लिपुलेख दर्रा

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नेपाल की नई सरकार ने लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति जताई है, जिससे लंबे समय से चला आ रहा क्षेत्रीय विवाद फिर से उभर आया है।
- विवादित क्षेत्र: नेपाल सुगौली की संधि (Treaty of Sugauli) के आधार पर लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा पर दावा करता है।
लिपुलेख दर्रे के बारे में
- स्थान: यह एक उच्च-ऊँचाई वाला दर्रा है, जो भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन पर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित है।
- महत्त्व
- रणनीतिक: चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के निकट भारत की सीमा सुरक्षा, सैन्य आपूर्ति और निगरानी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण।
- व्यापार और तीर्थ मार्ग: वर्ष 1954 से भारत–चीन व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए उपयोग किया जाता रहा है।
- विवाद: नेपाल (सुगौली की संधि का हवाला देते हुए) इस पर दावा करता है, जबकि भारत ऐतिहासिक प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने की बात करता है।
- हालिया तनाव: वर्ष 2020 में नेपाल के नए मानचित्र दावे और भारत–चीन गतिविधियों (व्यापार, सड़क निर्माण, यात्रा) पर आपत्तियों के कारण यह मुद्दा लगातार सक्रिय बना हुआ है।
सुगौली की संधि (Treaty of Sugauli):
- हस्ताक्षरित: वर्ष 1816 में, एंग्लो-नेपाल युद्ध (1814–16) के बाद नेपाल के राज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच।
- क्षेत्रीय परिवर्तन: नेपाल ने काली नदी के पश्चिम (सतलुज तक) के क्षेत्रों को छोड़ दिया और तराई क्षेत्र पर अपने दावों का त्याग किया।
- सीमा निर्धारण: काली (महाकाली) नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा के रूप में निर्धारित किया गया।
- रेजिडेंट प्रावधान: काठमांडू में एक ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति की अनुमति दी गई, जिससे नेपाल के मामलों में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ा।
- रणनीतिक प्रभाव: इस संधि ने नेपाल के विस्तार को सीमित किया और उसकी आधुनिक क्षेत्रीय सीमाओं की शुरुआत को चिह्नित किया।
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सुकुमार अझिकोड जन्मशती राष्ट्रीय पुरस्कार
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सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर और तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को सुकुमार अझिकोड जन्मशती राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है।
सुकुमार अझिकोड जन्मशती पुरस्कार के बारे में
- प्रदानकर्ता: सुकुमार अझिकोड ट्रस्ट
- सम्मान के क्षेत्र
- मेधा पाटकर: सामाजिक सक्रियता के प्रति आजीवन समर्पण और विस्थापित समुदायों के अधिकारों के लिए उनके कार्य के लिए सम्मानित।
- पेरुमल मुरुगन: भारतीय साहित्य में उनके योगदान और अपने लेखन के माध्यम से जटिल सामाजिक मुद्दों की साहसिक अभिव्यक्ति के लिए सम्मानित।
- पुरस्कार के घटक: ₹50,000 की नकद राशि तथा प्रशस्ति-पत्र।
- सुकुमार अझिकोड केरल के एक प्रसिद्ध मलयालम लेखक, प्रख्यात साहित्यिक आलोचक, निबंधकार और वक्ता थे।
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C-ART वेधशाला

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हाल ही में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के मिशन मौसम (Mission Mausam) के अंतर्गत तटीय वायुमंडलीय अनुसंधान परीक्षण मंच (C-ART) का ओपन-फील्ड वेधशाला आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखापट्टनम में उद्घाटन किया गया।
C-ART के बारे में
- स्थापना एजेंसी: इसे भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) द्वारा स्थापित किया गया है, जो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है।
- स्थान और अवसंरचना: आंध्र विश्वविद्यालय में स्थापित, जिसने खुले क्षेत्र में मौसम संबंधी वेधशाला के लिए भूमि उपलब्ध कराई।
- संस्थान का स्वरूप: यह निरंतर और समेकित वायुमंडलीय अवलोकनों के साथ-साथ अनुसंधान सहयोग के लिए डिजाइन किया गया है।
- उद्देश्य
- मानसून अनुसंधान: मानसूनी संवहन के प्रक्रिया-स्तरीय विश्लेषण को समर्थन देना।
- मॉडल सुधार: संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान (NWP) मॉडलों में मानदंड आधारित योजनाओं को बेहतर बनाना।
- डेटा और सत्यापन: बेहतर पूर्वानुमान क्षमता के लिए डेटा समाकलन प्रयोग और मॉडल मूल्यांकन को सक्षम बनाना।
- उपकरण (वर्तमान व्यवस्था)
- डिस्ड्रोमीटर और 2D वीडियो डिस्ड्रोमीटर (2DVD): वर्षा की सूक्ष्म भौतिकी के अध्ययन के लिए।
- डिस्ड्रोमीटर: वर्षा की बूँदों के आकार, आकृति और वितरण को मापने वाला उपकरण।
- 2D वीडियो डिस्ड्रोमीटर (2DVD): गिरती हुई वर्षा की बूँदों की द्वि-आयामी छवियाँ लेकर सूक्ष्म अध्ययन करने वाला उन्नत उपकरण।
- 3D-प्रिंटेड स्वचालित मौसम स्टेशन (3D-PAWS) और पारंपरिक AWS
- स्वचालित मौसम स्टेशन (AWS): तापमान, आर्द्रता, पवन और वर्षा जैसे मौसमीय मानकों को स्वतः रिकॉर्ड करने वाली प्रणाली।
- 3D-PAWS: कम लागत वाला 3D-प्रिंटेड AWS, जिसे बड़े पैमाने पर और कुशल मौसम निगरानी के लिए डिजाइन किया गया है।
- एडी कोवेरिएंस टॉवर (Eddy Covariance Tower): पृथ्वी की सतह और वायुमंडल के बीच ऊष्मा, नमी और गैसों के आदान-प्रदान को मापता है।
- मौसम आधारित प्रोफाइलिंग: वायुमंडल की ऊर्ध्वाधर प्रोफाइलिंग (Vertical profiling) के लिए उपयोग किया जाता है।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के बारे में
- प्रकार: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के अंतर्गत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान
- स्थापना: वर्ष 1962 (स्वायत्त दर्जा: 1971)।
- मुख्यालय: पुणे (महाराष्ट्र)।
- मुख्य क्षेत्र: उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान, विशेष रूप से भारतीय मानसून और जलवायु विज्ञान पर केंद्रित
- प्रमुख कार्य
- संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान (NWP) मॉडलों का विकास
- जलवायु परिवर्तनशीलता और पृथ्वी तंत्र मॉडलिंग पर अनुसंधान
- चरम मौसमीय घटनाओं पर अध्ययन
- भारत में मौसम पूर्वानुमान और जलवायु सेवाओं के लिए वैज्ञानिक इनपुट प्रदान करना।
मिशन मौसम के बारे में
- यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य उन्नत पूर्वानुमान प्रणालियों के माध्यम से भारत को “मौसम-तैयार और जलवायु-स्मार्ट” बनाना है।
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शिशुओं के लिए मलेरिया का पहला उपचार

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2 से 5 किलोग्राम वजन वाले शिशुओं के लिए विशेष रूप से विकसित पहली मलेरिया दवा को पूर्व योग्यता (प्री-क्वालिफाई) प्रदान कर दी है।
शिशुओं के लिए मलेरिया दवा के बारे में
- दवा: आर्टेमेथर-ल्यूमेफैन्ट्रिन (Artemether-lumefantrine) का शिशु-विशिष्ट रूप (सामान्य ब्रांड नाम: कोआर्टेम)
- उपचार में कमी को दूर करना
- पूर्व: शिशुओं को बड़े बच्चों के लिए बनाई गई दवाओं की समायोजित खुराक दी जाती थी, जिससे खुराक में त्रुटि का जोखिम बढ़ जाता था।
- वर्तमान: आयु-उपयुक्त दवा उपलब्ध होने से सटीक खुराक सुनिश्चित होती है और शिशुओं के लिए सुरक्षा में सुधार होता है।
मलेरिया के लिए नए नैदानिक परीक्षण
- विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया के लिए तीन नए त्वरित निदान परीक्षणों को भी पूर्व योग्यता प्रदान किया है।
- मौजूदा परीक्षणों की समस्या
- अधिकांश वर्तमान परीक्षण प्लास्मोडियम फैल्सीपेरम (Plasmodium falciparum) द्वारा उत्पन्न HRP2 प्रोटीन का पता लगाते हैं।
- कुछ परजीवी स्ट्रेन्स में HRP2 जीन का विलोपन होता है, जिससे यह प्रोटीन बनता ही नहीं है।
- परिणामस्वरूप, ऐसे संक्रमणों का पता नहीं चल पाता, जिससे गलत नकारात्मक परिणाम और संक्रमण का प्रसार जारी रहता है।
- नए परीक्षणों में सुधार
- नए निदान pf-LDH (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम लैक्टेट डीहाइड्रोजनेज) नामक एक वैकल्पिक परजीवी प्रोटीन का पता लगाते हैं।
- इससे विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक विश्वसनीय पहचान संभव होती है, जहाँ HRP2-नकारात्मक स्ट्रेन्स मौजूद हैं।
- WHO की सिफारिश
- जहाँ HRP2 जीन विलोपन के कारण 5% से अधिक मलेरिया संक्रमण के मामले छूट जाते हैं, सभी देशों को इन नए परीक्षणों को अपनाना चाहिए।
मलेरिया के बारे में
- परिभाषा: मलेरिया एक मच्छर-जनित संक्रामक रोग है, जो प्लास्मोडियम (Plasmodium) परजीवियों के कारण होता है और मुख्यतः संक्रमित मादा एनोफिलीज (Anopheles) मच्छरों के काटने से फैलता है।
- कारक प्रजातियाँ: प्लास्मोडियम फैल्सीपेरम (सबसे गंभीर), साथ ही प्लास्मोडियम वाइवैक्स, प्लास्मोडियम ओवेल, प्लास्मोडियम मलेरियाई और प्लास्मोडियम नोलेसी।
- लक्षण और गंभीरता: बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द; गंभीर मामलों में एनीमिया, अंग विफलता और मृत्यु तक हो सकती है।
- वैश्विक बोझ: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की विश्व मलेरिया रिपोर्ट 2025 के अनुसार:
- 2024 में लगभग 28.2 करोड़ मामले और 6,10,000 मौतें दर्ज की गईं।
- पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में अधिकांश मौतें (विशेषकर अफ्रीका में)।
- मलेरिया नियंत्रण में प्रगति को धीमा करने वाली चुनौतियाँ: दवा प्रतिरोध, कीटनाशक प्रतिरोध, निदान संबंधी कमियाँ और घटती अंतरराष्ट्रीय निधि।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के बारे में
- परिचय: WHO संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए विशेषीकृत एजेंसी है, जो स्वास्थ्य मानक तय करती है, अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का समन्वय करती है और देशों को रोग नियंत्रण तथा स्वास्थ्य प्रणालियों में सहयोग देती है।
- स्थापना: वर्ष 1948।
- मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्जरलैंड)।
- भारत और WHO: भारत इसका संस्थापक सदस्य है और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र (SEARO) का हिस्सा है।
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सिनबैक्स-II (CINBAX-II), 2026

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भारत ने अभ्यास सिनबैक्स-II (CINBAX-II) 2026 के लिए अपनी सेना का एक दल तैनात किया है, जो कंबोडिया के साथ एक द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है और आतंकवाद-रोधी तथा संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों पर केंद्रित है।
सिनबैक्स (कंबोडिया–भारत द्विपक्षीय सेना अभ्यास)–II, 2026 के बारे में
- परिचय: सिनबैक्स-II, 2026 भारत और कंबोडिया के बीच दूसरा द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है, जिसका उद्देश्य संयुक्त परिचालन क्षमताओं को सुदृढ़ करना है।
- स्थान: यह अभ्यास रॉयल कंबोडियन एयर फोर्स प्रशिक्षण केंद्र (कैंप बेसिल) में आयोजित किया जा रहा है।
- सिनबैक्स-I का आयोजन 2024 में महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था।
- प्रतिभागी: भारतीय सेना के 120 सैनिक, मुख्यतः मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट से और रॉयल कंबोडियन आर्मी के 160 सैनिक।
- मुख्य फोकस क्षेत्र
- उप-पारंपरिक वातावरण में कंपनी-स्तरीय संयुक्त अभियान, जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय VII के अंतर्गत आतंकवाद-रोधी अभियान शामिल हैं।
- ड्रोन संचालन, स्नाइपर रणनीति और मोर्टार संचालन में प्रशिक्षण।
महत्त्व
- सिनबैक्स दोनों सेनाओं के बीच अंतर-संचालन क्षमता, समन्वय और परिचालन तालमेल को बढ़ाता है।
- भारत–कंबोडिया रक्षा संबंधों को सुदृढ़ करता है।
- विशेषकर अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना और आधुनिक युद्ध परिदृश्यों के लिए तैयारी को बेहतर बनाता है।
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पद्म डोरी अभियान
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पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के अंतर्गत पूर्वोत्तर हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम ने पद्म डोरी (Padma Doree) पहल शुरू की है।
पद्म डोरी पहल के बारे में
- परिचय: पद्म डोरी एक अंतर-क्षेत्रीय वस्त्र पहल है, जो पूर्वोत्तर भारत और मध्य प्रदेश को जोड़ती है।
- परंपराओं का संगम: इसमें पूर्वोत्तर भारत के एरी (अहिंसा) रेशम को मध्य प्रदेश की चंदेरी बुनाई के साथ संयोजित किया गया है।
- उद्देश्य: एक सतत् और कारीगर-केंद्रित वस्त्र पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना तथा पारंपरिक शिल्पों का पुनर्जीवन करना।
- महत्त्व: यह “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा को दर्शाता है, जो विविध सांस्कृतिक परंपराओं के एकीकरण को प्रोत्साहित करती है।
- सततता पर जोर: पर्यावरण-अनुकूल एरी रेशम उत्पादन और विरासत हथकरघा तकनीकों को बढ़ावा देता है।
- सांस्कृतिक संवर्द्धन: इसमें प्रदर्शनियाँ, फैशन शो और कारीगरों की भागीदारी के साथ प्रत्यक्ष प्रदर्शन शामिल हैं।
एरी रेशम के बारे में
- परिचय: एरी रेशम, जिसे “अहिंसा रेशम” भी कहा जाता है, बिना रेशम के कीड़े को मारे तैयार किया जाता है, इसलिए यह पर्यावरण के अनुकूल और नैतिक बन जाता है।
- स्रोत: यह एरी रेशम कीट से प्राप्त होता है जिसे मुख्यतः अरंडी (Castor) के पत्तों पर पाला जाता है।
- क्षेत्र: मुख्यतः पूर्वोत्तर भारत- असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में उत्पादित।
- बनावट और विशेषताएँ: यह मुलायम, गर्म, टिकाऊ और वायु-संचारी होता है, जो शॉल और शीतकालीन वस्त्रों के लिए उपयुक्त है।
- सततता: इसके उत्पादन में कम ऊर्जा और न्यूनतम रसायनों का उपयोग होता है, जिससे सतत् आजीविका को समर्थन मिलता है।
चंदेरी वस्त्र के बारे में
- परिचय: चंदेरी बुनाई मध्य प्रदेश के चंदेरी नगर की एक पारंपरिक हथकरघा कला है, जिसकी जड़ें मध्यकालीन भारत में हैं।
- वस्त्र के प्रकार: यह अपने हल्के, पारदर्शी बनावट और चमकदार फिनिश के लिए प्रसिद्ध है, जिसे प्रायः रेशम, सूती या रेशम-सूती मिश्रण से बनाया जाता है।
- डिजाइन की विशेषताएँ: इसमें बारीक जरी कार्य के साथ जटिल आकृतियाँ, जैसे- मोर, कमल और ज्यामितीय पैटर्न बुने जाते हैं।
- सांस्कृतिक महत्त्व: चंदेरी साड़ियाँ और पारंपरिक परिधान व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं, जो सौंदर्य और विरासत शिल्पकला का प्रतीक हैं।
- जीआई टैग: चंदेरी साड़ियाँ भौगोलिक संकेतक (GI) उत्पाद के रूप में मान्यता प्राप्त हैं।
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