संदर्भ
नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट, 2024 भारत के जनसंख्या विस्फोट के चरण से जनसांख्यिकीय स्थिरीकरण की ओर संक्रमण को दर्शाती है, जिसकी विशेषता घटती प्रजनन दर, गिरती जन्म दर और बढ़ती जीवन प्रत्याशा है।
संबंधित तथ्य
- भारत जनसंख्या ‘विस्फोट’ की स्थिति से आगे बढ़ते हुए वृद्धशील जनसंख्या और कार्यबल विस्तार में कमी की ओर अग्रसर है।

जनसांख्यिकी के बारे में
- परिभाषा: जनसांख्यिकी मानव जनसंख्या का सांख्यिकीय और गणितीय अध्ययन है, जो मुख्यतः यह समझने पर केंद्रित होता है कि विशेष रूप से जन्म, मृत्यु और प्रवासन जैसी महत्त्वपूर्ण घटनाओं के कारण आकार, संरचना और स्थानिक वितरण समय के साथ कैसे बदलते हैं।
- जनसांख्यिकीय संक्रमण मॉडल (DTM): यह एक वैचारिक ढाँचा है, जो बताता है कि आर्थिक विकास के दौरान समाज उच्च जन्म और मृत्यु दर से निम्न जन्म और मृत्यु दर की ओर कैसे संक्रमण करता है।
- भारत चरण 3 के अंतिम भाग में है और चरण 4 की ओर बढ़ रहा है, यद्यपि विभिन्न राज्य इस संक्रमण के अलग-अलग चरणों में स्थित हैं।
- प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन: यह वह कुल प्रजनन दर (TFR) है, जिस पर कोई जनसंख्या बिना प्रवासन के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक स्वयं को प्रतिस्थापित करती है, जो सामान्यतः लगभग 2.1 बच्चे प्रति महिला मानी जाती है।
- जनसंख्या संवेग: यह एक जनसांख्यिकीय घटना है, जिसमें उप-प्रतिस्थापन प्रजनन दर प्राप्त करने के बावजूद जनसंख्या बढ़ती रहती है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग प्रजनन आयु समूह में प्रवेश कर रहे होते हैं।
भारत में प्रमुख जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियाँ (SRS 2024 के आँकड़े)
- प्रतिस्थापन स्तर से नीचे प्रजनन: भारत की राष्ट्रीय कुल प्रजनन दर (TFR) 1.9 पर स्थिर रही, जो लगातार पाँचवें वर्ष प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे बनी रही।
- घटती जन्म दर: राष्ट्रीय सामान्य जन्म दर (CBR) में दीर्घकालिक गिरावट जारी रही, जो वर्ष 2014 में 21 प्रति 1,000 जनसंख्या से घटकर वर्ष 2024 में 18.3 हो गई।
- स्थिर मृत्यु दर आधार: राष्ट्रीय सामान्य मृत्यु दर (CDR) 6.4 प्रति 1,000 जनसंख्या रही, जो महामारी-पूर्व स्तर से थोड़ा अधिक बनी हुई है।

- बढ़ती आयु दीर्घता: जन्म के समय जीवन प्रत्याशा लगभग 72 वर्ष तक पहुँच गई है, जो जीवित रहने के परिणामों में सुधार को दर्शाती है, यद्यपि ग्रामीण-शहरी और लैंगिक अंतर अभी भी बने हुए हैं।
- बाल जीवित रहने में सुधार: राष्ट्रीय शिशु मृत्यु दर (IMR) घटकर प्रति 1,000 जीवित जन्म पर 24 मृत्यु हो गई, जबकि पाँच वर्ष से कम आयु मृत्यु दर (U5MR) घटकर 28 हो गई।
- जन्म के समय लिंग अनुपात (SRB): रिपोर्ट में राष्ट्रीय SRB में मामूली सुधार दर्ज किया गया, जो तीन-वर्षीय औसत के आधार पर प्रति 1,000 लड़कों पर 918 लड़कियाँ तक पहुँच गया।
नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) सांख्यिकीय रिपोर्ट के बारे में
- नोडल एजेंसी: यह भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त का कार्यालय द्वारा संचालित किया जाता है, जो गृह मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
- उद्देश्य: यह भारत की सबसे बड़ी जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण प्रणाली है, जिसका उपयोग निम्नलिखित का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है:
- जन्म दर (BR)
- मृत्यु दर (DR)
- शिशु मृत्यु दर (IMR)
- कुल प्रजनन दर (TFR)।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इसे वर्ष 1964–65 में पायलट आधार पर प्रारंभ किया गया और वर्ष 1969–70 में पूर्ण रूप से क्रियाशील बनाया गया।
- कार्यप्रणाली: यह एक द्वि-अभिलेख प्रणाली पर आधारित है, जिसमें शामिल हैं:
- स्थानीय गणनाकर्ता द्वारा निरंतर गणना
- पर्यवेक्षकों द्वारा अर्द्ध-वार्षिक पुनरावलोकन सर्वेक्षण
- अभिलेखों का मिलान और सत्यापन।
- महत्त्व: यह दो जनगणना अवधियों के बीच विश्वसनीय वार्षिक जनसांख्यिकीय अनुमान प्रदान करता है।
- यह लोक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और जनसंख्या स्थिरीकरण से संबंधित नीति निर्माण में सहायता करता है।
- नीतिगत प्रासंगिकता: यह भारत की प्रगति की निगरानी करने में सहायक है:
- शिशु मृत्यु दर में कमी
- प्रजनन दर में गिरावट
- सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति।
- हालिया प्रवृत्ति: नवीनतम रिपोर्ट भारत के चल रहे जनसांख्यिकीय संक्रमण को दर्शाती है, जिसकी विशेषता घटती प्रजनन दर और सुधरते मृत्यु संकेतक हैं।
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जनसांख्यिकीय संक्रमण को प्रेरित करने वाले कारक
- महिला साक्षरता और शिक्षा: महिला साक्षरता और माध्यमिक शिक्षा के विस्तार ने प्रजनन दर में कमी लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, क्योंकि इससे विवाह में विलंब, प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में वृद्धि और छोटे परिवार के मानदंडों को प्रोत्साहन मिला है।
- SRS 2024 के आँकड़े इस संबंध को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं—अशिक्षित माताओं में कुल प्रजनन दर (TFR) 3.2 है, जबकि शिक्षित माताओं में यह 1.8 है, जो प्रतिस्थापन स्तर से कम है।
- आधुनिक परिवार नियोजन और सरकारी हस्तक्षेप: परिवार नियोजन सेवाओं, गर्भनिरोधकों और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच ने दंपतियों को परिवार के आकार के संबंध में सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाया है।
- मिशन परिवार विकास (MPV), अंतरा कार्यक्रम (इंजेक्टेबल गर्भनिरोधक) और छाया (गैर-हार्मोनल गर्भनिरोधक गोलियाँ) जैसी सरकारी पहल ने विशेष रूप से उच्च प्रजनन वाले जिलों में परिवार नियोजन की पहुँच को सुदृढ़ किया है।
- फैमिली प्लानिंग लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम (FP-LMIS) ने स्वास्थ्य केंद्रों पर आपूर्ति की कमी को कम करके गर्भनिरोधकों की उपलब्धता में सुधार किया है।
- शहरीकरण और बढ़ती आर्थिक लागत: तीव्र शहरीकरण और शहरों की ओर प्रवास ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत के कारण छोटे परिवार की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।
- संयुक्त परिवार प्रणाली से एकल परिवार प्रणाली की ओर बदलाव ने भी बड़े परिवारों की आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकता को कम किया है।
- घटती शिशु मृत्यु दर: मातृ स्वास्थ्य, पोषण और बाल टीकाकरण कार्यक्रमों जैसे मिशन इंद्रधनुष में सतत् सुधार से बाल जीवित रहने की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- जैसे-जैसे बाल जीविता संबंधी विश्वास में वृद्धि हुई है, वैसे-वैसे शिशु मृत्यु के विरुद्ध सुरक्षा के रूप में बड़े परिवार रखने की पारंपरिक प्रवृत्ति में धीरे-धीरे कमी आई है।
भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का महत्त्व
- वर्तमान युवा जनसंख्या का लाभ: भारत विश्व की सबसे युवा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है, जहाँ मध्य आयु 29.2 वर्ष है, जबकि चीन (40.2 वर्ष) और पश्चिमी समाजों में यह अधिक है।
- यह युवा समूह 15–29 आयु वर्ग में 370–380 मिलियन लोगों को सम्मिलित करता है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 27% है।
- समय-सीमित जनसांख्यिकीय लाभांश: अपनी 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु में होने के कारण भारत के पास एक महत्त्वपूर्ण कार्यशील आयु लाभांश है।
- हालाँकि, यह लाभांश स्थायी नहीं है और इसे शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन में लक्षित निवेश के माध्यम से मानव पूँजी में परिवर्तित करना आवश्यक है।
- समय-सीमा और तात्कालिकता का निर्धारण: जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार, भारत की जनसंख्या वर्ष 2050 से 2060 के बीच चरम पर पहुँच सकती है, जिसके बाद इसमें धीरे-धीरे गिरावट आएगी।
- यह लाभांश वर्ष 2030 से 2041 के बीच चरम पर पहुँचेगा और वर्ष 2055 तक समाप्त हो सकता है, जिससे दीर्घकालिक नीतिगत योजना की तत्काल आवश्यकता उत्पन्न होती है।
- उपभोग और बाजार का लाभ: बड़ी युवा जनसंख्या घरेलू माँग, बचत और उद्यमिता को बढ़ा सकती है, जिससे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि को समर्थन मिलता है।
समाधान योग्य प्रमुख चुनौतियाँ
- वृद्धावस्था संक्रमण और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव: भारत की जनसांख्यिकीय चुनौती अब जनसंख्या नियंत्रण से हटकर वृद्धावस्था, क्षेत्रीय असंतुलन और भविष्य के कार्यबल की सीमाओं के प्रबंधन की ओर स्थानांतरित हो रही है।
- निरंतर निम्न प्रजनन दर के कारण भविष्य में सक्रिय श्रमबल में कमी आएगी, जबकि बढ़ता वरिष्ठ आश्रित अनुपात पेंशन प्रणालियों और सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर भारी राजकोषीय दबाव डालेगा।

- विकृत लिंगानुपात और विवाह संबंधी दबाव: 918 का SRB निरंतर पुत्र संबंधी वरीयता को दर्शाता है और दीर्घकालिक सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
- इनमें विवाह संकट (लड़कियों की कमी), मानव तस्करी का जोखिम और गंभीर रूप से प्रभावित राज्यों में लैंगिक असुरक्षा में वृद्धि शामिल हैं।
- युवा बेरोजगारी और कौशल असंगति: युवा जनसंख्या वृद्धि एक संरचनात्मक चुनौती प्रस्तुत करती है—शिक्षित युवाओं में उच्च बेरोजगारी और उद्योग की आवश्यकताओं तथा प्रशिक्षण परिणामों के मध्य बढ़ता अंतर।
- यदि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन नहीं हुआ, तो यह लाभांश सामाजिक-आर्थिक तनाव का कारण बन सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भारत में शिक्षित युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी को रेखांकित किया है, जो कौशल असंगति को दर्शाता है।
- स्नातक बेरोजगारी दर 29.1% रही, जबकि अशिक्षितों में यह 3.4% थी और माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में यह 18.4% रही।
- शिक्षित बेरोजगार युवाओं का हिस्सा वर्ष 2000 में 54.2% से बढ़कर वर्ष 2022 में 65.7% हो गया, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 76.7% रही।
- रिपोर्ट ने गिग और अनौपचारिक रोजगार पर बढ़ती निर्भरता को भी रेखांकित किया, जो गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी को दर्शाता है।
- उत्तर-दक्षिण विभाजन और संघीय प्रभाव
- क्षेत्रीय असमानता: दक्षिणी राज्यों ने दशकों पहले प्रतिस्थापन प्रजनन स्तर प्राप्त कर लिया और अब वृद्धशील समाजों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि बिहार (TFR 2.9) और उत्तर प्रदेश (2.6) जैसे उत्तरी राज्य अभी भी जनसंख्या वृद्धि को बढ़ा रहे हैं।
- संघीय प्रभाव: असमान प्रजनन दर में गिरावट निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण, वित्त आयोग द्वारा संसाधन हस्तांतरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर बहस को तीव्र कर सकती है।
- उत्तर-दक्षिण प्रवासन दबाव और राजनीतिक अर्थव्यवस्था: इस जनसांख्यिकीय विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर आंतरिक प्रवासन हो रहा है, जिसमें युवा श्रमिक उत्तरी राज्यों से दक्षिणी आर्थिक केंद्रों की ओर जा रहे हैं।
- जहाँ यह उत्तर के लिए वित्तीय प्रेषण उत्पन्न करता है, वहीं दक्षिण में शहरी अवसंरचना पर दबाव और सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है।
- दीर्घकालिक रोग और स्वास्थ्य असमानताएँ: वृद्धावस्था संक्रमण के साथ गैर-संचारी रोगों (NCDs) जैसे मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर का बोझ बढ़ेगा, जिसके लिए मजबूत निवारक और वृद्ध देखभाल प्रणाली आवश्यक है।
- साथ ही, ग्रामीण-शहरी विभाजन स्पष्ट है; SRS के अनुसार 48.9% ग्रामीण मृत्यु बिना औपचारिक चिकित्सा देखभाल के होती हैं, जो स्वास्थ्य प्रणाली में गंभीर कमी को दर्शाता है।
- डेटा अंतराल और विलंबित जनगणना: SRS वार्षिक संकेतक प्रदान करता है, लेकिन अद्यतन जनगणना की अनुपस्थिति से प्रवास, वृद्धावस्था, शहरीकरण, कल्याण वितरण और निर्वाचन क्षेत्र स्तर की योजना में बाधा आती है।

भारत द्वारा की गई पहल
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) एवं आयुष्मान भारत: आयुष्मान आरोग्य मंदिर (HWCs) के संस्थागत नेटवर्क के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण किया गया है, जिससे मातृ-नवजात निगरानी से लेकर गैर-संचारी रोगों (NCDs) की सार्वभौमिक पहचान और प्रारंभिक वृद्ध देखभाल तक सेवाओं का विस्तार हुआ है।
- जननी सुरक्षा योजना (JSY) एवं प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY): सशर्त नकद हस्तांतरण के माध्यम से संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित किया जाता है और पोषण समर्थन हेतु आंशिक वेतन क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जा रही है।
- अटल पेंशन योजना (APY) एवं पीएम श्रम योगी मान-धन (PM-SYM): स्वैच्छिक, सह-अंशदायी पेंशन प्रणाली के माध्यम से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए वृद्धावस्था आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है।
- स्किल इंडिया मिशन (PMKVY 4.0) एवं NAPS: युवा जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रखते हुए व्यावसायिक प्रशिक्षण को उद्योग 4.0 से जोड़ा जा रहा है तथा औद्योगिक अप्रेंटिसशिप का विस्तार कर उद्योग-शिक्षा कौशल अंतर को कम किया जा रहा है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ: 14 रणनीतिक क्षेत्रों में श्रम-प्रधान विनिर्माण को बढ़ावा देकर कार्यशील आयु जनसंख्या को रोजगार देने हेतु आर्थिक हस्तक्षेप किया जा रहा है।
- वृद्ध कल्याण तंत्र: भारत का वृद्ध कल्याण ढाँचा स्वास्थ्य, आर्थिक भागीदारी और तकनीकी समाधान को समाहित करता है।
- राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम (NPHCE) के माध्यम से प्राथमिक, जिला और तृतीयक स्तर पर वृद्ध देखभाल सेवाओं को सुदृढ़ किया गया है।
- सीनियर एबल सिटिजन्स फॉर री-एम्प्लॉयमेंट इन डिग्निटी (SACRED) पोर्टल वरिष्ठ नागरिकों को रोजगार अवसर प्रदान कर उन्हें आर्थिक रूप से सक्रिय बनाए रखने में सहायता करता है।
- सीनियर केयर एजिंग ग्रोथ इंजन (SAGE) पहल के माध्यम से तकनीक आधारित ‘सिल्वर इकोनॉमी’ को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें स्टार्ट-अप, सहायक प्रौद्योगिकी और वृद्ध-अनुकूल सेवाएँ शामिल हैं।
- प्रवासी संचालनीयता ढाँचे (ONORC एवं e-Shram): डिजिटल शासन के माध्यम से असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया गया है तथा खाद्य सुरक्षा की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित की गई है, जिससे आंतरिक प्रवासियों को सुरक्षा मिलती है।
- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP): पक्षपाती लैंगिक चयन के विरुद्ध व्यवहार परिवर्तन संचार और प्रवर्तन तंत्र के माध्यम से बालिका संरक्षण तथा शिक्षा में लैंगिक अंतराल को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
- मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम: 26 सप्ताह के सवेतन अवकाश और क्रेच सुविधाओं को अनिवार्य कर महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) को बढ़ाने हेतु संरचनात्मक कार्यस्थल सुधार किए गए हैं।
वैश्विक कार्यवाही एवं पहल
- संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य 3 (SDG 3): सभी आयु वर्गों के लिए स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करने और कल्याण को बढ़ावा देने का लक्ष्य, जिसमें मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी, रोगों के विरुद्ध सुरक्षा और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) प्राप्त करना शामिल है।
- स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए संयुक्त राष्ट्र दशक (2021–2030): विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व में एक वैश्विक पहल, जिसका उद्देश्य आयु-अनुकूल वातावरण, एकीकृत देखभाल और दीर्घकालिक समर्थन प्रणालियों के माध्यम से वृद्ध व्यक्तियों के जीवन में सुधार करना है।
- मैड्रिड अंतरराष्ट्रीय वृद्धावस्था कार्य योजना (2002): जनसंख्या के वृद्धावस्था संबंधी संक्रमण से निपटने के लिए एक वैश्विक नीति ढाँचा प्रदान करती है, जिसमें सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, आय सुरक्षा और सक्रिय वृद्धावस्था पर बल दिया गया है।
- WHO की वैश्विक रणनीति एवं कार्य योजना (वृद्धावस्था और स्वास्थ्य): स्वस्थ वृद्धावस्था को बढ़ावा देने, स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करने और आयु-संवेदनशील सार्वजनिक नीतियाँ विकसित करने पर केंद्रित है।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC): विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रोत्साहित, ताकि बिना आर्थिक कठिनाई के सभी को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित हो सके।
- सतत् विकास हेतु 2030 एजेंडा: वृद्धावस्था, स्वास्थ्य समानता, लैंगिक समावेशन और सामाजिक सुरक्षा जैसे जनसांख्यिकीय मुद्दों को सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) के व्यापक ढाँचे में एकीकृत करता है।
- UNFPA की पहलें: संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष देशों को जनसांख्यिकीय योजना, प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ, वृद्धावस्था नीतियाँ और जनसंख्या डेटा प्रणाली के विकास में समर्थन प्रदान करता है।
आगे की राह
- कौशल असंगति को दूर करना और बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करना: भारत को तात्कालिक रूप से अपने व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का आधुनिकीकरण करना होगा, ताकि वे बदलती बाजार आवश्यकताओं के अनुरूप हों तथा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी पहलों के माध्यम से श्रम-प्रधान विनिर्माण केंद्रों का विस्तार करना होगा, जिससे युवा जनसंख्या को उत्पादक रूप से समाहित किया जा सके।
- PLFS 2023-24 के अनुसार, 15–59 वर्ष आयु वर्ग के केवल 4.1% व्यक्तियों ने औपचारिक व्यावसायिक/तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जबकि 30.6% ने अनौपचारिक स्रोतों से प्रशिक्षण प्राप्त किया।
- महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) को बढ़ावा देना: भविष्य के कार्यबल संकट के प्रभाव को कम करने हेतु संरचनात्मक सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी, जिनमें सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, सुलभ बाल देखभाल नेटवर्क और कार्य संबंधी ढाँचे शामिल हैं।
- उदाहरण: 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग में महिला LFPR में जून 2025 से निरंतर वृद्धि दर्ज की गई और दिसंबर 2025 में 35.3% तक पहुँच गई, जो वर्ष का उच्चतम स्तर है, फिर भी और सुधार की आवश्यकता है।
- ‘सिल्वर इकोनॉमी’ का विकास: राज्य को असंगठित श्रमिकों के लिए सह-अंशदायी पेंशन कोष विकसित करना होगा तथा वृद्धजन स्वास्थ्य विशेषज्ञता, विशेष चिकित्सा इकाइयों और सुलभ सार्वजनिक अवसंरचना में दीर्घकालिक निवेश बढ़ाना होगा।
- संघीय वास्तविकताओं का समन्वय और प्रवासन समर्थन: गंतव्य राज्यों को समावेशी शहरी नीतियाँ लागू करनी चाहिए, ताकि आने वाले प्रवासी श्रमिकों को समर्थन मिल सके, जबकि संघीय संस्थाओं को ऐसे राजकोषीय साझा तंत्र विकसित करने चाहिए, जो जनसांख्यिकीय प्रबंधन को प्रोत्साहित करें और उच्च-विकास क्षेत्रों को दंडित न करें।
- निवारक और वृद्धजन स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना: भारत को गैर-संचारी रोगों (NCDs) की स्क्रीनिंग, पैलियेटिव केयर, घर-आधारित देखभाल, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन और वृद्धजन सेवाओं का विस्तार प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर करना चाहिए।
- जनसंख्या डेटा प्रणाली में सुधार: भारत को लंबित जनगणना आयोजित करनी चाहिए और नागरिक पंजीकरण प्रणालियों को सुदृढ़ करना चाहिए, ताकि प्रवास, वृद्धावस्था, कल्याण वितरण और शहरीकरण के लिए सूक्ष्म स्तर पर योजना निर्माण संभव हो सके।
निष्कर्ष
SRS 2024 रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत की जनसांख्यिकीय चुनौती अब केवल जनसंख्या वृद्धि नियंत्रण से हटकर स्थिरीकरण, वृद्धावस्था और क्षेत्रीय असमानता के प्रबंधन की ओर स्थानांतरित हो गई है। भारत को अपनी शेष जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, महिला श्रम भागीदारी और सामाजिक सुरक्षा में निवेश करना चाहिए, ताकि जनसांख्यिकीय परिवर्तन भविष्य की कमी के स्थान पर दीर्घकालिक राष्ट्रीय शक्ति का स्रोत बन सके।