संदर्भ
हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि घरेलू हिंसा (DV) अधिनियम, 2005 की धारा 20(1)(d) के अंतर्गत वयस्क अविवाहित पुत्री अपने पिता से मौद्रिक राहत की माँग कर सकती है।

संबंधित तथ्य
- शैक्षिक सहायता का अधिकार: न्यायालय ने निर्णय दिया कि वयस्क अविवाहित पुत्री घरेलू हिंसा (DV) अधिनियम, 2005 की धारा 20(1)(d) के अंतर्गत उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने पिता से वित्तीय सहायता की माँग करने का अधिकार रखती है।
- माता-पिता का दायित्व: न्यायालय ने कहा कि माता-पिता का मूलभूत सुविधाएँ, स्वास्थ्य-सेवा एवं शिक्षा उपलब्ध कराने का दायित्व केवल संतान के वयस्क हो जाने मात्र से स्वतः समाप्त नहीं हो जाता है।
- घरेलू हिंसा (DV) अधिनियम का उद्देश्य: न्यायालय ने कहा कि केवल इस आधार पर राहत से वंचित करना कि पुत्री वयस्क हो चुकी है, धारा 20(1)(d) के विधायी उद्देश्य को विफल कर देगा।
घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के बारे में
- परिवार/घरेलू संबंधों के अंतर्गत हिंसा से पीड़ित महिलाओं को प्रभावी संरक्षण प्रदान करने के लिए अधिनियमित एक सिविल कानून।
- अधिनियमन: वर्ष 2005 में अधिनियमित तथा 26 अक्टूबर 2006 से प्रभावी।
- दायरा: घरेलू संबंध में रहने वाली प्रत्येक व्यथित महिला को संरक्षण प्रदान करता है, जिसमें लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला भी शामिल है।
- घरेलू हिंसा की परिभाषा: इसमें शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक तथा आर्थिक उत्पीड़न, सहित दहेज से संबंधित उत्पीड़न शामिल है।
- प्रमुख धाराएँ
- धारा 18: संरक्षण आदेश
- धारा 19: निवास आदेश
- धारा 20: मौद्रिक राहत, जिसमें शामिल हैं—
- आय की हानि
- चिकित्सा व्यय
- संपत्ति की हानि/क्षति
- व्यथित व्यक्ति तथा उसके बच्चों के लिए भरण-पोषण — धारा 20(1)(d) में इसका प्रावधान है तथा “इसके अतिरिक्त” (in addition to) शब्दावली इस मामले में व्याख्या का मुख्य आधार थी और जहाँ उचित हो, इसमें शैक्षिक व्यय भी शामिल किया जा सकता है।
- धारा 21: अभिरक्षा आदेश
- धारा 22: प्रतिकर आदेश
- धारा 23: अंतरिम/एकपक्षीय आदेश
- व्यापक दायरा: घरेलू संबंध में रहने वाली प्रत्येक व्यथित महिला को शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक तथा आर्थिक उत्पीड़न से संरक्षण प्रदान करता है।
- निवास का अधिकार: प्रत्येक व्यथित महिला को साझा गृह में निवास करने का अधिकार प्रदान करता है, चाहे उसका उस पर स्वामित्व अथवा वैधानिक अधिकार हो या नहीं।
- संस्थागत सहायता एवं प्रवर्तन: संरक्षण अधिकारियों, सेवा प्रदाताओं, आश्रय गृहों तथा चिकित्सा सुविधाओं का प्रावधान करता है तथा संरक्षण आदेशों के उल्लंघन को संज्ञेय एवं गैर-जमानती अपराध बनाता है।
- कार्यान्वयन तंत्र: संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति, सेवा प्रदाताओं के पंजीकरण तथा पीड़ितों को आश्रय गृहों एवं चिकित्सा सुविधाओं तक पहुँच का प्रावधान करता है।
संबंधित न्यायिक दृष्टांत
- अभिलाषा बनाम प्रकाश (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल वयस्क हो जाने के आधार पर अविवाहित वयस्क पुत्री दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144) के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती, जब तक कि वह शारीरिक अथवा मानसिक दिव्यांगता से ग्रस्त न हो।
- हालाँकि, जहाँ लागू हो, वह व्यक्तिगत विधियों के अंतर्गत राहत प्राप्त कर सकती है।
- राजनेश बनाम नेहा (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने भरण-पोषण निर्धारित करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश निर्धारित किए तथा इस बात पर बल दिया कि भरण-पोषण ऐसा होना चाहिए, जिससे गरिमापूर्ण जीवन-स्तर सुनिश्चित हो तथा इसका निर्धारण पक्षकारों की वित्तीय क्षमता के आधार पर किया जाए।
- XYZ बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अविवाहित पुत्री को अपने माता-पिता से शैक्षिक व्यय की माँग करने का अप्रतिहर्त्य एवं विधिक रूप से प्रवर्तनीय अधिकार प्राप्त है तथा न्यायालय, माता-पिता की वित्तीय क्षमता के अधीन, उन्हें उच्च शिक्षा का व्यय वहन करने का निर्देश दे सकता है।
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