संदर्भ:
हाल ही में मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अंतरलिंगी व्यक्तियों (Intersex Persons) को पृथक कानूनी मान्यता एवं संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने संबंधी याचिका पर केंद्र एवं राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है।

प्रमुख बिंदु
- मुख्य माँग: याचिका में जन्मजात लैंगिक विशेषताओं में विविधता (Differences of Sex Development–DSD) वाले व्यक्तियों को जन्म के समय निर्धारित लिंग से भिन्न लैंगिक पहचान रखने वाले व्यक्तियों से अलग एक पृथक एवं विशिष्ट वर्ग के रूप में मान्यता देने की माँग की गई है।
- पृथक कानूनी ढाँचा: याचिका में केंद्र सरकार को छह माह के भीतर अंतरलिंगी व्यक्तियों के लिए मान्यता, संरक्षण, सकारात्मक समर्थन एवं कल्याणकारी उपायों का प्रावधान करने वाले वैधानिक दिशा-निर्देश बनाने का निर्देश देने की माँग की गई है।
- चिकित्सीय सुरक्षा: याचिका में निम्नलिखित माँगें की गई हैं:
- अंतरलिंगी देखभाल हेतु राष्ट्रीय चिकित्सीय प्रोटोकॉल समिति का गठन।
- अंतरलिंगी शिशुओं एवं बच्चों पर चिकित्सकीय दृष्टि से अनावश्यक अपरिवर्तनीय शल्य-चिकित्सा अथवा हार्मोन संबंधी हस्तक्षेपों पर प्रतिबंध, सिवाय उन स्थितियों के जहाँ जीवन-रक्षक चिकित्सीय आवश्यकता हो।
- सभी गैर-आपातकालीन हस्तक्षेपों के लिए सूचित सहमति संबंधी प्रोटोकॉल को अपनाना।
- कानूनी मान्यता एवं सामाजिक समावेशन: याचिका में निम्नलिखित की माँग की गई है:
- तटस्थ/अस्थायी जन्म पंजीकरण।
- पहचान संबंधी दस्तावेजों में समावेशन।
- शिक्षा एवं लोक रोजगार में आरक्षण।
- उत्तराधिकार एवं अन्य नागरिक अधिकारों में स्पष्टता।
- सम्मानजनक एवं उपेक्षा-रहित शब्दावली का प्रयोग।
- अंतरलिंगी व्यक्तियों के समक्ष चुनौतियाँ: याचिका में बलपूर्वक चिकित्सीय हस्तक्षेप, सामाजिक परित्याग, दस्तावेजीकरण संबंधी कठिनाइयाँ, भेदभाव, तथा शिक्षा, रोजगार एवं उत्तराधिकार से बहिष्करण जैसी समस्याओं को रेखांकित किया गया है।
- संवैधानिक आधार: याचिका में तर्क दिया गया है कि पृथक मान्यता का अभाव निम्नलिखित का उल्लंघन करता है:-
- अनुच्छेद-14 – विधि के समक्ष समानता एवं विधियों का समान संरक्षण।
- अनुच्छेद-15 – भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद-21 – जीवन, गरिमा, पहचान एवं शारीरिक स्वायत्तता का अधिकार।
अंतरलिंगी व्यक्तियों के बारे में
- अंतरलिंगी व्यक्ति वे होते हैं, जो गुणसूत्रों, जनन ग्रंथियों, हार्मोनों अथवा जननांगों जैसी जन्मजात लैंगिक विशेषताओं में ऐसी विविधताओं के साथ जन्म लेते हैं, जो सामान्य पुरुष अथवा महिला जैविक वर्गीकरण के अनुरूप नहीं होती हैं।
- लैंगिक विकास में विविधताएँ: DSD जन्मजात अवस्थाओं का एक समूह है, जिसमें गुणसूत्रीय, जनन ग्रंथीय अथवा शारीरिक लैंगिक विशेषताओं का विकास असामान्य होता है।
- अंतरलिंगी एवं ट्रांसजेंडर में अंतर: अंतरलिंगी होना जन्म से विद्यमान जैविक विविधता है, जबकि ट्रांसजेंडर होना उस स्थिति को दर्शाता है, जिसमें किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान, जन्म के समय निर्धारित लिंग से भिन्न होती है।
- चिकित्सीय नैतिकता: अंतरराष्ट्रीय मानक अंतरलिंगी शिशुओं पर चिकित्सकीय दृष्टि से अनावश्यक एवं अपरिवर्तनीय चिकित्सीय हस्तक्षेपों को तब तक हतोत्साहित करते हैं, जब तक वे सूचित सहमति देने में सक्षम न हो जाएँ, सिवाय चिकित्सीय आपातकाल की स्थिति में।
- प्रमुख चुनौतियाँ: अंतरलिंगी व्यक्ति सामाजिक कलंक, बलपूर्वक शल्य-चिकित्सा, कानूनी अदृश्यता, पहचान संबंधी दस्तावेजों की समस्याओं, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच तथा सामाजिक भेदभाव का सामना करते हैं।
भारत में कानूनी एवं संवैधानिक ढाँचा
- NALSA निर्णय (वर्ष 2014): सर्वोच्च न्यायालय ने लैंगिक पहचान के स्व-निर्धारण के अधिकार को मान्यता दी तथा सरकारों को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए कानूनी मान्यता, सकारात्मक कार्रवाई एवं सामाजिक कल्याणकारी उपाय उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। वर्तमान याचिका में तर्क दिया गया है कि अंतरलिंगी व्यक्तियों के लिए ट्रांसजेंडर संरक्षणों के अंतर्गत सम्मिलित करने के बजाय एक पृथक कानूनी ढाँचे की आवश्यकता है।
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019: यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभाव को प्रतिबंधित करता है तथा कल्याणकारी उपायों का प्रावधान करता है, किंतु अंतरलिंगी व्यक्तियों से संबंधित विशिष्ट चिकित्सीय एवं कानूनी चिंताओं का पृथक रूप से समाधान नहीं करता है।
- भारत में अंतरलिंगी व्यक्ति प्रायः ट्रांसजेंडर की व्यापक कानूनी श्रेणी के अंतर्गत सम्मिलित कर दिए जाते हैं।
अंतरलिंगी अधिकारों पर न्यायिक एवं राज्य स्तरीय हस्तक्षेप
- मद्रास उच्च न्यायालय- अरुणकुमार बनाम पंजीकरण महानिरीक्षक (वर्ष 2019): न्यायालय ने अंतरलिंगी शिशुओं एवं बच्चों पर चिकित्सकीय दृष्टि से अनावश्यक लिंग-चयनात्मक शल्य-चिकित्सा पर प्रभावी रूप से प्रतिबंध लगाया तथा उनके शारीरिक अखंडता के अधिकार को मान्यता दी।
- तमिलनाडु सरकार का आदेश (वर्ष 2019): मद्रास उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में तमिलनाडु जीवनरक्षक चिकित्सीय परिस्थितियों को छोड़कर अंतरलिंगी शिशुओं एवं बच्चों पर लिंग परिवर्तन शल्य-चिकित्सा पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य बन गया।
- दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR), 2021: अंतरलिंगी शिशुओं पर चिकित्सकीय दृष्टि से अनावश्यक लिंग-चयनात्मक शल्य-चिकित्सा पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की।
- सर्वोच्च न्यायालय (2026): अंतरलिंगी अधिकारों से संबंधित PIL को तीन-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजते हुए यह माना कि इसमें लिंग (Sex) एवं जेंडर (Gender) के मध्य अंतर तथा अंतरलिंगी व्यक्तियों के लिए पृथक कानूनी ढाँचे की आवश्यकता से जुड़े महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न निहित हैं।