राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT)

5 May 2026

संदर्भ

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने वेदांता (Vedanta) की याचिका को खारिज करते हुए अडानी ग्रुप की होल्डिंग कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स के विरुद्ध चुनौती को अस्वीकार कर दिया, और ‘ऋणदाताओं की समिति’ (Committee of Creditors – CoC) के व्यावसायिक निर्णय को दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के ढाँचे के अंतर्गत बरकरार रखा।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 के बारे में

  • IBC को वर्ष 2016 में अधिनियमित किया गया था, ताकि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) और परिसमापन के माध्यम से ऋण समाधान के लिए एक सुदृढ़ ढाँचा प्रदान किया जा सके।
  • इसका उद्देश्य संपत्तियों के मूल्य को अधिक करना तथा ऋणदाताओं के बीच न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है।
  • IBC कंपनियों के लिए समयबद्ध समाधान प्रक्रिया प्रदान करता है, जिससे भारत में फर्म के बाहर निकलने की समस्या का समाधान किया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि के प्रमुख बिंदु

  • दिवाला समाधान प्रक्रिया: जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अंतर्गत समाधान प्रक्रिया का सामना किया।
    • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) ने वर्ष 2026 (मार्च) में अडानी की समाधान योजना को स्वीकृति प्रदान की।
  • प्रतिस्पर्द्धी बोलियाँ: वेदांता ने कुल मूल्य के आधार पर अधिक बोली प्रस्तुत की, किंतु अडानी की बोली में अधिक अग्रिम भुगतान तथा कम समय-सीमा थी।
    • ऋणदाताओं ने अधिक विलंबित मूल्य की अपेक्षा निश्चितता एवं शीघ्र वसूली को प्राथमिकता दी।
  • ऋणदाताओं की समिति (CoC) की भूमिका: CoC, जिसमें राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लिमिटेड का लगभग 86% मतदान हिस्सा था, ने अडानी की योजना को अनुमोदित किया।
    • यह इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि CoC की व्यावसायिक बुद्धिमत्ता सर्वोपरि होती है तथा सामान्यतः न्यायिक समीक्षा से परे रहती है।
  • NCLAT का निर्णय: अधिकरण ने समाधान प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं पाई।
    • यह कहा कि केवल उच्च बोली होने मात्र से CoC के निर्णय को अमान्य नहीं किया जा सकता है।
    • साथ ही, आर्थिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमितता पर बल दिया गया।

PW OnlyIAS विशेष

ऋणदाताओं की समिति’ (Committee of Creditors – CoC) के बारे में

  • ऋणदाताओं की समिति (CoC) दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अंतर्गत सर्वोच्च निर्णय-निर्माण निकाय है।
    • यह कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) की निगरानी करती है तथा यह निर्धारित करती है कि किसी तनावग्रस्त कंपनी की पुनर्स्थापना (Resolution) की जाए या तरलता (liquidation) प्रदान करना।
  • संरचना
    • यह अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) द्वारा दावों के सत्यापन के पश्चात् गठित की जाती है।
    • इसमें केवल वित्तीय ऋणदाता (जैसे-बैंक एवं वित्तीय संस्थान) शामिल होते हैं।
    • परिचालन ऋणदाताओं को मतदान का अधिकार नहीं होता, किंतु यदि उनका बकाया एक निर्धारित सीमा से अधिक हो, तो वे बैठकों में भाग ले सकते हैं।
  • भूमिका एवं कार्य
    • यह समाधान पेशेवर (RP) के माध्यम से कॉरपोरेट देनदार पर नियंत्रण स्थापित करती है।
    • यह बोलीदाताओं द्वारा प्रस्तुत समाधान योजनाओं का मूल्यांकन करती है।
    • यह कंपनी की पुनर्स्थापना या तरलता बनाए रखने के बीच निर्णय लेती है।
    • यह संपत्तियों के मूल्य में वृद्धि तथा सभी हितधारकों के हितों में संतुलन सुनिश्चित करती है।
  • व्यावसायिक बुद्धिमत्ता
    • CoC अपनी व्यावसायिक बुद्धिमत्ता का प्रयोग करती है, अर्थात् इसके वित्तीय निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी होते हैं।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है कि न्यायालयों का हस्तक्षेप केवल प्रक्रियात्मक या विधिक आधारों तक सीमित होना चाहिए।
  • प्रमुख शक्तियाँ
    • समाधान पेशेवर (RP) की नियुक्ति या प्रतिस्थापन करना।
    • दिवालिया समाधान की लागत को अनुमोदित करना।
    • समाधान योजनाओं को स्वीकृत या अस्वीकृत करना (सामान्यतः 66% या अधिक मतदान की आवश्यकता)।
    • पुनर्गठन, परिसंपत्ति विक्रय या परिसमापन से संबंधित रणनीतिक निर्णय लेना।

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) के बारे में

  • NCLAT एक अर्द्ध-न्यायिक अपीलीय निकाय है, जिसकी स्थापना कंपनी अधिनियम, 2013 (धारा 410) के अंतर्गत की गई है।
    • यह वर्ष 2016 (1 जून) से कार्यरत है।
  • संरचना एवं गठन: इसका नेतृत्व एक अध्यक्ष (Chairperson) द्वारा किया जाता है, जिसके साथ न्यायिक एवं तकनीकी सदस्य होते हैं।
    • सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा विधि, वित्त एवं प्रशासन के क्षेत्र में विशेषज्ञता के आधार पर की जाती है।
  • मुख्यालय: नई दिल्ली
  • कार्य: यह कॉरपोरेट दिवाला समाधान तथा प्रतिस्पर्द्धा कानून से संबंधित मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • अधिकार-क्षेत्र: यह निम्नलिखित के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करता है—
    • राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT)
    • दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI)
    • भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (CCI)
    • राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन प्राधिकरण (NFRA)।
  • शक्तियाँ एवं प्रक्रिया
    • इसे दीवानी न्यायालय के समान शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे-समन जारी करना, साक्ष्य लेना तथा दस्तावेजों की माँग करना।
    • इसके आदेश दीवानी डिक्री के समान प्रवर्तनीय होते हैं।
    • इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील भारत के सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है।
    • त्वरित न्याय सुनिश्चित करने हेतु मामलों का निपटान 6 माह के भीतर करने का प्रावधान है।

राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लिमिटेड (NARCL) के बारे में

  • राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी लिमिटेड (NARCL) भारत का पहला बैड बैंक” है, जिसे गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) की समस्या से निपटने हेतु परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (ARC) के रूप में स्थापित किया गया है।
  • संरचना: इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की लगभग 51% हिस्सेदारी है, जबकि शेष हिस्सेदारी निजी बैंकों के पास है।
    • यह ‘इंडिया डेब्ट रिजॉल्यूशन कंपनी लिमिटेड’ (IDRCL) के साथ मिलकर कार्य करता है,
    • NARCL तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का अधिग्रहण करता है,
    • IDRCL उनका प्रबंधन एवं समाधान करता है।
  • कार्य-प्रणाली: यह बैंकों से ₹500 करोड़ से अधिक की तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का अधिग्रहण करता है।
  • भुगतान संरचना
    • 15% अग्रिम नकद भुगतान
    • 85% प्रतिभूति रसीदों (Security Receipts – SRs) के रूप में
    • यह ₹30,600 करोड़ की सरकारी गारंटी द्वारा समर्थित है, जिससे न्यूनतम वसूली सुनिश्चित होती है।
  • भूमिका एवं महत्त्व
    • यह बैंकों की बैलेंस शीट को स्वच्छ करता है, जिससे खराब ऋणों का बोझ कम होता है।
    • यह तेज समाधान प्रक्रिया तथा बेहतर मूल्य प्राप्ति को संभव बनाता है।
    • यह ऋण प्रवाह एवं बैंकिंग दक्षता में सुधार करता है।
    • यह तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के केंद्रीकृत समेकनकर्ता के रूप में कार्य करता है।

निष्कर्ष

यह मामला दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के अंतर्गत ऋणदाताओं की समिति (CoC) की व्यावसायिक बुद्धिमत्ता की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की सीमित भूमिका तथा भारत के दिवाला तंत्र में NARCL जैसे संस्थानों के बढ़ते महत्त्व को रेखांकित करता है।

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