हाल ही में लद्दाख के उपराज्यपाल ने पुगा घाटी में भारत के पहले एवं सबसे गहरे भू-तापीय कुओं का उद्घाटन किया है।
‘कुओं’ के संबंध में प्रमुख विशेषताएँ
दो भूतापीय कुएँ, प्रत्येक 1,000 मीटर गहरे, 14,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर खोदे गए हैं।
400 मीटर की गहराई पर अधिकतम 135°C तापमान दर्ज किया गया है तथा इससे भी अधिक तापमान का पता लगाने के लिए आगे परीक्षण जारी है।
भू-तापीय ऊर्जा पायलट परियोजना: ये कुएँ भारत की पहली 1 मेगावाट क्षमता वाली प्रदर्शन-स्तरीय भूतापीय ऊर्जा परियोजना को समर्थन देंगे, जिसका क्रियान्वयन ONGC ऊर्जा केंद्र द्वारा किया जा रहा है।
महत्त्व: यह परियोजना भारत में भू-तापीय ऊर्जा के विकास के लिए आदर्श मॉडल सिद्ध होगी, लद्दाख के कार्बन-तटस्थ लक्ष्य की प्राप्ति में योगदान देगी, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाएगी तथा नेट जीरो प्रतिबद्धताओं को समर्थन प्रदान करेगी।
भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) के बारे में: (UPSC प्रारंभिक परीक्षा, 2013)
भू-तापीय ऊर्जा एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जो पृथ्वी की सतह के नीचे संचित प्राकृतिक ऊष्मा से प्राप्त होती है तथा विद्युत उत्पादन एवं प्रत्यक्ष तापीय उपयोग के लिए प्रयुक्त होती है।
ऊष्मा का स्रोत: यह ऊष्मा मुख्यतः पृथ्वी के भीतर होने वाले रेडियोधर्मी क्षय तथा पृथ्वी के निर्माण के समय से शेष बची ऊष्मा से उत्पन्न होती है।
कार्य सिद्धांत:भू-तापीय जलाशयों तक पहुँचने के लिए कुएँ खोदे जाते हैं, जिनसे प्राप्त गर्म जल अथवा भाप का उपयोग विद्युत उत्पादन हेतु टरबाइनों को चलाने या प्रत्यक्ष तापन के लिए किया जाता है।
भू-तापीय संसाधनों के प्रकार:
‘हाइड्रोथर्मल’ प्रणाली: प्राकृतिक रूप से विद्यमान गर्म जल एवं वाष्प के जलाशय।
संवर्द्धित भू-तापीय प्रणाली (EGS):गर्म शुष्क चट्टानों में कृत्रिम रूप से विकसित किए गए जलाशय।
भू-दाबीय संसाधन:गर्म, उच्च-दाबयुक्त लवणीय जल के जलाशय।
गर्म शुष्क चट्टान स्रोत संबंधी संसाधन: भूमिगत गहराई में स्थित उच्च तापमान वाली चट्टानें, जिनमें प्राकृतिक जल की उपलब्धता सीमित होती है।
‘पुगा’ भू-तापीय क्षेत्र:
स्थान:लद्दाख के लेह जिले के चांग-थांग क्षेत्र में स्थित पुगा घाटी में अवस्थित है।
भू-वैज्ञानिक स्थिति:भारतीय प्लेट एवं यूरेशियाई प्लेट की टक्कर से निर्मित हिमालयी भू-तापीय पट्टी में स्थित है।
विशेषताएँ:गर्म जलस्रोतों, फ्यूमरोल, गंधक के निक्षेपों एवं वाष्प निकास छिद्रों की उपस्थिति इसकी सक्रिय भू-तापीय प्रणाली को दर्शाती है।
संभावना: इसे विद्युत उत्पादन एवं प्रत्यक्ष तापीय उपयोगों के लिए भारत का सर्वाधिक संभावनाशील भू-तापीय संसाधन माना जाता है।
भू-तापीय ऊर्जा का महत्त्व
स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत: अत्यल्प ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के साथ निरंतर निम्न-कार्बन ऊर्जा उपलब्ध कराती है।
आधार-भार विद्युत:सौर एवं पवन ऊर्जा के विपरीत 24×7 निर्बाध विद्युत आपूर्ति प्रदान करती है।
ऊर्जा सुरक्षा: आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करती है तथा भारत के नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाती है।
क्षेत्रीय विकास: दूरस्थ हिमालयी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है तथा डीजल-आधारित विद्युत उत्पादन पर निर्भरता कम करती है।
बहुआयामी उपयोग:विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त स्थल तापन, ग्रीनहाउस, मत्स्य पालन,औद्योगिक तापन एवं पर्यटन को भी समर्थन प्रदान करती है।
भू-तापीय ऊर्जा की वैश्विक स्थिति
वैश्विक स्थापित क्षमता:भू-तापीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 17 GW (2025) से अधिक है, जिससे प्रतिवर्ष लगभग 100 TWhविद्युत का उत्पादन होता है।
वैश्विक विद्युत उत्पादन में भागीदारी:भूतापीय ऊर्जा का वैश्विक विद्युत उत्पादन में योगदान 1% से कम (लगभग 0.3–0.4%) है, किंतु यह विश्वसनीय 24×7 आधार-भार विद्युत उपलब्ध कराती है।
विद्युत उत्पादन में अग्रणी देश
संयुक्त राज्य अमेरिका (सर्वाधिक उत्पादक)
इंडोनेशिया
फिलीपींस
भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावना
अनुमानित क्षमता:भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने अपने भारत के भू-तापीय एटलस, 2022 में 381 तापीय विसंगति वाले क्षेत्रों में भारत की भू-तापीय ऊर्जा क्षमता लगभग10,600 MW बताई है।
पायलट परियोजनाएँ: भारत का पहला परिचालित20 kWभू-तापीय विद्युत संयंत्रसिंगरेनी कोलियरिज कंपनी लिमिटेड (SCCL) द्वारा तेलंगाना के मनुगुरु में बाइनरी ऑर्गेनिक रैंकिन चक्र (ORC) प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए स्थापित किया गया।
प्रमुख भू-तापीय स्रोत
पुगा–चुमाथांग (लद्दाख)
कैंबे बेसिन (गुजरात)
सोन–नर्मदा–ताप्ती (सोनाटा) पट्टी
पश्चिमी तटीय प्रांत (महाराष्ट्र–गोवा)
गोदावरी बेसिन
महानदी बेसिन
अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह
हिमालयी भू-तापीय प्रांत (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू एवं कश्मीर)
समाधान अपेक्षित चुनौतियाँ
उच्च प्रारंभिक निवेश:अन्वेषण एवं गहरी ड्रिलिंग के लिए अत्यधिक पूँजी की आवश्यकता होती है तथा भू-वैज्ञानिक अनिश्चितता भी अधिक रहती है।
प्रौद्योगिकीय सीमाएँ: उन्नत भू-तापीय ड्रिलिंग एवं जलाशय प्रबंधन में स्वदेशी विशेषज्ञता का अभाव।
संसाधन अन्वेषण: पर्याप्त भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण एवं संसाधन आकलन का अभाव।
दूरस्थ स्थान: अधिकांश भू-तापीय संसाधन उच्च ऊँचाई एवं अवसंरचना से वंचित क्षेत्रों में स्थित हैं।
नीतिगत समर्थन: समर्पित राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति के अभाव में इसका व्यावसायिक उपयोग धीमा रहा है।
आगे की राह
राष्ट्रीय नीति:भूतापीय ऊर्जा के दोहन एवं निवेश को बढ़ावा देने के लिए लक्षित वित्तीय प्रोत्साहनों से युक्त एक समर्पित राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति तैयार की जाए।
प्रौद्योगिकी एवं निवेश:सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) तथा अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए।
परियोजनाओं का विस्तार:व्यावसायिक उपयोग से पूर्व पायलटपरियोजनाओं का विस्तार किया जाए।
नवीकरणीय ऊर्जा में एकीकरण:भू-तापीय ऊर्जा को भारत की नवीकरणीय ऊर्जा एवं नेट जीरो रणनीति में सम्मिलित किया जाए।
क्षमता निर्माण:भू-वैज्ञानिक अन्वेषण, संसाधन मानचित्रण एवं स्वदेशी प्रौद्योगिकीय क्षमताओं को सुदृढ़ किया जाए।
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