संदर्भ
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत ‘एसिड अटैक’ के पीड़ितों की परिभाषा का विस्तार करते हुए बलपूर्वक एसिड निगलने के लिए बाध्य किए गए पीड़ितों को भी इसमें शामिल किया है।
‘एसिड अटैक’ के पीड़ितों पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- पीड़ितों की परिभाषा का विस्तार: न्यायालय ने कहा कि “‘एसिड अटैक’ के पीड़ित” केवल ‘एसिड’ फेंकने तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि इसमें बलपूर्वक एसिड निगलने के लिए बाध्य किए गए व्यक्तियों को भी शामिल किया जाना चाहिए, जिससे व्यापक विधिक मान्यता सुनिश्चित हो सके।
- अदृश्य चोटों की मान्यता: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जिन पीड़ितों को आंतरिक चोटें होती हैं, भले ही बाह्य विकृति दिखाई न दे, वे भी कानून के अंतर्गत समान रूप से संरक्षण और लाभ के पात्र हैं।
- पश्चदृष्टि से प्रभावशीलता: विस्तारित परिभाषा वर्ष 2016 से प्रभावी मानी जाएगी, जिससे पूर्व में एसिड निगलने से पीड़ित भी दिव्यांगता संबंधी लाभों का दावा कर सकेंगे।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत एसिड अटैक के पीड़ितों के लिए प्रावधान
- बेंचमार्क दिव्यांगता के रूप में समावेशन: एसिड अटैक के पीड़ितों को निर्दिष्ट दिव्यांगता की श्रेणी में मान्यता दी गई है, जिससे वे विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं एवं कानूनी संरक्षण का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
- सामाजिक सुरक्षा लाभों का अधिकार: पीड़ित वित्तीय सहायता, पुनर्वास समर्थन तथा दिव्यांगता पेंशन जैसे लाभों के पात्र होते हैं, जो सरकार द्वारा प्रदान किए जाते हैं।
- पहचान प्रमाणन: अधिनियम के अंतर्गत दिव्यांगता प्रमाण-पत्र/पहचान-पत्र जारी करना अनिवार्य है, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार से संबंधित लाभों तक पहुँच सुनिश्चित होती है।
- आरक्षण एवं भेदभाव-निषेध: पीड़ितों को शिक्षा एवं सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण का लाभ मिलता है, साथ ही उनके विरुद्ध भेदभाव से संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के बारे में
- यह एक व्यापक विधि है, जिसका उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों एवं गरिमा की रक्षा करना है।
- उत्पत्ति एवं पृष्ठभूमि: यह अधिनियम संयुक्त राष्ट्र विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अभिसमय को लागू करने हेतु अधिनियमित किया गया, जिसे भारत ने वर्ष 2007 में अनुमोदित किया था।
- इसने विकलांग व्यक्ति अधिनियम, 1995 का स्थान लिया, जिससे भारतीय कानून को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाया गया।
- प्रमुख प्रावधान
- दिव्यांगता की विस्तारित परिभाषा: अधिनियम में मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की श्रेणियों की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 कर दी गई है तथा सरकार को अतिरिक्त श्रेणियाँ अधिसूचित करने का अधिकार दिया गया है।
- अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: यह कल्याण-आधारित दृष्टिकोण से हटकर अधिकार-आधारित ढाँचे को अपनाता है, जिससे समानता, गरिमा एवं पूर्ण सहभागिता सुनिश्चित होती है।
- रोजगार एवं शिक्षा में आरक्षण: सरकारी नौकरियों में 4% तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में 5% आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जो बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिए है।
- संस्थागत तंत्र: अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय एवं राज्य सलाहकार बोर्ड की स्थापना तथा मुख्य आयुक्तों की नियुक्ति की गई है, जो क्रियान्वयन की निगरानी करते हैं।
- सुगम्यता एवं समावेशन: सुगम्य भारत अभियान के अंतर्गत सार्वजनिक भवनों, परिवहन एवं सूचना प्रणालियों में सुगम्यता सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है।
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महत्त्व
- दिव्यांगता संबंधी न्याय का सुदृढ़ीकरण: यह निर्णय पूर्व में वंचित पीड़ितों को मान्यता देकर समावेशन सुनिश्चित करता है तथा दिव्यांगता अधिकारों में विद्यमान विधिक रिक्तताओं को पाटता है।
- लैंगिक न्याय का आयाम: चूँकि अधिकांश पीड़ित महिलाएँ होती हैं, यह निर्णय लैंगिक न्याय को सुदृढ़ करता है तथा समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है।
- अनुच्छेद-142 के अंतर्गत न्यायिक सक्रियता: न्यायालय ने अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित किया, जिससे विधायी संशोधन की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल राहत प्रदान की जा सके।
- नीतिगत निहितार्थ: यह सरकार को एसिड अटैक के पीड़ितों की रोकथाम, पुनर्वास एवं दीर्घकालिक देखभाल हेतु एक समग्र नीति ढाँचा अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
निष्कर्ष
यह निर्णय दिव्यांगता संबंधी अधिकारों को सुदृढ़ करता है, क्योंकि यह समावेशी मान्यता, त्वरित राहत तथा न्याय एवं कल्याण तक समान पहुँच सुनिश्चित करता है, जिसमें एसिड के पीड़ित भी शामिल हैं।