Q. जब दुनिया मुक्त व्यापार और बहुपक्षवाद से हटकर संरक्षणवाद (Protectionism) और द्विपक्षवाद (Bilateralism) की ओर बढ़ रही है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने क्या चुनौतियाँ हैं? इन चुनौतियों का सामना कैसे किया जा सकता है? (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियों को रेखांकित कीजिए। 
  • इन चुनौतियों का सामना करने के उपाय सुझाइए।

उत्तर

वैश्विक व्यवस्था के मुक्त व्यापार और बहुपक्षीय ढाँचों से हटकर संरक्षणवाद और द्विपक्षवाद की ओर बढ़ने के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को अब कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025 में बढ़ते आर्थिक विखंडन की चेतावनी दी गई है, जहाँ व्यापार बाधाएँ और गुट-आधारित गठबंधन भारत की वृद्धि, प्रतिस्पर्धात्मकता और वैश्विक बाज़ार तक पहुँच के लिए चुनौतियाँ पेश करते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियाँ

  • बाजार पहुँच में कमी: प्रमुख निर्यात गंतव्यों में शुल्क और गैर-शुल्क उपाय भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर रहे हैं।
    • उदाहरण: यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन और अमेरिका की शुल्क नीतियाँ भारतीय वस्तुओं के लिए बढ़ती बाधाओं को दर्शाती हैं।
  • निवेश में अनिश्चितता: विकसित देश विदेशी निवेश पर कड़े नियम लागू कर रहे हैं, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी अधिग्रहण और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करना कठिन हो जाता है, जो उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में उनकी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करता है।
  • मुद्रास्फीति का दबाव: वैश्विक स्तर पर निर्यात प्रतिबंध और आपूर्ति बाधाएँ इनपुट लागत को बढ़ाती हैं।
    • उदाहरण: वस्तुओं पर निर्यात नियंत्रण और युद्ध-जनित मूल्य वृद्धि ने भारत के आयात बिल को बढ़ाया है और आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित किया है।
  • सेवा क्षेत्र और गतिशीलता पर दबाव: विकसित देशों में कड़े वीज़ा नियम और डेटा विनियम भारत के IT–BPM निर्यात और कुशल श्रमिकों की आवाजाही को सीमित करते हैं, जिससे प्रमुख विदेशी मुद्रा स्रोत प्रभावित होता है।
  • पूँजी प्रवाह में अस्थिरता: वैश्विक अनिश्चितता पूँजी के बहिर्वाह को बढ़ा सकती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है और भारतीय कंपनियों के लिए उधारी महंगी हो जाती है।

इन चुनौतियों से निपटने के उपाय

  • निर्यात बाजारों का विविधीकरण: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मध्य-पूर्व में निर्यात बढ़ाकर कुछ सीमित बाजारों पर निर्भरता कम करना।
    • उदाहरण: भारत–अफ्रीका सहयोग, भारत–यूएई CEPA
  • घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करना: PLI योजना और मेक इन इंडिया के माध्यम से स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता कम करना तथा उच्च-मूल्य वाले निर्यात को प्रोत्साहित करना।
    • उदाहरण: इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा क्षेत्र।
  • रणनीतिक व्यापार समझौते: स्मार्ट द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों के माध्यम से शुल्क में कमी और मानकों तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करना।
    • उदाहरण: ब्रेक्जिट के बाद भारत–यू.के. मुक्त व्यापार वार्ताएँ।
  • वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVCs) में एकीकरण: इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और आईटी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जुड़कर उत्पादन का विस्तार, विशेषज्ञता और निर्यात को बढ़ावा देना।
  • व्यापार सुगमता और तकनीकी उन्नयन: बंदरगाहों, कस्टम प्रक्रियाओं और डिजिटल व्यापार प्रणालियों में सुधार कर निर्यात की लागत और समय को कम करना।
    • उदाहरण: पेपरलेस व्यापार पहल।

निष्कर्ष

भारत चयनात्मक और उच्च-गुणवत्ता वाले मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को क्षमता-वर्धक औद्योगिक नीतियों के साथ संयोजित कर सकता है, साथ ही WTO सुधार और व्यावहारिक सहयोग समूहों का समर्थन कर सकता है। मानक-अनुरूप निर्यात और विश्वसनीय आपूर्ति साझेदारियाँ सुनिश्चित करने से भारत की विश्वसनीयता मजबूत होगी, निवेश आकर्षित होगा और एक भरोसेमंद वैश्विक आर्थिक भागीदार के रूप में उसकी प्रतिष्ठा सुदृढ़ होगी।

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