संदर्भ
केंद्र सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में संशोधन कर एसिड अटैक से पीड़ित की परिभाषा का विस्तार किया है, ताकि इसमें एसिड अथवा अन्य समान संक्षारक पदार्थों के सेवन से आंतरिक चोटें झेलने वाले व्यक्तियों को भी शामिल किया जा सकेगा ।
दिव्यांगजन के बारे में
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अनुसार, दिव्यांगजन वह व्यक्ति है, जिसे दीर्घकालिक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा संवेदी रूप से अक्षमता विद्यमान हो, जो विभिन्न बाधाओं के साथ अंतःक्रिया के कारण समाज में अन्य व्यक्तियों के समान पूर्ण एवं प्रभावी भागीदारी में अवरोध उत्पन्न करती हो।
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दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के बारे में
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 वर्ष 2016 में अधिनियमित किया गया तथा 19 अप्रैल, 2017 से प्रभावी हुआ।
- पूर्ववर्ती कानून का प्रतिस्थापन: इसने दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 को प्रतिस्थापित किया है।
- उद्देश्य: यह सभी दिव्यांगजनों को गरिमा, भेदभाव-रहित वातावरण तथा समान अवसरों के साथ जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित करना है।
- दिव्यांगताओं की विस्तारित मान्यता: इस अधिनियम के अंतर्गत 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को मान्यता प्रदान की गई है, जिनमें दृष्टिहीनता, कम दृष्टि, बौनापन, थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, सिकल सेल रोग, एसिड अटैक से पीड़ित लोग आदि शामिल हैं।
- बेंचमार्क दिव्यांगता की परिभाषा: बेंचमार्क दिव्यांगता से आशय ऐसे व्यक्ति से है, जिसकी निर्दिष्ट दिव्यांगता कम-से-कम 40% हो, जहाँ दिव्यांगता को मापने योग्य रूप में परिभाषित नहीं किया गया है।
- जहाँ दिव्यांगता को मापने योग्य रूप में परिभाषित किया गया है, वही बेंचमार्क दिव्यांगता में वह प्रत्येक व्यक्ति शामिल होगा, जिसे संबंधित प्रमाणन प्राधिकारी द्वारा इस रूप में प्रमाणित किया गया हो।
- अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप: इस अधिनियम में दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों को समाहित किया गया है, जिसका भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है।
- दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय एक मानवाधिकार संधि है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों के अधिकारों एवं गरिमा को बढ़ावा देना तथा उनका संरक्षण करना है।
- इसे वर्ष 2006 में अंगीकृत किया गया तथा वर्ष 2008 में यह प्रभावी हुआ।
संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ
- विस्तारित परिभाषा: एसिड अटैक पीड़ित शब्द में अब ऐसे व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है, जो एसिड अथवा अन्य समान संक्षारक पदार्थों को फेंकने, निगलने या गिराने से हुए हिंसक आक्रमण, स्व-क्षति अथवा दुर्घटना के कारण बाह्य अथवा आंतरिक रूप से विकृत हो गए हों।
- भूतलक्षी प्रभाव: यह संशोधन भूतलक्षी प्रभाव रखता है, जिससे 22 मई, 2026 से पूर्व आंतरिक चोटें झेलने वाले पीड़ित भी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत लाभ प्राप्त करने के पात्र होंगे।
- 22 मई, 2026 को केंद्र सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की अनुसूची में संशोधन संबंधी अधिसूचना आधिकारिक रूप से जारी की।
- विधिक रिक्तता की पूर्ति: पूर्ववर्ती कानून केवल एसिड अटैक पीड़ितों को मान्यता देता था, जबकि जबरन एसिड निगलने वाले पीड़ितों को इससे बाहर रखा गया था, यद्यपि ऐसे कृत्य दंड विधि के अंतर्गत दंडनीय थे।
- दंड विधि के साथ सामंजस्य: यह संशोधन भारतीय न्याय संहिता की धारा 124 के अनुरूप दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम को समन्वित करता है।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 124 (स्वेच्छापूर्वक या जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाना) के अंतर्गत एसिड अटैक तथा एसिड को निगलना, दोनों दंडनीय अपराध हैं, जिनके लिए 10 वर्ष के कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।
सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप
- न्यायिक मान्यता: मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद-142 के अंतर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए जबरन एसिड निगलने वाले व्यक्तियों को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत एसिड अटैक पीड़ितों की श्रेणी में शामिल किया।
- विधायी सुधार की आवश्यकता: न्यायालय ने कहा कि जबरन एसिड निगलने वाले पीड़ित भी एसिड अटैक पीड़ितों के समान गंभीर शारीरिक एवं मानसिक आघात झेलते हैं, इसलिए उन्हें समान विधिक संरक्षण एवं पुनर्वास मिलना चाहिए।
- सरकार को निर्देश: न्यायालय ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि:
- एसिड अटैक से संबंधित दंडात्मक एवं जमानत संबंधी प्रावधानों को सुदृढ़ किया जाए।
- दीर्घकालिक चिकित्सीय देखभाल, पुनर्वास तथा पीड़ितों के सामाजिक पुनर्समावेशन को सुनिश्चित करने हेतु एक व्यापक पुनर्वास नीति तैयार की जाए।