डिफेंस फोर्सेज विजन 2047

16 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री ने ‘डिफेंस फोर्सेज विजन 2047: ए रोडमैप फॉर अ फ्यूचर-रेडी इंडियन मिलिट्री’ नामक एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज जारी किया है।

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 के बारे में

  • संस्थागत उत्पत्ति और निर्माण: इसे मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ (HQ IDS) द्वारा तैयार किया गया है। यह भारत की सैन्य संरचना के व्यवस्थित परिवर्तन के लिए एक व्यापक, दीर्घकालिक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करता है।

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  • राष्ट्रीय विकास के साथ रणनीतिक समन्वय: इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब भारत वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत) बने, तब उसकी सेना सुदृढ़, आधुनिक और देश के बढ़ते वैश्विक प्रभाव व हितों की रक्षा करने में पूर्णतः सक्षम हो।
  • सेनाओं के बीच एकीकरण: यह दृष्टि पारंपरिक रूप से अलग-अलग कार्य करने वाली थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच समन्वय स्थापित कर एकीकृत बल के निर्माण पर जोर देती है।
  • युद्ध की सोच में परिवर्तन: यह सैन्य दर्शन में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती है, जिसमें संगठनात्मक समन्वय और तकनीकी एकीकरण को भविष्य की युद्ध क्षमता के मुख्य आधार के रूप में प्राथमिकता दी गई है।
  • आत्मनिर्भरता और सक्रिय तैयारी: इसका उद्देश्य ऐसी सेना का निर्माण करना है, जो विचार और क्षमता दोनों में आत्मनिर्भर हो तथा पारंपरिक प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर सक्रिय और बहु-क्षेत्रीय तैयारी अपनाए।
    • सेना को तकनीकी रूप से उन्नत बनाना,
    • तीनों सेनाओं के बीच बेहतर एकीकरण सुनिश्चित करना,
    • तथा साइबर, जल के नीचे (अंडरवॉटर) और अंतरिक्ष जैसे विभिन्न क्षेत्रों में संचालन करने में सक्षम बनाना।

विजन 2047 के प्रमुख बिंदु

  • बहु-क्षेत्रीय और खुफिया-आधारित युद्ध: यह रोडमैप पारंपरिक युद्धक्षेत्र की सीमाओं से आगे बढ़कर मल्टी-डोमेन ऑपरेशन्स की तैयारी पर जोर देता है।
    • यह नेटवर्क-केंद्रित प्रणाली से आगे बढ़कर इंटेलिजेंस-केंद्रित युद्ध की ओर परिवर्तन को दर्शाता है, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और उन्नत डेटा विश्लेषण के माध्यम से सेनाएँ तीव्र गति से खतरों का आकलन कर उन्हें निष्क्रिय कर सकती हैं।
  • विशेष तकनीकी बलों की स्थापना: उच्च-प्रौद्योगिकी, युद्ध की दिशा परिवर्तन को प्रबंधित करने के लिए चार विशेष त्रि-सेवा इकाइयों के गठन का प्रस्ताव है—
    • डिफेंस जियोस्पेशियल एजेंसी: हाई-रिजॉल्यूशन उपग्रह की जानकारी के लिए
    • डेटा फोर्स: युद्धक्षेत्र के बिग डेटा के प्रबंधन के लिए
    • ड्रोन फोर्स: मानव रहित हवाई और अंडरवाटर क्षमताओं के केंद्रीकरण के लिए
    • कॉग्निटिव वॉरफेयर एक्शन फोर्स: दुष्प्रचार और मनोवैज्ञानिक अभियानों का मुकाबला करने के लिए।
  • मिशन सुदर्शन चक्र के माध्यम से रणनीतिक सुरक्षा कवच: इस विजन का एक प्रमुख आधार बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) और वायु रक्षा प्रणाली का विकास है।
    • मिशन सुदर्शन चक्र का उद्देश्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसंरचना, आर्थिक केंद्रों और बड़े नागरिक क्षेत्रों को उन्नत हवाई खतरों से सुरक्षित करना है।
  • संयुक्तता और संरचनात्मक सुधार: यह विजन तीनों सेनाओं के मध्य बेहतर समन्वय पर जोर देता है।
    • इसके अंतर्गत इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की स्थापना का प्रस्ताव है, जहाँ तीनों सेनाएँ एक इकाई के रूप में कार्य करेंगी।
    • साथ ही, एक सामान्य रक्षा बल अधिनियम लाने का सुझाव दिया गया है, जिससे तीनों सेनाओं के कानूनी ढाँचे और सेवा शर्तों में एकरूपता लाई जा सके।
  • आत्मनिर्भरता और औद्योगिक संप्रभुता: इस रोडमैप का एक प्रमुख स्तंभ रक्षा उत्पादन में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
    • इसके लिए डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (DAP) में सुधार कर घरेलू स्तर पर उन्नत तकनीकों—जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमान और पनडुब्बियाँ—का निर्माण बढ़ावा दिया जाएगा।
  • स्वदेशी रणनीतिक संस्कृति और मानव संसाधन: यह दस्तावेज भारतीय सैन्य सोच के “उपनिवेशवाद से मुक्त” होने पर बल देता है, ताकि भारत की अपनी ऐतिहासिक और भौगोलिक परिस्थितियों पर आधारित रणनीति विकसित हो सके।
    • साथ ही, अग्निपथ योजना को मजबूत करने और सैनिकों के शैक्षिक व तकनीकी स्तर को बढ़ाने पर जोर दिया गया है, ताकि वे आधुनिक तकनीक आधारित हथियारों को प्रभावी ढंग से संचालित कर सकें।

चरणबद्ध रोडमैप – वर्ष 2047 तक की यात्रा

यह विजन दस्तावेज मानता है कि इतना व्यापक परिवर्तन एक ही बार में संभव नहीं है। इसलिए यह एक संरचित समय-सीमा का प्रस्ताव करता है, जिससे आधुनिकीकरण के साथ-साथ भारत की सुरक्षा भी सुनिश्चित बनी रहे:

  • चरण I: संक्रमण काल (2026–2030): इस चरण में मुख्य ध्यान संगठनात्मक पुनर्गठन और संयुक्तता की नींव तैयार करने पर है।
    • इसमें इंटीग्रेटेड कमांड्स की शुरुआत, स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स को तेजी से लागू करना तथा समुद्री एवं वायु क्षेत्र की निगरानी क्षमता को मजबूत करना शामिल है।
  • चरण II: सुदृढ़ीकरण का दौर (2030–2040): यह दशक “टेक्नोलॉजी लीप” के रूप में परिभाषित है, जहाँ सेना डिजिटल प्रभुत्व हासिल करती है।
    • इस चरण में मिशन सुदर्शन चक्र का पूर्ण संचालन, ड्रोन स्वार्म और AI आधारित निगरानी प्रणालियों का व्यापक उपयोग किया जाएगा, जिससे सीमाओं की सुरक्षा न्यूनतम मानव जोखिम के साथ सुनिश्चित हो सके।
  • चरण III: उत्कृष्टता का दौर (2040–2047): स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने तक भारत का लक्ष्य पूर्ण बौद्धिक और औद्योगिक संप्रभुता प्राप्त करना है।
    • इसका उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों को इंटेलिजेंस-केंद्रित युद्ध में वैश्विक रूप से अग्रणी बनाना, उन्नत रक्षा तकनीक का प्रमुख निर्यातक बनना तथा अंतरिक्ष एवं साइबर सुरक्षा में प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करना है।

परंपरागत सिद्धांत और आधुनिक एकीकृत दृष्टिकोण के मध्य अंतर

विशेषता पारंपरिक सिद्धांत आधुनिक एकीकृत दृष्टिकोण
कमांड संरचना सेवा-विशिष्ट: थलसेना, नौसेना और वायुसेना अलग-अलग कमांड के अंतर्गत कार्य करती थीं। एकीकृत थिएटर कमांड: सभी सेनाएँ एकल कमांडर के अधीन एकीकृत बल के रूप में कार्य करती हैं।
प्रमुख क्षेत्र गतिशील युद्ध पर ध्यान (स्थल, समुद्र, वायु)। बहु-क्षेत्रीय संचालन: साइबर, अंतरिक्ष और विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र भी शामिल।
निर्णय प्रक्रिया मानव-आधारित विश्लेषण, फील्ड रिपोर्ट पर निर्भर (धीमी)। खुफिया-केंद्रित: कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा त्वरित डेटा विश्लेषण और खतरे की पहचान।
खरीद नीति विदेशी आयात और तैयार तकनीक पर अधिक निर्भरता आत्मनिर्भरता: स्वदेशी डिजाइन और स्थानीय आपूर्ति शृंखला पर जोर।
प्रौद्योगिकी केंद्र मानव-संचालित प्लेटफॉर्म (टैंक, मानवयुक्त विमान)। मानवरहित प्रणालियाँ: ड्रोन (UAV) और स्वायत्त रोबोटिक्स का व्यापक उपयोग।
संघर्ष का प्रकार अग्रिम पंक्ति के भौतिक युद्ध। हाइब्रिड युद्ध: दुष्प्रचार और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों से निपटना, साथ ही भौतिक रक्षा।

यह विजन क्यों आवश्यक है?

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 केवल आधुनिकीकरण का रोडमैप नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था से उत्पन्न एक रणनीतिक आवश्यकता है। जैसे-जैसे भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है, यह विजन उसके हितों की सुरक्षा के लिए एक ढाँचे (ब्लूप्रिंट) के रूप में कार्य करता है, जो पाँच प्रमुख आधारों पर आधारित है:

  • अस्थिर भू-रणनीति में मार्गदर्शन: भारत एक विशिष्ट “टू-फ्रंट” (द्वि-पक्षीय) चुनौती का सामना करता है, जिसके लिए LAC और LoC के साथ दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों के विरुद्ध एक साथ प्रतिरोध आवश्यक है।
    • आधुनिक संघर्ष “ग्रे जोन” में चला गया है—साइबर हमलों और दुष्प्रचार जैसी शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयाँ, जो खुले युद्ध की सीमा से अलग हैं।
    • विशेषीकृत इकाइयाँ, जैसे कॉग्निटिव वॉरफेयर एक्शन फोर्स, इन हाइब्रिड खतरों के विरुद्ध राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और डिजिटल अवसंरचना की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।
  • सैन्य मामलों में “तीसरी क्रांति” के अनुरूप अनुकूलन: हम एक तकनीकी विस्फोट के साक्षी हैं, जहाँ पारंपरिक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध इंटेलिजेंस-केंद्रित युद्ध में विकसित हो रहा है।
    • एआई क्षमता में वृद्धि: भविष्य के युद्ध वही जीतेंगे, जो डेटा को सबसे तेज संसाधित करते हैं। एआई-आधारित निर्णय-निर्माण अब विलासिता नहीं बल्कि आवश्यकता है।
    • अंतर को कम करना: प्रतिद्वंद्वी तेजी से ड्रोन स्वार्म, स्टेल्थ तकनीक और अंतरिक्ष-आधारित हथियार तैनात कर रहे हैं। विजन 2047 सुनिश्चित करता है कि भारत तकनीकी समानता प्राप्त करे, जिससे पारंपरिक हार्डवेयर को अप्रचलित होने से रोका जा सके।
  • आत्मनिर्भरता के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता: विदेशी निर्भरता को समाप्त करना राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए महत्त्वपूर्ण है। ऐतिहासिक रूप से, विदेशी आयात पर निर्भरता ने संकट के दौरान स्पेयर पार्ट्स और सॉफ्टवेयर अपडेट के संबंध में “चोकपॉइंट” कमजोरियाँ उत्पन्न कीं।
    • अनुकूलित समाधान: घरेलू नवाचार सुनिश्चित करता है कि उपकरण—जैसे तेजस जेट या हल्के टैंक—भारत के विशिष्ट ऊँचाई और उष्णकटिबंधीय वातावरण के लिए विशेष रूप से बनाए गए हों।
    • औद्योगिक गहराई: निजी कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और एमएसएमई के एकीकरण द्वारा, भारत विश्व के सबसे बड़े आयातक से एक वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र में परिवर्तित हो रहा है।
  • “विकास के इंजन” की सुरक्षा: जैसे-जैसे भारत 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, उसका सुरक्षा कवच विस्तारित होना चाहिए।
    • समुद्री झुकाव: मात्रा के आधार पर 90% व्यापार समुद्र के माध्यम से होने के कारण, हिंद-प्रशांत में समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) और समुद्र-तल पर स्थित डेटा केबल्स की रक्षा के लिए एक भविष्य-तैयार नौसेना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • मिशन सुदर्शन चक्र: यह महत्त्वपूर्ण औद्योगिक गलियारों और आर्थिक केंद्रों पर एक व्यापक मिसाइल रक्षा कवच प्रदान करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि राष्ट्र के “विकास के इंजन” सुरक्षित रहें।
  • सभ्यतागत निरंतरता और मानव परिवर्तन: विजन 2047 भारतीय सैन्य अवधारणा को “उपनिवेश-मुक्त” करने का प्रयास करता है, जो आधुनिक तकनीक को भारतीय दर्शन (जैसे चाणक्य के सिद्धांत) में निहित स्वदेशी रणनीतिक संस्कृति के साथ समन्वय स्थापित करता है।
    • बल का आधुनिकीकरण: यह सांस्कृतिक परिवर्तन मानव संसाधन परिवर्तन द्वारा समर्थित है। अग्निपथ योजना जैसी पहल के माध्यम से, सेना संबंधी रखने वाले समझ रखने वाले, प्रेरित युवाओं की भर्ती कर रही है, जो 21वीं सदी के युद्ध में महारत हासिल करने में सक्षम हैं।
    • अनुसंधान और कूटनीति: DRDO, शैक्षणिक जगत और निजी क्षेत्र के मध्य सहयोग को बढ़ावा देकर, भारत क्वांटम तकनीक और हाइपरसोनिक्स में अग्रणी बनने का लक्ष्य रखता है, साथ ही ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए एक विश्वसनीय रक्षा भागीदार बन रहा है।

विजन का महत्व

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 केवल एक आधुनिकीकरण योजना से अधिक है; यह एक मेटा-रणनीति है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को आर्थिक संप्रभुता के साथ जोड़ती है। इसका महत्त्व भारत को एक विरासत-निर्भर सैन्य से एक वैश्विक रूप से प्रभुत्वशाली, आत्मनिर्भर शक्ति में परिवर्तित करने में निहित है।

  • विकसित भारत के लिए आधार: एक विकसित राष्ट्र को एक सुरक्षित वातावरण की आवश्यकता होती है।
    • यह विजन सुनिश्चित करता है कि भारत की सैन्य शक्ति उसकी आर्थिक वृद्धि के साथ कदम मिलाकर चले, वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और उसके वैश्विक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक “हार्ड पॉवर” प्रदान करे।
  • रणनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करना: महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में 100% आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखकर, भारत संकट के दौरान विदेशी शक्तियों द्वारा “कूटनीतिक दबाव” या आपूर्ति शृंखला व्यवधान के जोखिम को समाप्त करता है।
    • यह भारत को विश्व के अग्रणी आयातक से शीर्ष वैश्विक रक्षा निर्यातक में परिवर्तित करता है।
  • युद्ध प्रणाली में प्रतिमान परिवर्तन: यह विजन भारत के “भविष्य के युद्ध” की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
    • साइबर, अंतरिक्ष और AI-आधारित कमांड्स को संस्थागत बनाकर, भारत प्रतिक्रियात्मक सीमा रक्षा के माध्यम से सक्रिय, बहु-क्षेत्रीय प्रतिरोध की ओर बढ़ रहा है, जो “ग्रे जोन” और “नॉन-काइनेटिक” खतरों (जैसे- डिजिटल) का प्रबंधन कर सकता है।
  • आर्थिक और औद्योगिक गुणक: आत्मनिर्भरता का प्रयास घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है।
    • एमएसएमई और स्टार्ट-अप्स को रक्षा आपूर्ति शृंखला में शामिल करके और रक्षा औद्योगिक गलियारों को मजबूत करके, यह विजन उच्च-तकनीकी नौकरियाँ उत्पन्न करता है और एक मजबूत राष्ट्रीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देता है।
  • “संपूर्ण-राष्ट्र” दृष्टिकोण की ओर परिवर्तन: यह दस्तावेज नागरिक-सैन्य समेकन की दिशा में एक बड़ा कदम दर्शाता है।
    • यह सैन्य शक्ति को कूटनीतिक, तकनीकी और आर्थिक साधनों के साथ जोड़ता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि देश के सभी क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान दें और उससे लाभान्वित हों।
  • दीर्घकालिक संघर्षों में लचीलापन सुनिश्चित करना: आधुनिक वैश्विक संघर्षों (जैसे- यूक्रेन) से सीखते हुए, यह विजन “क्षमता में वृद्धि” पर जोर देता है।
    • यह उच्च-तीव्रता, दीर्घकालिक युद्धों के दौरान गोला-बारूद, ड्रोन और स्पेयर पार्ट्स के उत्पादन को तेजी से बढ़ाने की क्षमता को प्राथमिकता देता है।
  • वैश्विक नेतृत्व और कूटनीति: विश्वस्तरीय सैन्य और स्वदेशी रणनीतिक संस्कृति विकसित करके, भारत स्वयं को ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित करता है।
    • यह हिंद महासागर क्षेत्र में “प्रथम प्रतिक्रिया देने वाले” के रूप में भारत की भूमिका को मजबूत करता है।

जिन चुनौतियों का समाधान आवश्यक है

  • सेवा समन्वय की समस्याएँ: तीनों सेनाएँ (थल सेना, नौसेना, वायु सेना) परंपरागत रूप से अलग-अलग कार्य करती रही हैं। उन्हें इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स के अंतर्गत लाना शक्ति और संसाधन साझा करने की आवश्यकता उत्पन्न करता है, जिससे प्रायः आंतरिक टकराव या “टर्फ वॉर्स” उत्पन्न होते हैं।
  • प्रौद्योगिकी अंतराल: भारत अभी भी कुछ “कोर” प्रौद्योगिकियाँ, जैसे जेट इंजन या उन्नत माइक्रोचिप्स, बनाने में संघर्ष करता है। भले ही हम विमान बना लें, हमें प्रायः “ब्रेन” या इंजन आयात करना पड़ता है, जो पूर्ण संप्रभुता के लक्ष्य को चुनौती देता है।
  • उच्च लागत और बजट सीमाएँ: बड़ी संख्या में सेना के वेतन और पेंशन का भुगतान करते हुए नई तकनीक खरीदना बहुत महँगा है।
    • यह जोखिम है कि बजट की कमी योजना को धीमा कर सकती है, जिससे सेना को पुराने उपकरणों का उपयोग अपेक्षा से अधिक समय तक करना पड़ सकता है।
  • साइबर जोखिम: जैसे-जैसे हम AI और डिजिटल युद्ध की ओर बढ़ते हैं, हम हैकिंग के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
    • उन्नत विदेशी साइबर हमलों से अपने सैन्य डेटा की रक्षा करना एक निरंतर और कठिन कार्य है।
  • नौकरशाही देरी: भारत की खरीद प्रक्रिया (जिस तरह हम हथियार खरीदते हैं) प्रायः धीमी और जटिल होती है।
    • निर्णय लेने में लंबी देरी के कारण तकनीक सैनिकों तक पहुँचने से पूर्व ही पुरानी हो सकती है।
  • अगली पीढ़ी का प्रशिक्षण: उच्च-तकनीकी ड्रोन और AI का उपयोग एक अत्यधिक तकनीकी दक्ष बल की आवश्यकता करता है।
    • यह चिंता है कि क्या वर्तमान प्रशिक्षण प्रणाली और अल्पकालिक अग्निपथ योजना ऐसे जटिल युद्ध के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ तैयार कर सकती है।
  • निजी उद्योग का विस्तार: जबकि हम चाहते हैं कि निजी कंपनियाँ हथियार बनाएँ, किंतु कई इकाइयाँ अभी भी छोटी हैं।
    • छोटे पुर्जे बनाने से लेकर पनडुब्बी या टैंक का निर्माण भारी निवेश की माँग करता है, जिसको लेकर कई कंपनियों में अभी भी संकोच है।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ

  • संयुक्तता और एकीकृत कमांड (अमेरिका मॉडल): संयुक्त राज्य अमेरिका ने गोल्डवॉटर-निकोल्स अधिनियम के माध्यम से एकीकृत संरचना की ओर कदम बढ़ाया है।
    • इस कानून ने पदोन्नति के लिए “त्रि-सेवा अनुभव” को आवश्यक बनाकर विभिन्न सैन्य शाखाओं को एक साथ काम करने के लिए बाध्य किया।
    • भारत इसका अनुसरण कर सकता है यह सुनिश्चित करके कि इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स के पास सभी संसाधनों पर वास्तविक अधिकार हो, न कि केवल शिथिल सहयोग।
  • नागरिक-सैन्य समेकन (चीन मॉडल): चीन के पास “संपूर्ण-राष्ट्र” रणनीति है, जहाँ नागरिक प्रौद्योगिकी (जैसे AI और 5G) सीधे सैन्य के साथ साझा की जाती है।
    • भारत भी निजी तकनीकी स्टार्ट-अप्स और विश्वविद्यालयों के लिए DRDO के साथ रक्षा परियोजनाओं पर काम करना आसान बनाकर इसी प्रकार का नागरिक-सैन्य समेकन अपना सकता है।
  • “स्टार्ट-अप” सैन्य पारिस्थितिकी तंत्र (इजरायल मॉडल): इजरायल सैन्य चुनौतियों को व्यावसायिक सफलता में बदलने के लिए प्रसिद्ध है।
    • वे युवा सैनिकों को तकनीकी समस्याओं को हल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे एक जीवंत नवाचार संस्कृति विकसित होती है। भारत अग्निपथ योजना का उपयोग करके तकनीकी रूप से दक्ष युवाओं की पहचान कर सकता है और उनके विचारों को “डिफेंस इन्क्यूबेटर्स” के माध्यम से वित्तपोषित कर सकता है।
  • तीव्र क्रय क्षमता (आधुनिक युद्ध के लिए आवश्यक): यूक्रेन संघर्ष के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि “धीमा और पूर्ण” की तुलना में “तीव्र तथा पर्याप्त” दृष्टिकोण बेहतर है।
    • देश अब रैपिड प्रोटोटाइपिंग की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ वे वर्षों के बजाय हफ्तों में ड्रोन का निर्माण और परीक्षण करते हैं। भारत को अपने खरीद नियमों को सरल बनाने की आवश्यकता है ताकि ऐसे तीव्र अपडेट संभव हो सकें।
  • असममित युद्ध पर ध्यान: छोटे देश (जैसे सिंगापुर या इजरायल) बेहतर इलेक्ट्रॉनिक्स, ड्रोन और साइबर उपकरणों पर निर्भर होकर बड़ी सेनाओं को हराने के लिए “स्मार्ट पॉवर” का उपयोग करते हैं।
    • भारत का ड्रोन फोर्स और डेटा फोर्स पर ध्यान इस वैश्विक परिवर्तन के अनुरूप है, जो “मात्रा पर गुणवत्ता” की ओर है।
  • दीर्घकालिक बजट (बहुवर्षीय वित्तपोषण): फ्राँस जैसे देश “मिलिट्री प्रोग्रामिंग लॉज” का उपयोग करते हैं, जो 5 से 7 वर्षों के लिए निश्चित बजट की गारंटी देते हैं।
    • यह वार्षिक बजट परिवर्तनों के कारण परियोजनाओं के रुकने से रोकता है। भारत एक नॉन-लैप्सेबल मॉडर्नाइजेशन फंड से लाभान्वित हो सकता है ताकि मिशन सुदर्शन चक्र जैसी बड़ी परियोजनाओं में धन का अभाव न हो।
  • रक्षा निर्यात नेतृत्व (दक्षिण कोरिया मॉडल): दक्षिण कोरिया ने कम मूल्य पर उच्च गुणवत्ता वाले हथियार प्रदान करके एक आयातक से शीर्ष-10 वैश्विक निर्यातक में परिवर्तन किया।
    • भारत का वर्ष 2047 तक वैश्विक निर्यातक बनने का लक्ष्य ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए “विश्वसनीय और किफायती” तकनीक पर ध्यान केंद्रित करके इस मार्ग का अनुसरण कर सकता है।

अब तक भारत द्वारा उठाए गए कदम

  • चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का निर्माण: संयुक्तता को बढ़ावा देने के लिए, भारत ने अपने पहले CDS की नियुक्ति की और सैन्य मामलों का विभाग (DMA) स्थापित किया।
    • यह सरकार को एकल-बिंदु सैन्य सलाह प्रदान करने और तीनों सेवाओं के मध्य अंतर को पाटने के लिए एक ऐतिहासिक कदम था।
  • अग्निपथ योजना का शुभारंभ: यह प्रमुख मानव संसाधन सुधार लड़ाकू बलों की औसत आयु को कम करने के लिए शुरू किया गया।
    • इसका उद्देश्य तकनीक-समझ रखने वाले “अग्निवीरों” की भर्ती करना है, जो आधुनिक युद्ध की डिजिटल और स्वचालित प्रणालियों को सँभाल सकें।
  • सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची: रक्षा मंत्रालय ने हजारों वस्तुओं—सरल पुर्जों से लेकर जटिल मिसाइल प्रणालियों तक—की कई सूचियाँ जारी की हैं जिन्हें आयात नहीं किया जा सकता।
    • यह “आयात प्रतिबंध” सेना और उद्योग को आत्मनिर्भर समाधान विकसित करने के लिए बाध्य करता है।
  • रक्षा औद्योगिक गलियारों की स्थापना: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो समर्पित गलियारे स्थापित किए गए हैं।
    • ये केंद्र सैन्य, निजी निर्माताओं और स्टार्ट-अप्स को एक साथ लाकर एक मजबूत घरेलू आपूर्ति शृंखला का निर्माण करते हैं।
  • iDEX (इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस) पहल: यह मंच सेना को स्टार्ट-अप्स और MSME से जोड़ता है।
    • यह छोटे उद्यमों को उच्च-ऊँचाई वाले ड्रोन या सुरक्षित संचार उपकरण जैसी विशिष्ट सैन्य समस्याओं के समाधान के लिए वित्तपोषण और मार्गदर्शन प्रदान करता है।
  • आयुध निर्माणियों का निगमीकरण: दक्षता और गुणवत्ता में सुधार के लिए, 41 पुरानी सरकारी फैक्टरियों को सात नए रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) में पुनर्गठित किया गया।
    • यह कदम इन संस्थाओं को अधिक पेशेवर कंपनियों की तरह कार्य करने की अनुमति देता है।
  • मिशन सुदर्शन चक्र के अंतर्गत सफल परीक्षण: भारत ने पहले ही अपने इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस वेपन सिस्टम (IADWS) का परीक्षण शुरू कर दिया है।
    • ओडिशा तट के पास इंटरसेप्टर मिसाइलों के हालिया सफल उड़ान परीक्षण बहु-स्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कवच की दिशा में पहले व्यावहारिक कदम को दर्शाते हैं।
  • रक्षा निर्यात में वृद्धि: सक्रिय रक्षा कूटनीति के माध्यम से, वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत का निर्यात 21,000 करोड़ रुपये से अधिक के रिकॉर्ड उच्च स्तर तक पहुँच गया।
    • यह सिद्ध करता है कि भारत वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र बनने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।
  • सृजन (SRIJAN) पोर्टल: एक ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया ताकि निजी उद्योग यह पहचान सकें कि कौन-सी रक्षा वस्तुएँ वर्तमान में आयात की जा रही हैं, जिससे वे उन्हें स्थानीय रूप से निर्माण (स्वदेशीकरण) करने का प्रयास कर सकें।

मानव स्तंभ के रूप में- सैनिक का आधुनिकीकरण (अग्निपथ):

विजन का एक प्रमुख भाग यह सुनिश्चित करना है कि “मशीन के पीछे का सैनिक” स्वयं तकनीक जितना आधुनिक हो। इस मानव परिवर्तन के लिए अग्निपथ योजना मुख्य साधन है:

  • “टेक-नेटिव” बल: युवा कर्मियों (अग्निवीरों) की भर्ती करके, सेना यह सुनिश्चित करती है कि उसकी अग्रिम पंक्ति उन लोगों से बनी हो, जो डिजिटल तकनीक के साथ बड़े हुए हैं।
    • ये सैनिक स्वाभाविक रूप से उच्च-तकनीकी उपकरणों (जैसे- ड्रोन और टैबलेट) के साथ अधिक सहज होते हैं, जिनकी वर्ष 2047 के लिए कल्पना की गई है।
  • सैन्य और समाज का एकीकरण: जो लोग चार वर्षों के बाद सेवा छोड़ते हैं, वे विशेष कौशल के साथ नागरिक कार्यबल में वापस आते हैं।
    • यह भारत के बढ़ते निजी रक्षा उद्योगों के लिए एक कुशल प्रतिभा पूल का निर्माण करता है, जिससे देश अपने उत्पादन लक्ष्यों को पूरा कर सके।
  • वित्तीय अनुशासन: इस मॉडल की ओर बढ़कर, सेना अपने बजट का बेहतर प्रबंधन कर सकती है।
    • दीर्घकालिक पेंशन पर बचत को आधुनिकीकरण कोष में स्थानांतरित किया जा सकता है, ताकि भविष्य के युद्ध के लिए आवश्यक उन्नत उपग्रहों और AI प्रणालियों की खरीद सुनिश्चित की जा सके।

आगे की राह

  • नागरिक-सैन्य समेकन को सुदृढ़ करना: तकनीकी प्रतिस्पर्द्धा जीतने के लिए, सेना को रक्षा प्रयोगशालाओं और नागरिक तकनीकी केंद्रों के बीच की विषमताओं को समाप्त करना होगा।
    • भारत को अधिक “ड्यूल-यूज” अनुसंधान को प्रोत्साहित करना चाहिए, जहाँ स्वास्थ्य सेवा या लॉजिस्टिक्स के लिए AI विकसित करने वाले निजी स्टार्ट-अप्स अपने उपकरणों को आसानी से डेटा फोर्स या ड्रोन फोर्स के लिए अनुकूलित कर सकें।
  • संयुक्तता को संस्थागत बनाना: इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड्स की ओर बढ़ना केवल कार्यालयों के स्थानांतरण तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
    • भारत को एक अनिवार्य संयुक्त सेवा कैडर शुरू करना चाहिए, जहाँ अधिकारी अपने कॅरियर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सेना की अन्य शाखाओं में काम करते हुए बिताएँ, ताकि विश्वास और समन्वय विकसित हो सके।
  • स्थिर और बहुवर्षीय वित्तपोषण: चूँकि पनडुब्बी या लड़ाकू विमान बनाने में दशकों लगते हैं, सरकार को एक ‘नॉन-लैप्सेबल’ आधुनिकीकरण कोष बनाना चाहिए।
    • यह सुनिश्चित करेगा कि यदि किसी वर्ष धन खर्च नहीं होता है, तो वह अगले वर्ष के लिए रक्षा बजट में बना रहे, जिससे मिशन सुदर्शन चक्र जैसी बड़ी परियोजनाएँ बाधित न हों।
  • उद्योग संबंधी क्षमता निर्माण: आधुनिक युद्ध दिखाते हैं कि देशों के पास गोला-बारूद और ड्रोन बहुत जल्दी समाप्त हो जाते हैं।
    • भारत को निजी कंपनियों और MSME को ऐसे कारखाने के निर्माण में सहायता करनी चाहिए, जो संकट के दौरान उत्पादन को तेजी से बढ़ा सकें, यह सुनिश्चित करते हुए कि कभी भी आपूर्ति समाप्त न हो।
  • नौकरशाही बाधाओं को हटाना: हथियार खरीदने की प्रक्रिया (प्रोक्योरमेंट) को तीव्र बनाने की आवश्यकता है।
    • डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर (DAP) को सरल बनाकर और अनावश्यक कागजी कार्यवाही हटाकर, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि जब तक सैनिक को नया ड्रोन मिले, तब तक तकनीक पुरानी न हो जाए।
  • वैश्विक साझेदारियों का विस्तार: भारत को सह-उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए—जहाँ हम केवल विदेशी तकनीक खरीदें नहीं, बल्कि विदेशी भागीदारों के साथ मिलकर उसे यहाँ निर्मित भी करें।
    • यह हमें विश्वसनीय और किफायती “मेड इन इंडिया” रक्षा प्रणालियाँ प्रदान करते हुए वैश्विक दक्षिण के लिए एक शीर्ष वैश्विक निर्यातक बनने के लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करेगा।
  • नियर-स्पेस और साइबर सीमाओं में निवेश: सेना को “नए उच्च क्षेत्र” को प्राथमिकता देनी चाहिए।
    • इसका अर्थ है– नियर-स्पेस एसेट्स (जैसे- उच्च-ऊँचाई वाले गुब्बारे या उपग्रह) में भारी निवेश करना और विदेशी हैकर्स से हमारी राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड और संचार नेटवर्क की रक्षा के लिए एक सुदृढ़ साइबर कवच का निर्माण करना है।

निष्कर्ष

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 यह सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता है कि भारत बदलती वैश्विक परिस्थितियों में पिछड़ नहीं रहा है। स्थानीय नवाचार, अंतर-सेवा समन्वय और उन्नत तकनीक के माध्यम से भारत एक ऐसी सशक्त सेना का निर्माण कर रहा है, जो केवल खतरों का सामना ही नहीं करती, बल्कि उन्हें पूर्व में ही रोकने में सक्षम है। अंततः, यह रोडमैप राष्ट्रीय सुरक्षा को आर्थिक प्रगति के साथ समन्वित करते हुए विकसित भारत के लक्ष्य को सुदृढ़ करता है।

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