असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026

27 May 2026

संदर्भ

हाल ही में असम सरकार ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) विधेयक, 2026 प्रस्तुत किया।

संबंधित तथ्य

  • यदि यह पारित हो जाता है, तो असम पूर्वोत्तर भारत का पहला राज्य तथा उत्तराखंड और गुजरात के बाद भारत का तीसरा राज्य होगा, जो UCC कानून लागू करेगा।

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समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में

  • परिभाषा: UCC एक एकीकृत व्यक्तिगत विधि ढाँचा है, जो सभी नागरिकों पर उनकी धार्मिक पहचान से परे समान रूप से लागू होता है।
    • यह विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेना एवं संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे नागरिक विषयों का मानकीकरण करता है।
  • संवैधानिक आधार: राज्य नीति के निदेशक तत्वों (DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद-44 यह स्पष्ट रूप से निर्देश देता है कि राज्य भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।

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  • न्यायिक समर्थन: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने हेतु निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण निर्णयों में UCC की आवश्यकता पर बल दिया है—
    • शाह बानो मामला (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार को CrPC की धारा 125 के अंतर्गत मान्यता दी तथा समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया।
    • सरला मुद्गल मामला (1995): न्यायालय ने बहुविवाह के लिए धार्मिक परिवर्तन के दुरुपयोग को रेखांकित किया तथा कानूनी समानता एवं सामाजिक सुधार सुनिश्चित करने के लिए UCC के महत्व को पुनः स्थापित किया।

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असम UCC विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • बहुविवाह का उन्मूलन एवं आपराधीककरण: प्रस्तावित कानून सख्त एकपत्नी प्रथा को लागू करता है।
    • बहुविवाह का कोई भी रूप प्रतिबंधित होगा तथा इसके उल्लंघन पर अधिकतम 7 वर्ष तक का कारावास निर्धारित किया गया है।
  • विवाह एवं तलाक का अनिवार्य पंजीकरण
    • निश्चित समय-सीमा: सभी विवाह एवं तलाक को घटना या न्यायिक आदेश के 60 दिनों के भीतर निर्धारित उप-पंजीयक (Sub-registrar) के समक्ष पंजीकृत करना अनिवार्य होगा।
    • मानकीकृत नियम: विवाह के लिए न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष एवं महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है, साथ ही निकट संबंधों (37 श्रेणियाँ) में विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है।
  • लिव-इन’ संबंधों का विधिक विनियमन
    • अनिवार्य सूचना: लिव-इन संबंध में रहने वाले युगलों को एक माह के भीतर उप-पंजीयक के समक्ष पंजीकरण कराना होगा।
      • यह प्रावधान राज्य के बाहर रहने वाले असम के निवासियों पर भी लागू होगा।
    • दंडात्मक प्रावधान: निर्धारित समय में पंजीकरण न कराने पर 3 माह तक का कारावास, ₹10,000 तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
      • यदि कोई व्यक्ति आधिकारिक नोटिस का उत्तर नहीं देता, तो 6 माह तक का कारावास एवं ₹25,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
    • संतान की वैधता एवं भरण-पोषण: लिव-इन संबंध से जन्मी संतान को पूर्णतः वैध माना जाएगा।
      • इसके अतिरिक्त, परित्यक्त महिलाओं को भरण-पोषण का कानूनी अधिकार प्राप्त होगा।
  • लैंगिक रूप से समान उत्तराधिकार: यह विधेयक बिना वसीयत की स्थिति में संपत्ति के वितरण हेतु समान एवं संतुलित प्राथमिकता क्रम प्रदान करता है।
    • प्रथम श्रेणी (Class-1) उत्तराधिकारियों में पति/पत्नी, संतान एवं माता-पिता को समान रूप से शामिल किया गया है, जिससे लैंगिक रूप से भेदभावपूर्ण प्रथाओं का अंत होता है।
  • जनजातीय अपवाद: स्वदेशी परंपरागत अधिकारों की रक्षा हेतु यह कानून असम के अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों पर लागू नहीं होगा, जो राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 12.44% हैं।

समान नागरिक संहिता (UCC) की मूल आवश्यकता

  • धर्मनिरपेक्षता का सुदृढ़ीकरण: एक वास्तविक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए आवश्यक है कि सभी नागरिकों की समान नागरिक पहचान हो, जिससे राज्य द्वारा प्रदत्त कानूनी अधिकार धार्मिक प्रथाओं से पृथक रहें।
  • लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना: पारंपरिक व्यक्तिगत विधियों में प्रायः महिलाओं के विरुद्ध संपत्ति अधिकार एवं तलाक से संबंधित पक्षपातपूर्ण प्रावधान होते हैं। UCC इन असमानताओं को समाप्त कर लैंगिक समानता स्थापित करता है।
  • राष्ट्रीय एकीकरण को प्रोत्साहन: एक समान कानून एक राष्ट्र, एक कानून” की भावना को साकार करता है तथा विभिन्न समुदायों के पृथक कानूनों से उत्पन्न कानूनी विखंडन को समाप्त करता है।
  • सरलीकरण एवं समानता: यह भारत की जटिल एवं परस्पर विरोधी व्यक्तिगत विधियों की प्रणाली को सरल बनाता है, जिससे कानूनी प्रणाली अधिक सुलभ होती है तथा प्रत्येक नागरिक को समान नागरिक दर्जा प्राप्त होता है।

समाधान हेतु प्रमुख चुनौतियाँ

  • गोपनीयता का प्रश्न: लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण तथा उल्लंघन पर दंड का प्रावधान, अनुच्छेद-21 के अंतर्गत निहित निजता के अधिकार (के.एस. पुट्टास्वामी निर्णय) के संभावित उल्लंघन के रूप में आलोचना का विषय है।
  • संघवाद संबंधी चिंताएँ: व्यक्तिगत विधियाँ संविधान की समवर्ती सूची (प्रविष्टि 5) के अंतर्गत आती हैं। ऐसे में राज्यों द्वारा अलग-अलग UCC कानून पारित करना राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता के स्थान पर विखंडित कानूनी ढाँचा उत्पन्न कर सकता है।
  • असममित छूट (Asymmetric Exemptions): गैर-जनजातीय समुदायों पर कानून लागू करना, जबकि अनुसूचित जनजातियों (STs) को पूर्णतः छूट देना, सामाजिक एवं राजनीतिक तनाव को बढ़ा सकता है, विशेषकर एक जातीय रूप से संवेदनशील राज्य में।
  • धार्मिक स्वतंत्रता की चिंता: व्यक्तिगत विधियाँ धार्मिक एवं सामुदायिक प्रथाओं से गहराई से जुड़ी होती हैं, अतः यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद-25 के अंतर्गत आपत्तियों का सामना कर सकता है, यद्यपि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य एवं अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है।
  • पूर्वोत्तर की विशेष संवेदनशीलता: इस क्षेत्र में संवैधानिक रूप से संरक्षित प्रथाएँ, जनजातीय स्वायत्तता व्यवस्था एवं पारंपरिक सामुदायिक कानून विद्यमान हैं, अतः UCC के क्रियान्वयन में विशेष सावधानी एवं संतुलन आवश्यक है।

आगे की राह

  • सहमति निर्माण: राज्य सरकारों को अंतर-धार्मिक एवं नागरिक समाज संवाद को व्यापक रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि अल्पसंख्यक समुदायों में सांस्कृतिक पहचान के क्षरण की आशंकाओं को दूर किया जा सके।
  • व्यक्तिगत विकल्पों का अपराधीकरण समाप्त करना: लिव-इन संबंधों पर निगरानी रखने वाले कठोर दंडात्मक प्रावधानों के स्थान पर नागरिक दिशा-निर्देश (Civil guidelines) लागू किए जाने चाहिए, जिससे राज्य के अतिक्रमण एवं नैतिक पुलिसिंग को रोका जा सके।
  • राष्ट्रीय मॉडल मसौदा तैयार करना: भारत का विधि आयोग (Law Commission of India) विभिन्न राज्यों (असम, उत्तराखंड, गोवा) के विधेयकों से श्रेष्ठ प्रथाओं (को संकलित कर एक संतुलित एवं भेदभाव-रहित राष्ट्रीय ढाँचा विकसित करे।
  • लैंगिक-तटस्थ विधायी संरचना: भरण-पोषण, उत्तराधिकार, अभिभावकीय एवं लिव-इन संबंधों से संबंधित प्रावधानों को इस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए कि वे संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करें, साथ ही निजी विकल्पों के अनावश्यक अपराधीकरण से बचें।

निष्कर्ष

असम UCC विधेयक, अनुच्छेद-44 के संवैधानिक आदर्श को साकार करने की दिशा में एक साहसिक विधायी पहल का प्रतीक है। यद्यपि लैंगिक समान संपत्ति अधिकार एवं संतान की वैधता से संबंधित प्रावधान ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं, किंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य किस प्रकार कानूनी एकरूपता, व्यक्तिगत मौलिक स्वतंत्रताओं तथा पूर्वोत्तर भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक विविधता के मध्य संतुलन स्थापित करता है।

असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026

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