मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS)
Mobile Phone Manufacturing Scheme (MPMS)
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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के मोबाइल फोन विनिर्माण पारितंत्र को सुदृढ़ करने के लिए मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (Mobile Phone Manufacturing Scheme–MPMS) को मंजूरी प्रदान की।
मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS) के बारे में:
- यह केंद्रीय क्षेत्रक योजना है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा बड़े पैमाने पर मोबाइल फोन विनिर्माण को बढ़ावा देने, घरेलू मूल्य संवर्द्धन को बढ़ावा देने तथा वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मूल्य शृंखलाओं में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए अनुमोदित किया गया है।
- उद्देश्य: मोबाइल फोन उत्पादन का विस्तार करना, घरेलू मूल्य संवर्द्धन को बढ़ाना, सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण करना, भारतीय ब्रांडों को प्रोत्साहित करना, डिजाइन एवं अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देना तथा निर्यात एवं रोजगार में वृद्धि करते हुए प्रौद्योगिकीय संप्रभुता प्राप्त करना।
- नोडल निकाय: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY)।
- बजटीय परिव्यय: ₹62,500 करोड़।
- कार्यान्वयन अवधि: इस योजना का क्रियान्वयन पाँच वर्षों (वित्तीय वर्ष 2026–27 से 2030–31) तक किया जाएगा।
- प्रोत्साहन: पात्र मोबाइल फोन बिक्री पर 2.25%–5% तक प्रोत्साहन, प्रमुख घटकों की घरेलू सोर्सिंग के लिए अतिरिक्त 1.5% तक प्रोत्साहन तथा उत्पाद डिजाइन एवं अनुसंधान एवं विकास (R&D) करने वाले भारतीय ब्रांडों के लिए 3% प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
भारत में मोबाइल विनिर्माण की स्थिति:
- वैश्विक स्थिति: भारत उत्पादन की मात्रा के आधार पर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है तथा देश में बिकने वाले 99.2% मोबाइल फोन भारत में ही निर्मित होते हैं।
- चीन विश्व का सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है, जो वैश्विक स्मार्टफोन उत्पादन का अनुमानतः 70% से 80% उत्पादन करता है।
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अबत्सहायेश्वरर/अबथसहायेश्वरर मंदिर
Abathsahayeswarar Temple

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तंजावुर (तमिलनाडु) स्थित 12वीं शताब्दी के अबत्सहायेश्वरर (थुक्काची) मंदिर को उत्कृष्ट विरासत संरक्षण के लिए यूनेस्को एशिया-प्रशांत विशिष्टता पुरस्कार (UNESCO Asia-Pacific Award of Distinction, 2024) से सम्मानित किया गया।
अबथसहायेश्वरर (थुक्काची) मंदिर के बारे में:
- यह तमिलनाडु के तंजावुर जिले के थुक्काची में स्थित 12वीं शताब्दी का एक जीवंत हिंदू मंदिर है, जो उत्तरकालीन चोल स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
- निर्माण: इसका संबंध कुलोत्तुंग प्रथम एवं विक्रम चोल से माना जाता है। इसे विक्रम चोल के शासनकाल में पूर्णतः निर्मित एकमात्र प्रमुख मंदिर माना जाता है। कुलोतुंग प्रथम ने इसे तेवरम् (Thevaram) के पाठ हेतु अनुदान प्रदान किया था।
प्रमुख विशेषताएँ
- विशिष्ट चोल स्थापत्य: यह एक दुर्लभ करा कोविल (Kara Kovil) है, जिसमें गर्भगृह को शोभायात्रा के रथ के समान डिजाइन किया गया है।
- शैव महत्त्व: अभिलेखों में इसका उल्लेख थेंथिरुकालाथि (Thenthirukalathi) अथवा विक्रमचोलीश्वरम् (Vikramacholeeswaram) के रूप में मिलता है। यहाँ भगवान शरभेश्वर (Lord Sarabeshwarar) की सबसे प्राचीन पाषाण प्रतिमाओं में से एक स्थापित है।
- यूनेस्को मान्यता: इस जीवंत विरासत स्मारक के संरक्षण के लिए इसे यूनेस्को एशिया-प्रशांत विशिष्टता पुरस्कार (2024) प्राप्त हुआ।
- संरक्षण दृष्टिकोण: इसके संरक्षण कार्य में स्थापत्य वेद (Sthapatya Veda), आगम शास्त्र तथा स्थपतियों (Sthapathis) की पारंपरिक विशेषज्ञता को ड्रोन सर्वेक्षण, डिजिटल मानचित्रण, फोटोग्रामेट्री तथा प्रिसीजन एनास्टाइलोसिस जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ संयोजित किया गया।
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सहायता-प्राप्त मृत्यु
Assisted Dying
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फ्राँस की संसद ने एक ऐतिहासिक सहायता प्राप्त मृत्यु (Assisted Dying) विधेयक को मंजूरी दी है, जिसके तहत पात्र अंतिम अवस्था के असाध्य रोगों (Terminally Ill) से पीड़ित वयस्कों को कड़े कानूनी सुरक्षा प्रावधानों के अंतर्गत चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु प्राप्त करने की अनुमति दी जाएगी।
सहायता प्राप्त मृत्यु (Assisted Dying) के बारे में
- सहायता प्राप्त मृत्यु (Assisted Dying) एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत पात्र अंतिम अवस्था के असाध्य रोगों से पीड़ित वयस्क कठोर चिकित्सीय एवं प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों के अधीन डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवा का सेवन कर स्वेच्छा से अपने जीवन का अंत कर सकते हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ
- चिकित्सीय सुरक्षा उपाय: पात्रता का आकलन दो स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है, जिसके बाद स्वीकृति से पूर्व अनिवार्य विचार-अवधि (Mandatory Reflection Period) प्रदान की जाती है, ताकि निर्णय सूचित एवं स्वैच्छिक हो।
- स्व-प्रशासन सिद्धांत: अधिकांश ऐसे न्यायक्षेत्रों में, जहाँ सहायता प्राप्त मृत्यु वैध है, रोगी को स्वयं निर्धारित दवा का सेवन करना होता है, जबकि सक्रिय इच्छामृत्यु अर्थात् किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रत्यक्ष रूप से दवा देना, अनेक देशों में अभी भी प्रतिबंधित है।
- अंतरात्मा के आधार पर आपत्ति: स्वास्थ्यकर्मी नैतिक या धार्मिक आधार पर इस प्रक्रिया में भाग लेने से इनकार कर सकते हैं, किंतु सामान्यतः उन्हें रोगी को किसी अन्य इच्छुक चिकित्सक के पास भेजना होता है।
सहायता प्राप्त मृत्यु पर भारत का दृष्टिकोण
- न्यायिक मान्यता: सर्वोच्च न्यायालय ने कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) में अनुच्छेद-21 के अंतर्गत गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार (Right to Die with Dignity) को मान्यता दी तथा निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराते हुए लिविंग विल (Living Will) को कड़े सुरक्षा प्रावधानों के साथ मान्यता प्रदान की।
- वर्तमान कानूनी स्थिति: सक्रिय इच्छामृत्यु तथा चिकित्सक-सहायता प्राप्त आत्महत्या (Physician-Assisted Suicide) भारत में अभी भी अवैध हैं तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत दंडनीय हैं। वहीं निष्क्रिय इच्छामृत्यु का विधिक ढाँचा पूर्णतः सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर आधारित है, न कि किसी संसदीय कानून पर।
- प्रक्रियागत सुधार: वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को सरल बनाते हुए एकल चिकित्सा बोर्ड द्वारा प्रमाणन की अनुमति दी तथा न्यायिक स्वीकृति की पूर्व अनिवार्यता को समाप्त कर दिया।
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रविदासिया
Ravidassias

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रविदासिया (Ravidassias) समुदाय ने अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान एवं धार्मिक परंपराओं का हवाला देते हुए वर्ष 2027 की जनगणना में अलग धर्म श्रेणी की पुनः माँग उठाई है।
रविदासिया के बारे में
- रविदासिया गुरु रविदास के अनुयायी हैं तथा विशिष्ट उपासना स्थलों, धार्मिक ग्रंथों, प्रतीकों एवं धार्मिक परंपराओं वाले एक प्रमुख दलित धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- भौगोलिक विस्तार: रविदासिया समुदाय की सर्वाधिक आबादी पंजाब के दोआब क्षेत्र (जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला तथा शहीद भगत सिंह नगर) में पाई जाती है। इसके अतिरिक्त यूरोप, उत्तरी अमेरिका तथा यूनाइटेड किंगडम में भी इसका एक बड़ा प्रवासी समुदाय है।
- अलग धर्म की माँग: समुदाय जनगणना में अलग धर्म श्रेणी की माँग कर रहा है। उसका तर्क है कि रविदासिया धर्म एक स्वतंत्र धर्म के रूप में विकसित हो चुका है।
- स्वतंत्र धर्म के रूप में स्थापना: रविदासिया समुदाय ने वर्ष 2010 में, मुख्यतः डेरा सचखंड बल्लाँ के नेतृत्व में, स्वयं को औपचारिक रूप से एक पृथक धर्म घोषित किया।
- धार्मिक ग्रंथ: इसका पवित्र ग्रंथ ‘अमृतबानी गुरु रविदास जी’ है, जिसमें गुरु रविदास के 200 भजनों (Hymns) का संकलन है।
- प्रमुख सिद्धांत एवं मान्यताएँ: यह धर्म जाति व्यवस्था को अस्वीकार करता है, बेगमपुरा (Begampura) की अवधारणा का अनुसरण करता है, “जय गुरुदेव” को अपना मूल मंत्र (Motto) मानता है तथा “हर (Har)” को अपने धार्मिक प्रतीक के रूप में अपनाता है।
जनगणना में पृथक धर्म श्रेणी का प्रावधान
- जनगणना गणना: जनगणना में प्रत्येक उत्तरदाता द्वारा घोषित धर्म को दर्ज किया जाता है, जिसमें छह पूर्व-निर्धारित प्रमुख धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध एवं जैन) के अतिरिक्त अन्य धर्म भी शामिल होते हैं, जिससे स्व-पहचान का यथार्थ रूप से अभिलेखन सुनिश्चित होता है।
- कानूनी निहितार्थ: जनगणना में अलग धर्म श्रेणी केवल जनसांख्यिकीय गणना का आधार प्रदान करती है; इससे अल्पसंख्यक दर्जा, आरक्षण का लाभ अथवा कोई पृथक कानूनी मान्यता स्वतः प्राप्त नहीं होती है।
गुरु रविदास के बारे में
- गुरु रविदास (15वीं-16वीं शताब्दी) भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख संत, रहस्यवादी कवि तथा सामाजिक सुधारक थे, जिनके भक्ति पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं।
- प्रमुख योगदान
- बेगमपुरा: गुरु रविदास ने बेगमपुरा की परिकल्पना प्रस्तुत की, जो जातिगत भेदभाव, भय, अन्याय तथा सामाजिक असमानता से मुक्त एक आदर्श समाज है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को समान गरिमा प्राप्त हो।
- समानता एवं सामाजिक न्याय: उन्होंने अस्पृश्यता तथा जाति-आधारित पदानुक्रम का विरोध किया तथा मानव समानता, करुणा एवं श्रम की गरिमा को न्यायपूर्ण समाज की आधारशिला बताया।
- कर्मकांड से ऊपर भक्ति: उन्होंने कर्मकांडों के स्थान पर व्यक्तिगत भक्ति, नैतिक आचरण तथा आंतरिक पवित्रता को आध्यात्मिक मुक्ति का वास्तविक मार्ग बताया।
- विरासत: माघ पूर्णिमा के अवसर पर मनाई जाने वाली गुरु रविदास जयंती उनके जन्म का स्मरण करती है तथा सामाजिक समानता, धार्मिक सद्भाव एवं भक्ति परंपरा में उनके स्थायी योगदान का उत्सव मनाती है।
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चीन की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’
China’s ‘Great Green Wall’
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चीन की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ (थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट प्रोग्राम) ने उत्तरी चीन में मरुस्थलीकरण की गति को उल्लेखनीय रूप से धीमा किया है। हालाँकि, वैज्ञानिकों ने इस उपलब्धि को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया है।
‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ (थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट प्रोग्राम) के बारे में:
- प्रारंभ: यह चीन द्वारा वर्ष 1978 में प्रारंभ किया गया एक बड़े पैमाने का वनीकरण एवं पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन कार्यक्रम है।
- विस्तार क्षेत्र: यह उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी तथा उत्तर-पूर्वी चीन में फैला हुआ है और देश के लगभग आधे भू-भाग को आच्छादित करता है।
- पैमाना: यह विश्व के सबसे बड़े पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापन कार्यक्रमों में से एक है।
प्रमुख तकनीक: स्ट्रॉ चेकरबोर्ड
- यह रेतीले टीलों के स्थिरीकरण की एक तकनीक है, जिसका उपयोग चीन के ग्रेट ग्रीन वॉल कार्यक्रम में मरुस्थलीकरण को नियंत्रित करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है।
- विधि: स्ट्रॉ (Straw) की डंडियों को एक-दूसरे को काटती हुई पंक्तियों में इस प्रकार लगाया जाता है कि स्थानांतरित होते रेतीले टीलों पर जालीनुमा चेकरबोर्ड संरचना बन जाए।
- सहायक भूमिका:
- रेत का स्थिरीकरण: पवन द्वारा अपरदन को कम करता है तथा रेत के क्षरण को रोकता है।
- नमी संरक्षण: नमी को संचित करता है तथा जल की हानि को कम करता है।
- वनीकरण को समर्थन: पौधरोपण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपलब्ध कराता है।
कार्यक्रम की वैश्विक मान्यता
- UNCCD की मान्यता: मरुस्थलीकरण से निपटने पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) ने इस कार्यक्रम को मरुस्थलीकरण से मुकाबले का एक सफल मॉडल के रूप में मान्यता प्रदान की है।
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