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संपीडित बायोगैस (CBG)

15 Jul 2026

संदर्भ

पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़े तनाव के कारण कच्चे तेल एवं एलपीजी की आपूर्ति शृंखलाएँ प्रभावित हुई हैं, जिससे इस बात पर पुनः चर्चा तीव्र हो गई है कि क्या संपीडित बायो गैस  (CBG) भारत की आयात निर्भरता को कम कर ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकती है।

भारत की ऊर्जा संवेदनशीलता

  • भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85% आयात करता है, जिसके एक बड़े भाग की आपूर्ति पश्चिम एशिया से होती है।
  • भारत के एलपीजी आयात का लगभग 90% होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामरिक अवरोध बिंदु है।
  • कच्चे तेल के आपूर्तिकर्ताओं में विविधीकरण के बावजूद पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार की अस्थिरता से भारत की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षा प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है।

भारत को बायो गैस की आवश्यकता क्यों है?

  • ऊर्जा सुरक्षा: घरेलू स्तर पर उत्पादित संपीडित बायो गैस आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करती है तथा भारत के ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाती है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: यह फसल अवशेष, पशुधन के अपशिष्ट, नगरपालिका अपशिष्ट एवं सीवेज अपशिष्ट को ईंधन में परिवर्तित करती है, जिससे पराली दहन तथा प्रदूषण जैसी समस्याओं में कमी आती है।
  • जलवायु प्रतिबद्धताएँ: यह नवीकरणीय, कार्बन-तटस्थ ईंधन है, जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों तथा वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के भारत के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक है।

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बायो गैस के बारे में

  • बायो गैस एक गैसीय ईंधन है, जो पशुधन अपशिष्ट, फसल अवशेष, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट तथा सीवेज जैसे जैव-अपघटनीय कार्बनिक पदार्थों के अवायवीय अपघटन से उत्पन्न होती है।
  • संघटन: इसमें मुख्यतः मेथेन (50–70%), कार्बन डाइऑक्साइड (30–50%) तथा अल्प मात्रा में हाइड्रोजन सल्फाइड, नाइट्रोजन एवं जलवाष्प होती है।
  • प्रकृति: बायो गैस एक नवीकरणीय, कार्बन-तटस्थ एवं स्वच्छ-दहनशील ईंधन है, जो कार्बनिक अपशिष्ट को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित करती है।
  • उपयोग: इसका प्रमुख रूप से भोजन पकाने, विद्युत उत्पादन, तापन तथा लघु औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है।

संपीडित बायो गैस के बारे में

  • यह परिशोधित बायो गैस है, जिसमें से कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, आर्द्रता तथा अन्य अशुद्धियों को हटाने के बाद इसे संपीडित कर उच्च गुणवत्ता वाला गैसीय ईंधन तैयार किया जाता है।
  • संघटन: संपीडित बायो गैस में 90–95% से अधिक मेथेन होती है, जिससे यह रासायनिक एवं कार्यात्मक रूप से संपीडित प्राकृतिक गैस के समान होती है।
  • उपयोग: इसका उपयोग परिवहन ईंधन, औद्योगिक अनुप्रयोगों तथा सिटी गैस वितरण नेटवर्क के माध्यम से घरेलू एवं वाणिज्यिक उपभोग हेतु किया जाता है।
  • उप-उत्पाद: संपीडित बायो गैस के उत्पादन के दौरान किण्वित जैविक खाद तथा तरल किण्वित जैविक खाद भी प्राप्त होती है, जिनका उपयोग जैविक उर्वरकों के रूप में किया जा सकता है।

बायो गैस को प्रोत्साहित करने हेतु सरकारी पहल

  • सतत् पहल (2018): पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा सतत् पहल प्रारंभ की गई, जिसका उद्देश्य 5,000 संपीडित बायो गैस संयंत्रों की स्थापना तथा संपीडित बायो गैस के लिए बाजार का विकास करना था। हालाँकि, जून 2026 तक केवल 132 संयंत्र ही परिचालन में थे।
  • गोबरधन योजना (2018): स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत गोबरधन योजना प्रारंभ की गई, जिसका उद्देश्य अपशिष्ट से संपदा दृष्टिकोण के माध्यम से जैव-अपघटनीय अपशिष्ट को बायो गैस एवं जैविक उर्वरकों में परिवर्तित करना है।
  • आवश्यक संपीडित बायो गैस मिश्रण (वित्तीय वर्ष 2025–26): सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025–26 से संपीडित प्राकृतिक गैस एवं पाइप्ड प्राकृतिक गैस में 1% संपीडित बायो गैस के मिश्रण को अनिवार्य किया है, जिसे क्रमिक रूप से बढ़ाकर वित्तीय वर्ष 2028–29 तक 5% किया जाएगा।

बायो गैस के व्यापक विस्तार में चुनौतियाँ

  • अवसंरचना विकास की धीमी गति: परियोजनाओं के क्रियान्वयन में विलंब के कारण परिचालनरत संपीडित बायो गैस संयंत्रों की संख्या निर्धारित लक्ष्यों से काफी कम है।
  • उच्च पूँजीगत लागत: बायो गैस एवं संपीडित बायो गैस संयंत्रों की स्थापना के लिए पर्याप्त प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी वाणिज्यिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है।
  • निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी: अपर्याप्त वित्तीय प्रतिफल, वित्तपोषण संबंधी बाधाएँ तथा नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण निजी निवेश हतोत्साहित हुआ है।
  • संस्थागत वित्त तक सीमित पहुँच: परियोजना विकासकर्ताओं को परियोजनाओं की स्थापना हेतु किफायती ऋण प्राप्त करने में अक्सर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • एनर्जी क्रॉप्स की ओर झुकाव: जैव ईंधन के लिए प्रयुक्त कच्चे माल से अधिक लाभ मिलने के कारण किसान मक्का तथा अन्य सहायक फसलों की कृषि को खाद्यान्न फसलों पर प्राथमिकता दे सकते हैं।
    • जर्मनी से सीख: जर्मनी में बायो गैस के तीव्र विस्तार ने मक्का की अत्यधिक खेती को बढ़ावा दिया, जिसे “कॉर्न मेनिया” कहा गया। अंततः सरकार को कच्चे माल के रूप में मक्का के उपयोग पर प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाने पड़े।
    • आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में मक्का की खेती में तीव्र वृद्धि का उल्लेख करते हुए फसल विविधता एवं खाद्य सुरक्षा पर चिंता व्यक्त की गई।
      • सर्वेक्षण के अनुसार, मक्का का उत्पादन वित्तीय वर्ष 2015–16 में 2.56 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024–25 में 3.78 टन प्रति हेक्टेयर हो गया, जबकि सोयाबीन, सूरजमुखी, रेपसीड, मूँगफली तथा मोटे अनाज की उत्पादकता स्थिर रही या उसमें गिरावट दर्ज की गई।
  • फसल विविधता के लिए खतरा: मक्का की खेती के विस्तार से दलहन, तिलहन, मोटे अनाज तथा अन्य आवश्यक फसलों के अंतर्गत क्षेत्रफल घट सकता है, जिससे कृषि विविधीकरण प्रभावित होगा।
  • खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंता: दलहन एवं खाद्य तिलहन की खेती में कमी से भारत की आयात निर्भरता बढ़ सकती है तथा घरेलू खाद्य कीमतें वैश्विक अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती हैं।

वैश्विक तुलना

देश/क्षेत्र स्थिति
यूरोप, चीन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका संयुक्त रूप से इन देशों का योगदान वैश्विक बायो गैस उत्पादन में लगभग 90% है।
जर्मनी यूरोप का अग्रणी उत्पादक; वर्ष 2000 में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत अधिनियम लागू किया, जिसके अंतर्गत आय की गारंटी तथा लघु संयंत्रों के लिए प्रोत्साहन प्रदान किए गए।
डेनमार्क वर्ष 2030 तक अपनी गैस प्रणाली में 100% बायोमेथेन का लक्ष्य; कच्चे माल के रूप में पशुधन का गोबर एवं कृषि अपशिष्ट का उपयोग करता है, न कि फसलों का , जो अधिक सतत् मॉडल माना जाता है।

आगे की राह

  • अपशिष्ट आधारित कच्चे माल को प्राथमिकता देना: बायो गैस उत्पादन के लिए मुख्यतः फसल अवशेष, पशुधन का गोबर, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट तथा अन्य जैव-अपघटनीय अपशिष्ट का उपयोग किया जाए, न कि खाद्यान्न फसलों का।
  • वित्तीय प्रोत्साहनों को सुदृढ़ करना: परियोजनाओं की व्यवहार्यता बढ़ाने के लिए अधिक पूँजीगत सब्सिडी, व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण, कर प्रोत्साहन तथा संस्थागत वित्त तक आसान पहुँच सुनिश्चित की जाए।
  • सहायक अवसंरचना को विकसित करना: उत्पादन के विस्तार हेतु बायोमास के संग्रहण, भंडारण, परिवहन तथा गैस पाइपलाइन संपर्क में निवेश किया जाए।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देना: स्थिर नीतिगत ढाँचा, सुनिश्चित क्रय समझौते तथा दीर्घकालिक मूल्य निर्धारण तंत्र निजी निवेश को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
  • खाद्य-ऊर्जा संतुलन बनाए रखना: जैव ईंधन संबंधी नीतियाँ यह सुनिश्चित करें कि ऊर्जा फसलों को बढ़ावा देने से खाद्य सुरक्षा, फसल विविधता तथा किसानों की दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित न हो।

निष्कर्ष

बायो गैस एवं संपीडित बायो गैस (CBG) भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण तथा ऊर्जा सुरक्षा के प्रमुख आधार बन सकते हैं। इस क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के लिए सुदृढ़ अवसंरचना, प्रभावी नीतिगत सहयोग, निजी निवेश तथा अपशिष्ट-आधारित कच्चे माल की रणनीति आवश्यक है, जो खाद्य सुरक्षा एवं सतत् कृषि का भी संरक्षण करने में सक्षम हो।

संपीडित बायोगैस (CBG)

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