संदर्भ
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने यह अवगत कराया है कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLISFPI) ने अप्रैल 2026 तक, अत्यंत उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है।
- इस योजना के माध्यम से लगभग 3.39 लाख रोजगारों का सृजन हुआ है, जो इसके मूल लक्ष्य 2.5 लाख से उल्लेखनीय रूप से अधिक है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र रोजगार सृजन का एक प्रमुख प्रेरक के रूप में उभर रहा है।
खाद्य प्रसंस्करण क्या है?
- संदर्भ: सरल शब्दों में, खाद्य प्रसंस्करण वह माध्यम है, जो किसान के खेत को उपभोक्ता की थाली से जोड़ता है।
- इसमें अनाज, फल, दूध या मछली जैसे कच्चे पदार्थों को ऐसे उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है, जो अधिक समय तक सुरक्षित रहें और सुविधाजनक हों।
- प्राथमिक स्तर: फसलों की सफाई, ग्रेडिंग और छंटाई जैसी बुनियादी क्रियाएँ।
- द्वितीयक स्तर: कच्ची फसलों को घटक में बदलना, जैसे- गेहूँ का आटे में परिवर्तन।
- तृतीयक स्तर: ऐसे ‘रेडी-टू-ईट’ (Ready-to-eat) भोजन या स्नैक्स बनाना, जिन्हें अतिरिक्त पकाने की आवश्यकता नहीं होती है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLISFPI) के बारे में
- PLISFPI एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य भारत को वैश्विक खाद्य विनिर्माण केंद्र में रूपांतरित करना है।
- इसे मार्च 2021 में ₹10,900 करोड़ के बजट के साथ स्वीकृत किया गया था। यह योजना खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों को उनके उत्पादन और बिक्री में वृद्धि के आधार पर प्रोत्साहन प्रदान करती है।
- योजना के मुख्य उद्देश्य
- वैश्विक चैंपियन: भारतीय खाद्य ब्रांडों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना।
- रोजगार: ग्रामीण और शहरी युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करना।
- मूल्य संवर्द्धन: मूल फसलों को उच्च-मूल्य उत्पादों में परिवर्तित कर किसानों को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करना।
- निर्यात वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाना।
- रणनीतिक संरेखण: यह योजना आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी प्रमुख पहलों के साथ संरेखित है, जिसका उद्देश्य भारत को वैश्विक खाद्य प्रसंस्करण केंद्र के रूप में विकसित करना है।
PLISFPI योजना की कार्यप्रणाली
- PLISFPI योजना को पारितंत्र के विभिन्न घटकों को समर्थन देने हेतु तीन श्रेणियों में संरचित किया गया है:
- श्रेणी I ( बड़े स्तर पर विनिर्माण): यह बड़े पैमाने पर उत्पादन पर केंद्रित है, जिसमें तैयार-खाद्य (RTE) और तैयार-पकाने योग्य (RTC) उत्पाद (जिसमें मिलेट आधारित उत्पाद शामिल हैं), प्रसंस्कृत फल एवं सब्जियाँ, समुद्री उत्पाद शामिल हैं।
- श्रेणी II (MSME एवं नवाचार केंद्रित): यह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को नवोन्मेषी एवं जैविक खाद्य उत्पादों के विकास के लिए प्रोत्साहित करती है, जिसमें अंडे और पोल्ट्री उत्पाद जैसे विशिष्ट क्षेत्र भी शामिल हैं।
- श्रेणी III (वैश्विक ब्रांडिंग): यह विदेशों में ब्रांडिंग और विपणन को समर्थन प्रदान करती है, जिससे भारतीय खाद्य उत्पादों को वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करने में सहायता मिलती है।
- समर्पित ‘मिलेट’ प्रोत्साहन पहल
- विशेष ‘मिलेट’ उप-योजना: मिलेट आधारित उत्पादों हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLISMBP) को वर्ष 2022-23 में ₹800 करोड़ के व्यय प्रावधान के साथ प्रारंभ किया गया।
- पोषण एवं आर्थिक प्रोत्साहन: यह मिलेट (श्री अन्न) के उपयोग को RTE और RTC उत्पादों में बढ़ावा देती है, जिससे पोषण सुरक्षा, मूल्य संवर्द्धन तथा किसानों की आय में वृद्धि होती है।
- प्रोत्साहन संरचना एवं पात्रता
- प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन: कंपनियों को आधार वर्ष (2019-20) के ऊपर वृद्धिशील बिक्री के आधार पर प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।
- निवेश की आवश्यकता: पात्रता के लिए कंपनियों को प्लांट तथा मशीनरी, अवसंरचना एवं प्रौद्योगिकी उन्नयन में निवेश करना अनिवार्य है।
- ब्रांडिंग समर्थन: सरकार विदेशों में ब्रांडिंग और विपणन व्यय का 50% तक प्रतिपूर्ति करती है, जो वार्षिक बिक्री के 3% या ₹50 करोड़ प्रति वर्ष (जो भी कम हो) तक सीमित है।
- न्यूनतम प्रतिबद्धता: गंभीर भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु कंपनियों को पाँच वर्षों में कम-से-कम ₹5 करोड़ वैश्विक ब्रांडिंग पर व्यय करना आवश्यक है।
- लघु उद्यमों को समर्थन
- सशक्त MSME भागीदारी: स्वीकृत आवेदकों में से 69 MSMEs हैं तथा अतिरिक्त 40 MSMEs अनुबंध विनिर्माण के माध्यम से जुड़े हुए हैं, जो मूल्य शृंखला के गहन एकीकरण को दर्शाता है।
- लक्षित वित्तीय समर्थन: कई MSMEs को पहले ही प्रोत्साहन वितरित किए जा चुके हैं, जिससे उन्हें प्रौद्योगिकी उन्नयन, गुणवत्ता सुधार और संचालन विस्तार में सहायता मिली है।
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हालिया वृद्धि और उपलब्धियाँ
पिछले एक दशक में इस क्षेत्र ने व्यापक परिवर्तन देखा है, जहाँ यह एक लघु-स्तरीय गतिविधियों से विकसित होकर एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक शक्ति बन गया है:
- आर्थिक मूल्य: इस क्षेत्र का अर्थव्यवस्था में कुल मूल्य एक दशक पूर्व ₹1.34 लाख करोड़ से बढ़कर हाल ही में ₹2.24 लाख करोड़ हो गया है।
- निर्यात में मूल्य संवर्द्धन: कृषि निर्यात में प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की हिस्सेदारी वर्ष 2014-15 के लगभग 13.7% से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 20.4% से अधिक हो गई है, जो उच्च-मूल्य खाद्य निर्यात की ओर भारत के संक्रमण को दर्शाती है।
- निजी निवेश: सरकारी समर्थन के परिणामस्वरूप निजी कंपनियों ने नई फैक्टरियों और मशीनरी में ₹9,200 करोड़ से अधिक का निवेश किया है।
- विशाल प्रसंस्करण क्षमता: भारत अब पूर्व की तुलना में प्रति वर्ष अतिरिक्त 34 लाख मीट्रिक टन खाद्य पदार्थों का प्रसंस्करण एवं संरक्षण करने में सक्षम है।

- संस्थागत विस्तार एवं वित्तीय प्रगति
- संस्थागत विस्तार: इस योजना के अंतर्गत 165 आवेदनों को स्वीकृति दी गई है, जो देशभर में 274 परियोजना स्थलों को शामिल करते हैं, जिससे व्यापक औद्योगिक भागीदारी परिलक्षित होती है।
- वित्तीय समर्थन: अब तक कंपनियों को ₹2,162.55 करोड़ के प्रोत्साहन वितरित किए जा चुके हैं, जिससे क्षमता विस्तार के लिए समयबद्ध सहायता सुनिश्चित हुई है।
- निर्यात वृद्धि एवं वैश्विक उपस्थिति
- निर्यात प्रदर्शन: प्रसंस्कृत कृषि, खाद्य उत्पादों के निर्यात में वर्ष 2019-20 से वर्ष 2024-25 के मध्य 13.23% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की गई है।
- निर्यात का स्तर: इस योजना के अंतर्गत समर्थित कंपनियों की कुल निर्यात बिक्री ₹89,000 करोड़ से अधिक हो गई है, जिससे वैश्विक खाद्य बाजार में भारत की उपस्थिति सुदृढ़ हुई है।
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के बारे में
- उद्देश्य एवं प्रारंभ: अप्रैल 2020 में प्रारंभ की गई उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना का उद्देश्य प्रदर्शन-आधारित वित्तीय प्रोत्साहनों के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ करना है।
- यह आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की एक प्रमुख आधारशिला है, जिसका लक्ष्य आत्मनिर्भरता, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और वैश्विक एकीकरण को बढ़ावा देना है।
- मुख्य सिद्धांत: यह योजना प्रदर्शन-आधारित मॉडल पर आधारित है, न कि अग्रिम सब्सिडी पर।
- इस योजना के तहत प्रोत्साहन आधार वर्ष (2019–20) के ऊपर वृद्धिशील बिक्री के आधार पर प्रदान किए जाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सार्वजनिक धन वास्तविक उत्पादन और वृद्धि से जुड़ा हो।
- विस्तार एवं कवरेज: प्रारंभ में इसे मोबाइल विनिर्माण, फार्मास्यूटिकल्स (APIs) और चिकित्सा उपकरणों जैसे क्षेत्रों के लिए लागू किया गया था। अब यह योजना 14 रणनीतिक क्षेत्रों तक विस्तारित हो चुकी है।
- लगभग ₹1.97 लाख करोड़ के कुल व्यय प्रावधान के साथ, यह खाद्य प्रसंस्करण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर मॉड्यूल और विशेष इस्पात जैसे उद्योगों को समर्थन प्रदान करती है।
- वैश्विक चैंपियंस का निर्माण: यह योजना कंपनियों को प्लांट, मशीनरी और प्रौद्योगिकी में न्यूनतम निवेश की शर्त के माध्यम से आर्थिक मानदंड प्राप्त करने हेतु प्रोत्साहित करती है।
- इससे भारतीय कंपनियाँ लागत कम करने, गुणवत्ता सुधारने और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में सक्षम बनती हैं।
- रोजगार सृजन: बड़े पैमाने पर विनिर्माण को बढ़ावा देकर यह योजना महत्त्वपूर्ण रोजगार अवसर उत्पन्न करती है।
- उदाहरणस्वरूप, केवल खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में ही 3.3 लाख से अधिक रोजगार सृजित हुए हैं, जिनमें प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष (लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति शृंखला) रोजगार शामिल हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: PLI योजना बड़ी एंकर कंपनियों को MSMEs के साथ जोड़कर गुणक प्रभाव (multiplier effect) उत्पन्न करती है।
- लघु उद्यम घटक निर्माण, पैकेजिंग और आपूर्ति इनपुट्स के माध्यम से योगदान करते हैं, जिससे उनका वैश्विक मूल्य शृंखला में एकीकरण तथा प्रौद्योगिकी उन्नयन संभव होता है।
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भारत लाभ की स्थिति में क्यों है:
भारत कई प्राकृतिक एवं सामाजिक कारकों के कारण “विश्व का खाद्य भंडार (Food Basket of the World)” बनने की विशिष्ट स्थिति में है:
- अत्यधिक उत्पादन: भारत विश्व में फल एवं सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिससे कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- शहरी जीवनशैली: जैसे-जैसे अधिक लोग शहरों की ओर अग्रसर हो रहे हैं और व्यस्त जीवन जी रहे हैं, सुविधाजनक एवं ‘रेडी-टू-ईट’ खाद्य पदार्थों की माँग तेजी से बढ़ रही है।
- ‘मिलेट’ क्रांति: स्वास्थ्य के प्रति वैश्विक जागरूकता के साथ, भारत के मिलेट (श्री अन्न) एक पोषणयुक्त सुपरफूड के रूप में अत्यधिक माँग में हैं।
- प्रौद्योगिकी परिवर्तन: फास्ट-फ्रीजिंग और विशेष पैकेजिंग जैसी नई तकनीकों के माध्यम से खाद्य पदार्थों को स्वाद बनाए रखते हुए महीनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
कार्यान्वयन एवं शासन तंत्र
- परियोजना प्रबंधन हेतु एजेंसी: इस योजना का कार्यान्वयन इंडस्ट्रियल फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड द्वारा किया जाता है, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय संस्था है।
- पारदर्शी आवेदन प्रक्रिया: आवेदन एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) के माध्यम से ऑनलाइन पोर्टल पर आमंत्रित किए जाते हैं, जिससे पारदर्शिता एवं सुलभता सुनिश्चित होती है।
- डिजिटल निगरानी: एक वेब-आधारित प्रबंधन सूचना प्रणाली के माध्यम से परियोजनाओं की रियल-टाइम प्रगति की निगरानी की जाती है, जिससे जवाबदेही तथा समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है।
चुनौतियाँ
यद्यपि प्रगति तीव्र है, फिर भी कई बाधाएँ इस क्षेत्र की गति को धीमा करती हैं:
- खाद्य अपव्यय: रेफ्रिजरेटेड ट्रकों और कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण बड़ी मात्रा में फल एवं सब्जियाँ कारखाने तक पहुँचने से पहले ही खराब हो जाती हैं।
- कठोर वैश्विक मानक: कई भारतीय उत्पाद विदेशों में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के सख्त मानकों को पूरा न करने के कारण अस्वीकृत हो जाते हैं।
- महँगा ऋण: लघु उद्यमियों के लिए उन्नत मशीनरी खरीदने हेतु सस्ती ऋण सुविधा प्राप्त करना कठिन होता है, जिससे उच्च-गुणवत्ता प्रसंस्करण प्रभावित होता है।
- खंडित आपूर्ति शृंखला: किसान और कारखाने के बीच अत्यधिक बिचौलिये होने से लागत बढ़ती है तथा गुणवत्ता घटती है।
आगे की राह
विकसित भारत (2047) के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु ध्यान निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित होना चाहिए:
- क्लस्टर की स्थापना: कृषि क्षेत्रों के निकट खाद्य प्रसंस्करण हब विकसित करना, जिससे परिवहन संबंधी समय और खराबी में कमी आए।
- स्मार्ट लॉजिस्टिक्स: डिजिटल ट्रैकिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर खेत से बाजार तक खाद्य गुणवत्ता की निगरानी करना।
- पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग: प्लास्टिक के उपयोग को कम कर पर्यावरणीय पैकेजिंग को अपनाना, जिससे वैश्विक पर्यावरण के प्रति सचेत उपभोक्ताओं को आकर्षित किया जा सके।
- कुशल कार्यबल: ग्रामीण युवाओं को तकनीकी कौशल में प्रशिक्षित करना, ताकि वे आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण मशीनरी का संचालन कर सकें।
निष्कर्ष
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र केवल एक उद्योग नहीं है; यह किसानों की आय दोगुनी करने और ग्रामीण गरीबी को कम करने का एक प्रभावी माध्यम है। मूल उपज को उच्च-मूल्य उत्पादों में परिवर्तित कर भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि “मेक इन इंडिया” मिशन के माध्यम से वैश्विक खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास को सुदृढ़ किया जा सके।