राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) 2031-2035 की स्वीकृति

26 Mar 2026

संदर्भ

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत वर्ष 2031-2035 की अवधि के लिए भारत के अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को मंजूरी दे दी है।

संबंधित तथ्य

  • यह घोषणा पश्चिम एशिया में संचालित संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और ऊर्जा बाजारों में व्यवधान के बीच आई है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता के जोखिमों को रेखांकित करती है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के बारे में 

  • NDCs पेरिस समझौते (2015) के तहत किए गए देश-स्तरीय लक्ष्य हैं, जिनका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और जीवाश्म ईंधन की खपत को नियंत्रित करना है ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से अत्यंत कम, और अधिमानतः 1.5°C तक सीमित किया जा सके।
  • अद्यतन नियम: देशों को अपने NDCs को प्रत्येक पाँच वर्ष में अद्यतन करना अनिवार्य है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) संबंधी दृष्टिकोण (2031-35)

  • मार्गदर्शक सिद्धांत: भारत के वर्ष 2031–2035 के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को तैयार करते समय, भारत सरकार ने पहले ग्लोबल स्टॉकटेक (GST) के परिणामों और ‘सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्त्व एवं संबंधित क्षमताओं(CBDR-RC) के सिद्धांत को ध्यान में रखा है, जो पेरिस समझौते के अनुरूप है।
  • परामर्श संबंधी ढाँचा: भारत की क्रमिक जलवायु प्रतिबद्धताएँ, व्यापक हितधारक परामर्श और नीति आयोग के दस कार्य समूहों द्वारा किए गए अध्ययन का परिणाम हैं।
  • क्षेत्रीय दायरा: ऊर्जा, उद्योग, परिवहन, कृषि, जल और शहरी विकास सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट इनपुट का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया गया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि संशोधित लक्ष्य महत्वाकांक्षी, प्राप्त करने योग्य और घरेलू क्षमताओं पर आधारित हैं।
  • समग्र सरकारी दृष्टिकोण
    • दृष्टिकोण: NDCs समग्र सरकारी और समग्र सामाजिक दृष्टिकोण अपनाता है, जिसमें जलवायु लक्ष्यों को विकास प्राथमिकताओं के साथ एकीकृत किया गया है।
  • समावेशी नीति निर्माण: यह प्रक्रिया आजीविका, विकास और ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सहभागी और पारदर्शी नीति निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) संबंधी ढाँचे (2031-2035) के बारे में

नए ढाँचे के तहत, भारत ने निम्नलिखित प्रतिबद्धताएँ जताई हैं:

  • उत्सर्जन तीव्रता: सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की तुलना में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता को वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2035 तक 47% तक कम करना।
  • गैर-जीवाश्म स्रोतों पर निर्भरता कम करना: स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करना।
  • कार्बन सिंक: वनों और वृक्षावरण के माध्यम से 3.5-4 अरब टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक स्थापित करना।

स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में सरकार की प्रमुख पहलें

  • ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: स्वच्छ हाइड्रोजन को भविष्य के ऊर्जा स्रोत के रूप में बढ़ावा देता है।
  • पीएम सूर्य घर (मुफ्त बिजली) योजना: घरों में छत पर सौर पैनल लगाने को प्रोत्साहित करती है।
  • उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLI): स्वच्छ प्रौद्योगिकियों सहित घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देती है।
  • पीएम-कुसुम योजना: कृषि में सौर ऊर्जा के उपयोग को समर्थन देती है।
  • कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS): औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन को कम करती है।
  • परमाणु ऊर्जा विस्तार: विश्वसनीय कम कार्बन ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ

  • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत ने अपनी उत्सर्जन तीव्रता में 36% (2005-2020) की कमी की है और वर्ष 2035 तक इसे बढ़ाकर 47% करने का लक्ष्य रखा है।
  • गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का विस्तार: गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता का 52.57% (फरवरी 2026) प्राप्त कर लिया गया है, जो लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले ही पूर्ण हो गया है; वर्ष 2035 तक नया लक्ष्य 60% निर्धारित किया गया है।
  • कार्बन सिंक निर्माण: वन और वृक्षावरण के माध्यम से वर्ष 2021 तक 2.29 अरब टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक का निर्माण किया जा चुका है।
  • संवर्द्धित कार्बन सिंक लक्ष्य: वर्ष 2035 तक (वर्ष 2005 के स्तर से) CO₂ समतुल्य के 3.5–4.0 बिलियन टन के लिए लक्ष्य बढ़ाया गया।
  • वैश्विक मान्यता: खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा मान्यता प्राप्त वन क्षेत्र में निवल वृद्धि के मामले में वैश्विक स्तर पर तीसरा और कुल वन क्षेत्र के मामले में नौवाँ स्थान है।
  • वृद्धि और स्थिरता का संतुलन: उच्च GDP वृद्धि दर के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन प्रदर्शित करता है।
  • मजबूत प्रतिबद्धता: जलवायु लक्ष्यों को समय से पहले लगातार हासिल करना, भविष्य के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने की मजबूत प्रतिबद्धता और क्षमता को दर्शाता है।

महत्त्व

  • विकसित भारत का विजन: भारत का वर्ष 2031‑35 के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) ‘विकसित भारत’ विजन द्वारा मार्गदर्शित है, जो केवल वर्ष 2047 के लक्ष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान में कार्य करने की प्रतिबद्धता है ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध और जलवायु‑लचीला भारत का निर्माण किया जा सके।
  • युवाओं और महिलाओं के लिए अवसर: जलवायु प्रतिबद्धताओं से हरित परिवर्तन में युवाओं और महिलाओं के लिए नए अवसर उत्पन्न होने की उम्मीद है।
  • सतत् विकास मॉडल: भारत नीति, नवाचार और भागीदारी के माध्यम से यह दर्शाता है कि आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी साथ-साथ संचालित हो सकते हैं।
  • महत्त्वपूर्ण उपलब्धि: NDC (2031-35) को कैबिनेट की मंजूरी कम कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीले भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम है और यह भारत के वैश्विक जलवायु नेतृत्व को मजबूत करता है।

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC)

  • UNFCCC एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों की वायुमंडलीय सांद्रता को कम करना है, ताकि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में मानवजनित खतरनाक हस्तक्षेप को रोका जा सके।
  • UNFCCC पर वर्ष 1992 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे पृथ्वी शिखर सम्मेलन, रियो शिखर सम्मेलन या रियो सम्मेलन के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस सम्मेलन के 197 पक्षकार हैं, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में हुई प्रगति का आकलन करने के लिए प्रतिवर्ष पक्षकारों के सम्मेलन (COP) में मिलते हैं।
  • सचिवालय: बॉन, जर्मनी।
  • UNFCCC की संस्थागत व्यवस्थाएँ
    • कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP)
    • COP अध्यक्ष और ब्यूरो
    • सहायक निकाय (SBs)
    • सचिवालय

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