भारतीय संघवाद का अनुपस्थित स्तंभ: पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना

25 May 2026

संदर्भ 

हाल ही में भारतीय संघवाद पर बहस केंद्र–राज्य संबंधों से आगे बढ़कर सरकार के तृतीय स्तर पर शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों की भूमिका को भी शामिल करने लगी है।

संबंधित तथ्य

  • अरविंद सुब्रमण्यन, पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, ने एक लेख में स्थानीय शासन के तृतीय स्तर को भारतीय संघवाद का सौतेला बच्चा” (Stepchild of Indian federalism) बताया, जो राज्य सरकारों द्वारा अत्यधिक नियंत्रित है।

तृतीय स्तर की सरकार’ के बारे में

  • तृतीय स्तर की सरकार’ का तात्पर्य स्थानीय स्वशासन संस्थाओं से है, जो केंद्र और राज्य सरकारों के नीचे कार्य करती हैं।
    • ग्रामीण शासन का संचालन पंचायती राज प्रणाली के माध्यम से ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तर पर किया जाता है।
    • शहरी शासन का संचालन नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के माध्यम से होता है।
  • संवैधानिक स्थिति: इसे 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों (1992) के माध्यम से संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।
  • कार्य: ये स्वच्छता, जल आपूर्ति, सड़कें, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्थानीय योजना जैसी आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति करते हैं।

स्थानीय निकायों को संघवाद की बहस से बाहर क्यों रखा गया है?

  • केंद्र–राज्य केंद्रित संघवाद: भारतीय संघवाद ऐतिहासिक रूप से केंद्र–राज्य संबंधों जैसे GST विवाद, राज्यपाल की भूमिका और वित्तीय हस्तांतरण पर केंद्रित रहा है, जिससे स्थानीय निकायों की उपेक्षा हुई है।
  • राज्य सरकारों का प्रभुत्व: राज्य नगर आयुक्तों की नियुक्ति को नियंत्रित करते हैं; उदाहरण के लिए, दिल्ली और बंगलूरू जैसे शहरों में अधिकारी मुख्यतः राज्य सरकारों के प्रति उत्तरदायी रहते हैं।
  • कमजोर वित्तीय क्षमता: शहरी स्थानीय निकाय बहुत कम स्वयं का राजस्व उत्पन्न करते हैं, और कई नगरपालिकाएँ मूलभूत सेवाओं के लिए राज्य हस्तांतरण पर अत्यधिक निर्भर रहती हैं।
  • प्रशासनिक निर्भरता: कार्यों के हस्तांतरण के बाद भी नगरपालिका कर्मचारी प्रायः राज्य कैडर के अधीन रहते हैं, जिससे शहर सरकारों की स्वायत्तता सीमित होती है।
  • 73वें और 74वें संशोधनों का अधूरा क्रियान्वयन: कई राज्यों ने 74वें संशोधन के अंतर्गत 18 कार्यों का पूर्ण हस्तांतरण शहरी स्थानीय निकायों को नहीं किया है।
  • क्रियान्वयन एजेंसियों के रूप में धारणा:अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन’ और जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसी योजनाएँ प्रायः ‘टॉप-डाउन’ (Top-down) प्रशासनिक संरचनाओं के माध्यम से लागू की जाती हैं।
  • शहरी शासन की विफलताएँ: दिल्ली में गंभीर प्रदूषण और बंगलूरू में यातायात जाम कमजोर और खंडित शहरी शासन प्रणाली को दर्शाते हैं।
  • कम संस्थागत और राजनीतिक क्षमता: कई छोटे नगरपालिकाओं में पेशेवर शहरी योजनाकार, वित्तीय विशेषज्ञ और तकनीकी कर्मचारी की कमी होती है, जिससे उनकी शासन क्षमता प्रभावित होती है।

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स्थानीय निकायों में ई-शासन

  • ई-ग्राम स्वराज पोर्टल: पंचायतों में डिजिटल शासन को बढ़ावा देता है, जिसमें ऑनलाइन योजना, बजट और लेखांकन प्रणालियाँ शामिल हैं।
  • स्मार्ट सिटीज मिशन: एकीकृत कमांड केंद्रों और स्मार्ट सेवा वितरण प्रणालियों के माध्यम से प्रौद्योगिकी-आधारित शहरी शासन को प्रोत्साहित करता है।
  • स्वामित्व योजना: ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति मानचित्रण और स्वामित्व अभिलेखों के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग करती है।

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चुनौतियाँ 

  • कमजोर स्थानीय शासन की ऐतिहासिक निरंतरता: वर्ष 1925 में जवाहरलाल नेहरू ने अवलोकित किया कि स्थानीय निकायों में दक्षता और सफलता का अभाव है, और यह स्थिति वर्तमान में भी बनी हुई है।
    • 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों (1993) के माध्यम से संवैधानिक मान्यता मिलने के बावजूद, स्थानीय सरकारें संस्थागत रूप से कमजोर बनी हुई हैं।
  • कमजोर प्रशासनिक क्षमता: भारत में स्थानीय सरकारों के पास नियुक्तियों, पदोन्नतियों और अनुशासनात्मक शक्तियों पर बहुत सीमित नियंत्रण है।
    • नगर आयुक्त और वरिष्ठ अधिकारी मुख्यतः राज्य सरकारों के प्रति उत्तरदायी रहते हैं, जिससे शहरी स्वायत्तता कमजोर होती है।
  • सरकारी रोजगार में कम हिस्सेदारी: संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन जैसे देशों में लगभग दो-तिहाई सरकारी कर्मचारी स्थानीय सरकारों के अधीन कार्य करते हैं।
    • भारत में, केवल लगभग 10% से थोड़ा अधिक सरकारी कर्मचारी स्थानीय निकायों में कार्यरत हैं, जिससे उनकी सेवा वितरण क्षमता कम हो जाती है।
  • स्थिर राजस्व सृजन: शहरी स्थानीय निकाय अपने स्वयं के कर राजस्व को बढ़ाने में विफल रहे हैं, जो दशकों से GDP के लगभग 0.3% के आस-पास बना हुआ है।
    • इसके विपरीत, केंद्र और राज्यों ने समय के साथ अपने राजस्व सृजन की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
  • कम सार्वजनिक व्यय: तृतीय स्तर द्वारा किया गया व्यय GDP के 1% से कम बना हुआ है, जबकि केंद्र और राज्य कई गुना अधिक खर्च करते हैं।
    • बाहरी अनुदानों पर निर्भरता स्थानीय सरकारों की वित्तीय स्वायत्तता और कार्यक्षमता को कम करती है।
  • राज्यों के अधीनस्थ अंग के रूप में कार्य: भारत में संघवाद की बहस मुख्यतः केंद्र और राज्यों पर केंद्रित रहती है, जबकि तीसरा स्तर उपेक्षित रहता है।
    • स्थानीय सरकारों को स्वायत्त लोकतांत्रिक संस्थाओं के बजाय राज्यों के अधीनस्थ प्रशासनिक अंग के रूप में देखा जाता है।
  • उच्च निर्भरता, कम स्वायत्तता: सरकार के उच्च स्तर का वित्तीय हस्तांतरण का उपयोग शहरों पर प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण के साधन के रूप में करते हैं।
    • स्थानीय निकाय नागरिकों पर पर्याप्त कर लगाने में अनिच्छुक या असमर्थ रहते हैं, जिससे दीर्घकालिक वित्तीय दुर्बलता उत्पन्न होती है।
  • प्रबंधकीय कमजोरी: राज्य सरकारें शहरी प्रशासन पर प्रभुत्व बनाए रखती हैं, जिससे शहरों में प्रबंधकीय पेशेवरता और जवाबदेही कम होती है।
    • भले ही कार्य औपचारिक रूप से हस्तांतरित किए गए हों, संचालनात्मक नियंत्रण राज्यों के पास ही बना रहता है।

आगे की राह

  • शहरीकरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व: भविष्य की जनगणना और राज्य के भीतर परिसीमन से शहरी मतदाताओं का राजनीतिक महत्त्व बढ़ सकता है, जिससे शहरी शासन की माँग मजबूत हो सकती है।
  • स्वतंत्र स्थानीय कैडर: नगरीय प्रशासन को कर्मचारियों की नियुक्ति, पदोन्नति और अनुशासनात्मक कार्यों पर अधिक नियंत्रण होना चाहिए।
  • अत्यधिक राज्य नियंत्रण को कम करना: राज्य सरकारों को शहरी शासन और योजना में नियंत्रक के बजाय सुगमकर्ता के रूप में कार्य करना चाहिए।
  • प्रतिस्पर्द्धी अर्द्ध संघवाद को बढ़ावा देना: इंदौर, सूरत और भुवनेश्वर जैसे शहरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित करने से नवाचार, सेवा वितरण और शहरी शासन मानकों में सुधार हो सकता है।
  • कार्यों का पूर्ण हस्तांतरण: राज्यों को 74वें संशोधन के अंतर्गत 18 कार्यों तथा 73वें संशोधन के प्रासंगिक अधिकारों का पूर्ण हस्तांतरण स्थानीय निकायों को करना चाहिए।
  • वित्तीय स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: शहरी स्थानीय निकायों को संपत्ति कर संग्रह, उपयोगकर्ता शुल्क और स्थानीय राजस्व सृजन में सुधार हेतु सशक्त बनाया जाना चाहिए।
  • भागीदारीपूर्ण शहरी शासन: वार्ड समितियों, सार्वजनिक परामर्श और स्थानीय जवाबदेही तंत्रों के माध्यम से नागरिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • स्थानीय निकायों की क्षमता निर्माण: नगरपालिकाओं को प्रभावी शासन के लिए प्रशिक्षित शहरी योजनाकार, वित्तीय विशेषज्ञ, इंजीनियर और तकनीकी पेशेवरों की आवश्यकता है।
  • शहरी विकास योजनाओं में सुधार: अटल मिशन फॉर रिजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन और जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसी योजनाओं को बुनियादी ढाँचे के निर्माण के साथ-साथ संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए।
  • संघवाद की बहस में शहरों का एकीकरण: संघवाद पर चर्चाओं में केंद्र–राज्य संबंधों के साथ-साथ शहरी शासन और विकेंद्रीकरण को भी शामिल किया जाना चाहिए।
    • स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने के लिए अधिक वित्तीय स्वायत्तता, प्रशासनिक नियंत्रण और जवाबदेही तंत्रों की आवश्यकता है।

ग्रामीण शासन के संदर्भ में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें

  • PESA अधिनियम, 1996 का क्रियान्वयन: पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाना चाहिए, ताकि जनजातीय और अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन को सुदृढ़ किया जा सके।
  • ग्राम पंचायतों का उपयुक्त आकार: ग्राम पंचायतों का गठन उपयुक्त जनसंख्या और भौगोलिक आकार के साथ किया जाना चाहिए, ताकि प्रभावी प्रशासन और बेहतर जनभागीदारी सुनिश्चित हो सके।
  • कर्मचारियों की नियुक्ति की शक्ति: पंचायतों को कर्मचारियों की नियुक्ति करने और उनकी सेवा शर्तों का स्वतंत्र प्रबंधन करने का अधिकार दिया जाना चाहिए, ताकि प्रशासनिक दक्षता में सुधार हो सके।
  • बजट अनुमोदन में स्वायत्तता: राज्य स्तरीय कानूनों में उच्च प्राधिकरणों द्वारा पंचायत बजट की स्वीकृति की आवश्यकता को हटाया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता बढ़ सके।
  • राज्य सरकार के हस्तक्षेप को सीमित करना: राज्य सरकारों के पास पंचायत प्रस्तावों को मनमाने ढंग से निलंबित करने या निर्वाचित प्रतिनिधियों के विरुद्ध अत्यधिक कार्रवाई करने की शक्ति नहीं होनी चाहिए।
  • समग्र गतिविधि मानचित्रण: राज्यों को ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध सभी विषयों के लिए पंचायतों को स्पष्ट रूप से कार्य और जिम्मेदारियाँ सौंपनी चाहिए।
  • राजस्व आधार को सुदृढ़ करना: स्थानीय सरकारों के राजस्व स्रोतों का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करने के लिए एक समग्र रणनीति अपनाई जानी चाहिए।

निष्कर्ष

भारत की संघीय संरचना एक सशक्त तृतीय स्तर के शासन के बिना अधूरी रहती है। कमजोर शहरी शासन के परिणामस्वरूप खराब सेवा वितरण, वित्तीय निर्भरता, प्रदूषण, भीड़भाड़ और प्रतिस्पर्द्धात्मकता में कमी देखी गई है। वास्तविक विकेंद्रीकरण के माध्यम से शहरों को सशक्त बनाना शासन में सुधार, शहरीकरण को बनाए रखने और भारत की आर्थिक वृद्धि को तेज करने के लिए आवश्यक है।

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