संदर्भ
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि आरोपी सहमति देता है तो निचले न्यायालय निरस्त भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A (राजद्रोह) के तहत मुकदमों की सुनवाई जारी रख सकते हैं, भले ही इस कानून की संवैधानिक वैधता अभी भी चुनौती के अधीन बनी हुई है।
ऐतिहासिक एवं विधिक पृष्ठभूमि
- औपनिवेशिक उत्पत्ति: धारा 124A का मसौदा थॉमस बैबिंगटन मैकॉले द्वारा तैयार किया गया और इसे वर्ष 1870 में भारतीय दंड संहिता में शामिल किया गया था।
- इसे ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया गया, जिनमें महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक शामिल थे।
- भारतीय दंड संहिता का मसौदा मैकॉले की अध्यक्षता में तैयार किया गया था, लेकिन धारा 124A वर्ष 1860 में लागू संहिता का हिस्सा नहीं थी। इसे वर्ष 1870 में जेम्स स्टीफन से जुड़े संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया।
- वर्ष 2022 स्थगन: मई वर्ष 2022 में, एस.जी. वोम्बटकेरे बनाम भारत संघ वाद में, सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने धारा 124A (राजद्रोह) को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया।
- न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे इस प्रावधान के तहत कोई नई प्राथमिकी दर्ज न करें, जाँच जारी न रखें, या दंडात्मक कार्रवाई न करें, क्योंकि इसका व्यापक दुरुपयोग और औपनिवेशिक प्रकृति है।
- वर्ष 2026 में परिवर्तन: कमरान बनाम मध्य प्रदेश राज्य में, न्यायालय ने वर्ष 2022 के स्थगन को केवल “सहमति देने वाले आरोपियों” के लिए आंशिक रूप से हटाया, जो अपने मुकदमों की प्रगति या समापन चाहते हैं और त्वरित न्याय के अधिकार को प्राथमिकता दी।

राजद्रोह पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (वर्ष 1950): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर अनुच्छेद-19(2) से “राजद्रोह” शब्द को हटा दिया।
- इसने निर्णय दिया कि केवल सरकार की आलोचना के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, जिससे सरकार को प्रथम संविधान संशोधन (वर्ष 1951) लाना पड़ा और “सार्वजनिक व्यवस्था” शब्द जोड़ा गया ताकि धारा 124A को बनाए रखा जा सके।
- केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य (वर्ष 1962): पाँच-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने धारा 124A की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन इसके दायरे को सीमित कर दिया।
- इसने निर्णय दिया कि राजद्रोह तभी लागू होगा, जब हिंसा के लिए उकसावा या सार्वजनिक अव्यवस्था उत्पन्न करने का उद्देश्य हो। सरकारी नीतियों या कार्यों के विरुद्ध तीखे शब्द राजद्रोह नहीं माने जाएँगे।
- बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (वर्ष 1995): सर्वोच्च न्यायालय ने उन दो व्यक्तियों पर लगे राजद्रोह के आरोप हटा दिए, जिन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान समर्थक नारे लगाए थे।
- न्यायालय ने कहा कि सामान्य नारेबाजी, जो कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करती या वास्तविक हिंसा में परिवर्तित नहीं होती, वह राजद्रोह नहीं है।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (वर्ष 2015): सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को निरस्त करते हुए न्यायालय ने एक सिद्धांत स्थापित किया, जो सीधे राजद्रोह पर लागू होता है।
- इसने भाषण को तीन स्तरों में विभाजित किया—चर्चा, समर्थन और उकसावा। न्यायालय ने कहा कि नागरिकों को कट्टर विचारों का समर्थन करने का अधिकार है; राज्य केवल तब हस्तक्षेप कर सकता है, जब भाषण हिंसा के उकसावे तक पहुँच जाए।
- एस.जी. वोम्बटकेरे बनाम भारत संघ (वर्ष 2022): तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने 152 वर्ष प्राचीन औपनिवेशिक कानून को स्थगित कर दिया।
- न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को नई प्राथमिकी दर्ज करने से प्रतिबंधित किया और देशभर में लंबित मुकदमों और अपीलों को स्थगित कर दिया।
- कमरान बनाम मध्य प्रदेश राज्य (वर्ष 2026): सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2022 के स्थगन को केवल “सहमति देने वाले आरोपियों” के लिए हटाया, जिसने लंबे समय तक कारावास झेला है।
- इसने निर्णय दिया कि निम्न न्यायालय मुकदमों की सुनवाई जारी रख सकते हैं और निर्णय दे सकते हैं, यदि आरोपी स्वेच्छा से सहमति देता है, और इस प्रकार त्वरित न्याय के अधिकार (अनुच्छेद-21) को प्राथमिकता दी गई, जबकि मुख्य संवैधानिक चुनौती अभी लंबित है।
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विधिक परिवर्तन— IPC की धारा 124A से BNS की धारा 152 तक
BNS ने स्पष्ट रूप से “राजद्रोह” अपराध को समाप्त करने का दावा किया है। हालाँकि, इसने धारा 152 को प्रस्तुत किया है, जो “भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों” को दंडित करती है। नीचे दी गई सारणी यह दर्शाती है कि पुराने औपनिवेशिक प्रावधान की तुलना आधुनिक वैधानिक ढाँचे से कैसे की जाती है।
विशेषता
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IPC की धारा 124A (प्राचीन)
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BNS की धारा 152 (वर्तमान)
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| नामकरण |
स्पष्ट रूप से “देशद्रोह (Sedition)” कहा गया। |
“भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य” के रूप में वर्णित। |
| मुख्य अपराध |
सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष भड़काना। |
विघटनकारी गतिविधियों या अलगाववादी कृत्यों के माध्यम से संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालना |
| संचार के माध्यम |
शब्द (मौखिक/लिखित), संकेत या दृश्य प्रस्तुति। |
शब्द, संकेत, इलेक्ट्रॉनिक संचार या वित्तीय साधनों का उपयोग। |
| दंड का परिमाण |
आजीवन कारावास या अधिकतम 3 वर्ष तक का दंड, साथ में जुर्माना। |
आजीवन कारावास या अधिकतम 7 वर्ष तक का दंड, साथ में जुर्माना। |
मुख्य संवैधानिक एवं विधिक चिंताएँ
- असंवैधानिक प्रावधानों के निर्णय का द्वंद्व: धारा 124A की मूल संवैधानिक वैधता अभी भी लंबित है और सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ के समक्ष चुनौती के अधीन है।
- विरोधाभास: ऐसे कानून के आधार पर न्यायालयों को दोष या निर्दोषता का निर्णय देने की अनुमति देना, जिसकी संवैधानिकता संदिग्ध है, गंभीर विधिक असंतुलन उत्पन्न करता है।
- यदि भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय धारा 124A को असंवैधानिक घोषित कर देता है, तो इस बीच दिए गए सभी दोषसिद्धि निर्णय स्वाभाविक रूप से त्रुटिपूर्ण हो जाएँगे।

- संयुक्त मुकदमों में प्रक्रियात्मक अव्यवस्था: स्पष्टीकरण के अनुसार कार्यवाही केवल “सहमति देने वाले आरोपियों” के लिए पुनः प्रारंभ हो सकती है, जबकि आपराधिक मामलों में प्रायः एकाधिक सह-आरोपी होते हैं।
- यदि आरोपी ‘A’ शीघ्र निष्पत्ति के लिए सहमति देता है, लेकिन आरोपी ‘B’ और ‘C’ मना करते हैं, तो यह प्रक्रियात्मक गतिरोध उत्पन्न करता है।
- एक ही अपराध के लिए मुकदमों का विभाजन विरोधाभासी निर्णय, न्यायिक अक्षमता और संयुक्त दायित्व के सिद्धांत के उल्लंघन का कारण बन सकता है।
- “चिलिंग इफेक्ट” सिद्धांत का ह्रास: राजद्रोह का ऐतिहासिक रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता {अनुच्छेद-19(1)(a)} पर निरोधात्मक प्रभाव रहा है।
- इस प्रावधान को पुनः सक्रिय करने से आलोचकों के अनुसार, औपनिवेशिक दमनकारी कानून का संस्थागत खतरा पुनः उभरता है, जो “औपनिवेशिक विरासत को समाप्त करने” के घोषित उद्देश्य के विपरीत है।
आगे की राह
- संवैधानिक समीक्षा: सर्वोच्च न्यायालय को धारा 124A की वैधता पर शीघ्र निर्णय लेना चाहिए तथा भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि वैध असहमति के विरुद्ध दुरुपयोग रोका जा सके।
- मजबूत सुरक्षा उपाय: भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत राजद्रोह-सदृश प्रावधानों में सख्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए, जिनमें ऐसे मामलों के पंजीकरण से पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पूर्व स्वीकृति शामिल हो।
- अधिकार और सुरक्षा का संतुलन: न्यायपालिका को राष्ट्रीय सुरक्षा और त्वरित न्याय के साथ-साथ मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण के मध्य संतुलन बनाना चाहिए।