‘क्वार्टर-टू-मिडलाइफ’ महिलाओं (वर्ष 25–60) का स्वास्थ्य: चुनौतियाँ और प्राथमिकताएँ

5 May 2026

संदर्भ

हालिया अनुसंधान ने 25–60 वर्ष आयु वर्ग (क्वार्टर-टू-मिडलाइफ) की महिलाओं हेतु स्वास्थ्य नीतियों में उपेक्षा को उजागर किया है, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण कमी पर ध्यान आकर्षित हुआ है।

संबंधित तथ्य

  • यह अनुसंधान “मझधार” पहल के अंतर्गत (PCI इंडिया द्वारा AIIMS पटना एवं अन्य संस्थानों के सहयोग से) किया गया है, जिसने प्रजनन आयु के बाद महिलाओं के स्वास्थ्य की उपेक्षा को उजागर किया है। 

क्वार्टर-टू-मिडलाइफ महिलाएँ (वर्ष 25–60) के बारे में 

  • क्वार्टर-टू-मिडलाइफ महिलाएँ” शब्द का प्रतिपादन डॉ. शिवांगी शंकर और डॉ. सुदीप्त मंडल जैसे शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जो वर्ष 25–60 आयु वर्ग की उन महिलाओं का वर्णन करता है, जो प्रारंभिक वयस्कता और वृद्धावस्था के बीच स्थित हैं।

यह श्रेणी क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • यह चरण महिलाओं के जीवन का सबसे बड़ा और सबसे सक्रिय हिस्सा होता है, फिर भी इसे स्वास्थ्य नीति में व्यापक रूप से नजरअंदाज किया जाता है।
    • प्रजनन-उपरांत बहिष्करण: कई महिलाएँ संतानोत्पत्ति के बाद मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों से बाहर हो जाती हैं।
    • पूर्व-वृद्धावस्था उपेक्षा: उन्हें अभी तक जराचिकित्सा (Geriatric) देखभाल प्रणालियों के अंतर्गत शामिल नहीं किया जाता है।

क्वार्टर-टू-मिडलाइफ’ महिलाओं (वर्ष 25–60) की प्रमुख विशेषताएँ

  • उच्च उत्तरदायित्व का चरण: महिलाएँ परिवार में प्राथमिक देखभालकर्ता की भूमिका निभाती हैं, जहाँ वे बच्चों के पालन-पोषण और वृद्धों की देखभाल का प्रबंधन करती हैं।
    • वे अवैतनिक देखभाल कार्य और वेतनयुक्त रोजगार के दोहरे बोझ का सामना करती हैं, जिससे समय की कमी (Time poverty) और स्व-देखभाल पर सीमित ध्यान होता है।
  • उच्च आर्थिक योगदान का चरण: यह चरण विशेषतः स्व-सहायता समूहों (SHGs), कृषि और असंगठित क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के उच्चतम स्तर को दर्शाता है।
    • वे घरेलू आय, गरीबी उन्मूलन और स्थानीय स्तर के आर्थिक विकास की प्रमुख प्रेरक होती हैं।
  • स्वास्थ्य संक्रमण का चरण: यह चरण प्रजनन स्वास्थ्य से दीर्घकालिक और जीवनशैली-संबंधित रोगों की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
    • असंक्रामक रोग (NCDs), रजोनिवृत्ति से जुड़े परिवर्तन मानसिक तनाव में वृद्धि करते हैं, जो अल्प स्वास्थ्य सेवा से उत्पन्न व्यवहार और व्यक्तिगत स्वास्थ्य की उपेक्षा से और अधिक गंभीर हो जाते हैं।
  • निर्णय-निर्माण की भूमिका: महिलाएँ घरेलू निर्णयों में, विशेषकर वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में, अधिक भागीदारी करती हैं।
    • वे स्व-सहायता समूहों (SHGs) और स्थानीय शासन संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाकर स्थानीय विकास को प्रभावित करती हैं।
  • वित्तीय संक्रमण चरण – सीमित स्वायत्तता: आर्थिक योगदान के बावजूद, कई महिलाओं का वित्तीय संसाधनों और संपत्तियों पर नियंत्रण सीमित रहता है।
    • पुरुष सदस्यों पर निर्भरता स्वतंत्र स्वास्थ्य और आजीविका संबंधी निर्णयों को सीमित करती है।
  • सामाजिक पहचान का संक्रमण: महिलाएँ सक्रिय मातृत्व से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक भूमिकाओं की ओर संक्रमण करती हैं।
    • इस प्रक्रिया में पहचान संबंधी चुनौतियाँ, मान्यता में कमी और बदलती सामाजिक अपेक्षाएँ सामने आती हैं।
  • सामाजिक और आर्थिक तनावों के प्रति संवेदनशीलता: इस चरण की महिलाएँ आय में कमी, स्वास्थ्य संकट और पारिवारिक समस्याओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं।
    • सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षा तंत्र की कमी उन्हें गरीबी और हाशिये पर जाने के जोखिम में डालती है।
  • निवारक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच: नियमित जाँच और स्वास्थ्य परीक्षण जैसी निवारक सेवाओं का उपयोग कम होता है।
    • इससे रोगों का देर से निदान होता है और समय के साथ स्वास्थ्य परिणाम और  भी खराब हो जाते हैं।

क्वार्टर-टू-मिडलाइफ’ महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली प्रमुख समस्याएँ

  • नीतिगत अदृश्यता: स्वास्थ्य प्रणाली मुख्यतः किशोरियों और मातृ स्वास्थ्य पर केंद्रित रहती है, जिससे मध्य आयु की महिलाएँ लक्षित हस्तक्षेपों से बाहर रह जाती हैं।
    • परिणामस्वरूप, यह वर्ग अपर्याप्त सेवाओं से वंचित रहता है और समर्पित स्वास्थ्य कार्यक्रमों से बाहर रहता है।
  • रोग भार: स्वास्थ्य स्थितियों का एक बड़ा हिस्सा अपर्याप्त स्क्रीनिंग और जागरूकता के कारण निदानित नहीं हो पाता है।
    • इससे असंक्रामक रोगों (NCDs) का देर से पता चलता है, जिससे रुग्णता और उपचार लागत बढ़ती है।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक उपेक्षा: महिलाएँ प्रायः अपने स्वास्थ्य की अपेक्षा परिवार की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देती हैं।
    • गहरे जड़ें जमाए लैंगिक मानदंड स्वास्थ्य-सेवा प्राप्त करने में देरी और निवारक देखभाल की उपेक्षा का कारण बनते हैं।
  • सीमित डेटा और साक्ष्य अंतराल: मध्य आयु की महिलाओं के स्वास्थ्य पर जीवन-चक्र आधारित और दीर्घकालिक अध्ययन (Longitudinal studies) का अभाव है।
    • इससे नीतिगत रूप से अस्पष्ट क्षेत्रों का निर्माण होता है और इस वर्ग के लिए साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप कमजोर रहते हैं।
  • वित्तीय और पहुँच संबंधी बाधाएँ: कई महिलाओं के पास वित्तीय स्वायत्तता और स्वास्थ्य बीमा कवरेज का अभाव होता है, जिससे गुणवत्तापूर्ण सेवाओं तक पहुँच सीमित होती है।
    • आउट-ऑफ-पॉकेट’ व्यय (out-of-pocket expenditure) और परिवार पर निर्भरता समय पर उपचार में देरी करती है।
  • मानसिक स्वास्थ्य पर अपर्याप्त ध्यान: तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ कम निदानित और कम उपचारित रहती हैं।
    • सामाजिक कलंक और सेवाओं की कमी से मनोवैज्ञानिक कल्याण प्रभावित होता है।
  • कार्यस्थल और व्यावसायिक स्वास्थ्य की उपेक्षा: असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत महिलाएँ निम्न कार्य-परिस्थितियों और व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा के अभाव का सामना करती हैं।
    • कार्यस्थल स्वास्थ्य नीतियों की अनुपस्थिति से बीमारी और थकान का जोखिम बढ़ता है।
  • खंडित स्वास्थ्य सेवा वितरण: स्वास्थ्य सेवाएँ समग्र और निरंतर होने के बजाय योजना-आधारित और अस्थायी बनी रहती हैं।
    • सेवाओं के बीच समन्वय की कमी के कारण निवारक, प्रोत्साहक और उपचारात्मक देखभाल में अंतराल उत्पन्न होते हैं।

क्वार्टर-टू-मिडलाइफ’ महिलाओं (वर्ष 25–60) पर ध्यान केंद्रित करना क्यों आवश्यक है?

  • आर्थिक विकास: स्वस्थ महिलाएँ उच्च उत्पादकता एवं कार्यबल भागीदारी में वृद्धि कर आर्थिक उत्पादन को सुदृढ़ करती हैं।
    • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) अथवा कृषि में संलग्न स्वस्थ महिला निरंतर कार्य कर सकती है, जिससे घरेलू आय एवं स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होती है।
  • पीढ़ीगत प्रभाव: महिलाएँ परिवार के स्वास्थ्य, पोषण एवं कल्याण को आकार देती हैं, जिससे अनेक पीढ़ियों पर प्रभाव पड़ता है।
    • पोषण के प्रति जागरूक माँ बच्चों की प्रतिरक्षा क्षमता तथा वृद्धों की देखभाल सुनिश्चित करती है, जिससे परिवार में समग्र रोग-भार कम होता है।
  • जनसांख्यिकीय संक्रमण: बढ़ती जीवन प्रत्याशा के साथ यह चरण महिलाओं के जीवन का बड़ा हिस्सा बनता जा रहा है।
    • वर्ष 40 में प्रारंभिक स्क्रीनिंग, वर्ष 60 में जटिलताओं को रोककर स्वस्थ वृद्धावस्था एवं निर्भरता में कमी सुनिश्चित करती है।
  • लैंगिक समानता एवं अधिकार: यह महिलाओं को केवल प्रजनन भूमिकाओं तक सीमित न मानकर जीवनपर्यंत स्वास्थ्य अधिकारों के साथ एक स्वतंत्र इकाई के रूप में मान्यता देता है।
  • असंक्रामक रोगों की रोकथाम एवं लागत में कमी: प्रारंभिक पहचान से दीर्घकालिक रोग-भार तथा स्वास्थ्य व्यय में कमी आती है।
    • उदाहरणार्थ, उच्च रक्तचाप का समय पर निदान स्ट्रोक अथवा हृदय रोग जैसी जटिलताओं को रोक सकता है।
  • मानव पूँजी का सुदृढ़ीकरण: स्वस्थ महिलाएँ उत्पादकता एवं देखभाल की गुणवत्ता में सुधार कर समग्र मानव विकास को सुदृढ़ करती हैं।
  • श्रम बल भागीदारी में वृद्धि: बेहतर स्वास्थ्य महिलाओं को रोजगार के अवसरों में प्रवेश एवं निरंतरता बनाए रखने में सक्षम बनाता है।
    • नियमित स्वास्थ्य जाँच की उपलब्धता महिलाओं को स्व-सहायता समूहों (SHGs) या लघु उद्यमों में सक्रिय भागीदारी जारी रखने में सहायता करती है।
  • सामाजिक स्थिरता एवं सामुदायिक विकास: महिलाएँ सामुदायिक नेटवर्क और सामाजिक एकजुटता की केंद्रीय धुरी होती हैं।
    • स्वस्थ महिलाएँ स्थानीय शासन (पंचायतों) एवं सामुदायिक पहलों में सक्रिय भागीदारी कर स्थानीय स्तर के विकास को सुदृढ़ करती हैं।

आगे की राह

  • जीवन-चक्र आधारित स्वास्थ्य नीति ढाँचे को अपनाना: संकीर्ण मातृ-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर एक समग्र जीवन-चक्र मॉडल की ओर बढ़ना, जिसमें महिलाओं के किशोरावस्था, प्रजनन, मध्य आयु तथा वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य आवश्यकताओं का एकीकृत समावेश हो।
  • निवारक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग का संस्थानीकरण: असंक्रामक रोगों, कैंसर (स्तन, गर्भाशय ग्रीवा), अस्थिक्षय तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए नियमित स्क्रीनिंग की सार्वभौमिक उपलब्धता सुनिश्चित करना, विशेषकर स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य ढाँचों के माध्यम से।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल एवं निरंतर देखभाल को सुदृढ़ करना: प्रोत्साहक, निवारक, उपचारात्मक एवं पुनर्वासात्मक सेवाओं को एकीकृत प्रणाली के अंतर्गत समाहित करना, जिससे खंडित एवं योजनागत स्वास्थ्य सेवा वितरण से बचा जा सके।
  • वित्तीय सुरक्षा एवं बीमा कवरेज का विस्तार: आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का विस्तार करते हुए मध्य आयु की महिलाओं के लिए बाह्य रोगी सेवाएँ, निदान सेवाएँ तथा दीर्घकालिक रोग प्रबंधन को शामिल करना।
  • स्वास्थ्य जागरूकता एवं व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करना: सूचना, शिक्षा एवं संचार अभियानों के माध्यम से लैंगिक मानदंडों, सामाजिक उपेक्षा तथा कम स्वास्थ्य-सेवा ग्रहण व्यवहार को संबोधित करते हुए महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने हेतु प्रोत्साहित करना।
  • मानसिक एवं व्यावसायिक स्वास्थ्य पर ध्यान: विशेष रूप से असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तथा कार्यस्थल सुरक्षा मानकों को शामिल करना, जिससे तनाव प्रबंधन एवं व्यावसायिक कल्याण सुनिश्चित हो सके।
  • डेटा प्रणाली एवं साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण में सुधार: मध्य आयु की महिलाओं पर दीर्घकालिक अध्ययन, लैंगिक रूप से विभेदित आँकड़ों तथा अनुसंधान में निवेश करना, ताकि लक्षित एवं साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेपों का निर्माण तथा प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जा सके।

मातृत्व के अतिरिक्त महिलाओं के स्वास्थ्य पर वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ (तुलनात्मक सारणी) 

आयाम जापान (निवारक मॉडल) यूनाइटेड किंगडम (NHS स्वास्थ्य जाँच) विश्व स्वास्थ्य संगठन (जीवन-चक्र दृष्टिकोण)
संस्थागत ढाँचा सरकार और कार्यस्थल-एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा द्वारा संचालित विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्देशित
लक्षित समूह वयस्क, विशेषकर 40–60 वर्ष 40–74 वर्ष आयु वर्ग के वयस्क जीवन के सभी चरणों में संपूर्ण जनसंख्या
मुख्य दृष्टिकोण निवारक, नियमित पूर्ण-शरीर जाँच (निंगेन डॉक) जोखिम-आधारित स्क्रीनिंग और प्रारंभिक हस्तक्षेप समग्र, जीवन-चक्र आधारित सतत देखभाल
फोकस क्षेत्र गैर-संचारी रोग, कैंसर, रजोनिवृत्ति, अस्थि स्वास्थ्य हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, किडनी रोग, मानसिक स्वास्थ्य निवारक, प्रोत्साहक, उपचारात्मक + स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारक
सेवा प्रदाय तंत्र कार्यस्थल-आधारित वार्षिक अनिवार्य जाँच और क्लीनिक। सामान्य चिकित्सकों और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से प्राथमिक देखभाल। सुदृढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और सामुदायिक पहुँच।
लैंगिक संवेदनशीलता मध्य आयु के मुद्दों जैसे रजोनिवृत्ति और वृद्धावस्था को संबोधित करता है। सामान्य जनसंख्या पर केंद्रित, महिलाओं को अप्रत्यक्ष लाभ। स्पष्ट रूप से लैंगिक और समानता-आधारित ढाँचा।
निवारक रणनीति नियमित जाँच के माध्यम से प्रारंभिक पहचान जोखिम मूल्यांकन + जीवनशैली में सुधार प्रत्येक जीवन चरण में प्रारंभिक हस्तक्षेप
एकीकरण स्तर रोजगार प्रणाली के साथ मजबूत एकीकरण। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली के साथ एकीकृत। बहु-क्षेत्रीय समन्वय (स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा)।
परिणाम/प्रभाव उच्च जीवन प्रत्याशा, कम रोग भार गैर-संचारी रोगों से समय-पूर्व मृत्यु में कमी समावेशी स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए वैश्विक नीति ढाँचा
भारत के लिए प्रमुख सीख मध्य आयु में नियमित स्वास्थ्य जाँच को संस्थागत बनाना। जोखिम-आधारित निवारक स्वास्थ्य जाँच अपनाना। जीवन-चक्र एवं समानता-आधारित स्वास्थ्य मॉडल की ओर परिवर्तन।

निष्कर्ष

क्वार्टर-टू-मिडलाइफ महिलाएँ (वर्ष 25–60) स्वास्थ्य नीति में एक अदृश्य मध्य वर्ग’ (Missing middle) का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो आर्थिक रूप से उत्पादक होने के बावजूद चिकित्सकीय रूप से उपेक्षित रहती हैं, अतः इनके लिए जीवन-चक्र आधारित एवं समावेशी स्वास्थ्य देखभाल दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

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