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Q. "भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? क्या भय या घृणा फैलाने वाले अथवा हिंसा को भड़काने वाले भाषण भी इसके अंतर्गत आते है? भारत में फ़िल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से थोड़ा अलग धरातल पर क्यों खड़ी हैं? चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

September 22, 2023

GS Paper IIIndian Polity

उत्तर:

दृष्टिकोण:

  • परिचय: भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की अवधारणा का परिचय दीजिए।
  • मुख्य भाग
    • लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने में इसकी मूल अवधारणा और इसके महत्व को परिभाषित कीजिए।
    • भय या घृणा फैलाने वाले अथवा हिंसा को भड़काने वाले भाषण को परिभाषित कीजिए. घृणास्पद भाषण पर भारतीय संविधान के रुख और कानूनी प्रावधानों पर चर्चा कीजिए।
    • भारत में फिल्मों के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर जोर दीजिए।
    • अभिव्यक्ति के अन्य रूपों की तुलना में फिल्मों के अलग-अलग व्यवहार के पीछे के कारणों पर चर्चा कीजिए।
    • सीबीएफसी(CBFC) की भूमिका और इसमें शामिल व्यावसायिक हितों पर प्रकाश डालिए।
    • प्रासंगिक उदाहरण अवश्य प्रदान कीजिए।
  • निष्कर्ष: असीमित स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच आवश्यक संतुलन का सारांश देते हुए निष्कर्ष निकालिए।

परिचय:

भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” की अवधारणा एक मौलिक मानव अधिकार है, जो दुनिया भर के लोकतांत्रिक संविधानों में निहित है, गौरतलब है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भारत के प्रत्येक व्यक्ति को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी मिलती है। कुल मिलाकर यह व्यक्तिगत स्वायत्तता, लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने और विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का सार दर्शाता है।

मुख्य भाग: 

भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है कि  यह व्यक्तियों को प्रतिशोध, सेंसरशिप या कानूनी प्रतिबंधों के डर के बिना अपनी राय, अवधारणा और भावनाओं को व्यक्त करने की अनुमति देती है। यह स्वतंत्रता एक खुले संवाद को सुनिश्चित करके लोकतांत्रिक समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे सामाजिक, राजनीतिक और यहां तक कि आर्थिक प्रगति भी हो सकती है। 

क्या भय या घृणा फैलाने वाले अथवा हिंसा को भड़काने वाले भाषण भी इसके अंतर्गत आते हैं?:
हालाँकि अभिव्यक्ति की आज़ादी का दायरा बहुत व्यापक है, लेकिन यह पूर्ण नहीं है। दुनिया भर में एक प्रमुख बहस यह है कि क्या इस स्वतंत्रता में “घृणास्पद भाषण” शामिल है। घृणास्पद भाषण अभिव्यक्ति का कोई भी रूप है जो नस्ल, धर्म, जातीय मूल या लिंग जैसी विशेषताओं के आधार पर किसी समूह के खिलाफ भेदभाव करता है, बदनाम करता है या हिंसा या पूर्वाग्रह को उकसाता है।

भारत में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में नफरत फैलाने वाले भाषण शामिल नहीं हैं। भारतीय दंड संहिता (IPC) जैसे कानूनों में प्रावधान (धारा 153A, 153B, 295A, आदि) हैं जो सांप्रदायिक सद्भाव को बाधित करने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या विभिन्न समूहों के बीच वैमनष्य को बढ़ावा देने वाले भाषण को दंडित करते हैं। 

उदाहरण के लिए,
भारत में बार-बार उद्धृत किया जाने वाला उदाहरण सलमान रुश्दी की पुस्तक “द सैटेनिक वर्सेज” पर प्रतिबंध के रूप में दिखाई देता है। इस पुस्तक को संभावित रूप से एक विशेष समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाला माना गया, जिसके कारण इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 

भारत में फ़िल्में – अभिव्यक्ति का एक अलग स्तर:
भारत में फ़िल्में न केवल अभिव्यक्ति का माध्यम हैं, बल्कि अभिव्यक्ति की शक्तिशाली उपकरण भी हैं जो लोकप्रिय संस्कृति और सामाजिक मानदंडों को प्रभावित करती हैं। भारत में सिनेमा की व्यापक पहुंच को देखते हुए, उन्हें निम्नलिखित कारणों से अभिव्यक्ति के अन्य रूपों की तुलना में थोड़ा अलग स्थान पर रखा गया है:

  • व्यापक प्रभाव: फिल्मों में सामाजिक धारणाओं, मूल्यों और एक दूसरे के प्रति व्यवहारों को आकार देने की शक्ति होती है। इस विशाल प्रभाव के साथ यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी आती है कि सामग्री गुमराह न करे या नुकसान न पहुंचाए।
  • व्यावसायिक पहलू: व्यक्तिगत राय या आकस्मिक बातचीत के विपरीत, फिल्मों में महत्वपूर्ण व्यावसायिक हित शामिल होते हैं, जिससे रचनात्मकता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • प्रमाणन के माध्यम से विनियमन: केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) भारत में फिल्मों की समीक्षा और वर्गीकरण करता है। जबकि कुछ लोगों का तर्क है कि यह सेंसरशिप का एक रूप है, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता बनाए रखने के आधार पर इसका बचाव किया जाता है।

उदाहरण के लिए,
फिल्म “पद्मावत” को ऐतिहासिक शख्सियतों की कथित गलत प्रस्तुति, फिल्मों की संवेदनशीलता और उनके संभावित सामाजिक प्रभाव को प्रदर्शित करने के कारण कई राज्यों में कई विवादों और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।

निष्कर्ष:

भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक होते हुए भी अपनी जिम्मेदारियों और सीमाओं के साथ आती है, विशेषकर भारत जैसे विविध और बहुलवादी समाज में। हालाँकि यह सुनिश्चित करना सर्वोपरि है कि लोगों की आवाज़ें दबाई न जाएँ, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ऐसी स्वतंत्रताएँ नफरत या उकसावे का साधन न बनें। भारत में फिल्मों की अनूठी स्थिति कलात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच सावधानीपूर्वक चलने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

What do you understand by the concept “freedom of speech and expression”? Does it cover hate speech also? Why do the films in India stand on a slightly different plane from other forms of expression? Discuss in hindi

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