प्रश्न की मुख्य माँग
- ब्रिक्स विरोध से अलग भारत के तटस्थ रूख के पीछे रणनीतिक तर्क
- भारत के रणनीतिक संतुलन से उत्पन्न मुद्दे
- लैटिन अमेरिका के प्रति नीति का पुनर्मूल्यांकन
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उत्तर
3 जनवरी, 2026 को ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व के तहत वेनेजुएला में अमेरिका का हालिया हस्तक्षेप ‘मुनरो सिद्धांत’ की संभावित वापसी का संकेत देता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार करके अमेरिका पश्चिमी गोलार्द्ध को अपने अनन्य प्रभाव क्षेत्र के रूप में पुनः स्थापित कर रहा है, जो संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेपकारी युद्धोत्तर मानदंडों को चुनौती देता है।
ब्रिक्स विरोध से अलग भारत के तटस्थ रूख के पीछे रणनीतिक तर्क
- द्विपक्षीय संबंधों को प्राथमिकता: भारत द्वारा संतुलित रुख अपनाना अमेरिका के साथ एक महत्त्वपूर्ण व्यापार समझौते और 50% दंडात्मक टैरिफ से राहत पाने के लिए वार्ता की आवश्यकता पर आधारित है।
- क्षेत्रीय हितों में कमी: पड़ोसी देशों या अफ्रीका के विपरीत, लैटिन अमेरिका भारत के प्रमुख सुरक्षा हितों के लिए कम प्राथमिकता वाला क्षेत्र बना हुआ है।
- उदाहरण: इस क्षेत्र के साथ भारत का व्यापार (45 अरब डॉलर) लैटिन अमेरिकी देशों के साथ चीन के व्यापार के 10% से भी कम है, जिससे तटस्थ रूख अपनाना एक सही निर्णय है।
- ब्रिक्स के भिन्न हित: जहाँ रूस और चीन मादुरो को अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखते हैं, वहीं भारत इस संकट को समुद्री स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखता है।
- निकटवर्ती पड़ोस पर ध्यान केंद्रित करना: रणनीतिक तटस्थ रूख यह सुनिश्चित करता है कि सक्रिय सीमा तनाव के दौरान पाकिस्तान या चीन जैसे पड़ोसी देशों को कोई कूटनीतिक लाभ प्रदान न करे।
भारत की रणनीतिक तटस्थ रूख से उत्पन्न मुद्दे
- नैतिक प्रभाव का क्षरण: एक संप्रभु राष्ट्राध्यक्ष के ‘अपहरण’ पर तटस्थ रूख साधने से अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के समर्थक के रूप में भारत की लंबे समय से चली आ रही साख कमजोर होती है।
- वैश्विक दक्षिण में विश्वसनीयता का संकट: भारत ‘वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व’ करने का प्रयास कर रहा है, ऐसे में किसी विकासशील राष्ट्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की निंदा न करने से चयनात्मक नैतिकता और दोहरे मानदंडों की धारणा उत्पन्न होती है।
- ब्रिक्स एकजुटता के जोखिम: संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर ब्रिक्स के अंतर्गत भारत द्वारा भिन्न रुख अपनाना इस समूह के विस्तार के साथ उसके अलग-थलग पड़ने की आशंका बढ़ा सकती है।
- उदाहरण: क्षेत्रीय अखंडता के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप पर लगातार तटस्थता भारत के लिए उस समय प्रतिकूल सिद्ध हो सकती है, जब वह अपने क्षेत्रीय विवादों पर ब्रिक्स समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
- ‘सलामी-स्लाइसिंग’ का उदाहरण: तटस्थ रूख अन्य शक्तियों को अपने क्षेत्र में ” प्रत्यक्ष कार्रवाई” करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे हिंद महासागर या LAC में भारत के हितों को संभावित रूप से खतरा हो सकता है।
- आर्थिक विविधीकरण: भारत को केवल ऊर्जा पर केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर लैटिन अमेरिका की 5.5 ट्रिलियन डॉलर की GDP का लाभ उठाना चाहिए, विशेष रूप से जब अमेरिका चीन से दूरी बनाने और ‘जोखिम कम करने’ के लिए दबाव डाल रहा है।
- उदाहरण: स्वच्छ ऊर्जा, औषधि निर्माण, फार्मा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में विस्तार करने का विशाल अवसर है और लगभग 65 करोड़ की आबादी का एक बड़ा बाजार है।
लैटिन अमेरिका के प्रति नीति का पुनर्मूल्यांकन
- कूटनीतिक विस्तार: एक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए, भारत को ‘प्रतिक्रियात्मक’ और केवल आदान-प्रदान संबंधी कूटनीति से हटकर विभिन्न देशों के साथ आपसी संबंध प्रगाढ़ करते हुए अधिक दूतावास और क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित करने की आवश्यकता है।
- महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा: लैटिन अमेरिका में विश्व के सबसे बड़े लीथियम और ताँबे के भंडार हैं, जो भारत के इलेक्ट्रिक वाहन और हरित ऊर्जा परिवर्तन के लिए आवश्यक हैं।
- उदाहरण: अमेरिका-चीन की तीव्र प्रतिस्पर्द्धा के बीच “लीथियम त्रिकोण” के साथ साझेदारी (अर्जेंटीना, बोलीविया, चिली) को सुरक्षित करने के लिए संबंधों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।
- प्रभाव क्षेत्रों का मुकाबला: इस क्षेत्र के साथ गहन संलग्नता भारत को एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन करने का अवसर देती है, जहाँ लैटिन अमेरिका केवल एक सामान्य साझेदार नहीं बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बने।
- उदाहरण के लिए: ‘गुटनिरपेक्षता’ से ‘बहुपक्षवाद’ की ओर बदलाव भारत को विचारधाराओं के बीच गठबंधन बनाने में मदद करता है, जिससे महाशक्तियों के प्रभाव का प्रतिरोध किया जा सकता है।
निष्कर्ष
वेनेजुएला के संबंध में भारत का ‘रणनीतिक संतुलन’ उसकी वर्तमान आर्थिक और सुरक्षा संबंधी निर्भरताओं का एक संतुलित आकलन दर्शाता है। ‘ग्लोबल साउथ’ का सही मायने में नेतृत्व करने के लिए, भारत को एक मूक दर्शक की भूमिका से हटकर एक सक्रिय भागीदार बनना होगा, जिससे भारत पश्चिमी गोलार्द्ध में आर्थिक सुदृढ़ता तथा अंतरराष्ट्रीय कानून एवं संयुक्त राष्ट्र चार्टर की मूल अवधारणा का सक्रिय भागीदार बने।
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