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स्वप्रेरित न्यायिक संज्ञान एवं न्यायिक अतिक्रमण के बदलते आयाम

1 Jun 2026

संदर्भ

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्तिगत आपराधिक मामलों में स्वप्रेरित संज्ञान (अर्थात् स्वयं पहल करके कार्रवाई करना) के बढ़ते उपयोग ने एक गहन संवैधानिक बहस को जन्म दिया है।

हालिया प्रमुख निष्कर्ष एवं वैचारिक चिंताएँ

  • स्वप्रेरित क्षेत्राधिकार में बढ़ती प्रवृत्ति: आँकड़े दर्शाते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वयं पहल कर लिए गए मामलों की संख्या में तीव्र और कई गुना वृद्धि हुई है।
    • वर्ष 2020 से वर्ष 2024 के मध्य न्यायालय ने 35 स्वप्रेरित मामलों का पंजीकरण किया, जो इससे पूर्व के पूरे 15 वर्षों में दर्ज 31 मामलों की कुल संख्या से अधिक है।
  • मीडिया ट्रिगर’ क्रम: एक दोहराव वाला क्रम उभरकर सामने आया है, जिसमें प्रमुख समाचार चैनलों पर लगातार चर्चा के तुरंत बाद सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप करता है।
    • विधि विशेषज्ञों का तर्क है कि इससे मामलों के चयन का आधार पूरी तरह कानूनी होने के बजाय समयगत और मीडिया-प्रेरित प्रतीत होता है।
  • गैलेंटर–राम दुविधा (Galanter-Ram Dilemma): शैक्षणिक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि उच्च न्यायपालिका व्यापक संस्थागत सुधारों की अपेक्षा व्यक्तिगत मामलों में विशिष्ट और प्रतीकात्मक हस्तक्षेप को अधिक प्राथमिकता देती है।
    • यह प्रवृत्ति अनजाने में अधीनस्थ न्यायालयों (ट्रायल कोर्ट्स) की क्षमता के प्रति एक ऐतिहासिक अविश्वास को दर्शाती है।
  • न्याय में तेजी लाने पर सीमित प्रभाव: संस्थागत अभिलेख दर्शाते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी से अनिवार्य रूप से शीघ्र दोषसिद्धि सुनिश्चित नहीं होती है।
    • लखीमपुर खीरी और मणिपुर वीडियो प्रकरण जैसे चर्चित मामलों में मूल मुकदमों की सुनवाई अब भी लंबित है, जबकि सैकड़ों गवाहों का परीक्षण करने और अंतिम निर्णय देने जैसे जटिल एवं श्रमसाध्य कार्य अंततः स्थानीय ट्रायल न्यायालयों द्वारा ही संपन्न किए जाते हैं।

दो मार्ग: व्यक्तिगत हस्तक्षेप बनाम संरचनात्मक सुधार

इस बहस को न्यायिक दृष्टिकोणों के दो मार्गों के माध्यम से समझा जा सकता है—विशिष्ट मामलों में व्यक्तिगत हस्तक्षेप तथा आपराधिक न्याय प्रणाली का संरचनात्मक सुधार।

  • आसान मार्ग (व्यक्तिगत स्वप्रेरित संज्ञान): इसमें केवल न्यायपीठ के आंतरिक निर्णय की आवश्यकता होती है, जिसके आधार पर समाचार रिपोर्टों से प्रेरित किसी चर्चित मामले को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जा सकता है।
    • यह औपचारिक संस्थागत कानूनी साधनों [जैसे सहारा (Sahara) बनाम सेबी सिद्धांत के अंतर्गत स्थापित मीडिया स्थगन आदेश) के बजाय न्यायिक प्रभाव, नैतिक अधिकार और न्यायालय की प्रतिष्ठा पर अधिक निर्भर करता है।
  • कठोर मार्ग (संस्थागत सुधार): यह मार्ग धीमे, दीर्घकालिक और बहु-संस्थागत सहयोग की माँग करता है:-
    • उच्च न्यायालयों के साथ समन्वय: अधीनस्थ न्यायालयों के कठोर वाद-प्रबंधन तथा प्रशासनिक पर्यवेक्षण के लिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद-235 में प्रावधान किया गया है।
      • अनुच्छेद-235: भारतीय संविधान का अनुच्छेद-235 उच्च न्यायालयों को जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों पर प्रशासनिक और अनुशासनात्मक नियंत्रण प्रदान करता है। इसमें नियुक्ति-पश्चात पदस्थापन, पदोन्नति, स्थानांतरण तथा अनुशासनात्मक मामलों का नियंत्रण शामिल है, जिससे अधीनस्थ न्यायपालिका की स्वतंत्रता और दक्षता सुनिश्चित होती है।
    • अधीनस्थ न्यायालयों (ट्रायल कोर्ट) के आधारभूत ढाँचे के लिए पर्याप्त वित्तीय आवंटन सुनिश्चित करना।
    • न्यायाधीशों की नियुक्तियों तथा न्यायाधीशों के प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ समन्वय स्थापित करना।

संबंधित संवैधानिक प्रावधान एवं सिद्धांत

  • अनुच्छेद-32, 136 और 142: आपराधिक न्याय से संबंधित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सामान्यतः उसकी रिट क्षेत्राधिकार, अपीलीय क्षेत्राधिकार तथा पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने की असाधारण शक्ति पर आधारित होता है।
    •  हालाँकि, इन शक्तियों का प्रयोग उच्च न्यायालयों द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों पर किए जाने वाले संवैधानिक पर्यवेक्षण की व्यापक व्यवस्था के भीतर ही होना चाहिए।
  • अनुच्छेद-235 (अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण): यह अनुच्छेद जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों के नियंत्रण और प्रशासन की शक्ति सीधे संबंधित उच्च न्यायालयों को प्रदान करता है, न कि सर्वोच्च न्यायालय को।
    • स्थानीय आपराधिक मुकदमों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार-बार प्रत्यक्ष हस्तक्षेप, अनुच्छेद-235 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों द्वारा जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों पर किए जाने वाले सामान्य संवैधानिक पर्यवेक्षण तंत्र को कमजोर कर सकता है।
  • मीडिया ट्रायल पर पूर्ववर्ती उदाहरण (सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्प. बनाम SEBI, 2012): पाँच जजों की संवैधानिक पीठ ने यह तय किया कि अगर न्याय प्रशासन को पक्षपात का कोई वास्तविक और बड़ा खतरा’ हो, तो न्यायालयों के पास मीडिया प्रकाशनों के विरुद्ध रोक लगाने वाले आदेश जारी करने का सख्त कानूनी अधिकार है।
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