संदर्भ
हाल ही में भारत सरकार ने उत्पादकता, गुणवत्ता एवं वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ने के उद्देश्य से कपास उत्पादकता मिशन (2026–31) का शुभारंभ किया है, जो भारत विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक क्षेत्र तथा कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक एवं उपभोक्ता है।
कपास के बारे में
- कपास एक खरीफ नकदी फसल तथा विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक रेशा फसलों में से एक है। कृषि, उद्योग, रोजगार तथा निर्यात में इसके महत्त्वपूर्ण योगदान के कारण इसे लोकप्रिय रूप से श्वेत स्वर्ण (White Gold) कहा जाता है।
- विशेषताएँ: कपास एक अर्द्ध-शुष्क (Semi-xerophytic) फसल है, जिसकी कृषि उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों में की जाती है।
- कृषि-जलवायवीय आवश्यकताएँ: कपास की सर्वोत्तम वृद्धि 21–27°C तापमान पर होती है, इसके लिए 50–100 सेमी. वर्षा, न्यूनतम 210 पाला-रहित दिन तथा उचित जल निकासी वाली काली (रेगुर) अथवा जलोढ़ मिट्टी उपयुक्त होती है।
- कपास की प्रजातियाँ: भारत विश्व का एकमात्र देश है, जहाँ कपास की सभी चार मान्यता प्राप्त प्रजातियों की कृषि की जाती है:
- गॉसिपियम आर्बोरियम (Gossypium arboreum) (एशियाई कपास)
- गॉसिपियम हर्बेसियम (Gossypium herbaceum) (एशियाई कपास)
- गॉसिपियम हिर्सुटम (Gossypium hirsutum) (अमेरिकी/अपलैंड कपास), जो भारत में उत्पादित लगभग 90% सँकर कपास तथा सभी Bt कपास सँकरों का आधार है।
- गॉसिपियम बार्बाडेन्स (Gossypium barbadense) (मिस्र/सी आइलैंड/पेरूवियन कपास), जिससे अतिदीर्घ रेशा (Extra Long Staple-ELS) प्राप्त होता है।
- रेशों का वर्गीकरण: कपास को रेशे की लंबाई के आधार पर लघु, मध्यम, मध्यम-दीर्घ, दीर्घ तथा अतिदीर्घ रेशा (ELS) श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। ELS कपास को उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्र निर्माण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
- प्रमुख उपयोग: कपास वस्त्र, परिधान, तकनीकी वस्त्र, खाद्य तेल तथा पशु आहार उद्योगों के लिए प्रमुख कच्चा माल है।
भारत में कपास क्षेत्र की स्थिति
- वैश्विक स्थिति: भारत कपास के कृषि क्षेत्र में प्रथम तथा उत्पादन एवं उपभोग में द्वितीय स्थान पर है। यह वैश्विक रेशा उत्पादन में लगभग 19% योगदान देता है तथा विश्व के कुल कपास कृषि क्षेत्र का लगभग 38% हिस्सा रखता है।

- उत्पादन: वर्ष 2025-26 के दौरान कपास उत्पादन का अनुमान 290.91 लाख गाँठ (Bales) है, जबकि घरेलू उपभोग का अनुमान 328 लाख गाँठ है।
- कृषि का प्रतिरूप: कपास की खेती 114.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है, जिसमें लगभग 62% क्षेत्र वर्षा-आधारित है, जिससे उत्पादन मानसून पर अत्यधिक निर्भर रहता है।
- व्यापार प्रदर्शन: वित्त वर्ष 2024–25 (FY25) के दौरान भारत ने 11.49 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के कपास का निर्यात किया, जो वैश्विक कपास निर्यात का लगभग 3.37% है।
- प्रमुख उत्पादक क्षेत्र: कपास की खेती तीन कृषि-जलवायवीय क्षेत्रों में केंद्रित है:
- उत्तरी क्षेत्र: पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान।
- मध्य क्षेत्र: गुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश।
- दक्षिणी क्षेत्र: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक।
- इसके अतिरिक्त ओडिशा एवं तमिलनाडु में भी कपास की खेती की जाती है।
- आर्थिक महत्त्व: कपास लगभग 60 लाख किसानों की आजीविका का आधार है तथा खेती से लेकर वस्त्र निर्माण तक की पूरी मूल्य शृंखला में लगभग 4-5 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
- ऐतिहासिक महत्त्व: भारत में कपास की कृषि का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से जुदा हुआ है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना, जबकि अहमदाबाद “भारत का मैनचेस्टर” के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

संबद्ध सरकारी पहलें
- कपास उत्पादकता मिशन (2026–31): ₹5,659.22 करोड़ के परिव्यय के साथ प्रारंभ किए गए इस मिशन का उद्देश्य उच्च उपज, जलवायु-सहिष्णु तथा कीट-प्रतिरोधी किस्मों को बढ़ावा देकर, रेशे की गुणवत्ता में सुधार करके, अतिदीर्घ रेशा (ELS) कपास की खेती को प्रोत्साहित करना है। साथ ही किसानों की आय बढ़ाकर वर्ष 2031 तक कपास उत्पादन को 498 लाख गाँठ तक पहुँचाना है।
- यह मिशन 24 लाख हेक्टेयर, 140 जिलों तथा 14 कपास उत्पादक राज्यों को आच्छादित करता है, जिससे लगभग 32 लाख किसान लाभान्वित होंगे। साथ ही यह सरकार के 5F विजन- फार्म (Farm), फाइबर (Fibre), फैकटरी (Factory), फैशन (Fashion), फॉरेन (Foreign) को भी समर्थन प्रदान करता है।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) मध्यम एवं दीर्घ रेशे वाली कपास के लिए पृथक रूप से MSP की अनुशंसा करता है, जबकि भारतीय कपास निगम (CCI) किसानों को अत्यल्प मूल्य पर बिक्री से बचाने हेतु खरीद करता है।

- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) के अंतर्गत कपास पर विशेष परियोजना: वर्ष 2023–24 से लागू यह परियोजना हाई डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS), क्लोजर स्पेसिंग प्लांटिंग सिस्टम (CSPS) तथा अतिदीर्घ रेशे (ELS) वाली कपास के लिए उन्नत उत्पादन तकनीकों को बढ़ावा देती है।
- कस्तूरी कॉटन भारत: इस पहल का उद्देश्य गुणवत्ता प्रमाणन, ट्रेसेबिलिटी तथा मानकीकरण के माध्यम से भारतीय कपास को वैश्विक स्तर पर एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित करना है।
- डिजिटल एवं प्रौद्योगिकी पहलें: सरकार डिजिटल खरीद, ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसेबिलिटी, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन तथा कपास किसान ऐप को बढ़ावा दे रही है, ताकि उत्पादकता, पारदर्शिता, गुणवत्ता आश्वासन तथा किसानों तक पहुँच में सुधार किया जा सके।
कपास क्षेत्र की चुनौतियाँ
- कम उत्पादकता: कपास की उत्पादकता वैश्विक औसत से कम बनी हुई है, जिसका कारण अनियमित वर्षा, सीमित यंत्रीकरण, उन्नत कृषि पद्धतियों को अपर्याप्त रूप से अपनाना तथा वर्षा-आधारित खेती पर अत्यधिक निर्भरता है।
- कीट प्रकोप: पिंक बॉलवर्म तथा अन्य कीट Bt कपास को अपनाने के बावजूद उत्पादन में कमी तथा कृषि की लागत में वृद्धि का कारण बने हुए हैं।
- गुणवत्ता संबंधी बाधाएँ: अतिदीर्घ रेशे (ELS) वाली कपास का सीमित उत्पादन तथा रेशे की असंगत गुणवत्ता प्रीमियम अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम करती है।
- बाजार संबंधी जोखिम: मूल्य अस्थिरता, बढ़ती उत्पादन लागत तथा अपर्याप्त कटाई-पश्चात् अवसंरचना किसानों की आय को प्रभावित करती रहती है।
- मूल्य संवर्द्धन: भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा अभी भी कच्चे कपास तथा मध्यवर्ती उत्पादों का है, जो वस्त्र क्षेत्र में अधिक मूल्य संवर्द्धन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।