संदर्भ
प्रक्षेपण के लगभग छह वर्ष बाद, चंद्रयान-2 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्रों में सतह के नीचे (उपसतही) बर्फ की संभावित उपस्थिति के नए साक्ष्य प्रदान किए हैं।
खोज के पीछे का विज्ञान
- यह अध्ययन चंद्रमा पर स्थित एक विशिष्ट भू-आकृतिक तथा तापीय वातावरण पर केंद्रित था।
- दोहरी छाया वाले क्रेटर (Doubly Shadowed Craters): ये छोटे क्रेटर हैं, जो चंद्र ध्रुवों के निकट स्थित बड़े स्थायी रूप से छायायुक्त क्षेत्रों (Permanently Shadowed Regions-PSRs) के भीतर पाए जाते हैं।
- क्योंकि इन तक न तो प्रत्यक्ष सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और न ही पर्याप्त बिखरा हुआ विकिरण, इसलिए ये चंद्रमा के सबसे ठंडे ज्ञात स्थानों में शामिल हैं।

- तापीय संरक्षण: सूर्य के प्रकाश और तापीय विकिरण से निरंतर सुरक्षा मिलने के कारण ये क्षेत्र अत्यंत ठंडे बने रहते हैं।
- ऐसी परिस्थितियाँ जल एवं बर्फ के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए अनुकूल मानी जाती हैं।
- वाष्पशील पदार्थों का नेटवर्क: ये अत्यधिक शीतल क्षेत्रों (कोल्ड ट्रैप) के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ जल तथा अन्य वाष्पशील यौगिक भू-वैज्ञानिक कालक्रम तक सुरक्षित रह सकते हैं।
विश्लेषणात्मक कार्यप्रणाली
वैज्ञानिकों ने संभावित बर्फ-समृद्ध उपसतही पदार्थों और खुरदरे, चट्टानी भू-भाग के बीच अंतर करने के लिए उन्नत रडार ध्रुवणमितीय (Polarimetric) विश्लेषण का उपयोग किया, क्योंकि ये दोनों ही रडार संकेतों में एक जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकते हैं।
- ध्रुवण की डिग्री (Degree of Polarization- DOP): DOP यह मापता है कि चंद्र सतह या उपसतह के साथ अंतःक्रिया करने के बाद परावर्तित (वापस आने वाला) रडार संकेत अपनी मूल ध्रुवण अवस्था को किस सीमा तक बनाए रखता है।
- रडार पहचान मानदंड: अध्ययन में आयतनिक प्रकीर्णन की पहचान के लिए एक परिष्कृत मानदंड प्रस्तावित किया गया, जो उपसतह में बर्फ जैसे पदार्थ की उपस्थिति का संकेत दे सकता है:-
- वृत्तीय ध्रुवण अनुपात (CPR) > 1.0
- ध्रुवण की डिग्री (DOP) < 0.13
- आकृतिक समर्थन: फॉस्टिनी क्रेटर के अंदर लगभग 1.1 किमी. चौड़े एक छोटे क्रेटर में उच्च रडार ध्रुवण (High Radar Polarization) और विशिष्ट पालिदार-किनारे वाली (लोबेट-रिम) भू-आकृति पाई गई है। इससे संकेत मिलता है कि किसी संघट्ट के कारण सतह के नीचे मौजूद बर्फ-समृद्ध परत उजागर हुई है या उसके साथ अंतःक्रिया हुई है।
यह खोज क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- स्थानीय संसाधन उपयोग (In-Situ Resource Utilization – ISRU): संभावित उपसतही बर्फ भंडारों का मानचित्रण भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- चंद्रमा पर उपलब्ध बर्फ का उपयोग पेयजल, ऑक्सीजन उत्पन्न करने तथा हाइड्रोजन-ऑक्सीजन आधारित रॉकेट ईंधन बनाने में किया जा सकता है।
- गहन अंतरिक्ष अभियानों के लिए ईंधन: यदि चंद्रमा पर उपलब्ध जल को रॉकेट ईंधन में परिवर्तित किया जा सके, तो यह भविष्य में मंगल तथा उससे आगे के गहन अंतरिक्ष अभियानों (Deep Space Missions) के लिए एक महत्वपूर्ण सामरिक ईंधन-पुनर्भरण केंद्र (Strategic Refueling Hub) बन सकता है।
- चंद्रयान-2 का सतत् वैज्ञानिक महत्त्व: यद्यपि विक्रम लैंडर वर्ष 2019 में सफल सॉफ्ट लैंडिंग नहीं कर पाया था, फिर भी चंद्रयान-2 ऑर्बिटर लगातार मूल्यवान वैज्ञानिक आँकड़े उपलब्ध करा रहा है।
- चंद्रयान-2 का DFSAR (डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर रडार) पेलोड चंद्र ध्रुवीय क्षेत्रों के अध्ययन हेतु उच्च-रिजॉल्यूशन, पूर्ण ध्रुवणमितीय (Fully Polarimetric) एल-बैंड (L-band) और एस-बैंड (S-band) रडार अवलोकन प्रदान करता है।
चंद्रमा की सतह एवं तापमान संबंधी विशेषताएँ
- स्थायी रूप से छायायुक्त क्षेत्र: चंद्र ध्रुवों के निकट स्थित ऐसे अंधकारमय क्षेत्र, जहाँ क्रेटरों के किनारे, सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध कर देते हैं, जिसके कारण वहाँ बहुत कम या बिल्कुल भी प्रत्यक्ष सूर्य प्रकाश नहीं पहुँचता है।
- ये क्षेत्र जल-बर्फ तथा अन्य वाष्पशील पदार्थों को संरक्षित रखने में सक्षम होते हैं।
- द्वि-छायित क्रेटर: द्वि-छायित क्रेटर (Doubly Shadowed Craters) बड़े स्थायी रूप से छायायुक्त क्षेत्रों (PSRs) के भीतर स्थित छोटे क्रेटर होते हैं।
- ये प्रत्यक्ष सूर्य के प्रकाश के साथ-साथ आस-पास के भू-भाग से आने वाले अधिकांश प्रकीर्णित प्रकाश और तापीय विकिरण से भी सुरक्षित रहते हैं, जिसके कारण इनका तापमान अत्यंत निम्न बना रहता है।
- वोलाटाइल ट्रैप/कोल्ड ट्रैप: यह एक अत्यधिक शीतल (अत्यंत ठंडा) क्षेत्र होता है, जहाँ जलवाष्प जैसे वाष्पशील पदार्थ जमकर लंबी भू-वैज्ञानिक अवधियों (Geological Periods) तक सुरक्षित रह सकते हैं।
- पालिदार-किनारे वाली भू-आकृति (Lobate-Rim Morphology): यह प्रवाह जैसी या जीभ के आकार की क्रेटर का किनारा होता है।
- इस संदर्भ में, यह इस बात का संकेत हो सकता है कि किसी संघट्ट (टक्कर) के कारण उपसतह में मौजूद बर्फ-समृद्ध पदार्थ उजागर हुआ है या उसके साथ अंतःक्रिया हुई है।
- रडार प्रौद्योगिकी एवं संकेत संबंधी शब्दावली
- ‘डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर रडार’ (Dual Frequency Synthetic Aperture Radar- DFSAR): यह चंद्रयान-2 पर स्थापित एक रडार उपकरण है, जो माइक्रोवेव संकेतों का उपयोग करके चंद्रमा की सतह तथा उथली उपसतह का अध्ययन करता है, यहाँ तक कि पूर्णतः अंधकारमय ध्रुवीय क्षेत्रों में भी।
- रडार ध्रुवणमिति (Radar Polarimetry): एक ऐसी तकनीक, जिसमें यह अध्ययन किया जाता है कि परावर्तन के बाद रडार तरंगों के ध्रुवण (Polarization) में किस प्रकार परिवर्तन होता है।
- यह तकनीक सतह के खुरदरेपन, उपसतह में दबे पदार्थों तथा संभावित बर्फ-समृद्ध निक्षेपों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायता करती है।
- वृत्तीय ध्रुवण अनुपात: यह एक रडार मानदंड है, जिसका उपयोग वापस आने वाले वृत्तीय ध्रुवित संकेतों की तुलना करने के लिए किया जाता है।
- केवल उच्च CPR का मान खुरदरे भू-भाग या बर्फ (दोनों में से किसी एक) की उपस्थिति का संकेत दे सकता है। इसलिए अध्ययन में अधिक सटीक व्याख्या के लिए CPR को DOP के साथ संयुक्त रूप से उपयोग किया गया।
- अंतरिक्ष यात्रा संबंधी अवधारणाएँ
- स्थानीय संसाधन उपयोग: अंतरिक्ष में उपलब्ध स्थानीय संसाधनों का उपयोग करना, जैसे चंद्रमा की बर्फ से जल का निष्कर्षण, ताकि सभी आवश्यक सामग्री पृथ्वी से ले जाने की आवश्यकता न पड़े।
- द्रव हाइड्रोजन-ऑक्सीजन प्रणोदक: उच्च ऊर्जा वाला रॉकेट ईंधन मिश्रण, जिसे सैद्धांतिक रूप से जल को विद्युत अपघटन द्वारा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करके तैयार किया जा सकता है।
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