प्रश्न की मुख्य माँग
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और ‘रूप की अपेक्षा सार’ सिद्धांत
- कानूनी निश्चितता और निवेशक विश्वास पर प्रभाव
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उत्तर
टाइगर ग्लोबल मामला (2026), वर्ष 2018 में फ्लिपकार्ट की 1.6 बिलियन डॉलर की हिस्सेदारी की वॉलमार्ट को बिक्री से संबंधित एक उच्च-स्तरीय कर विवाद है। इसके मूल में ‘रूप से अधिक सार’ का सिद्धांत निहित है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने कर संधियों के साथ कानूनी दस्तावेजीकरण और तकनीकी अनुपालन की तुलना में निवेश संरचना की वास्तविक आर्थिक वास्तविकता और वाणिज्यिक उद्देश्य को प्राथमिकता दी।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और ‘रूप की अपेक्षा सार’
- शेल कंपनियों की अस्वीकृति: सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के कर-राजस्व के दावे को बनाए रखा और माना कि टाइगर ग्लोबल की मॉरीशस इकाइयाँ केवल ‘कंड्यूइट्स या पास-थ्रू व्हीकल्स (कर बचाने के उद्देश्य से निर्मित इकाइयाँ) थीं, जिनमें स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार या वाणिज्यिक सार का अभाव था।
- उदाहरण के लिए: न्यायालय ने ध्यान दिया कि इन कंपनियों के ‘प्रमुख और बुद्धिमान व्यक्ति’ मॉरीशस के बजाय अमेरिका (टाइगर ग्लोबल मैनेजमेंट LLC) में स्थित थे।
- कर निवास प्रमाण-पत्र (TRC) की पर्याप्त प्रमाण के रूप में अस्वीकार्यता: निर्णय ने स्थापित किया कि कर, निवास प्रमाण-पत्र, अब कर जाँच के खिलाफ एक “अचूक” ढाल नहीं है, अगर अंतर्निहित संरचना एक अस्वीकार्य कर बचाव व्यवस्था के रूप में उजागर होती है।
- उदाहरण के लिए: सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के आदेश को पलट दिया कि कर निवास प्रमाण-पत्र पर्याप्त प्रमाण हैं, इस निर्णय से अब कर अधिकारियों को प्रमाण-पत्र से परे भी जाँच की अनुमति मिल गई।
- सामान्य कर परिवर्जन रोधी नियम (GAAR) और ग्रैंडफादरिंग अवधारणा: न्यायालय ने निर्णय दिया कि सामान्य कर परिवर्जन रोधी नियम (GAAR) संधि लाभों को रद्द कर सकते हैं, यहाँ तक कि ‘ग्रैंडफादर्ड’ निवेशों (वर्ष 2017 से पहले के) के लिए भी, यदि व्यवस्था में वाणिज्यिक तर्क का अभाव है।
- कराधान में संप्रभुता: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय मूल्य-निर्माण से उत्पन्न होने वाली आय पर कर लगाना एक अंतर्निहित संप्रभु अधिकार है, जिसे कृत्रिम ऑफशोर मार्गों द्वारा कमजोर नहीं किया जा सकता है।
कानूनी निश्चितता और निवेशक विश्वास पर प्रभाव
- पूर्वानुमेयता का क्षरण: CBDT के लंबे समय से चले आ रहे परिपत्रों और वर्ष 2003 के आजादी बचाओ आंदोलन के पूर्व उदाहरण को दरकिनार करते हुए, यह निर्णय स्थापित कर नियोजन में ‘संधि जोखिम’ को पुनः प्रस्तुत करता है।
- उदाहरण के लिए: कर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह उन निवेशकों के लिए ‘पूरी तरह से भ्रमित करने वाला संदेश’ है, जिन्होंनें ग्रैंडफादरिंग से संबंधित स्पष्ट सरकारी आश्वासनों पर भरोसा किया थे।
- मुकदमेबाजी जोखिम में वृद्धि: इस निर्णय से एक ‘पैंडोरा बॉक्स’ खुल गया है, जिससे कर विभाग को मॉरीशस या सिंगापुर के माध्यम से संधि लाभों का दावा करने वाले सैकड़ों पुराने मामलों को पुनः खोलने की अनुमति मिल सकती है।
- उच्च अनुपालन लागत: विदेशी निजी इक्विटी/जोखिम पूँजी निधियों को अब संधि क्षेत्राधिकार में “गहरा सार” (स्थानीय कर्मचारी, कार्यस्थल, स्वतंत्र बोर्ड) प्रदर्शित करना होगा, जिससे सौदा करना महँगा हो जाएगा।
- उदाहरण के लिए: भारतीय स्टार्ट-अप सौदों में निकास योजना और क्षतिपूर्ति खंड को अब संभावित कर देनदारियों के लिए महत्त्वपूर्ण पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।
- पूँजी प्रवाह का बाधित होना: ऐसे समय में जब भारत शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बहिर्वाह का सामना कर रहा है, कथित न्यायिक-नीति विचलन गैर-सूचीबद्ध इक्विटी क्षेत्र में निवेशकों के उत्साह को कम कर सकता है।
निष्कर्ष
हालाँकि यह निर्णय बड़े स्तर पर कर चोरी के विरुद्ध भारत की राजकोषीय संप्रभुता के दावे को न्यायसंगत रूप से स्थापित करता है, लेकिन इससे नियामक अस्थिरता का माहौल बनने का जोखिम है। “विकसित भारत” के लिए, सरकार को स्पष्ट और विधायी दिशा-निर्देशों के संभावित दुरुपयोग को रोकने वाले उपायों को लागू करना होगा। साथ ही निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए वित्त मंत्रालय को यह स्पष्ट करना होगा कि “सार” परीक्षण मनमाने ढंग से लागू नहीं किए जाएँगे, यह सुनिश्चित करते हुए कि भारत एक नियम-आधारित, प्रतिस्पर्द्धी निवेश गंतव्य बना रहेगा।
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