संदर्भ
भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायल की यात्रा के दौरान भारत की “वेस्ट एशिया नीति” को फिर से स्पष्ट किया, जिसमें रणनीतिक स्वतंत्रता, रक्षा सहयोग में निरंतरता, और प्रौद्योगिकी व सुरक्षा साझेदारी को गहरा करने पर जोर दिया गया।
वर्ष 2026 की प्रधानमंत्री यात्रा के मुख्य अंश
- रणनीतिक उन्नयन और शासन
- साझेदारी के नए स्तर: दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर संबंधों को “विशेष रणनीतिक साझेदारी” के रूप में उन्नत किया, जिसमें इजरायल को वैश्विक नवाचार शक्ति और भारत को वैश्विक प्रतिभा तथा निर्माण हब के रूप में मान्यता दी गई।
- संस्थागत ढाँचे: नई व्यवस्थाएँ स्थापित की गईं ताकि नीतियों को सरकार-से-सरकार (G2G), व्यवसाय-से-व्यवसाय (B2B), और जनता-से-जनता (P2P) क्षेत्रों में क्रियान्वित किया जा सके।
- संसदीय संबंध: भारत–इजरायल संसदीय मित्रता समूह की स्थापना की गई, ताकि विधायी सहयोग को मजबूत किया जा सके।
- डिजिटल और वित्तीय एकीकरण (फिनटेक कूटनीति)
- UPI–इजरायल संबंध: NPCI इंटरनेशनल और इजरायल की फास्ट पेमेंट प्रणाली (मसाव) के मध्य एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को इजरायल की भुगतान प्रणाली से जोड़ा गया।
- इससे व्यवसायों और पर्यटकों के लिए सीमा-पार लेनदेन सुगम हो गया।
- वित्तीय साइबर सुरक्षा: राष्ट्रीय प्रतिक्रिया टीमों के बीच खुफिया आदान-प्रदान और संयुक्त “साइबर-सिमुलेशन” के माध्यम से वित्तीय इकोसिस्टम की सुरक्षा हेतु रणनीतिक साझेदारी शुरू की गई।
- अग्रणी प्रौद्योगिकियाँ और नवाचार
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI): शिक्षा, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय कल्याण में AI के उपयोग पर सहयोग के लिए व्यापक MOU पर हस्ताक्षर किए गए।
- महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी (iCET): सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, और बायोटेक्नोलॉजी में सामर्थ्य समन्वय के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (NSAs) द्वारा नई पहल शुरू की गई।
- अंतरिक्ष अन्वेषण: इसरो और इजरायल स्पेस एजेंसी (ISA) के बीच सहयोग को मजबूत किया गया, विशेष रूप से इजरायली अंतरिक्ष स्टार्ट-अप्स को भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के साथ जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
- I4F और शोध वित्तपोषण: भारत–इजरायल संयुक्त शोध कॉल्स के लिए विश्वविद्यालय स्तर पर सहयोग बढ़ाने हेतु संयुक्त शोध बजट को 1 मिलियन डॉलर से बढ़ाकर 1.5 मिलियन डॉलर किया गया।
- श्रम गतिशीलता और प्रवास
- कार्यबल का विस्तार: अगले पाँच वर्षों में इजरायल में 50,000 अतिरिक्त भारतीय श्रमिकों के आगमन पर सहमति बनी।
- क्षेत्रीय विविधीकरण: निर्माण और देखभाल (Construction & Caregiving) के अलावा भारतीय श्रमिकों को विनिर्माण (Manufacturing), रेस्तराँ, और वाणिज्य एवं सेवा क्षेत्रों में विस्तार के लिए नए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए।
- उच्च-कौशल गतिशीलता: डेटा साइंस और उच्च-तकनीकी उद्योगों में भारतीय पेशेवरों के लिए मार्ग बनाने पर जोर दिया गया।
- कृषि, जल, और पर्यावरण
- कृषि में नवाचार: भारत-इजरायल कृषि नवाचार केंद्र (IINCA) और “विलेजेस ऑफ एक्सीलेंस” (VoE) मॉडल लॉन्च किया, जिसने पहले ही एक मिलियन से अधिक भारतीय किसानों को प्रशिक्षण दिया है।
- मत्स्य पालन और जलीय कृषि: भारत की “ब्लू इकोनॉमी” को आधुनिक बनाने हेतु संयुक्त उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया गया।
- स्थायित्त्व: चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) प्रथाओं और गंगा तथा अन्य नदियों की सफाई में उन्नत इजरायली जल पुनर्चक्रण तकनीक के उपयोग में सहयोग का वचन दिया।
- रक्षा, सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी उपाय
- रक्षा रोडमैप: नवंबर 2025 के रक्षा सहयोग संबंधी MOU को मान्यता दी गई और उन्नत प्लेटफॉर्म के सह-विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- साइबर उत्कृष्टता केंद्र: भारत में समर्पित भारत–इजरायल साइबर सुरक्षा उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने हेतु उद्देश्य-पत्र (Letter of Intent) पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे क्षमता निर्माण और “सुरक्षा द्वारा डिजाइन” (Security by Design) सिद्धांत लागू हो सकें।
- आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता: दोनों नेतृत्वकर्ताओं ने अक्टूबर 7, 2023 के इजरायल पर हमलों और वर्ष 2025 में पहलगाम और नई दिल्ली में हुए आतंकवादी हमलों की निंदा की और सीमापार आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
- संवाद और वैश्विक व्यापार
- मुक्त व्यापार क्षेत्र (FTA) गति: FTA वार्ता के लिए ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ (Terms of Reference) को पुष्टि दी गई और समझौते पर शीघ्र हस्ताक्षर करने के लिए टीमों को निर्देशित किया गया।
- IMEC और I2U2: भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) में प्रतिबद्धता की पुष्टि की गई, जिसमें इजरायल को क्षेत्रीय व्यापार और संपर्क के लिए महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार माना गया।
- सामुद्रिक धरोहर: गुजरात के लोथल में राष्ट्रीय समुद्री धरोहर परिसर के विकास में इजरायली विशेषज्ञता शामिल करने के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए।
भारत के लिए इजरायल का महत्त्व?
भारत का इजरायल के साथ संपर्क केवल कूटनीतिक नहीं है; यह भारत के वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने के लिए एक मौलिक आवश्यकता है।
- सुरक्षा अंतर: इजरायल ही एकमात्र प्रमुख रक्षा साझेदार है जो “ब्लैक बॉक्स” तकनीकों और सोर्स कोड साझा करने के लिए तैयार है।
- पिछले दशक में भारत ने इजरायल से 2.9 अरब डॉलर का सैन्य हार्डवेयर आयात किया है, जिसमें रडार, निगरानी और युद्ध ड्रोन, तथा मिसाइलें शामिल हैं।
- इससे भारत को उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली को स्वदेशी प्लेटफॉर्म में अनुकूलित और एकीकृत करने में मदद मिलती है।
- सैन्य आधुनिकीकरण: इजरायल उच्च-स्तरीय सेंसर और हीरन ड्रोन प्रदान करता है, जो LAC और LOC पर स्थिति की निगरानी बढ़ाते हैं।
- संकट में विश्वसनीयता: ऐतिहासिक रूप से, इजरायल “नो-स्ट्रींग्स-अटैच्ड” समर्थक रहा है।
- वर्ष 1971 के युद्ध या वर्ष 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान, जब अन्य पारंपरिक मित्रों ने संकोच किया, इजरायल ने महत्त्वपूर्ण सैन्य हार्डवेयर उपलब्ध कराया।
- जीवनरक्षक तकनीक: भारत को गंभीर जल संकट का सामना है; इजरायली जल-विलयन और सटीक कृषि में प्रगति भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है।
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- कृषि लचीलापन: इंडो-इजरायल कृषि परियोजना (IIAP) के माध्यम से, इजरायली ड्रिप सिंचाई ने भारतीय किसानों को पैदावार बढ़ाने में मदद की और जल की खपत को 40% तक कम किया।
- रणनीतिक लाभ: इजरायल के साथ मजबूत संबंध भारत को पश्चिम एशियाई भू-राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं, जिससे यह अरब दुनिया और पश्चिम के बीच संतुलन की भूमिका निभा सकता है।
- शांति लाभ (IMEC): भारत स्वयं को भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के “एंकर” के रूप में स्थापित कर रहा है, इजरायली बंदरगाहों जैसे हाइफा को यूरोप के लिए प्राथमिक मार्ग के रूप में उपयोग कर पारंपरिक समुद्री बाधाओं को बायपास कर रहा है।
भारत–इजरायल संबंधों के बारे में
- ऐतिहासिक विकास
- संकोच का युग (1948–1992): भारत ने आधिकारिक रूप से वर्ष 1950 में इजरायल को मान्यता दी, लेकिन शीत युद्ध की स्थितियों और फिलिस्तीनी मुद्दे के कारण मुंबई में संबंधों को केवल “कांसुलर स्तर” पर रखा।
- फिर भी, तब भी इजरायल ने भारत के वर्ष 1962, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान गुप्त सैन्य सहायता प्रदान की।
- अराफात पिवट (1992): पूर्ण संबंध स्थापित किए गए जब फिलिस्तीनी नेता यासर अराफात ने संकेत दिया कि भारत में इजरायल का दूतावास नई दिल्ली को फिलिस्तीनी मुद्दे में सीधे प्रभाव देने का अवसर देगा।
- कारगिल जीवनरेखा (1999): कारगिल संघर्ष के दौरान, इजरायल ने “अंतिम संसाधन के ऋणदाता” के रूप में कार्य किया, आपातकालीन स्टॉक से लेजर-निर्देशित मिसाइल किट और UAVs प्रदान किए।
भारत–इजरायल संबंधों की समयरेखा
- वर्ष 1947: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के विभाजन का विरोध किया और धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्र बनाने के विचार को अस्वीकार किया।
- वर्ष 1950: भारत ने आधिकारिक रूप से इजरायल की मान्यता दी।
- वर्ष 1953: इजरायल ने मुंबई में वाणिज्य और वीजा सेवाओं के लिए एक ‘काउन्सलेट’ खोला।
- वर्ष 1950–1980: भारत ने ‘गुट निरपेक्ष आंदोलन’ (NAM) के तहत फिलिस्तीनी मुद्दे में अरब समर्थक नीति बनाए रखी।
- शीत युद्ध की परिस्थितियों और NAM के प्रति प्रतिबद्धता के कारण पूर्ण कूटनीतिक संबंध नहीं स्थापित किए गए।
- इसके बावजूद, गोपनीय रक्षा और खुफिया संपर्क धीरे-धीरे विकसित हुए, विशेषकर वर्ष 1962 के भारत–चीन युद्ध और वर्ष 1971 के भारत–पाक युद्ध के बाद।
- वर्ष 1992: भारत और इजरायल ने पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित किए।
डिहाइफिनेशन नीति
भारत ने स्पष्ट रूप से “डिहाइफिनेशन” नीति अपनाई, यह जताते हुए कि इजरायल के साथ संबंध फिलिस्तीनी संबंधों पर निर्भर नहीं हैं।
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- वर्ष 2017: भारत–इजरायल संबंधों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ, जब भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायल का राज्य दौरा किया और यह पहला ऐसा दौरा था।
- वर्ष 2018: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में तुर्की और यमन द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जो अमेरिका के निर्णय का विरोध करता था कि यरूशलेम को इजरायल की राजधानी माना जाए।
- वर्ष 2021: भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में गाजा, वेस्ट बैंक और फिलिस्तीन में मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच के लिए स्थायी आयोग बनाने के प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया।
- I2U2 साझेदारी (2021)
- वर्ष 2021 में स्थापित, इसमें भारत, इजरायल, यू.ए.ई. और अमेरिका शामिल हैं।
- इसका उद्देश्य आर्थिक विकास, वैज्ञानिक नवाचार और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।
- वर्ष 2023: IMEC लॉन्च: नई दिल्ली में आयोजित G20 समिट में घोषित।
- भारत, अमेरिका, यूएई, सऊदी अरब, फ्राँस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
- रणनीतिक उद्देश्य: एशिया, अरब खाड़ी और यूरोप के बीच बेहतर संपर्क और आर्थिक एकीकरण के माध्यम से आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए डिजाइन किया गया।
- दो स्तंभ: दो अलग-अलग गलियारों से मिलकर बना है:
- पूर्वी गलियारा: भारत को अरब खाड़ी से जोड़ता है।
- उत्तरी गलियारा: अरब खाड़ी को रेल और समुद्री मार्ग से यूरोप से जोड़ता है।
- मल्टी-मॉडल एकीकरण: केवल पारगमन से आगे बढ़ते हुए, इसमें विद्युत केबल, उच्च गति डेटा लिंक और स्वच्छ हाइड्रोजन पाइपलाइन शामिल हैं, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एक केंद्रीय हब के रूप में स्थापित होता है।
- वर्ष 2025: सितंबर 2025 में भारत सरकार और इजरायल राज्य सरकार ने द्विपक्षीय निवेश समझौते (BIA) पर हस्ताक्षर किए।
- इजरायल ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट का पहला देश बन गया, जिसने भारत के अद्यतन निवेश-संधि मॉडल को अपनाया।
- भारत और इजरायल के बीच द्विपक्षीय निवेश वर्तमान में लगभग 800 मिलियन अमेरिकी डॉलर है।
- यह भारत–इजरायल आर्थिक संबंधों में एक रणनीतिक उपलब्धि है, जो मुख्यतः रक्षा/प्रौद्योगिकी साझेदारी से व्यापक वाणिज्यिक एकीकरण की ओर संक्रमण का संकेत देता है।
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- आर्थिक एवं सामरिक स्तंभ
- व्यापार प्रवृत्ति: वस्तु व्यापार वित्त वर्ष 2023 में 10.77 अरब डॉलर के शिखर पर पहुँचा, लेकिन लाल सागर में शिपिंग व्यवधानों के कारण वित्त वर्ष 2024-25 में घटकर 3.75 अरब डॉलर रह गया।
- भारत, इजरायल का एशिया में वस्तु व्यापार के लिए दूसरा सबसे बड़ा देश साझेदार है।
- प्रमुख निर्यात: मोती और कीमती पत्थर, ऑटोमोटिव डीजल, रासायनिक और खनिज उत्पाद, मशीनरी और विद्युत उपकरण, प्लास्टिक, वस्त्र एवं परिधान उत्पाद, आधार धातुएँ तथा परिवहन उपकरण, कृषि उत्पाद।
- प्रमुख आयात: मोती और कीमती पत्थर, रासायनिक और खनिज/उर्वरक उत्पाद, मशीनरी तथा विद्युत उपकरण, पेट्रोलियम तेल, रक्षा उपकरण, मशीनरी एवं परिवहन उपकरण।
- रक्षा एवं “ऑपरेशन सिंदूर”: मई 2025 के “ऑपरेशन सिंदूर” ने “विशेष रणनीतिक साझेदारी” को प्रमाणित किया।
- इसमें स्काईस्ट्राइकर आत्मघाती ड्रोन और स्पाइडर वायु रक्षा प्रणालियों का उपयोग कर 23 मिनट के भीतर लक्ष्यों को निष्क्रिय किया गया, जिससे रियल-टाइम इंटेलिजेंस फ्यूजन की प्रभावशीलता सिद्ध हुई।
- सेमीकंडक्टर एवं डीप-टेक: वर्ष 2026 में ध्यान को सह-निर्माण (Co-creation) की ओर स्थानांतरित किया गया। दोनों राष्ट्र अब इजरायल की चिप डिजाइन क्षमता को भारत की “सेमीकॉन इंडिया” विनिर्माण प्रोत्साहन योजनाओं के साथ एकीकृत कर रहे हैं।
- गतिशीलता एवं प्रवासन स्तंभ: वर्ष 2026 की यात्रा की एक प्रमुख उपलब्धि बड़े पैमाने का श्रम समझौता था:
- कार्यबल विस्तार: पाँच वर्षों में 50,000 भारतीय श्रमिकों को इजरायल जाने की अनुमति देने हेतु एक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए।
- क्षेत्रीय विविधीकरण: देखभाल क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए, यह समझौता विनिर्माण, खाद्य सेवाओं तथा AI और डेटा साइंस जैसे उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में अवसर प्रदान करता है, जिससे इजरायल की श्रम कमी की पूर्ति होगी और भारतीयों को उच्च वेतन वाले अवसर प्राप्त होंगे।
- कृषि सहयोग: 1993 में कृषि सहयोग पर पहला समझौता हस्ताक्षरित किया गया।
- वर्ष 2006: कृषि पर व्यापक कार्य योजना (3-वर्षीय चक्र) प्रारंभ की गई, जिसे माशाव (इजरायल की अंतरराष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी) के माध्यम से लागू किया जाता है।
बागवानी क्षेत्र में कृषि सहयोग समझौते और कार्य योजना के प्रमुख फोकस क्षेत्र
- खाद्य सुरक्षा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा उच्च गुणवत्ता वाले बीज विकास पर सहयोग।
- उत्कृष्टता केंद्रों का विस्तार तथा उत्कृष्ट ग्राम मॉडल का कार्यान्वयन।
- उत्पादकता और स्थिरता बढ़ाने हेतु प्रस्तावित पंचवर्षीय बीज सुधार योजना का शुभारंभ।
- कीट प्रबंधन, क्षमता निर्माण तथा कटाई-पश्चात् प्रौद्योगिकियों पर सहयोग।
- रणनीतिक दृष्टि: दोनों पक्षों ने जलवायु चुनौतियों के बीच कृषि लचीलापन हेतु नवाचार तथा अनुसंधान एवं विकास का उपयोग करने के साझा लक्ष्य की पुनः पुष्टि की।
- इजरायल ने किसान सशक्तीकरण के लिए भारत के डिजिटल कृषि मिशन में गहरी रुचि दिखाई।
- संस्थागत तंत्र: निरंतर संवाद, लक्ष्य निर्धारण तथा प्रगति की निगरानी सुनिश्चित करने हेतु संयुक्त कार्य समूह की स्थापना।
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- 2025: मृदा और जल प्रबंधन, बागवानी तथा कृषि उत्पादन, कटाई-पश्चात् एवं प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी, कृषि यंत्रीकरण, पशुपालन व अनुसंधान एवं विकास में द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए बागवानी क्षेत्र में एक नए कृषि सहयोग समझौते तथा कार्य योजना पर हस्ताक्षर किए गए।
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारत–इजरायल सहयोग की निगरानी वर्ष 1993 में हस्ताक्षरित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते के अंतर्गत स्थापित संयुक्त समिति द्वारा की जाती है।
- I4F कोष भारत और इजरायल के बीच औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करता है।
- 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भारत–इजरायल औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास तथा प्रौद्योगिकीय नवाचार कोष (I4F) वर्ष 2017 में स्थापित किया गया, जिसका उद्देश्य दोनों देशों की कंपनियों के मध्य संयुक्त औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देना है।
- ऊर्जा: भारत इजरायल के तामार और लेविथान गैस क्षेत्रों में अन्वेषण लाइसेंस के लिए सक्रिय रूप से बोली लगाता है। भारतीय कंपनियों ओएनजीसी विदेश और इंडियन ऑयल को अन्वेषण लाइसेंस प्रदान किए गए।
चुनौतियाँ एवं चिंताएँ
- मध्य-पूर्व संतुलन: भारत को अपने साझेदार इजरायल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच एक कठिन संतुलन बनाए रखना पड़ता है।
- फिलिस्तीन मुद्दा: भारत ‘द्वि-राष्ट्र समाधान’ का समर्थन करता है (एक स्वतंत्र फिलिस्तीन, जो इजरायल के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहे)। फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इजरायली विस्तार कूटनीतिक असहमति का विषय बना हुआ है।
- ईरान संबंध: इजरायल, ईरान को एक प्रमुख खतरे के रूप में देखता है, जबकि भारत ईरान को ऊर्जा के लिए एक महत्त्वपूर्ण साझेदार तथा चाबहार बंदरगाह (मध्य एशिया के साथ व्यापार हेतु एक प्रमुख समुद्री मार्ग) के प्रवेश द्वार के रूप में देखता है।
- भारतीय नागरिकों की सुरक्षा: 90 लाख से अधिक भारतीय खाड़ी देशों (जैसे- संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब) में रहते और कार्य करते हैं। यदि युद्ध के दौरान भारत, इजरायल के अत्यधिक निकट दिखाई देता है, तो इससे इन भारतीयों की सुरक्षा, रोजगार और उनके द्वारा स्वदेश भेजी जाने वाली धनराशि प्रभावित हो सकती है।
- व्यापार एवं वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा
- चीन कारक: चीन इजरायल का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। भारत को चिंता है कि इजरायल संवेदनशील प्रौद्योगिकी बीजिंग के साथ साझा कर सकता है, विशेषकर तब जब भारत और चीन के बीच सीमा तनाव विद्यमान हैं।
- मुक्त व्यापार समझौते का अभाव: यद्यपि व्यापार मजबूत है, फिर भी अभी तक कोई मुक्त व्यापार समझौता (आयात और निर्यात पर करों में कमी हेतु समझौता) नहीं हुआ है। इससे अधिकांश व्यापार हीरे और सैन्य उपकरणों तक सीमित रहता है।
- साइबर सुरक्षा और गोपनीयता: गोपनीय निगरानी हेतु प्रयुक्त जासूसी सॉफ्टवेयर से संबंधित पूर्व घटनाओं ने विश्वास और भारतीय नागरिकों की गोपनीयता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
- ऊर्जा एवं परिवहन जोखिम
- आपूर्ति शृंखला में व्यवधान: लाल सागर या फारस की खाड़ी में संघर्ष जहाजों की आवाजाही बाधित कर सकते हैं। इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा (तेल और गैस की निरंतर आपूर्ति) जोखिम में पड़ती है तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे जैसी परियोजनाओं में विलंब हो सकता है।
आगे की राह
- “खरीदार और विक्रेता” संबंध से आगे बढ़ना
- संयुक्त विनिर्माण: केवल इजरायल से उपकरण खरीदने के स्थान पर भारत सह-विकास (साझा रूप से उत्पाद निर्माण) की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है।
- यह आत्मनिर्भर भारत पहल का समर्थन करता है तथा उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण को भारतीय भूमि पर स्थापित करने में सहायक है।
- व्यापार टोकरी का विस्तार: दोनों देशों को वर्ष 2026 तक मुक्त व्यापार समझौता अंतिम रूप देना चाहिए, ताकि कृषि, हरित ऊर्जा और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी जैसे नए क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा मिल सके।
- “ज्ञान गलियारे” का निर्माण
- शैक्षणिक संपर्क: भारत को अपने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को इजरायल के प्रमुख अनुसंधान केंद्रों से जोड़ना चाहिए।
- क्वांटम संगणन (अगली पीढ़ी के अति-तीव्र संगणक) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर ध्यान केंद्रित करने से ऐसा साझेदारी मॉडल विकसित होगा, जो केवल सैन्य समझौतों तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक सहयोग सुनिश्चित करेगा।
- रणनीतिक स्वतंत्रता
- स्वतंत्र कूटनीति: भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए, जिसका अर्थ है कि वह एक ही समय में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और ईरान से संवाद करने की स्वतंत्रता रखे, बिना किसी एक पक्ष के सैन्य गठबंधन में शामिल होने के लिए बाध्य हुए।
- लोगों-से-लोगों के मध्य संबंध: सामान्य नागरिकों के बीच यात्रा, छात्र विनिमय तथा व्यावसायिक बैठकों में वृद्धि से आपसी विश्वास पर आधारित अधिक मजबूत और पारदर्शी संबंध स्थापित करने में सहायता मिलेगी।
निष्कर्ष:
भारत–इजरायल संबंध पारस्परिक आवश्यकता पर आधारित एक “रणनीतिक धुरी” के रूप में परिपक्व हो चुके हैं। वर्ष 2026 की यात्रा यह सिद्ध करती है कि नई दिल्ली के लिए “विकसित भारत” का मार्ग इजरायल के साथ एक गहरी और व्यावहारिक साझेदारी से होकर गुजरता है, जिसमें उच्च-प्रौद्योगिकी सह-निर्माण तथा क्षेत्रीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है।