संक्षेप में समाचार

1 Jun 2026

यमुना कार्य योजना तैयार करने हेतु समिति

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है, जिसे आठ सप्ताह के भीतर एक व्यापक यमुना कार्य योजना तैयार करने का निर्देश दिया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की प्रमुख विशेषताएँ

  • समिति का गठन: इस समिति में केंद्रीय गृह सचिव तथा उन सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिव शामिल हैं, जिनसे होकर यमुना नदी प्रवाहित होती है।
  • कार्य योजना का उद्देश्य: समिति को यमुना नदी के कायाकल्प एवं प्रदूषण नियंत्रण के लिए एक समेकित रणनीति तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
  • कायाकल्प का मॉडल: न्यायालय ने नदी पुनर्स्थापन के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम के समान दीर्घकालिक और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव दिया है।
  • यमुना कार्य योजना के घटक: योजना में कार्यान्वयन रणनीति, बजटीय प्रावधान, समय-सीमा तथा संबंधित एजेंसियों की स्पष्ट रूप से निर्धारित जिम्मेदारियाँ शामिल होनी चाहिए।
  • निगरानी एवं समन्वय: सर्वोच्च न्यायालय ने जोर दिया कि समन्वय और निगरानी की जिम्मेदारी एक ही नोडल प्राधिकरण को सौंपी जानी चाहिए।
  • सुझाए गए उपाय: सिफारिशों में सीवेज शोधन संयंत्रों (STPs) की जियो-टैगिंग, जल गुणवत्ता संबंधी आँकड़ों की निगरानी तथा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों एवं बस्तियों की पहचान शामिल है।

यमुना नदी के बारे में 

  • यमुना नदी गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी तथा उत्तर भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदियों में से एक है।
  • उद्गम: यह नदी उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बंदरपूँछ शिखर के निकट स्थित यमुनोत्री हिमनद से निकलती है।
  • प्रमुख सहायक नदियाँ: यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में चंबल, बेतवा, केन, सिंध और टोंस नदियाँ शामिल हैं।
  • प्रवाह क्षेत्र: यमुना नदी उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से होकर प्रवाहित होती है।
  • पहचाने गए प्रदूषण स्रोत: अनुपचारित सीवेज, विषैले औद्योगिक अपशिष्ट, अवैध उद्योग तथा अतिक्रमण।
  • संगम स्थल (मुहाना): यह नदी प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में गंगा नदी से मिल जाती है।

खेत बचाओ अभियान 

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने 1 जून, 2026 को मध्य प्रदेश के रायसेन से “खेत बचाओ अभियान” का शुभारंभ किया।

खेत बचाओ अभियान के बारे में 

  • यह कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित एक राष्ट्रव्यापी एक माह का अभियान है, जिसका उद्देश्य सतत् कृषि और मृदा संरक्षण को बढ़ावा देना है।
  • उद्देश्य: संतुलित उर्वरक उपयोग, वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों तथा अत्यधिक रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करके मृदा स्वास्थ्य की रक्षा करना।
  • फोकस क्षेत्र: मृदा परीक्षण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण, हरी खाद (ग्रीन मैन्योरिंग) तथा जलवायु-लचीली कृषि को प्रोत्साहित करना।
  • किसान जागरूकता: किसानों को उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा नकली उर्वरक, बीज और कीटनाशकों की पहचान के बारे में शिक्षित करना।
  • क्रियान्वयन: कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) संस्थान, कृषि विश्वविद्यालयों तथा राज्य कृषि विभागों के माध्यम से इसे लागू किया जाता है।

भारत का 18वाँ रेलवे जोन

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दक्षिण तट रेलवे (SCoR) जोन 1 जून, 2026 को रेल मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना के बाद पूर्ण रूप से कार्यात्मक हो गया।

  • इसका मुख्यालय विशाखापत्तनम में स्थित है और यह भारत का 18वाँ रेलवे जोन है।

भारत का 18वाँ रेलवे जोन के बारे में 

  • प्रशासनिक व्यवस्था: यह जोन वर्तमान में सिरिपुरम् स्थित द डेक’ भवन से अस्थायी रूप से संचालित हो रहा है, जबकि इसका स्थायी मुख्यालय मुदसारलवा में निर्माणाधीन है (जिसकी आधारशिला जनवरी 2025 में प्रधानमंत्री द्वारा रखी गई थी)।
  • कानूनी आधार: इस जोन का गठन आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत एक वैधानिक प्रतिबद्धता को पूरा करता है, जिसके अनुसार विभाजित राज्य आंध्र प्रदेश के लिए एक अलग रेलवे जोन का प्रावधान किया गया था।
  • विभागीय संरचना: दक्षिण तट रेलवे जोन को चार रेलवे मंडलों में विभाजित किया गया है:
    • विशाखापत्तनम
    • विजयवाड़ा
    • गुंतकल
    • गुंटूर।
  • भौगोलिक विस्तार: यह जोन मुख्यतः आंध्र प्रदेश में विस्तृत रेल नेटवर्क का संचालन करता है, साथ ही इसका अधिकार क्षेत्र कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों तक भी फैला हुआ है।
  • संचालनात्मक फोकस: यह जोन लगभग 17,000 कर्मचारियों के प्रबंधन के लिए डिजाइन किया गया है।
    • तात्कालिक प्राथमिकता: क्षमता विस्तार और ट्रैक विकास को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसमें विशाखापत्तनम कॉरिडोर के आस-पास तृतीय एवं चतुर्थ रेल लाइन से संबंधित महत्त्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाएँ शामिल हैं, ताकि भारी माल ढुलाई और यात्री यातायात को प्रबंधित किया जा सके।

भारत में रेलवे जोन के बारे में

  • प्रशासनिक व्यवस्था: भारतीय रेलवे नेटवर्क को प्रशासनिक इकाइयों जिन्हें जोन कहा जाता है, में विभाजित किया गया है, जिन्हें आगे डिवीजनों में उप-विभाजित किया जाता है।
    • प्रत्येक जोन का नेतृत्व एक महाप्रबंधक करता है, जो सीधे रेलवे बोर्ड को रिपोर्ट करता है।
  • संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचा: चूँकि रेलवे संघ सूची के अंतर्गत आता है, इसलिए रेलवे जोन और डिवीजनों के गठन, परिवर्तन या नामकरण का अधिकार केंद्र सरकार के पास होता है, जो रेल मंत्रालय के माध्यम से कार्य करती है।
    • दक्षिण तट रेलवे (SCoR) जैसे नए जोन का गठन प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने, क्षेत्रीय रेलवे प्रबंधन को सुदृढ़ करने तथा क्षमता विस्तार को तीव्र करने के उद्देश्य से किया जाता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: SCoR जैसे स्थानीयकृत जोन का निर्माण प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने, क्षेत्रीय स्तर पर विद्युतीकरण एवं दोहरीकरण परियोजनाओं में तेजी लाने, विशेष माल ढुलाई गलियारों के माध्यम से आर्थिक विकास को बढ़ावा देने तथा लंबे समय से लंबित क्षेत्रीय अवसंरचना आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया गया है।

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर (1725–1795)

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प्रधानमंत्री ने लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

अहिल्याबाई होलकर के बारे में

  • जन्म एवं प्रारंभिक जीवन: 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी गाँव में जन्म हुआ था।
    • 1754 ईसवी में उनके पति खांडेराव होलकर का, 1766 ईसवी में उनके ससुर मल्हार राव होलकर तथा 1767 ईसवी में उनके पुत्र मालेराव होलकर का निधन हो गया।
  • सिंहासन ग्रहण: 11 दिसंबर, 1767 को उन्होंने होलकर वंश की गद्दी सँभाली और इंदौर की शासक बनीं।
  • सैन्य प्रशासन: उन्होंने तुकोजी राव होलकर को अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया।
  • राजधानी: उन्होंने महेश्वर (वर्तमान मध्य प्रदेश) को होलकर राज्य की राजधानी बनाया।
  • शासनकाल एवं राज्य: 1767 से 1795 ईसवी तक मालवा राज्य पर शासन किया, जिसकी राजधानी महेश्वर थी।
  • लोकप्रिय मान्यता: उन्हें उनके न्यायपूर्ण, करुणामय और जन-केंद्रित शासन के लिए लोकमाता और पुण्यश्लोक राजमाता के रूप में सम्मानित किया जाता है।
  • निधन: 13 अगस्त, 1795 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के योगदान 

  • आर्थिक विकास: मालवा को व्यापार, कृषि और हस्तशिल्प के एक समृद्ध केंद्र के रूप में विकसित किया।
  • प्रशासनिक सुधार: कुशल प्रशासन, लोक कल्याण और न्याय को बढ़ावा दिया तथा विधवाओं तथा हाशिए पर रहने वाले समुदायों के कल्याण के लिए कदम उठाए।
  • बुनियादी ढाँचा विकास: शिक्षा को प्रोत्साहित किया तथा सड़कों, कुओं, घाटों और विश्रामगृहों का निर्माण कर संपर्क व्यवस्था और जनकल्याण को सुदृढ़ किया।
  • कला और संस्कृति: मराठी कवि मोरोपंत, शायर अनंत गांधी और संस्कृत विद्वान खुशाली राम जैसे प्रतिष्ठित कवियों एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।
  • मंदिर पुनर्निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण: काशी विश्वनाथ मंदिर और सोमनाथ मंदिर सहित प्रमुख मंदिरों और तीर्थ स्थलों का पुनर्निर्माण एवं जीर्णोद्धार किया।
  • हस्तशिल्प संवर्द्धन: महेश्वर और इंदौर को प्रमुख व्यापार केंद्रों के रूप में विकसित किया तथा महेश्वरी बुनाई परंपरा को बढ़ावा दिया, जिसकी साड़ियों को GI टैग प्रदान किया गया हैं।
  • स्थायी विरासत: उन्हें सुशासन, सांस्कृतिक संरक्षण, महिला नेतृत्व और जनसेवा के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

उत्तर-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के ऊपर उल्का विस्फोट

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संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में मैसाचुसेट्स–न्यू हैम्पशायर सीमा के ऊपर लगभग 3 फुट व्यास (आकार) का एक उल्कापिंड विस्फोट के साथ टूट गया, जिससे सोनिक बूम उत्पन्न हुआ और पूरे क्षेत्र में इमारतें हिल गईं।

नासा का घटना पर आकलन 

  • उच्च-ऊँचाई पर विखंडन: उल्का पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 40 मील (64 किमी.) की ऊँचाई पर टूटकर बिखर गए।
  • अत्यधिक वेग: यह लगभग 75,000 मील प्रति घंटे (120,000 किमी/घंटा) की गति से वायुमंडल में प्रवेश कर रहा था।
  • हवाई विस्फोट (Airburst): अत्यधिक गति से प्रवेश करने के कारण उत्पन्न तीव्र वायुदाब और ऊष्मा के चलते यह उल्का हवा में ही विस्फोटित हो गया, जिसे हवाई विस्फोट या एयरबर्स्ट कहा जाता है।
  • ऊर्जा का उत्सर्जन: इसके विखंडन से लगभग 300 टन TNT के बराबर ऊर्जा मुक्त हुई, जिससे दूर-दूर तक सुनाई देने वाली ‘डबल बूम’ ध्वनि उत्पन्न हुई। 
  • प्राकृतिक उत्पत्ति की पुष्टि: नासा ने पुष्टि की कि यह वस्तु एक प्राकृतिक उल्का (Meteoroid) था, न कि कोई उपग्रह या अंतरिक्ष अपशिष्ट का पुनः प्रवेश।
    • अमेरिकी उल्का सोसायटी के अनुसार यह उल्का संभवतः वायुमंडल में ही जलकर नष्ट हो गया और पृथ्वी की सतह पर गिरने की संभावना बहुत कम है।
  • दिन के समय दिखाई देने वाली दुर्लभ ‘फायरबॉल’: यह एक अत्यंत चमकदार और अपेक्षाकृत बड़ा फायरबॉल था, जो दिन के समय दिखाई दिया और किसी ज्ञात उल्का वर्षा से संबंधित नहीं था।

बांग्लादेश की पद्मा बैराज

बांग्लादेश ने राजबाड़ी जिले में पद्मा नदी (गंगा नदी की डाउनस्ट्रीम धारा) पर पद्मा बैराज के निर्माण को स्वीकृति प्रदान की है।

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परियोजना के बारे में

  • परियोजना की विशेषताएँ
    • यह बांग्लादेश के नेतृत्व में संचालित एक अंतर-सीमाई नदी अवसंरचना परियोजना है, जिसका उद्देश्य शुष्क मौसम में जल की कमी को दूर करना तथा गंगा–पद्मा नदी के जल प्रबंधन में सुधार करना है।
    • 2.1 किलोमीटर लंबी इस बैराज में 78 स्पिलवे गेट, एक नेवीगेशन लॉक (Navigation Lock), अंडरस्लूइस तथा फिश पैसेज (Fish Passage) शामिल होंगे।
    • इसे लगभग 2.9 अरब घन मीटर जल संगृहीत करने तथा 113 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन के लिए डिजाइन किया गया है।
  • अपेक्षित लाभ
    • इससे बांग्लादेश के लगभग 37% भू-भाग में जल सुरक्षा में सुधार होने का अनुमान है।
    • यह देश के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में लगभग 28.8 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सहायता प्रदान करेगा।
  • प्रमुख चिंताएँ
    • पर्यावरणीय समूहों ने चेतावनी दी है कि विशाल बैराज अवसाद के प्रवाह तथा नदी की पारिस्थितिकी को बाधित कर सकते हैं।
    • प्रमुख जोखिमों में जलभराव, डाउनस्ट्रीम मत्स्य संसाधनों में गिरावट तथा अपर्याप्त जन एवं अंतर-सीमाई परामर्श शामिल हैं।
  • भारत से संबंध
    • चूँकि पद्मा नदी गंगा की निचली धारा (डाउनस्ट्रीम निरंतरता) है, इसलिए यह परियोजना भविष्य में भारत-बांग्लादेश जल-वितरण संबंधी चर्चाओं को प्रभावित कर सकती है, विशेषकर फरक्का बैराज और शुष्क मौसम में नदी के जल प्रवाह के संदर्भ में।
  • व्यापक महत्त्व
    • यह परियोजना दर्शाती है कि दक्षिण एशिया में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब भी बड़ी नदी अवसंरचना परियोजनाओं पर निर्भरता बनी हुई है, जबकि अवसाद प्रवाह (Sediment Flow), नदी पारिस्थितिकी और अंतर-सीमाई परामर्श से जुड़ी चिंताएँ यथावत मौजूद हैं।
    • यह प्रवृत्ति यूरोप और उत्तरी अमेरिका की वर्तमान दिशा से भिन्न है, जहाँ प्राकृतिक नदी पारिस्थितिकी तंत्रों की पुनर्स्थापना के लिए अप्रचलित बाँधों और नदी अवरोधों को बढ़ती संख्या में हटाया जा रहा है।

ब्यूफोर्ट किले

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इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में स्थित एक सामरिक पर्वतीय दुर्ग ब्यूफोर्ट किले (Beaufort Castle) पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। यह किला नबातियेह के निकट अवस्थित है तथा लितानी नदी पर रणनीतिक निगरानी (सामरिक बढ़त) प्रदान करता है।

ब्यूफोर्ट किले (Beaufort Castle) के बारे में

  • ब्यूफोर्ट किला (अरबी में कलाअत अल-शकीफ): दक्षिणी लेबनान में स्थित लगभग 900 वर्ष प्राचीन एक अत्यंत सामरिक महत्त्व वाला मध्यकालीन दुर्ग है।
  • भौगोलिक लाभ: नबातियेह के निकट ऊँची पहाड़ियों पर स्थित यह किला लितानी नदी पर निगरानी रखता है तथा दक्षिणी लेबनान और उत्तरी इजरायल के क्षेत्रों पर एक महत्त्वपूर्ण सामरिक बढ़त (Strategic Vantage Point) प्रदान करता है।
  • ऐतिहासिक परिचय: इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में क्रूसेडर किले के रूप में किया गया था। बाद में यह सलाउद्दीन (सलादीन) की सेना, ममलूक, उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य, फ्राँसीसी मंडेट प्रशासन तथा फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के नियंत्रण में रहा।
  • आधुनिक संघर्षों में भूमिका: इजरायली सेना ने वर्ष 1982 में इस किले को फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) से अपने नियंत्रण में लिया था और वर्ष 2000 तक इसे अपने कब्जे में रखा। 31 मई, 2026 को पुनः नियंत्रण प्राप्त करने के बाद इजरायली बलों ने 26 वर्षों में पहली बार यहाँ अपना ध्वज फहराया।
  • अंतरराष्ट्रीय संरक्षण दर्जा: यूनेस्को ने सशस्त्र संघर्ष के दौरान सांस्कृतिक संपत्ति की सुरक्षा से संबंधित वर्ष 1954 के हेग सम्मेलन के वर्ष 1999 के द्वितीय प्रोटोकॉल के तहत, ब्यूफोर्ट किले को अनंतिम उन्नत संरक्षण प्रदान किया है।

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