Q. उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष में बाघों से हटकर तेंदुओं और एशियाई काले भालुओं की ओर बदलाव देखने को मिल रहा है। इस प्रवृत्ति के पीछे के पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक कारकों का विश्लेषण कीजिए और हिमालयी क्षेत्र में सतत् मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व के लिए समग्र उपाय सुझाएँ। (10 अंक, 150 शब्द)

December 31, 2025

GS Paper IIIEnvironment & Ecology

प्रश्न की मुख्य माँग

  • मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीछे पारिस्थितिक कारक
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारक
  • सतत् सह-अस्तित्व के लिए समग्र उपाय

उत्तर

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहा है, जहाँ बाघों पर केंद्रित पारंपरिक धारणाएँ अब तेंदुओं और एशियाई काले भालुओं के साथ बढ़ते टकरावों से प्रतिस्थापित हो रही हैं। यह परिवर्तन संरक्षण संबंधी एक विरोधाभास से प्रेरित है, जहाँ एक प्रजाति की सफलता अनजाने में अन्य प्रजातियों को विस्थापित कर देती है और उन्हें मानव निर्मित क्षेत्रों में प्रवेश करना पड़ता है।

इस प्रवृत्ति के पीछे पारिस्थितिकी कारक

  • शिकारी जीवों का विस्थापन: प्रोजेक्ट टाइगर (वर्ष 1973) की सफलता के कारण मुख्य वनों में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिससे अधिक अनुकूलनशील तेंदुए सीमांत क्षेत्रों में विस्थापित कर दिए गए हैं।
    • उदाहरण: जिम कॉर्बेट और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की संख्या वर्ष 2023 तक 560 से अधिक हो गई, जिससे तेंदुए मानव बस्तियों में जाने के लिए मजबूर हो गए।
  • जलवायु परिवर्तन: बढ़ते तापमान के कारण एशियाई काले भालुओं की शीतनिद्रा की अवधि कम हो गई है, जिससे वे सर्दियों के महीनों में भी सक्रिय हो गए हैं, जबकि पारंपरिक रूप से वे इस दौरान निष्क्रिय रहते थे।
  • पर्यावास विखंडन: विद्युत लाइनों और सड़कों जैसी बड़े पैमाने की अवसंरचना परियोजनाओं ने सामुदायिक वनों को काटकर प्राकृतिक वन्यजीव गलियारों को नष्ट कर दिया है।
    • उदाहरण: वर्ष 1991-2021 की अवधि में उत्तराखंड में 58,684 हेक्टेयर वन क्षेत्र का भूमि हस्तांतरण किया गया, जो सभी राज्यों में चौथा सबसे अधिक है।
  • शिकार की कमी: बार-बार वनाग्नि और आक्रामक प्रजातियों ने प्राकृतिक चारे (जैसे ओक और जामुन) को नष्ट कर दिया है, जिससे भालुओं को बागों में भोजन की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारक

  • परित्यक्त बस्तियाँ: बड़े पैमाने पर हुए पलायन के कारण हजारों “वीरान गाँव” बन गए हैं, जो आक्रामक लैंटाना की घनी झाड़ियों में तब्दील हो गए हैं।
    • उदाहरण: एक दशक में पाँच लाख से अधिक लोग पहाड़ियों से पलायन कर चुके हैं, जिससे वीरान बस्तियों में शिकारी जानवरों के लिए सुरक्षित आवास बन गए हैं।
  • अपशिष्ट कुप्रबंधन: पहाड़ी कस्बों के आस-पास घरेलू जैविक अपशिष्ट और कूड़े के ढेरों का अनुचित निपटान भालू और तेंदुओं को आकर्षित करता है।
  • पशुधन की संवेदनशीलता: आवारा कुत्तों की अत्यधिक संख्या और असुरक्षित पशुधन वन-ग्राम सीमा पर रहने वाले तेंदुओं के लिए “आसान शिकार” प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: उत्तराखंड की लगभग 79% तेंदुआ आबादी अब संरक्षित क्षेत्रों से बाहर रहने का अनुमान है।
  • केंद्रीकृत प्रबंधन: वन प्रबंधन से पारंपरिक वन पंचायतों के अलगाव ने अग्नि सुरक्षा रेखाओं और वन स्वास्थ्य के रखरखाव में समुदाय की भूमिका को कम कर दिया है।
  • उदाहरण: नौकरशाही के केंद्रीकरण ने वर्ष 1931 के अधिनियम द्वारा स्थापित सामुदायिक नियंत्रण को धीरे-धीरे कम कर दिया है।

सतत् सह-अस्तित्व के लिए समग्र उपाय

  • तकनीकी हस्तक्षेप: सेंसर आधारित अलर्ट सिस्टम और रेडियो-टेलीमेट्री की तैनाती से ग्रामीणों को शिकारी जानवरों की गतिविधियों के बारे में प्रारंभिक चेतावनी मिल सकती है।
    • उदाहरण: उत्तराखंड सरकार संवेदनशील क्षेत्रों में सौलर बाड़ प्रणाली और AI-आधारित सेंसर अलर्ट सिस्टम तैनात कर रही है।
  • पर्यावास पुनर्स्थापन: देशी चौड़ी पत्ती वाले वनों (ओक/काफल) के पुनरुद्धार को प्राथमिकता देने से भालुओं और जंगली जानवरों के प्राकृतिक खाद्य चक्र को बहाल करने में मदद मिलेगी।
  • सामुदायिक सशक्तीकरण: वन पंचायतों को मजबूत करना और आधुनिक उपकरणों से लैस त्वरित प्रतिक्रिया दल (RRT) का गठन करना विश्वास की कमी को दूर कर सकता है।
  • जनसंख्या नियंत्रण: मानव-प्रधान क्षेत्रों में तेंदुओं और बंदरों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक नसबंदी कार्यक्रम लागू करना।
    • उदाहरण: राज्य सरकार ने हाल ही में सभी जिलों में वन्यजीव नसबंदी केंद्र स्थापित करने की घोषणा की है।

निष्कर्ष

हिमालयी संघर्ष संकट से निपटने के लिए “एकल प्रजाति पर केंद्रित दृष्टिकोण” से आगे बढ़कर एक एकीकृत परिदृश्य दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। पर्वतीय अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करके, प्रवासन को नियंत्रित करके और डेटा-आधारित सह-अस्तित्व के माध्यम से पारिस्थितिकी संतुलन को बहाल करके, उत्तराखंड अपने लचीले पर्वतीय समुदायों की आवश्यकताओं को अपनी विशिष्ट वन्यजीव विरासत के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

Uttarakhand is witnessing a shift in human–wildlife conflict from tigers to leopards and Asiatic black bears. Examine the ecological and socio-economic factors behind this trend and suggest holistic measures for sustainable human–wildlife coexistence in the Himalayan region. in hindi

Explore UPSC Foundation Course

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.