संदर्भ
हाल ही में मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल ने समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026 के प्रारूप को स्वीकृति प्रदान की है। यह विधेयक विवाह, तलाक, ‘लिव-इन’ संबंध एवं उत्तराधिकार जैसे विषयों को शामिल करते हुए सभी धर्मों के अनुयायियों पर लागू होने वाली एक समान नागरिक विधि का प्रस्ताव करता है।
संबंधित तथ्य
- इस विधेयक का प्रारूप सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा तैयार किया गया है।
प्रमुख विशेषताएँ
- समान नागरिक संहिता: यह विधेयक धर्म की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, संपत्ति का उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण एवं सहजीवन संबंधों को विनियमित करने वाली समान नागरिक विधि स्थापित करने का प्रस्ताव करता है।
- विवाह एवं तलाक संबंधी प्रावधान:
- एकपत्नी/एकपति प्रथा को सभी समुदायों के लिए अनिवार्य बनाया गया है, एक व्यक्ति का केवल एक ही जीवित जीवनसाथी हो सकता है।
- विवाह की न्यूनतम आयु: पुरुषों के लिए 21 वर्ष तथा महिलाओं के लिए 18 वर्ष कम-से-कम आयु निर्धारित की गई है।
- अवैध सहमति अथवा निषिद्ध संबंधों में होने वाले विवाह प्रतिबंधित होंगे (जब तक कि प्रथागत अपवाद लागू न हों)।
- मौखिक तलाक तथा अनौपचारिक पंचायतों द्वारा दिए गए निर्णयों को पूर्णतः अवैध घोषित किया गया है; तलाक केवल विधि में निर्धारित वैधानिक आधारों पर ही संभव होगा।
- हलाला जैसी प्रथाओं को, उसी जीवनसाथी से पुनर्विवाह के उद्देश्य से अपनाए जाने पर, दंडनीय अपराध बनाया गया है।
- ‘लिव-इन’ संबंधों का विनियमन: साथ रहने के एक माह के भीतर युगल को ‘लिव-इन’ संबंध की घोषणा रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।
- यदि दोनों में से कोई भी 21 वर्ष से कम आयु का है, तो संबंध के प्रारंभ एवं समाप्ति की जानकारी उसके माता-पिता/अभिभावकों को दी जाएगी तथा रजिस्ट्रार स्थानीय पुलिस थाने को भी इसकी सूचना देगा।
- महिलाओं एवं बच्चों का संरक्षण: विधेयक के अनुसार, सहजीवन संबंध में परित्यक्त महिला को सक्षम न्यायालय से भरण-पोषण का दावा करने का विधिक अधिकार प्राप्त होगा।
- यह सहजीवन संबंधों से जन्मे बच्चों को समान कानूनी दर्जा एवं उत्तराधिकार संबंधी अधिकार प्रदान करता है, अवैध संतान की अवधारणा को समाप्त करता है तथा पुत्र, पुत्री, विधवा एवं विधुर को समान उत्तराधिकार एवं संपत्ति संबंधी अधिकार सुनिश्चित करता है।
- अपवाद: यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद-342 एवं अनुच्छेद-366(25) के अंतर्गत अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगा, जिससे उनकी प्रथागत परंपराओं का संरक्षण बना रहेगा।

समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है?
- परिभाषा: समान नागरिक संहिता (UCC) से आशय व्यक्तिगत विधियों के ऐसे एकीकृत ढाँचे से है, जो सभी नागरिकों पर उनकी धार्मिक पहचान की परवाह किए बिना समान रूप से लागू होता है।
- यह विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण एवं संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों का एकरूपीकरण करता है।
- संवैधानिक आधार: राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों (DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद-44 में स्पष्ट रूप से उपबंध किया गया है कि राज्य भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
- संघीय व्यवस्था: विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, उत्तराधिकार एवं पारिवारिक विधि समवर्ती सूची (सूची-III, प्रविष्टि 5) के अंतर्गत आते हैं।
समान नागरिक संहिता (UCC) से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- व्यक्तिगत विधि समवर्ती सूची (सूची-III) के अंतर्गत आती है।
- अनुच्छेद-44: राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
- अनुच्छेद-14: विधि के समक्ष समानता एवं विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है।

- अनुच्छेद-15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग अथवा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।
- अनुच्छेद-21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें गरिमा, निजता एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता शामिल हैं।
- अनुच्छेद-25: लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य तथा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन अंतःकरण की स्वतंत्रता एवं धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
- अनुच्छेद-342: राष्ट्रपति को अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद-366(25): अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक परिभाषा प्रदान करता है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) राष्ट्रीय एकीकरण एवं लैंगिक न्याय को बढ़ावा देगी।
- सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995): न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल दूसरा विवाह करने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करना व्यक्तिगत विधियों का दुरुपयोग है तथा समान नागरिक संहिता (UCC) की आवश्यकता को पुनः रेखांकित किया है।
- जॉन वल्लामट्टोम बनाम भारत संघ (2003): न्यायालय ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) के अभाव में नागरिक मामलों में असमानताएँ उत्पन्न होती हैं तथा राष्ट्रीय एकीकरण बाधित होता है।
- शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017): न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया।
- जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने वैवाहिक संबंधों में समानता, गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता के संवैधानिक सिद्धांतों की पुनः पुष्टि की।
समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने वाले राज्य
- गोवा: पुर्तगाली सिविल संहिता, 1867 का पालन करता है, जिसे भारत में लागू एकमात्र समान नागरिक संहिता (UCC) माना जाता है।
- उत्तराखंड: स्वतंत्रता के बाद वर्ष 2024 में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने वाला पहला राज्य है।
- गुजरात: राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता (UCC) के क्रियान्वयन का परीक्षण करने के लिए एक समिति का गठन किया गया है।
- असम: राज्य ने अभी समान नागरिक संहिता (UCC) लागू नहीं की है, किंतु बहुविवाह पर प्रतिबंध (प्रशासनिक उपायों के माध्यम से) तथा असम मुस्लिम विवाह एवं तलाक पंजीकरण अधिनियम, 1935 को निरस्त करने जैसे विधिक सुधार किए हैं, जिन्हें व्यक्तिगत विधियों में अधिक एकरूपता की दिशा में कदम माना जाता है।
- मध्य प्रदेश: समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026 के प्रारूप को राज्य मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई है तथा इसे राज्य विधान सभा में प्रस्तुत किए जाने का प्रस्ताव है।