संदर्भ
जम्मू एवं कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी केंद्र सरकार के आश्वासन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभिलेखित किए जाने के ढाई वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद, इस दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
- मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा जम्मू एवं कश्मीर (J&K) को शीघ्र राज्य का दर्जा बहाल करने की माँग को लेकर किए गए विरोध-प्रदर्शनों के बाद यह मुद्दा पुनः चर्चा में आ गया है।
संबंधित तथ्य
- जम्मू एवं कश्मीर (J&K) को राज्य का दर्जा बहाल करने में हो रही देरी ने संघवाद, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक शासन तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों पर पुनः बहस को जन्म दिया है।
पृष्ठभूमि
- 5 अगस्त, 2019: अनुच्छेद-370 एवं अनुच्छेद-35A को प्रभावी रूप से निरस्त कर दिया गया था।
- जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के माध्यम से राज्य का विभाजन निम्नलिखित दो केंद्रशासित प्रदेशों में किया गया:
- विधानमंडल सहित जम्मू एवं कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश
- विधानमंडल रहित लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश

- वर्ष 2024 में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए, जिसके परिणामस्वरूप एक निर्वाचित सरकार का गठन हुआ।
- हालाँकि, जम्मू एवं कश्मीर (J&K) अब भी केंद्रशासित प्रदेश बना हुआ है।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (वर्ष 2023)
अनुच्छेद-370 (2023) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने:
- अनुच्छेद-370 के निरस्तीकरण की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
- केंद्र सरकार द्वारा यथाशीघ्र राज्य का दर्जा बहाल करने के आश्वासन को स्वीकार किया।
- निर्वाचन आयोग को सितंबर, 2024 तक विधानसभा चुनाव संपन्न कराने का निर्देश दिया, जिसका पालन किया जा चुका है।
- वर्तमान स्थिति: जम्मू एवं कश्मीर (J&K) वर्तमान में विधानमंडल सहित केंद्रशासित प्रदेश है, न कि पूर्ण राज्य।
केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा बने रहने से संबंधित चिंताएँ
- कार्यपालिका की सीमित शक्तियाँ: जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के अंतर्गत पुलिस, लोक व्यवस्था तथा अखिल भारतीय सेवाओं जैसे प्रमुख विषयों पर कार्यपालिका की महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ उपराज्यपाल (LG) के पास निहित हैं, जिससे निर्वाचित सरकार के प्रभावी संचालन की क्षमता सीमित हो जाती है।
- नौकरशाही पर सीमित नियंत्रण: स्थानांतरण, पदस्थापन तथा वरिष्ठ प्रशासनिक निर्णयों पर उपराज्यपाल के नियंत्रण के कारण नौकरशाही की जवाबदेही निर्वाचित सरकार के प्रति कम हो जाती है, जिससे नीतियों के कार्यान्वयन एवं विधायी पर्यवेक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने बल दिया था कि नौकरशाही की जवाबदेही मुख्यतः निर्वाचित सरकारों के प्रति होनी चाहिए, ताकि सुशासन सुनिश्चित किया जा सके।
- पुलिस एवं लोक व्यवस्था पर नियंत्रण का अभाव: अन्य राज्यों के विपरीत निर्वाचित सरकार को पुलिस एवं लोक व्यवस्था पर कोई अधिकार प्राप्त नहीं है, जिससे स्थानीय कानून-व्यवस्था एवं सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने की उसकी क्षमता सीमित हो जाती है।

- जनादेश और शासन के बीच असंतुलन : वर्ष 2024 में विधानसभा चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न होने के बावजूद निर्वाचित सरकार सीमित कार्यकारी शक्तियाँ हैं, जिससे जनादेश का पूर्ण प्रतिबिंब शासन में प्रदर्शित नहीं होता है।
- संघीय सिद्धांतों का क्षरण: केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा लंबे समय तक बनाए रखने से सहकारी संघवाद एवं असममित संघवाद से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न होती हैं, क्योंकि जम्मू एवं कश्मीर (J&K) चुनाव संपन्न होने के बाद भी राज्य का दर्जा पुनः प्राप्त न करने वाला एकमात्र पूर्व राज्य है।
- केंद्र-राज्य संबंधों पर पुंछी आयोग ने अनुशंसा की थी कि भारत की संघीय व्यवस्था में अत्यधिक केंद्रीकरण सामान्य नियम नहीं, बल्कि केवल अपवाद होना चाहिए।
- संवैधानिक नैतिकता: दिसंबर, 2023 में जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 की वैधता को बरकरार रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के उस आश्वासन को अभिलेखित किया था कि निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद “यथाशीघ्र” राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा।
- इस आश्वासन के बावजूद निरंतर विलंब संवैधानिक नैतिकता, संस्थागत उत्तरदायित्व तथा संवैधानिक प्रतिबद्धताओं के प्रति जनविश्वास को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
- राजनीतिक अनिश्चितता: राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए किसी निश्चित समय-सीमा के अभाव में दीर्घकालिक संवैधानिक एवं राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है, जिसका प्रभाव शासन, निवेश, दीर्घकालिक योजना तथा नीतिगत निरंतरता पर पड़ता है।
- जनविश्वास में कमी: निर्वाचित संस्थाओं की शक्तियों पर निरंतर प्रतिबंध लोकतांत्रिक शासन के प्रति जनविश्वास को कमजोर कर सकते हैं तथा विशेष रूप से युवा मतदाताओं के बीच राजनीतिक भागीदारी को हतोत्साहित कर सकते हैं।
सरकार का पक्ष
- सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: केंद्र सरकार का तर्क है कि जम्मू एवं कश्मीर के सामरिक महत्त्व एवं सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए राज्य का दर्जा बहाल करने से पूर्व, चरणबद्ध एवं संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
- सीमापार आतंकवाद: गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, सीमा पार से जारी आतंकवाद, घुसपैठ तथा वित्तपोषण जैसी चुनौतियाँ केंद्र की अधिक सुदृढ़ निगरानी की आवश्यकता को उचित ठहराती हैं।
- सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद राज्य का दर्जा: केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को आश्वस्त किया है कि सामान्य स्थिति बहाल होने तथा निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद जम्मू एवं कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। हालाँकि, इसके लिए अब तक कोई समय-सीमा घोषित नहीं की गई है।
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विपक्ष में तर्क
- सुरक्षा एवं लोकतंत्र परस्पर पूरक हैं: आंतरिक सुरक्षा एवं लोकतांत्रिक शासन परस्पर विरोधी नहीं हैं। इसके विपरीत, उत्तरदायी राजनीतिक संस्थाएँ स्थानीय शिकायतों का संवैधानिक माध्यमों से समाधान कर दीर्घकालिक स्थिरता को सुदृढ़ करती हैं।
- बेहतर स्थानीय प्रशासन: पूर्ण कार्यकारी अधिकारों से युक्त निर्वाचित सरकार स्थानीय समस्याओं का अधिक प्रभावी समाधान कर सकती है, लोक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार ला सकती है तथा यह सुनिश्चित कर सकती है कि विकास नीतियाँ क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हों।
- जनविश्वास में वृद्धि: राज्य का दर्जा बहाल होने से नागरिकों का संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास सुदृढ़ होगा, राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहन मिलेगा तथा राजनीतिक अलगाव की भावना कम होगी।
- बेहतर खुफिया तंत्र एवं जनसहयोग: निर्वाचित संस्थाओं के प्रति बढ़ा हुआ जनविश्वास सामुदायिक पुलिसिंग, खुफिया सूचना-संग्रह तथा नागरिकों एवं सुरक्षा एजेंसियों के मध्य सहयोग को मजबूत कर सकता है, जिससे आतंकवाद-रोधी प्रयास अधिक प्रभावी बनेंगे।
- लोकतांत्रिक वैधता शांति को बढ़ावा देती है: अन्य संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों के अनुभव दर्शाते हैं कि सुदृढ़ सुरक्षा उपायों के साथ समावेशी राजनीतिक भागीदारी दीर्घकालिक शांति, सामाजिक संतुलन तथा संस्थागत स्थिरता को बढ़ावा देती है। इस सिद्धांत पर द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने भी बल दिया है।
आगे की राह
- यथाशीघ्र राज्य का दर्जा बहाल किया जाए: केंद्र सरकार को अनुच्छेद-370 (2023) मामले में सर्वोच्च न्यायालय तथा संसद में दिए गए अपने आश्वासन का सम्मान करते हुए जम्मू एवं कश्मीर को यथाशीघ्र पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना चाहिए।
- वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव, जिनमें 63.88% का कुल मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया, के सफल आयोजन के बाद राज्य का दर्जा शीघ्र बहाल किया जाना संघवाद, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व तथा जनविश्वास को सुदृढ़ करेगा।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाया जाए: निर्वाचित सरकार को पूर्ण कार्यकारी एवं प्रशासनिक शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिए। साथ ही, 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के अनुरूप पंचायती राज संस्थाओं तथा शहरी स्थानीय निकायों को और अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए।
- पंचायती राज मंत्रालय के अनुसार, जम्मू एवं कश्मीर (J&K) में 33,000 से अधिक पंचायत प्रतिनिधि कार्यरत हैं, जो सहभागी शासन के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं।
- सुरक्षा एवं लोकतंत्र के मध्य संतुलन: सीमापार घुसपैठ एवं उग्रवाद से निपटने के लिए आतंकवाद-रोधी उपाय निरंतर जारी रहने चाहिए, साथ ही लोकतांत्रिक भागीदारी, नागरिक स्वतंत्रताओं तथा उत्तरदायी शासन का भी विस्तार किया जाना चाहिए।
- गृह मंत्रालय (MHA) की वार्षिक रिपोर्ट 2024–25 के अनुसार, आतंकवादी घटनाओं में निरंतर कमी आई है तथा सुरक्षा संकेतकों में सुधार हुआ है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए बिना पूर्ण लोकतांत्रिक शासन की बहाली के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनी हैं।
- संस्थागत संवाद को बढ़ावा दिया जाए: केंद्र सरकार एवं जम्मू एवं कश्मीर की निर्वाचित सरकार के मध्य शासन, सुरक्षा, आर्थिक विकास एवं संवैधानिक विषयों पर नियमित परामर्श हेतु एक संस्थागत तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
- ऐसा सहकारी संघवाद नीतियों के कार्यान्वयन को अधिक प्रभावी बनाएगा, प्रशासनिक संघर्ष को कम करेगा तथा क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में प्रभावी रूप से सम्मिलित करना सुनिश्चित करेगा।
- समावेशी विकास को प्रोत्साहित किया जाए: राजनीतिक सामान्य स्थिति के साथ-साथ रोजगार सृजन, पर्यटन, अवसंरचना, शिक्षा तथा उद्यमिता, विशेषकर युवाओं के लिए, निरंतर निवेश किया जाना चाहिए।
- जम्मू एवं कश्मीर आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, वर्ष 2024 में 2.35 करोड़ पर्यटकों का रिकॉर्ड आगमन दर्ज किया गया। साथ ही, PMDP, PMGSY, जल जीवन मिशन तथा PMEGP जैसी योजनाएँ अवसंरचना, कनेक्टिविटी एवं आजीविका को सुदृढ़ कर रही हैं, जिससे समावेशी विकास को दीर्घकालिक शांति एवं स्थिरता की आधारशिला के रूप में मजबूती मिल रही है।
संघ राज्य क्षेत्र बनाम राज्य: संवैधानिक अंतर
| पहलू |
राज्य |
संघ राज्य क्षेत्र (UT) |
| संवैधानिक आधार |
अनुच्छेद-152-237 के अंतर्गत शासित। |
अनुच्छेद-239-241 के अंतर्गत शासित। |
| कार्यपालिका का प्रमुख |
राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद होती है। |
प्रशासक/उपराज्यपाल (LG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है; कुछ संघ राज्य क्षेत्रों में मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद भी होती है। |
| विधायी शक्तियाँ |
राज्य सूची एवं समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बना सकते हैं। |
संसद के पास सर्वोपरि विधायी शक्ति होती है; केवल कुछ संघ राज्य क्षेत्रों को सीमित विधायी शक्तियाँ प्राप्त हैं। |
| प्रशासनिक नियंत्रण |
संघीय व्यवस्था के अंतर्गत अपेक्षाकृत अधिक संवैधानिक स्वायत्तता प्राप्त होती है। |
राष्ट्रपति के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से संघ सरकार द्वारा प्रशासित किए जाते हैं। |
| वित्तीय एवं राजनीतिक स्वायत्तता |
अधिक वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त होती है; सभी राज्यों का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व होता है। |
संघीय अनुदानों पर अधिक निर्भर होते हैं; केवल कुछ संघ राज्य क्षेत्रों का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व होता है। |
निष्कर्ष
जम्मू एवं कश्मीर (J&K) को राज्य का दर्जा बहाल करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व तथा सहकारी संघवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की परीक्षा है। यद्यपि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, तथापि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थायी शांति सुनिश्चित करने का सर्वोत्तम उपाय समावेशी राजनीतिक भागीदारी, सशक्त स्थानीय शासन तथा संवैधानिक प्रतिबद्धताओं की समयबद्ध पूर्ति है।