Q. [साप्ताहिक निबंध] वास्तविक नीतिगत उन्नति केवल प्रदान करने से नहीं, बल्कि सशक्तीकरण से होती है। (1200 शब्द)

निबंध का प्रारूप

  • प्रस्तावना: इस निबंध की शुरुआत किसी कहानी या प्रभावशाली उद्धरण से कीजिए। 

वास्तविक या सच्ची नीति क्या है?

किसी नीति को योजनाओं के एक समूह के रूप में नहीं बल्कि मानव क्षमता को उन्मुक्त करने के एक दूरदर्शी उपकरण के रूप में परिभाषित कीजिए। 

  • प्रावधान: प्रत्यक्ष लाभ (सब्सिडी, भत्ता) देना। 
  • सशक्तिकरण: लोगों को परिवर्तन का माध्यम या अभिकर्ता बनने में सक्षम बनाना (शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, भागीदारी)। 

उत्थान के लिए सशक्तिकरण क्यों आवश्यक है?

  • सतत विकास: अस्थायी लाभ अप्रभावी हो जाते हैं; क्षमताएं बनी रहती हैं। 
  • गरिमा: लोग आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, आश्रित नहीं।
  • लोकतांत्रिक नैतिकता: सशक्तिकरण सूचित भागीदारी और जवाबदेही को बढ़ावा देता है। 

नीति के माध्यम से सशक्तिकरण के आयाम

  • आर्थिक सशक्तिकरण
  • शैक्षिक और सूचनात्मक सशक्तिकरण
  • सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण

सशक्तिकरण के बिना मात्र व्यवस्था या प्रावधान  के जोखिम

  • निर्भरता संबंधी संस्कृति: पहल और आत्मनिर्भरता को कमजोर करती है।
  • रिसाव और दुरुपयोग: शीर्ष-से-नीचे की योजनाएं प्रायः डिलीवरी या वितरण में विफल हो जाती हैं। 
  • असमानता तथा अपवर्जन: संरचनात्मक मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। 

प्रतिवाद: प्रावधान(नियोजित करना) कभी-कभी क्यों आवश्यक होता है

  • मानवीय अनिवार्यता के रूप में प्रावधान। 
  • समान अवसर उपलब्ध कराना। 
  • सशक्तिकरण में समय लगता है – प्रावधान अंतराल को भरता है।

सशक्तिकरण-उन्मुख नीतियों के समकालीन उदाहरण

  • डिजिटल इंडिया: केवल सेवाएं ही नहीं, बल्कि पहुंच और समावेशन को सक्षम बनाना।
  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम: डेटा-संचालित विकास प्रदान करने के लिए प्रशासन को सशक्त बनाता है।
  • जल जीवन मिशन: केवल पाइप लाइन पहुंचाने तक ही सीमित नहीं, बल्कि जल प्रबंधन में समुदाय को भी शामिल किया गया है।

सशक्तिकरण-आधारित नीति निर्माण की चुनौतियाँ

  • अल्पावधि प्रावधान के लिए लोकलुभावन दबाव।
  • रूपांतरात्मक बदलाव को अमल में लाने की स्थानीय क्षमता कमजोर।
  • दृढ़संकल्पित अभिजात वर्ग द्वारा विकेंद्रीकरण का प्रतिरोध।

नीति के माध्यम से सशक्तिकरण को बढ़ावा देने वाले सक्षमकर्ता

  • अधिकार-आधारित ढाँचे (जैसे मनरेगा, आरटीआई)।
  • योजना और कार्यान्वयन में सामुदायिक भागीदारी।
  • क्षमता निर्माण और शिक्षा केंद्रीय स्तंभ होंगे।
  • लोगों को नीति बनाने में सहायता करने के लिए फीडबैक लूप (जैसे सामाजिक ऑडिट, MyGov)।

निष्कर्ष: सशक्तिकरण अच्छी नीति की आत्मा है। 

उत्तर

ओडिशा के एक छोटे से गाँव में, एक सरकारी कल्याणकारी योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को दैनिक राशन उपलब्ध कराया जाता था। इन लाभार्थियों में एक युवा विधवा मीना भी थी, जिसके दो बच्चे थे। वर्षों तक, उसका जीवन इसी राशन संबंधी प्रावधानों पर निर्भर रहा। किन्तु  एक दिन, मुफ्त राशन प्राप्त करने के बजाय, उन्हें राज्य आजीविका मिशन के तहत सिलाई में कौशल प्रशिक्षण की पेशकश की गई। अनिच्छा से, वह इसमें शामिल हो गई। आज मीना एक छोटा सा सिलाई का व्यवसाय चलाती हैं  तथा अपने बच्चों को विद्यालय भेजती हैं  एवं अपने गांव की अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण देती हैं। निर्भरता से गरिमा तक की उनकी यात्रा एक अद्वितीय सत्य को दर्शाती है। जहाँ सहायता आवश्यक है, वहीं सशक्तिकरण परिवर्तनकारी होता है।

मीना का परिवर्तन वास्तव में इस सिद्धांत को मूर्त रूप देता है, जैसा कि लाओ त्ज़ु ने हमें याद दिलाया है, “किसी व्यक्ति को एक मछली दे दो तो आप उसे एक दिन खिलाओगे; किसी व्यक्ति को मछली पकड़ना सिखा दो और आप उसे जीवन भर के लिए भोजन दे दोगे” यह शाश्वत ज्ञान प्रावधान और सशक्तिकरण के बीच अंतर को दर्शाता है। 

इस अंतर्दृष्टि को शासन में लागू करते हुए, लोक  नीति को अल्पकालिक राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालिक क्षमता निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए, जैसा कि अमर्त्य सेन ने अपने सामर्थ्य दृष्टिकोण में रेखांकित किया है, जिससे व्यक्तियों को आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और सहभागी नागरिक बनने में सक्षम बनाया जा सके। जहाँ राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने सबसे कमज़ोर लोगों की सहायता करे, वहीं व्यापक उद्देश्य लोगों की क्षमता का निर्माण होना चाहिए, ताकि व्यक्ति और समुदाय केवल जीवित रहने से आगे बढ़ सकें और अपनी शर्तों पर स्वतंत्र रूप से फलने-फूलने में सक्षम हो सकें।

वास्तविक या सच्ची नीति क्या है?

सच्ची नीति शासन तंत्र से आगे बढ़कर मानवीय क्षमता का विकास करके परिवर्तन को बढ़ावा देती है। जबकि प्रावधान तात्कालिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं, वहीं सशक्तिकरण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कौशल और भागीदारी में निरंतर निवेश के माध्यम से क्षमताओं को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, मध्याह्न भोजन योजना न केवल पोषण प्रदान करती है, बल्कि स्कूल में बच्चों की उपस्थिति और उनके सीखने की क्षमता में भी सुधार करती है, जो यह दर्शाता है कि नीति किस प्रकार पोषण प्रदान कर सकती है और सशक्त भी बना सकती है। 

संसाधन हस्तांतरण एवं क्षमता निर्माण को एक साथ जोड़कर, वास्तविक नीति लाभार्थियों को परिवर्तन के वाहकों में बदल देती है, ऐसे लोग जो न केवल सहायता प्राप्त करते हैं बल्कि विचारों का योगदान भी देते हैं, अपने विकास की ज़िम्मेदारी लेते हैं और अपने समुदायों के भविष्य को आकार देने में भाग लेते हैं। यह समग्र दृष्टिकोण निष्क्रिय प्राप्ति को सक्रिय सहभागिता में बदल देता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शासन न केवल राहत प्रदान करे, बल्कि लचीलापन और दीर्घकालिक विकास भी प्रदान करे। 

सशक्तिकरण उत्थान का मूल है

सशक्तिकरण के बिना प्रावधान से निर्भरता पैदा होने का खतरा रहता है। इसके विपरीत, यथार्थ सशक्तिकरण, गरिमा को ध्यान में रखते हुए, सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाता है, तथा नवाचार को बढ़ावा देकर स्थायी प्रगति सुनिश्चित करता है। यह लोगों को विकास में निष्क्रिय प्राप्तकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि सक्रिय हितधारक के रूप में मान्यता देता है। सशक्तिकरण दीर्घकालिक क्षमता का निर्माण करता है, जिससे व्यक्तियों को अपने जीवन को आकार देने तथा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सार्थक रूप से भाग लेने के लिए आत्मविश्वास, कौशल और स्वायत्तता प्राप्त होती है। यह स्वामित्व को पोषित करने के साथ भागीदारी को प्रोत्साहित करता है, तथा विकास को स्थानीय नेतृत्व और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक निचले स्तर की, सहभागितापूर्ण प्रक्रिया में परिवर्तित करता है।

इसके अलावा, सशक्तिकरण लोकतांत्रिक शासन के सिद्धांतों के अनुरूप है। इस सिद्धांत के अनुसार यह स्वीकार किया जाता है कि लोग केवल प्रशासित किये जाने वाले लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि वे अपने भाग्य को आकार देने में सक्रिय हितधारक हैं। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) जैसे कार्यक्रमों ने प्रदर्शित किया  है कि किस प्रकार महिलाओं के नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों ने न केवल ऋण प्राप्त करके, बल्कि आत्मविश्वास, मत और नेतृत्व प्राप्त करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदल दिया है। 

लोक नीति में बहुआयामी अनिवार्यता के रूप में सशक्तिकरण

सशक्तिकरण कोई एक-आयामी लक्ष्य नहीं है, यह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि में प्रकट होता है। इसलिए, लोक नीति को ऐसे सहायक पारिस्थितिकी तंत्रों का निर्माण करने का प्रयास करना चाहिए जो व्यक्तियों को पहल करने, अवसरों तक पहुंचने और आत्मविश्वास के साथ अपने अधिकारों का दावा करने की अनुमति दें। 

आर्थिक सशक्तिकरण: निर्वाह से सतत विकास तक

आर्थिक आत्मनिर्भरता सार्थक सशक्तिकरण का आधार है। जब व्यक्ति आय-उत्पादक कौशल, ऋण तक पहुँच और रोज़गार के अवसरों से लैस होते हैं, तो वे निर्भरता से उत्पादकता की ओर बढ़ते हैं। आर्थिक सशक्तिकरण आत्म-सम्मान को बढ़ाता है, गरिमा को बढ़ावा देता है और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) युवाओं को बाज़ार-संबंधित कौशल से लैस करती है, जिससे रोज़गार क्षमता में सुधार होता है और उद्यमिता को बढ़ावा मिलता है। इसी प्रकार, स्वयं सहायता समूहों (SHG) और सूक्ष्म-ऋण की पहुँच से लाखों लोगों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को, आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने में मदद मिली है।

आर्थिक आत्मनिर्भरता सार्थक सशक्तिकरण का आधार है। जब व्यक्तियों को आय-उत्पादक कौशल, ऋण तक पहुंच और रोजगार के अवसर उपलब्ध हो जाते हैं, तो वे निर्भरता से उत्पादकता की ओर अग्रसर होते हैं। आर्थिक सशक्तिकरण आत्म-सम्मान व गरिमा को बढ़ावा देता है, तथा भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) युवाओं को बाजार-प्रासंगिक कौशल से लैस करती है, जिससे  रोजगार क्षमता में सुधार होता है व उद्यमशीलता को बढ़ावा मिलता है। इसी प्रकार, स्वयं सहायता समूहों (SHG) और सूक्ष्म ऋण योजनाओं ने लाखों लोगों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनने में सक्षम बनाया है। 

शैक्षिक और सूचनात्मक सशक्तिकरण: चुनने की शक्ति को प्रज्वलित करना

शिक्षा ज्ञान का विस्तार करती है तथा जीवन के विकल्पों में सुधार लाकर सशक्त बनाती है। डिजिटल युग में, समय पर और प्रासंगिक जानकारी तक पहुँच लोगों को शासन से जुड़ने में सक्षम बनाने के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब व्यक्तियों को जानकारी दी जाती है, तो वे अधिकारों का दावा कर सकते हैं, जवाबदेही की मांग कर सकते हैं, और समाज में सार्थक रूप से भाग ले सकते हैं। उदाहरण के लिए, डिजिटल इंडिया पहल और उमंग जैसे प्लेटफॉर्म नागरिकों को सरकारी सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं और शिक्षण संसाधनों तक पहुँच प्रदान करके सूचना के अंतर को पाटते हैं। 

सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण: हाशिए से मत तक

सशक्तिकरण में ऐतिहासिक और प्रणालीगत बहिष्करणों को भी संबोधित किया जाना चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण यह सुनिश्चित करता है कि समाज के सभी वर्गों, विशेषकर महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को अपनी चिंताओं को व्यक्त करने और नीतियों को आकार देने के लिए मंच उपलब्ध हो। पंचायती राज संस्थाओं में अनिवार्य आरक्षण के माध्यम से लाखों महिलाएं राजनीतिक जीवन में प्रवेश कर चुकी हैं और स्थानीय अंतर्दृष्टि तथा समावेशन प्राथमिकताओं के साथ शासन में बदलाव ला रही हैं। यह विकेन्द्रीकृत भागीदारी सामुदायिक स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने में मदद करती है।

सशक्तिकरण के बिना अति-प्रावधान के जोखिम

तात्कालिक ज़रूरतों और कमज़ोरियों या भेद्यता को दूर करने के लिए प्रावधान ज़रूरी होते हुए भी, अगर लोगों की क्षमता और स्व-सहायता के विकास के प्रयासों से इसे पूरा न किया जाए, तो यह अनुत्पादक साबित हो सकता है। जब कल्याणकारी उपाय केवल सक्षमता प्रदान किए बिना दान देने पर केंद्रित होते हैं, तो उनसे दीर्घकालिक अकुशलताएं और सामाजिक असंतुलन पैदा होने का खतरा होता है। इससे निर्भरता की मानसिकता को बढ़ावा मिलता है, जहां व्यक्ति और समुदाय स्वयं के उत्थान के लिए सक्रिय रूप से प्रयास किए बिना राज्य से नियमित सहायता की अपेक्षा करने लगते हैं। इससे पहल करने की क्षमता व उद्यमशीलता की भावना कमज़ोर होती है, तथा नवाचार हतोत्साहित होता है। 

प्रावधान कभी-कभी आवश्यक होता है

यद्यपि सशक्तिकरण एक आदर्श नीतिगत लक्ष्य है, फिर भी प्रारंभिक चरणों में, विशेष रूप से सुभेद्य समूहों के लिए, प्रावधान प्रायः आवश्यक होते हैं। कोविड-19 महामारी जैसे संकटों में, भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य सेवा के लिए तत्काल सहायता महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया, जिससे विस्तृत पैमाने पर भुखमरी की समस्या से निजात मिली। 

संघर्षग्रस्त या अल्प-शासित क्षेत्रों में, बुनियादी प्रावधान राज्य में विश्वास बनाने में मदद करते हैं तथा गहन सुधारों के लागू होने से पहले समुदायों को स्थिर करते हैं। यह एक विश्वास-निर्माण उपाय के रूप में कार्य करता है जो नागरिकों की सहभागिता को सक्षम बनाता है। 

इसके अतिरिक्त, शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण या कानूनी जागरूकता के माध्यम से सशक्तिकरण में समय लगता है। इस अवधि के दौरान, प्रावधानीकरण से लोगों को और अधिक हाशिए पर जाने से रोका जा सकता है तथा लोगों को अवसरों का लाभ उठाने के लिए स्थान और सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।

कुंजी यह सुनिश्चित करने में निहित है कि कोई प्रावधान स्थायी निर्भरता न बन जाए, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान के लिए 

एक प्रमोचन मंच बन जाए। 

समकालीन समय में सशक्तिकरण उन्मुख नीतियों की प्रासंगिकता 

भारत विश्व में सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में से एक है। केवल सब्सिडी या नकद हस्तांतरण प्रदान करने से इस क्षमता का दोहन नहीं किया जा सकता। इस जनसांख्यिकी को एक उत्पादक शक्ति में बदलने के लिए शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता और डिजिटल पहुँच के माध्यम से सशक्तिकरण आवश्यक है। महामारी के बाद की दुनिया में, आत्मनिर्भर भारत जैसी नीतियां स्थानीय समाधानों, आत्मनिर्भरता और विकेन्द्रीकृत योजना को बढ़ावा देकर जीवन और आजीविका के पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण हो गई हैं। कोविड-19 संकट ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की भेद्यताओं और बाहरी सहायता पर निर्भरता को उजागर कर दिया है, तथा भविष्य में आने वाले झटकों का सामना करने के लिए व्यक्तियों और समुदायों को सशक्त बनाने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। 

इसके अतिरिक्त, गहरी जातिगत, लैंगिक और क्षेत्रीय असमानताओं वाले देश में, समान पहुँच और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सशक्तिकरण आवश्यक है। आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल हाशिए पर स्थित समूहों में आत्मनिर्भरता लाकर आर्थिक पुनरुद्धार और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देती है। पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण, ग्रामीण महिलाओं के लिए डिजिटल साक्षरता, तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति उद्यमिता योजनाएं जैसे उपाय दर्शाते हैं कि सशक्तिकरण किस प्रकार सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाता है। ये प्रयास दर्शाते हैं कि आज पुनर्निर्माण को पुनर्प्राप्ति से आगे बढ़कर एक अधिक समावेशी और समतामूलक समाज को बढ़ावा देना होगा।

सशक्तिकरण-आधारित नीति की चुनौतियाँ

सशक्तिकरण-आधारित नीतियाँ विकास के लिए एक दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रदान करती हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन प्रायः संरचनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों के कारण बाधित होता है। एक प्रमुख बाधा त्वरित, दृश्यमान लाभ पहुंचाने की राजनीतिक इच्छा है। लोकतंत्र में सरकारें प्रायः लोकलुभावन दबावों के आगे झुक जाती हैं, तथा मुफ्त बिजली, ऋण माफी या नकद हस्तांतरण जैसे अल्पकालिक प्रावधानों को प्राथमिकता देती हैं। चुनावी दृष्टि से आकर्षक होते हुए भी, ये उपाय शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता समर्थन जैसे दीर्घकालिक सशक्तिकरण प्रयासों पर भारी पड़ सकते हैं।

इसके अतिरिक्त, प्रायः संस्थागत जड़ता और सरकार तथा नौकरशाही के उच्च स्तर पर नियंत्रण साझा करने में अनिच्छा देखी जाती है। इस प्रतिरोध के परिणामस्वरूप स्थानीय संस्थाओं के लिए अपर्याप्त वित्तपोषण, खराब क्षमता निर्माण और सीमित स्वायत्तता उत्पन्न होती है, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियों की योजना बनाने, उन्हें लागू करने और निगरानी करने की उनकी क्षमता गंभीर रूप से कमजोर हो जाती है।

आगे बढ़ते हुए, भले ही सशक्तिकरण-उन्मुख नीतियाँ अच्छी तरह से सृजित की गई हों, उनकी सफलता ज़मीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन तंत्र पर निर्भर करती है। कई क्षेत्र, विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्र, खराब बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी और अकुशल निगरानी प्रणालियों से ग्रस्त हैं। यह कमजोर प्रशासनिक क्षमता कौशल निर्माण, उद्यमशीलता को बढ़ावा देने, या सहभागी शासन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई गई योजनाओं के अंतिम चरण के कार्यान्वयन में बाधा डालती है।

सशक्तिकरण को क्या सक्षम बनाता है?

सशक्तिकरण कोई अमूर्त बात नहीं है, इसके लिए ठोस तंत्र, संस्थागत समर्थन और व्यक्तियों को अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करने तथा अपने अधिकारों का दावा करने के लिए सक्षम वातावरण की आवश्यकता होती है। भारत में एक प्रमुख कारक कल्याण को दान के रूप में देखने से लेकर कानूनी अधिकार के रूप में देखने की प्रवृत्ति रही है। मनरेगा, सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे अधिकार-आधारित कानूनों ने अधिकारों को संस्थागत रूप दिया है, जिससे नागरिकों को सेवाओं तक पहुँच और जवाबदेही की माँग करने की शक्ति मिली है। मनरेगा ग्रामीण रोज़गार का कानूनी अधिकार सुनिश्चित करता है, जबकि सूचना का अधिकार नागरिकों को पारदर्शिता की तलाश करने और भ्रष्टाचार को चुनौती देने का अधिकार देता है।

सच्चे सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी है कि लोगों को उनके जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में शामिल किया जाए। ग्राम सभा, वार्ड समितियां और सामाजिक लेखा परीक्षा जैसी व्यवस्थाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि शासन न केवल लोगों के लिए हो, बल्कि लोगों द्वारा भी हो। उदाहरण के लिए, मनरेगा के अंतर्गत सामाजिक लेखा-परीक्षण से ग्रामीणों को व्यय और कार्यान्वयन की समीक्षा करने का अवसर मिलता है, जिससे जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है। यह सहभागी दृष्टिकोण शासन में विश्वास पैदा करता है और नागरिकों में स्वामित्व की भावना को बढ़ावा देता है।

आगे बढ़ते हुए, प्रौद्योगिकी पहुंच, दक्षता और पारदर्शिता में सुधार करके सशक्तिकरण के एक शक्तिशाली प्रवर्तक के रूप में उभरी है। JAM  (जन धन-आधार-मोबाइल) ने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) में क्रांति ला दी है, जिससे कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में लीकेज और बिचौलियों का उन्मूलन हो गया है। इसी प्रकार, Mygov, उमंग जैसे प्लेटफॉर्म और आकांक्षी जिला कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों में रियल-टाइम डैशबोर्ड ने शासन को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बना दिया है।

साथ मिलकर, ये तंत्र शासन दर्शन में बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ऊपर से नीचे की ओर प्रावधान से नीचे से ऊपर की ओर सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहा है। इस प्रकार, सशक्तिकरण केवल एक नीतिगत लक्ष्य नहीं, बल्कि लाखों लोगों के लिए एक जीवंत अनुभव बन जाता है।

सशक्तिकरण सच्ची नीति का आधार है

एक न्यायसंगत और समावेशी समाज की खोज में, नीति को केवल सेवाएँ प्रदान करने की भूमिका से आगे बढ़कर, क्षमता को जागृत करना होगा। सच्चा शासन निर्भरता बढ़ाकर नहीं, बल्कि क्षमताओं का विस्तार करके उन्नत होता है। सशक्तिकरण यह सुनिश्चित करता है कि नागरिक राज्य की उदारता के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता न बनें, बल्कि अपने भाग्य को आकार देने में सक्रिय भागीदार बनें। चाहे अधिकार-आधारित अधिकारों के माध्यम से, जमीनी स्तर पर भागीदारी के माध्यम से, या डिजिटल समावेशन के माध्यम से, लक्ष्य ऐसी प्रणालियों का निर्माण करना होना चाहिए जो व्यक्तियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आत्मविश्वास, ज्ञान और उपकरण प्रदान करें।

जैसा कि बेयोंसे ने ठीक ही कहा था, “शक्ति आपको दी नहीं जाती। आपको इसे लेना पड़ता है।” इसी प्रकार, सशक्तिकरण कोई विलासिता या आदर्श नहीं है, यह जीवंत लोकतंत्र, आर्थिक प्रत्यास्थता और सामाजिक न्याय के लिए एक आवश्यकता है। किसी राष्ट्र की सच्ची प्रगति इस बात में नहीं है कि वह अपने लोगों को कितनी सुविधा प्रदान करता है, बल्कि इस बात में है कि वह उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने और अपने सपनों का भविष्य बनाने में कितनी मजबूती से उन्हें सक्षम बनाता है।

To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.