Q. NavIC का वर्तमान संकट भारत की अंतरिक्ष-आधारित नौवहन क्षमता में संरचनात्मक और तकनीकी कमियों को उजागर करता है। विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संरचनात्मक कमियों का उल्लेख कीजिए।
  • प्रौद्योगिकीय कमियों की चर्चा कीजिए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

भारत की नाविक (NavIC) संकट, जो कार्यशील उपग्रहों की घटती संख्या से चिह्नित है, देश की स्वदेशी नेविगेशन क्षमता में गहरी संरचनात्मक और प्रौद्योगिकीय कमजोरियों को उजागर करता है। यह स्थिति रणनीतिक स्वायत्तता, सार्वजनिक सेवाओं और भारत की अंतरिक्ष आधारित अवसंरचना की दीर्घकालिक विश्वसनीयता को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करती है।

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संरचनात्मक कमियाँ

  • अपर्याप्त उपग्रह समूह क्षमता: नाविक के लिए कम-से-कम 7 उपग्रहों की आवश्यकता होती है, जबकि वर्तमान में केवल लगभग 3 उपग्रह ही पूर्ण स्थिति, नेविगेशन और समय (PNT) सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं।
    • उदाहरण: केवल IRNSS-1B, IRNSS-1L और NVS-01 पूरी तरह से कार्यशील हैं।
  • प्रतिस्थापन और अतिरिक्त व्यवस्था की कमजोरी: समय पर उपग्रह प्रतिस्थापन की कमी से प्रणाली की निरंतरता प्रभावित होती है।
    • उदाहरण: IRNSS-1F ने 10 वर्षों के बाद सेवा समाप्त कर दी, लेकिन तत्काल कोई बैकअप तैनात नहीं किया गया।
  • वैश्विक कवरेज की सीमित दृष्टि: नाविक अभी क्षेत्रीय प्रणाली तक सीमित है, जिससे इसकी विस्तार क्षमता और स्वीकृति सीमित रहती है।
    • उदाहरण: जीपीएस (~31 उपग्रह) वैश्विक कवरेज प्रदान करता है, जबकि नाविक का फोकस क्षेत्रीय है।
  • महत्त्वपूर्ण घटकों के आयात पर निर्भरता: विदेशी तकनीक पर निर्भरता प्रणाली की सुदृढ़ता को कमजोर करती है।
    • उदाहरण: पहले के उपग्रहों में आयातित परमाणु घड़ियाँ बार-बार विफल हुईं।
  • कार्यक्रम क्रियान्वयन में देरी: धीमी प्रक्षेपण प्रक्रिया और मिशन में देरी से उपग्रह समूह का रखरखाव प्रभावित होता है।
    • उदाहरण: NVS-02 (2025) तकनीकी खराबी के कारण सही कक्षा में नहीं पहुँच सका, जिससे प्रणाली को मजबूत करने में देरी हुई।

प्रौद्योगिकीय कमियाँ

  • परमाणु घड़ी प्रणालियों की विफलता: परमाणु घड़ियाँ सटीक स्थिति निर्धारण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती हैं; इनके विफल होने से नेविगेशन क्षमता प्रभावित हो जाती है।
    • उदाहरण: IRNSS-1F ने घड़ी की विफलता के कारण अपनी नेविगेशन क्षमता खो दी।
  • उपग्रहों की सीमित आयु और विश्वसनीयता: उपग्रहों के जीवनकाल के अंत के निकट होने से प्रणाली की मजबूती कम हो जाती है।
    • उदाहरण: IRNSS-1B अपनी 10 वर्ष की निर्धारित आयु से अधिक समय तक कार्य कर चुका है।
  • प्रक्षेपण और कक्षा स्थापना में विफलताएँ: उपग्रहों का अपूर्ण या त्रुटिपूर्ण कक्षा में स्थापित होना उनकी उपयोगिता को कम कर देता है।
    • उदाहरण: NVS-02 इंजन की खराबी के कारण उपयोग में नहीं आ सका।
  • अपूर्ण संकेत पारिस्थितिकी तंत्र: वैश्विक उपकरणों के साथ सीमित संगतता के कारण इसका व्यापक उपयोग बाधित होता है।
    • उदाहरण: स्मार्टफोन एकीकरण के लिए L1 बैंड समर्थन केवल NVS-01 के साथ ही शुरू किया गया।
  • बैकअप और त्रुटि-सहनशीलता की कमी: उपग्रहों में पर्याप्त अतिरिक्त प्रणाली न होने से किसी घटक के विफल होने पर पूरी प्रणाली प्रभावित हो जाती है।
    • उदाहरण: नेविगेशन क्षमता खोने के बाद कुछ उपग्रह केवल एक-तरफा संदेश प्रणाली तक सीमित रह गए।

आगे की राह 

  • तेजी से उपग्रह प्रक्षेपण: प्रतिस्थापन उपग्रहों का शीघ्र प्रक्षेपण कर उपग्रह समूह की क्षमता को पुनर्स्थापित किया जाए।
    • उदाहरण: बेइडु (BeiDou) प्रणाली की तरह निरंतर प्रक्षेपण रणनीति (लगभग 35 उपग्रह)।
  • स्वदेशी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी का विकास: परमाणु घड़ियों और अन्य महत्त्वपूर्ण घटकों का घरेलू निर्माण सुदृढ़ किया जाए।
    • उदाहरण: NVS-01 में प्रयुक्त स्वदेशी परमाणु घड़ी।
  • अतिरिक्त और बैकअप प्रणाली का निर्माण: प्रणाली की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त उपग्रहों और ऑनबोर्ड बैकअप का प्रावधान किया जाए।
    • उदाहरण: ग्लोनास प्रणाली 24 उपग्रहों के माध्यम से पर्याप्त बैकअप बनाए रखती है।
  • वैश्विक नेविगेशन क्षमता की ओर विस्तार: क्षेत्रीय प्रणाली से आगे बढ़कर वैश्विक प्रणाली की ओर संक्रमण किया जाए, जिससे रणनीतिक स्वायत्तता बढ़े।
    • उदाहरण: गैलीलियो प्रणाली वैश्विक स्तर पर विस्तारित कवरेज प्रदान करती है।
  • संस्थागत और मिशन योजना दक्षता को सुदृढ़ करना: समन्वय, वित्तपोषण और समय-सीमा प्रबंधन में सुधार कर मिशनों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: चंद्रयान-3 जैसे मिशनों में समयबद्धता और कुशल योजना से सफलता प्राप्त हुई।

निष्कर्ष

नाविक का संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत समस्या है, जिसके समाधान के लिए संरचनात्मक सुधार और प्रौद्योगिकीय सुदृढ़ता आवश्यक है। स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करना, अतिरिक्त व्यवस्था सुनिश्चित करना और तेजी से उपग्रह तैनाती करना, भारत की नेविगेशन संप्रभुता तथा रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर एक अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में।

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