प्रश्न की मुख्य माँग
- धान–गेहूँ स्थिरीकरण के सामाजिक–आर्थिक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
- धान–गेहूँ स्थिरीकरण के पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा कीजिए।
- प्रभावी फसल विविधीकरण के लिए नीतिगत उपायों वर्णन कीजिए।
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उत्तर
भारत में हरित क्रांति की सफलता ने धान और गेहूँ की व्यापक खेती के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की। किंतु समय के साथ यह फसल पैटर्न एक राजकोषीय तथा पारिस्थितिकी बोझ के रूप में उभरने लगा है, जिससे संसाधनों के क्षय, सब्सिडी संबंधी विकृतियों तथा भारत की कृषि प्रणाली की दीर्घकालिक स्थिरता पर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
धान–गेहूँ स्थिरीकरण के सामाजिक–आर्थिक प्रभाव
- सरकार पर बढ़ता राजकोषीय बोझ: चावल और गेहूँ के लिए बड़े पैमाने पर खरीद, भंडारण तथा इनपुट सब्सिडी सार्वजनिक वित्त पर दबाव डालते हैं।
- उदाहरण: भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अंतर्गत सरकार को खरीद और खाद्य सब्सिडी पर भारी व्यय करना पड़ता है।
- फसल चयन के लिए विकृत प्रोत्साहन: निश्चित खरीद व्यवस्था किसानों को दलहन, तिलहन और मोटे अनाज जैसी फसलों की कृषि से हतोत्साहित करती है, जबकि इनका पोषण और बाजार मूल्य अधिक है।
- उदाहरण: धान और गेहूँ भारत के लगभग 220 मिलियन हेक्टेयर सकल वुवाई क्षेत्र का लगभग 38% भाग हैं।
- क्षेत्रीय कृषि असंतुलन: इन फसलों का कुछ विशेष राज्यों में अधिक संकेंद्रण अंतर-राज्यीय कृषि असमानताओं को बढ़ाता है।
- उदाहरण: पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य धान-गेहूँ एकफसली प्रणाली में फँसे हुए हैं।
- बाजार और पोषण संबंधी विकृतियाँ: अनाज का अत्यधिक उत्पादन आहार विविधता को प्रभावित करता है और कुछ खाद्य वस्तुओं के आयात पर निर्भरता बढ़ाता है।
- उदाहरण: बड़े अनाज भंडार होने के बावजूद भारत खाद्य तेलों का प्रमुख आयातक बना हुआ है।
- किसानों की आय की सहनशीलता में कमी: सीमित फसल आधार पर निर्भरता किसानों को मूल्य झटकों, जलवायु जोखिमों और नीतिगत परिवर्तनों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।
धान–गेहूँ स्थिरीकरण के पर्यावरणीय प्रभाव
- भूजल का गंभीर क्षय: अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में अधिक जल की खपत वाली धान की कृषि भूजल के तीव्र दोहन को बढ़ाती है।
- उदाहरण: केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में धान की सिंचाई के कारण भूजल पर गंभीर दबाव देखा गया है।
- उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग: लगातार अनाज आधारित एकफसली प्रणाली के कारण रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, जिससे मृदा स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
- मृदा पोषक तत्त्वों का असंतुलन: बार-बार धान–गेहूँ चक्र अपनाने से मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों तथा कार्बनिक पदार्थों की कमी होने लगती है।
- उदाहरण: मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अंतर्गत किए गए मृदा परीक्षणों में व्यापक पोषक असंतुलन सामने आया है।
- ऊर्जा और विद्युत की अधिक खपत: भूजल पंपिंग के लिए निःशुल्क या रियायती बिजली उपलब्ध होने से ऊर्जा की माँग बढ़ती है और राजकोषीय दबाव भी बढ़ता है।
- पर्यावरणीय प्रदूषण: धान की कृषि के बाद फसल अवशेष जलाने की प्रवृत्ति वायु प्रदूषण को बढ़ाती है।
- उदाहरण: पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष जलाने से दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में शीतकालीन वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर हो जाती है।
प्रभावी फसल विविधीकरण के लिए नीतिगत उपाय
- न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद नीतियों में सुधार: दलहन, तिलहन और मोटे अनाज के लिए सुनिश्चित खरीद का विस्तार किया जाए, ताकि किसानों को व्यवहार्य विकल्प मिल सकें।
- उदाहरण: भारत में अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष 2023 के अंतर्गत बाजरे की खरीद को बढ़ावा देकर फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित किया गया।
- जल-कुशल फसलों को बढ़ावा: कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की खेती को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- उपकरण सब्सिडी का युक्तिकरण: धान–गेहूँ के लिए उर्वरक, बिजली और सिंचाई सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करते हुए टिकाऊ फसलों के लिए प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।
- उदाहरण: उर्वरक सब्सिडी का प्रत्यक्ष लाभ अंतरण इसके कुशल उपयोग को बढ़ाने और दुरुपयोग को कम करने का प्रयास करता है।
- विविध फसलों के लिए मूल्य शृंखला को सुदृढ़ करना: दलहन, तिलहन और मोटे अनाज के लिए प्रसंस्करण, भंडारण और बाजार पहुँच को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना कृषि-प्रसंस्करण समूहों को समर्थन प्रदान करती है।
- टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन: फसल चक्र, कृषि-पर्यावरणीय कृषि और जल-संरक्षण तकनीकों को अपनाने पर बल दिया जाना चाहिए।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देकर जल संरक्षण को प्रोत्साहित करती है।
निष्कर्ष
धान-गेहूँ प्रधान प्रणाली, जिसने कभी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की थी, अब पारिस्थितिकी स्थिरता और किसानों की समृद्धि की रक्षा के लिए संरचनात्मक सुधार की माँग करती है। बाजार प्रोत्साहनों, नीतिगत सुधारों और संसाधन-कुशल कृषि द्वारा समर्थित विविध फसल उत्पादन की ओर एक सुनियोजित संक्रमण, एक लचीली और जलवायु-अनुकूल भारतीय कृषि प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक होगा।
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