संदर्भ
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के 300 किमी. के क्षेत्र में स्थित कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाले सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन का 81% उन संयंत्रों से आता है, जिन्हें जुलाई 2025 की अधिसूचना के तहत अनिवार्य फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) स्थापना से छूट प्रदान की गई है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के बारे में
- स्थापना: वर्ष 2019 में स्थापित, यह वायु प्रदूषण, ऊर्जा संक्रमण तथा जलवायु नीति के क्षेत्र में कार्य करने वाला एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान संगठन है।
- उद्देश्य: वायु गुणवत्ता में सुधार तथा स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण को गति देने के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण एवं साक्ष्य-आधारित नीतिगत अनुशंसाओं के माध्यम से सरकारों, शोधकर्ताओं तथा नागरिक समाज को सहयोग प्रदान करना।
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सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- शिथिल मानकों के बावजूद प्रदूषण: रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2025 में उत्सर्जन मानकों में संशोधन के बाद भारत के 78% कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों के लिए फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) प्रणाली स्थापित करने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है।
- स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) द्वितीयक PM2.5 का प्रमुख पूर्वगामी प्रदूषक है, जो श्वसन संबंधी रोगों, हृदय-वाहिका विकारों, स्ट्रोक तथा आसमयिक मृत्यु में योगदान देता है।
- क्षेत्रीय प्रदूषण: चूँकि SO₂ PM2.5 में परिवर्तित होने से पूर्व सैकड़ों किलोमीटर तक यात्रा कर सकता है, इसलिए दूर स्थित ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन भी दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
- FGD से युक्त संयंत्रों का प्रदर्शन: फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) प्रणाली से सुसज्जित कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से, समान क्षमता वाले उन संयंत्रों की तुलना में, जहाँ प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं है, सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) का उत्सर्जन उल्लेखनीय रूप से कम पाया गया है।
फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) के बारे में
- फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) एक वायु प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकी है, जिसे ताप विद्युत संयंत्रों में फ्ल्यू गैसों से सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) को वायुमंडल में उत्सर्जित होने से पूर्व निस्तारित करने के लिए स्थापित किया जाता है।
- कार्य सिद्धांत: इसमें सामान्यतः चूना पत्थर अथवा चूना जैसे क्षारीय अवशोषकों का उपयोग कर SO₂ को रासायनिक रूप से अवशोषित किया जाता है तथा उसे जिप्सम में परिवर्तित किया जाता है, जिसका उपयोग सीमेंट एवं निर्माण उद्योग में किया जा सकता है।
- दक्षता: यह कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाले सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन का 95% तक निष्कासन करने में सक्षम है।
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पृष्ठभूमि: SO₂ उत्सर्जन मानकों का विकास
- वर्ष 2015: केंद्र सरकार ने सभी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) प्रणाली की स्थापना को अनिवार्य कर दिया था।
- वर्ष 2021: ताप विद्युत संयंत्रों को उनके स्थान एवं प्रदूषण संवेदनशीलता के आधार पर श्रेणी A, B एवं C में वर्गीकृत किया गया तथा प्रत्येक श्रेणी के लिए अलग-अलग अनुपालन समय-सीमा निर्धारित की गई थी।
- जुलाई 2025 अधिसूचना
- श्रेणी A: वर्ष 2027 तक FGD की स्थापना अनिवार्य।
- श्रेणी B: FGD स्थापना की आवश्यकता का निर्णय प्रकरण-दर-प्रकरण आधार पर किया जाएगा।
- श्रेणी C: FGD की अनिवार्य स्थापना से छूट; इस श्रेणी में भारत के लगभग 78% कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र शामिल हैं।
सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) क्या है और यह चिंता का विषय क्यों है?
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) एक रंगहीन, अत्यधिक अभिक्रियाशील तथा तीव्र गंध वाली गैस है, जो मुख्यतः सल्फर युक्त जीवाश्म ईंधनों, विशेषकर कोयले के दहन से उत्सर्जित होती है।
- यह एक प्रमुख वायु प्रदूषक है, जो श्वसन एवं हृदय-वाहिका संबंधी रोगों का कारण बनती है तथा अम्लीय वर्षा, पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) के निर्माण एवं पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण में योगदान देती है।
- भारत, मुख्यतः कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण, विश्व का सबसे बड़ा SO₂ उत्सर्जक है।
- PM2.5 का पूर्वगामी प्रदूषक: SO₂ वायुमंडल में अभिक्रिया कर द्वितीयक सूक्ष्म कणीय पदार्थ (PM2.5) का निर्माण करता है, जो शहरी वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की अनुशंसाएँ
- सभी संयंत्रों में FGD की अनिवार्य स्थापना: श्रेणी को दरकिनार करते हुए सभी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन प्रणाली की अनिवार्य स्थापना की व्यवस्था पुनः लागू की जाए।
- अधिक पारदर्शिता: सतत् उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (CEMS) के आँकड़ों को वास्तविक समय के साथ सार्वजनिक किया जाए।
- नियमित प्रकटीकरण: फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) प्रणालियों की संचालन स्थिति एवं अनुपालन रिपोर्टों को नियमित रूप से प्रकाशित किया जाए।
- वायु गुणवत्ता प्रबंधन को सुदृढ़ करना: विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में SO₂ एवं PM2.5 प्रदूषण को कम करने के लिए निगरानी एवं प्रवर्तन को अधिक प्रभावी बनाया जाए।