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‘स्ट्रैंडेड आयल’ से संबंधित छूट

7 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में अमेरिकी वित्त विभाग ने एक अस्थायी 30 दिवसीय छूट (अप्रैल 2026 की शुरुआत तक वैध) जारी की है, जिससे भारतीय रिफाइनर रूसी कच्चे तेल को खरीद सकते हैं, जो पहले से ही लोड किया हुआ है और ‘समुद्री क्षेत्र’ में है।

  • यह इजरायल-ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिर करने के उद्देश्य से उठाया गया एक व्यावहारिक नीतिगत कदम है।

छूट की प्रकृति

  • सीमित दायरा: यह नए रूसी तेल अनुबंधों के लिए व्यापक अनुमति नहीं है।
    • यह केवल उन ‘स्ट्रैंडेड ऑयल’ कार्गो (लगभग 120-130 मिलियन बैरल, जो वैश्विक स्तर पर मौजूद हैं) पर लागू होता है, जो प्रतिबंधों या जोखिम से बचने के कारण अटके हुए थे।

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  • ‘अच्छे पक्ष’ का तर्क: अमेरिकी प्रशासन ने फरवरी 2026 के व्यापार समझौते के बाद रूसी तेल खरीद को रोकने के भारत के पूर्व अनुपालन के लिए उसकी “बहुत अच्छे पक्ष” के रूप में प्रशंसा की थी।
  • रणनीतिक यू-टर्न: वाशिंगटन ने पहले भारत के रूसी तेल आयात को हतोत्साहित करने के लिए 25% दंडात्मक टैरिफ का प्रयोग किया था; यह छूट वैश्विक आपूर्ति संकट को रोकने के लिए एक व्यावहारिक कदम है।

अमेरिका ने अपना रुख क्यों बदला?

  • होर्मुज उच्च जोखिम क्षेत्र: होर्मुज जलडमरूमध्य (जो वैश्विक तेल का लगभग 20% सँभालता है) वर्तमान में एक उच्च जोखिम क्षेत्र है।
    • हालाँकि यह पूर्णतः नाकाबंदी नहीं है, लेकिन गंभीर जोखिमों और बीमा निलंबन ने तेल प्रवाह को बुरी तरह बाधित किया है। भारत को अपने तेल का 40-50% इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है।

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  • अमेरिकी मध्यावधि चुनाव (नवंबर 2026): पेट्रोल की उच्च कीमतें राजनीतिक रूप से “विषाक्त” हैं।
    • घरेलू ईंधन की कीमतों को कम रखने के लिए, अमेरिकी प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि वैश्विक आपूर्ति स्थिर बनी रहे।
  • बाजार तरलता: भारत को रूस से सस्ता तेल खरीदने की अनुमति देकर, अमेरिका भारत को अन्य तेल स्रोतों के लिए प्रतिस्पर्द्धा करने से रोकता है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतें स्थिर बनी रहती हैं।
  • रूसी लाभ को रोकना: वित्तीय सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह एक ‘जानबूझकर उठाया गया अल्पकालिक कदम’ है, जिससे मॉस्को को कोई महत्त्वपूर्ण वित्तीय लाभ नहीं होगा, क्योंकि तेल पहले ही उत्पादित और लोड किया जा चुका था।

भारत की रणनीतिक स्थिति

  • छूट से प्रीमियम तक: ऐतिहासिक रूप से, रूसी तेल भारत के लिए सस्ता था। अब, युद्ध संबंधी मार्गों में परिवर्तन और उच्च माँग के कारण, यह प्रीमियम पर बिक रहा है।
    • हालाँकि, भारत कीमत की तुलना में ऊर्जा सुरक्षा (उपलब्धता) को प्राथमिकता दे रहा है।
  • आयात पर निर्भरता: भारत अपनी दैनिक खपत का लगभग 90% (5.5-5.6 मिलियन बैरल) आयात करता है।
    • पश्चिम एशियाई आपूर्ति के जोखिम में होने के कारण, “फँसा हुआ” रूसी तेल एक महत्त्वपूर्ण रसद संबंधी सुरक्षा प्रदान करता है।
  • विविधीकरण: हालाँकि भारत अल्पावधि में रूसी तेल की खरीद बढ़ाएगा, दीर्घकालिक लक्ष्य ऐसी कमजोरियों का मुकाबला करने के लिए अमेरिकी एलएनजी और घरेलू सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को बढ़ाना है।

आगे की राह 

  • अल्पकालिक: सामरिक राहत और बाजार स्थिरता
    • स्टॉक की कमी को रोकना: यह छूट एक ‘प्रेशर रिलीज वाल्व’ की तरह कार्य करती है, जिससे भारतीय रिफाइनर 12 करोड़ बैरल से अधिक रूसी कच्चे तेल के भंडार को प्रोसेस कर सकते हैं।
      • इससे घरेलू ईंधन की तत्काल कमी को रोका जा सकता है और मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित किया जा सकता है, जो अन्यथा आपूर्ति में अचानक आई कमी से उत्पन्न हो सकता था।
    • मूल्य स्थिरीकरण: हालाँकि रूसी तेल अब ‘युद्ध-छूट’ पर नहीं है, लेकिन इसकी उपलब्धता भारत को एक हताश खरीदार के रूप में स्पॉट मार्केट में प्रवेश करने से रोकती है, जिससे वैश्विक ब्रेंट तेल की कीमतों को बेतहाशा बढ़ने से रोकने में मदद मिलती है।
  • मध्यम अवधि: संरचनात्मक विविधीकरण और लचीलापन
    • “चोकपॉइंट जोखिमों” से निपटना: होर्मुज जलडमरूमध्य से 40% से अधिक आयात होने के कारण, भारत को अपने ‘पश्चिम की ओर’ (मध्य पूर्व) से “वैश्विक स्रोत” की ओर परिवर्तन परिवर्तन को गति देनी होगी।
      • इसमें अमेरिका, ब्राजील और गुयाना के साथ दीर्घकालिक अनुबंधों को बढ़ाना शामिल है।
    • रणनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करना: अमेरिका द्वारा “सद्भावनापूर्ण भागीदार” का दर्जा दिए जाने से संकेत मिलता है कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता परिपक्व हो रही है।
      • भारत यह साबित कर रहा है कि वह अपनी राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा प्राथमिकताओं को बनाए रखते हुए अमेरिका का एक विश्वसनीय भागीदार हो सकता है।
  • दीर्घकालिक: संप्रभु सुरक्षा में परिवर्तन 
    • SPR चरण II का विस्तार: संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक शक्ति के लिए 9.5 दिनों का सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) अपर्याप्त है। चरण II (6.5 मिलियन मीट्रिक टन) को शीघ्रता से पूरा करना अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है ताकि न्यूनतम 30 दिनों का संप्रभु बफर उपलब्ध कराया जा सके।
      • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कार्यक्रम (IEP) समझौते के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के सदस्य प्रत्येक राष्ट्र को सामरिक पेट्रोलियम भंडार बनाए रखना आवश्यक है।
        • देशों को अपने शुद्ध तेल आयात के न्यूनतम 90 दिनों के बराबर आपातकालीन तेल भंडार बनाए रखना अनिवार्य है।
    • गहन डीकार्बोनाइजेशन: वास्तविक ऊर्जा स्वतंत्रता 88-90% आयात निर्भरता को कम करने में निहित है।
      • इसके लिए भारत को पश्चिम एशियाई ‘अप्रत्याशित घटनाओं’ से बचाने के लिए ‘पेट्रोलियम-आधारित’ अर्थव्यवस्था से ‘हरित-हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहन-आधारित’ अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना आवश्यक है।
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