संदर्भ
नीति आयोग ने उच्च-स्तरीय ‘शिक्षा से रोजगार और उद्यम’ (EEE) स्थायी समिति की पहली बैठक आयोजित की है।
संबंधित तथ्य
- यह विशेष समिति मूल रूप से केंद्रीय बजट 2026–27 के पैरा-51 में प्रस्तावित की गई थी, जिसका उद्देश्य भारत की विशाल युवा जनसंख्या की आर्थिक और सामाजिक आकांक्षाओं को पूरा करना है।
- यह वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनने की दीर्घकालिक रणनीति का एक प्रमुख घटक है।
EEE समिति का मुख्य अधिदेश और उद्देश्य
यह समिति तीन महत्त्वपूर्ण आर्थिक स्तंभों (शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता) को जोड़ती है, जिनके निम्नलिखित लक्ष्य हैं:
- वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाना: वर्ष 2047 तक भारत को वैश्विक सेवा बाजार में 10% हिस्सेदारी दिलाने में सहायता करना।
- विघटनकारी प्रौद्योगिकी का मूल्यांकन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित उन्नत प्रौद्योगिकियों के रोजगार संरचना और भविष्य की कौशल आवश्यकताओं पर प्रभाव का विश्लेषण करना।
- विकास के इंजन का अनुकूलन: सेवा क्षेत्र के उच्च क्षमता वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देकर आर्थिक उत्पादन, रोजगार सृजन और निर्यात क्षमता को बढ़ाना।
- संरचनात्मक परिवर्तन: ग्रामीण और अनौपचारिक श्रम को गैर-कृषि क्षेत्रों में सुचारू रूप से स्थानांतरित करना।

संस्थागत संरचना-अंतर-क्षेत्रीय अभिसरण
EEE समिति का गठन राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान की उस अनूठी क्षमता को प्रकट करता है, जो प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक सीमाओं के पार एक सहयोगात्मक तंत्र तैयार करती है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:-
- अध्यक्षता: इसका नेतृत्व सीधे राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा किया जाता है।
- अंतर-मंत्रालयी अभिसरण: इसमें श्रम और रोजगार मंत्रालय, कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा उच्च शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
- संघीय प्रतिनिधित्व: यह विभिन्न राज्य प्रशासन से प्रतिनिधित्व लेकर क्षेत्रीय कौशल आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- औद्योगिक एकीकरण: इसमें NASSCOM, FICCI, CII, FISME और सेवा निर्यात संवर्द्धन परिषद जैसे औद्योगिक संगठनों की भागीदारी है।
सेवा क्षेत्र का रणनीतिक महत्त्व
अपनी प्रारंभिक चर्चाओं में, समिति ने यह रेखांकित किया कि सेवा क्षेत्र भारत की समष्टि आर्थिक स्थिरता का प्रमुख आधार बना हुआ है:
- जनसांख्यिकीय परिवर्तन: भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक आर्थिक वृद्धि में बदलने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादक रोजगार का सृजन आवश्यक है, न कि कृषि क्षेत्र में प्रछन्न बेरोजगारी।
- निर्यात प्रतिस्पर्द्धा: पारंपरिक सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं से आगे बढ़कर कानूनी, वित्तीय, स्वास्थ्य और अभियांत्रिकी परामर्श जैसे उन्नत क्षेत्रों में विविधीकरण कर भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में सुदृढ़ स्थान दिलाना।
- अर्थव्यवस्था का औपचारिकीकरण: उद्योग-उपयुक्त कौशल मार्गों के माध्यम से श्रमिकों को कम वेतन वाले अनौपचारिक कार्यों से निकालकर सुरक्षित औपचारिक रोजगार संरचना में शामिल करना।
मुख्य विधिक, संस्थागत एवं संरचनात्मक चिंताएँ
हालाँकि समिति का गठन एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करती है:
- शिक्षा-उद्योग असंगति: भारत की औपचारिक शैक्षणिक पाठ्यक्रम प्रणाली ऐतिहासिक रूप से बाजार की वास्तविकताओं से अलग रही है।
- विश्वविद्यालय की डिग्री और उद्योग की आधुनिक आवश्यकताओं (प्रायोगिक ज्ञान) के बीच के अंतर को पाटना उच्च शिक्षा विभाग के लिए एक सतत् चुनौती बना हुआ है।
- प्रौद्योगिकीजनित विस्थापन का खतरा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता को तेजी से अपनाना एक दोहरी चुनौती प्रस्तुत करता है।
- जहाँ यह उन्नत तकनीकी रोजगार के नए अवसर उत्पन्न करता है, वहीं दूसरी ओर यह पारंपरिक और शुरुआती स्तर (एंट्री-लेवल) के सेवा क्षेत्रों, जैसे- बैक-ऑफिस संचालन, डेटा एंट्री और ग्राहक सहायता (कस्टमर सपोर्ट) से जुड़े रोजगार के लिए खतरा भी उत्पन्न करता है।
- संघीय क्रियान्वयन की चुनौतियाँ: क्योंकि राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान एक परामर्शदात्री निकाय है, इसलिए इसमें प्रवर्तन शक्तियों का अभाव है।
- किसी भी केंद्रीकृत कौशल ढाँचे को लागू करने के लिए विभिन्न राज्यों के बीच जमीनी स्तर पर पूर्ण समन्वय आवश्यक है।
- महाराष्ट्र जैसे अत्यधिक औद्योगीकृत राज्य और बिहार जैसे कृषि-प्रधान राज्य के बीच औद्योगिक क्षमता में अंतर यह दर्शाता है कि एक समान, एकीकृत कौशल नीति सभी स्थानों पर प्रभावी नहीं हो सकती।
आगे की राह
वास्तविक आर्थिक मूल्य उत्पन्न करने और केवल प्रशासनिक बैठकों से आगे बढ़ने के लिए, EEE स्थायी समिति को निम्नलिखित रणनीतियों को प्राथमिकता देनी चाहिए:
- गतिशील पाठ्यक्रम अपनाना: NASSCOM जैसे उद्योग निकायों और शैक्षिक बोर्डों के बीच निरंतर फीडबैक तंत्र स्थापित करना चाहिए ताकि कौशल विकास मार्गों को गतिशील रूप से अद्यतन किया जा सके और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में हो रहे तीव्र परिवर्तनों के साथ तालमेल बना रहे।
- अप्रेंटिसशिप तंत्र को मजबूत करना: उच्च शिक्षा ढाँचे के भीतर अनिवार्य, स्थानीय स्तर के अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों को शामिल करना चाहिए, ताकि व्यावहारिक और अनुभव आधारित प्रशिक्षण सुनिश्चित हो सके।
- राज्य-विशिष्ट कौशल का विकेंद्रीकरण: राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान के मंच का उपयोग करते हुए राज्यों को अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार उप-नीतियाँ बनाने का अधिकार देना चाहिए—जैसे बिहार में कृषि-प्रसंस्करण सेवाओं को प्राथमिकता देना और महाराष्ट्र में उन्नत डिजिटल सेवाओं का विस्तार करना।
- सेवा क्षेत्र उद्यमिता को प्रोत्साहन: युवाओं को केवल नौकरी खोजने वालों से हटाकर नौकरी सृजनकर्ता बनाने के लिए लक्षित ऋण सुविधाएँ, वित्तीय सहायता और सरल नियामक प्रक्रियाएँ प्रदान करनी चाहिए, जिससे वे सेवा-आधारित स्टार्ट-अप स्थापित कर सकें।
निष्कर्ष
‘शिक्षा से रोजगार और उद्यम’ (EEE) समिति भारत के कौशल-आधारित और रोजगार-उन्मुख विकास मॉडल की ओर परिवर्तन को दर्शाती है। शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता को भविष्य की आर्थिक आवश्यकताओं के साथ जोड़कर यह समिति भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को एक सतत् आर्थिक इंजन में बदलने में सहायता कर सकती है, जिससे विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।