अधीनस्थ (जिला) न्यायपालिका
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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों को अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 61 वर्ष करने पर विचार करने को कहा है।
संबंधित तथ्य
- जबकि देशभर में इसे समान रूप से 62 वर्ष करने का व्यापक प्रश्न अभी भी न्यायिक विचाराधीन है।
भारतीय न्यायपालिका की संरचना
- सर्वोच्च न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश करते हैं तथा जिसे संवैधानिक, अपीलीय एवं परामर्श संबंधी अधिकार-क्षेत्र प्राप्त है।
- उच्च न्यायालय: राज्य/केंद्रशासित प्रदेश स्तर के सर्वोच्च न्यायालय, जो रिट, अपीलीय तथा पर्यवेक्षी अधिकार-क्षेत्र का प्रयोग करते हैं।
- अधीनस्थ न्यायालय: इनमें जिला एवं सत्र न्यायालय तथा उनके अधीन कार्यरत दीवानी एवं आपराधिक न्यायालय सम्मिलित हैं, जो संबंधित उच्च न्यायालयों के पर्यवेक्षण में कार्य करते हैं।
अधीनस्थ/जिला न्यायपालिका के बारे में
- अधीनस्थ न्यायपालिका भारत की न्यायिक प्रणाली का मूलभूत स्तर है, जो जिला एवं स्थानीय स्तर पर कार्य करती है तथा नागरिकों के लिए न्याय प्राप्ति का प्राथमिक माध्यम है।
- यह दीवानी एवं आपराधिक मामलों की सुनवाई करती है तथा संबंधित उच्च न्यायालयों के प्रशासनिक एवं अपीलीय पर्यवेक्षण में कार्य करती है।
- संवैधानिक प्रावधान: संविधान के भाग VI के अध्याय VI में अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए संवैधानिक ढाँचा प्रदान किया गया है।
- अनुच्छेद-233: राज्यपाल, उच्च न्यायालय से परामर्श प्राप्त कर कर जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन एवं पदोन्नति करते हैं। अधिवक्ता समुदाय से प्रत्यक्ष भर्ती होने वाले अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम सात वर्ष का अधिवक्ता के रूप में अनुभव एक आवश्यक शर्त है।
- अनुच्छेद-234: जिला न्यायाधीशों के अतिरिक्त अन्य न्यायिक अधिकारियों की भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग तथा उच्च न्यायालय के माध्यम से की जाती है।
- अनुच्छेद-235: जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण, जिसमें पदस्थापन, पदोन्नति एवं अवकाश सम्मिलित हैं, संबंधित उच्च न्यायालय में निहित है।
- अनुच्छेद-236-237: जिला न्यायाधीश की अभिव्यक्ति को परिभाषित करते हैं तथा इन प्रावधानों को निर्दिष्ट श्रेणी के मजिस्ट्रेटों पर लागू करने का प्रावधान करते हैं।
- विभिन्न स्तरों पर सेवानिवृत्ति आयु
- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश: संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश: 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।
- अधीनस्थ न्यायालय: अधिकांश राज्यों में अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है।
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कुटकी (पिक्रोराइजा कुर्रोआ)

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हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के किसानों ने कुटकी (पिक्रोराइजा कुर्रोआ) के लिए स्टोलोन-आधारित (भूमि पर फैलने वाले तने) एक सतत् खेती पद्धति विकसित की है।
कुटकी (पिक्रोराइजा कुर्रोआ) के बारे में
- यह हिमालय के अल्पाइन एवं उप-अल्पाइन क्षेत्रों (2,700–4,500 मीटर) में पाई जाने वाली एक उच्च-मूल्य वाली औषधीय वनस्पति है।
- इसका उपयोग 2,000 से अधिक हर्बल औषधीय उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
- संरक्षण स्थिति:
- IUCN स्थिति: संकटग्रस्त (Endangered)।
- CITES स्थिति: परिशिष्ट-II में सूचीबद्ध — इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल विनियमित परिस्थितियों में तथा निर्यात अनुमति के आधार पर ही किया जा सकता है, ताकि व्यापार से इसकी प्राकृतिक आबादी को क्षति न पहुँचे।
- प्रमुख विशेषताएँ
- इस पौधे का औषधीय रूप से महत्त्वपूर्ण भाग इसकी स्टोलोन होती है, जो मिट्टी की सतह पर फैलने वाली तथा गाँठों वाली एक विशेष पार्श्वीय तना होती है, न कि इसकी रेशेदार जड़ें।
- उच्च हिमालयी औषधीय वनस्पति होने के कारण कुटकी क्षेत्र की जैव विविधता तथा पारंपरिक औषधीय संसाधनों में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।
- खतरे
- विनाशकारी दोहन: पारंपरिक संग्रहण में समूल पौधे को उखाड़ लिया जाता था, जिससे उसका पुनर्जनन रुक जाता था तथा वृद्धि घाट जाती थी।
- व्यावसायिक दबाव: हर्बल एवं औषधि उद्योगों की बढ़ती माँग तथा प्राकृतिक आबादी में गिरावट के कारण बाजार मूल्य बढ़ गए हैं, जिससे इसके प्राकृतिक उत्पादन पर दबाव बढ़ गया है।
- नवाचार: स्टोलोन-आधारित संग्रहण
- स्टोलोन एक पार्श्वीय शाखा वाला तना है, जिसमें गाँठें पाई जाती हैं और जो भूमि की सतह पर फैलता है। पारंपरिक संग्राहक सामान्यतः (और गलत रूप से) इसे पौधे की “जड़” मानते रहे हैं तथा यह मानते हैं कि औषधीय गुण इसी में होते हैं।
- वास्तव में पौधे की वास्तविक जड़ें रेशेदार होती हैं और उनमें कोई औषधीय गुण नहीं होता; केवल सूखी स्टोलोन ही औषधीय एवं व्यावसायिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होती है।
- नई पद्धति में केवल स्टोलोन का संग्रह किया जाता है तथा पौधे को सुरक्षित छोड़ दिया जाता है, जिससे उसका पुनर्जनन होता रहता है और वह निरंतर उत्पादन करता रहता है। इस प्रकार कुटकी की कृषि बहुवर्षीय गतिविधि में परिवर्तित हो गई है, जिससे इसकी पुनुरुत्पादन की क्षमता में वृद्धि हुई है।
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प्रधानमंत्री यंग अचीवर्स स्कॉलरशिप पुरस्कार योजना (PM-YASASVI)

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हाल ही में सरकार ने PM-YASASVI योजना के माध्यम से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (EBC) तथा विमुक्त जनजाति (DNT) के विद्यार्थियों के लिए शैक्षिक अवसरों को सुदृढ़ करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
प्रधानमंत्री यंग अचीवर्स स्कॉलरशिप अवॉर्ड स्कीम फॉर वाइब्रेंट इंडिया (PM-YASASVI) योजना के बारे में:
- यह सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की एक केंद्रीय क्षेत्र की समेकित छात्रवृत्ति योजना है।
- प्रारंभ: वर्ष 2021–22 में अनेक विद्यमान छात्रवृत्ति योजनाओं को एकीकृत करने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई।
- उद्देश्य: वित्तीय बाधाओं को कम करना तथा समावेशी, न्यायसंगत एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देना।
- PM-YASASVI योजना की प्रमुख विशेषताएँ
- लक्षित लाभार्थी: यह विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (EBC) तथा विमुक्त जनजाति (DNT) जैसे वंचित छात्र समुदायों पर केंद्रित है।
- आय सीमा: वार्षिक ₹2.5 लाख से कम आय वाले परिवारों के विद्यार्थियों को पात्रता प्रदान की जाती है।
- पाँच उप-योजनाएँ: इसमें प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक, टॉप क्लास स्कूल, टॉप क्लास कॉलेज छात्रवृत्तियाँ तथा समर्पित छात्रावास निर्माण जैसी संरचनात्मक सहायता सम्मिलित है।
- वित्तीय संरचना: यह स्तरानुसार वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिसके अंतर्गत कक्षा 9–10 के लिए प्रति वर्ष ₹75,000 तक तथा कक्षा 11–12 के टॉप क्लास स्कूल के विद्यार्थियों के लिए प्रति वर्ष ₹1,25,000 तक की सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
- लैंगिक समावेशन: योजना में 30% स्थान छात्राओं के लिए आरक्षित कर समावेशिता सुनिश्चित की गई है।
- NSP के माध्यम से आवेदन: आवेदन प्रक्रिया पूर्णतः ऑनलाइन है तथा राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल (NSP) के माध्यम से आधार से संबद्ध वन-टाइम रजिस्ट्रेशन के जरिए संचालित की जाती है।
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बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य

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हाल ही में यमन के हूती विद्रोहियों ने बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य के माध्यम से सऊदी अरब को लक्ष्य बनाते हुए पहली बार नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा की।
बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के बारे में:
- अर्थ: बाब-अल-मंदेब का अरबी भाषा में अर्थ “आँसुओं का द्वार” है।
- स्थिति: यह लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला एक संकीर्ण जलमार्ग है।
- यह यमन, जिबूती तथा इरिट्रिया (अफ्रीका का हॉर्न) के मध्य स्थित है।
- यह लाल सागर के मुहाने पर स्थित है, जो स्वेज नहर की ओर है, जो एशिया और यूरोप के मध्य प्रवेश द्वार है।
- अपने सबसे संकीर्ण भाग में इसकी चौड़ाई 29 किमी. है तथा इसमें समुद्री यातायात के लिए दो नौवहन चैनल हैं।
- सामरिक महत्त्व: यह विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है।
- इसके माध्यम से वैश्विक व्यापार का लगभग 12% संचालित होता है।
- वर्ष 2024 में इसके माध्यम से लगभग 4.1 अरब बैरल कच्च्चा तेल एवं पेट्रोलियम उत्पाद (वैश्विक कुल का लगभग 5%) का परिवहन हुआ था।
- यदि सऊदी अरब के जहाजों के लिए ये पूर्णतः प्रतिबंधित होता है, तो इससे सऊदी अरब के एशिया को होने वाले तेल निर्यात में बाधा उत्पन्न हो सकती है तथा वैश्विक तेल आपूर्ति में लगभग 7% की कमी आ सकती है।
- यह ईस्ट–वेस्ट (पेट्रोलाइन) पाइपलाइन के माध्यम से परिवहन किए जाने वाले सऊदी तेल के निर्यात का एक प्रमुख मार्ग है, जो अबकैक तेल क्षेत्र को यनबू स्थित लाल सागर के बंदरगाह से जोड़ती है।
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प्रोजेक्ट कुश (Project Kusha)
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हाल ही में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने ओडिशा तट के निकट एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से लंबी दूरी की सतह-से-वायु में मार करने वाली स्वदेशी ‘कुश’ मिसाइल का प्रथम उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न किया।
कुश मिसाइल प्रणाली के बारे में
- कुश, जिसे एक्सटेंडेड रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (ERADS) के नाम से भी जाना जाता है, एक स्वदेशी लंबी दूरी की सतह-से-वायु में मार करने वाली मिसाइल है, जिसका उद्देश्य भारत को बहु-स्तरीय वायु रक्षा कवच प्रदान करना है।
- उद्देश्य: लड़ाकू विमान, यूएवी (UAV), क्रूज मिसाइल तथा अन्य उच्च गति वाले हवाई लक्ष्यों सहित विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों को निष्क्रिय करना तथा भारत की सामरिक वायु रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना।
- विकसितकर्ता: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO)।
- प्रमुख विशेषताएँ
- मल्टी रेंज इंटरसेप्टर: इस प्रणाली में तीन इंटरसेप्टर प्रकार प्रस्तावित हैं—M1 (लगभग 150 किमी.), M2 (लगभग 250 किमी.) तथा M3 (लगभग 350–400 किमी.), जो विभिन्न दूरियों पर खतरों को अवरोधित करने में सक्षम होंगे।
- उन्नत खतरों का निष्प्रभावीकरण: कुश को स्टील्थ विमान, मानवरहित हवाई वाहन, क्रूज मिसाइल तथा संभावित रूप से बैलिस्टिक एवं हाइपरसोनिक खतरों सहित व्यापक प्रकार के हवाई खतरों का मुकाबला करने के लिए विकसित किया गया है।
- एकीकृत वायु रक्षा: इस प्रणाली को भारतीय वायु सेना की इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के साथ एकीकृत किया जाना प्रस्तावित है, जिससे हवाई खतरों का समन्वित रूप से पता लगाने, उनका अनुसरण करने तथा उन्हें निष्प्रभावी बनाने की क्षमता विकसित होगी।
- सामरिक महत्त्व: कुश का स्वदेशी विकास भारत की आयातित वायु रक्षा प्रणालियों पर निर्भरता कम कर सकता है, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत को सुदृढ़ कर सकता है तथा देश की महत्त्वपूर्ण अवसंरचना एवं सामरिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा क्षमता में वृद्धि कर सकता है।
भारत की वर्तमान वायु रक्षा प्रणाली
- सामरिक बाह्य रक्षा कवच: S-400 प्रणाली 400 किमी. तक की दूरी पर लड़ाकू विमानों एवं बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है।
- सामरिक मध्यवर्ती रक्षा ग्रिड: स्वदेशी आकाश तथा मध्यम दूरी की सतह से वायु में मार करने वाली मिसाइलें 25-100 किमी. की सीमा के भीतर खतरों को निष्प्रभावी कर सकती हैं।
- एकीकृत डिजिटल कमान: स्वचालित ‘इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम’ (IACCS) रडार से प्राप्त सूचनाओं का एकीकरण कर त्वरित समन्वय सुनिश्चित करती है।
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