संदर्भ
हाल ही में यूडाइज प्लस (UDISE+) 2025–26 रिपोर्ट में ‘विशेष आवश्यकता वाले बच्चे’ (CWSN) के नामांकन में स्थिरता को लेकर चिंता प्रदर्शित की गई है।
संबंधित तथ्य
- इस रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहलों के बावजूद, दिव्यांग बच्चों का एक बड़ा वर्ग आज भी औपचारिक विद्यालयी शिक्षा प्रणाली से बाहर है।
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के बारे में:
- परिभाषा: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों में उन बालकों एवं बालिकाओं को शामिल किया जाता है, जिन्हें दिव्यांगता, विकासात्मक विलंब अथवा अधिगम संबंधी कठिनाइयों के कारण अतिरिक्त शैक्षिक, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक या सामाजिक सहायता की आवश्यकता होती है।
- विधिक आधार: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत दिव्यांगता की 21 श्रेणियों को मान्यता दी गई है, जिसने विकलांग जन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त पूर्व की 7 (बाद में 8) श्रेणियों का स्थान लिया।
- शैक्षिक उद्देश्य: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को बच्चों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 के अंतर्गत समावेशी, न्यायसंगत एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है।
यूडाइज प्लस 2025–26 रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- नामांकन में स्थिरता: समावेशी शिक्षा पर नीतिगत बल दिए जाने के बावजूद, विद्यालयों में नामांकित विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की संख्या पिछले आठ वर्षों से लगभग 21.66 लाख पर लगभग स्थिर बनी हुई है।
- नामांकन में बड़ा अंतर: NFHS-5 में दिव्यांगता की व्यापकता तथा सरकार के जनसंख्या अनुमानों के आधार पर वर्ष 2025-26 में भारत में लगभग 98.8 लाख विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का अनुमान है। इसका अर्थ है कि दिव्यांग बच्चों में से केवल लगभग 22% ही विद्यालयों में नामांकित हैं।

- उच्च स्तरों पर घटती भागीदारी: शिक्षा के प्रत्येक अगले स्तर पर विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का अनुपात तीव्रता से घटता जाता है:
- प्राथमिक स्तर के लगभग 75% बच्चे उच्च प्राथमिक स्तर तक पहुँचते हैं।
- उच्च प्राथमिक स्तर से केवल लगभग 48% बच्चे माध्यमिक स्तर तक पहुँच पाते हैं।
- माध्यमिक स्तर से केवल लगभग 46% बच्चे उच्च माध्यमिक स्तर तक आगे पहुँच पाते हैं।
- लैंगिक असमानता: विभिन्न विद्यालयों में नामांकित प्रत्येक 100 विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों में से केवल लगभग 43 छात्राएँ हैं, जो निरंतर लैंगिक असमानता को दर्शाता है। हालाँकि, दिव्यांग बालिकाओं में बालकों की तुलना में विद्यालय छोड़ने की दर अपेक्षाकृत कम है।
- संभावित कम आँकड़ा-निर्धारण: विभिन्न विद्यालय अब भी दिव्यांगताओं का वर्गीकरण दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 द्वारा मान्यता प्राप्त 21 दिव्यांगताओं के स्थान पर पुरानी श्रेणियों के आधार पर करते हैं, जिससे विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के नामांकन का वास्तविक आँकड़ा कम आँका जा सकता है।
‘विशेष आवश्यकता वाले बच्चों’ की समावेशी शिक्षा से संबंधित चुनौतियाँ
- पहचान एवं आँकड़ों का अभाव: दिव्यांगता के अद्यतन आकलन का अभाव तथा पुरानी दिव्यांगता श्रेणियों का निरंतर उपयोग पात्र बच्चों की समुचित पहचान एवं पंजीकरण में बाधा उत्पन्न करता है।
- कम नामांकन एवं अधिक विद्यालय ड्रॉप आउट दर: दिव्यांग बच्चों का एक बड़ा हिस्सा अब भी शिक्षा प्रणाली से बाहर है, जबकि माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तर पर पहुँचने की दर में तीव्र गिरावट देखी जाती है।
- अपर्याप्त अवसंरचना: अनेक विद्यालयों में अब भी बाधा-रहित अवसंरचना, सुलभ शौचालय, रैंप, सहायक उपकरण तथा परिवहन सुविधाओं का अभाव है।
- विशेष शिक्षकों की कमी: प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों, थेरेपिस्ट्स तथा काउंसलर्स की अपर्याप्त उपलब्धता शिक्षण परिणामों को प्रभावित करती है।
- सामाजिक उपेक्षा एवं लैंगिक बाधाएँ: दिव्यांगता से संबंधित सामाजिक उपेक्षा, भेदभाव तथा लैंगिक पक्षपात विशेषकर बालिकाओं के विद्यालय में नामांकन एवं निरंतरता को हतोत्साहित करते हैं।
- कमजोर डेटा प्रणाली: सर्वेक्षणों में विलंब, दिव्यांगता संबंधी अद्यतन अनुमानों का अभाव तथा प्रतिवेदन में असंगतियाँ साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण को प्रभावित करती हैं।
संबद्ध सरकारी पहलें
- बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009: 6–14 वर्ष आयु वर्ग के सभी बच्चों, जिनमें दिव्यांग बच्चे भी शामिल हैं, के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करता है।
- सुगम्य भारत अभियान, 2015: सार्वजनिक भवनों, परिवहन तथा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी सहित शैक्षणिक संस्थानों में सुगमता को बढ़ावा देता है।
- यूनिक डिसएबिलिटी आईडी (UDID) परियोजना, 2016: दिव्यांग व्यक्तियों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करती है तथा कल्याणकारी योजनाओं एवं सेवाओं तक पहुँच की सुगमता सुनिश्चित करती है।
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016: दिव्यांगता की 21 श्रेणियों को मान्यता देता है तथा बिना किसी भेदभाव के समावेशी शिक्षा के अधिकार की गारंटी प्रदान करता है।
- समग्र शिक्षा, 2018: रिसोर्स टीचर्स, सहायक उपकरण, गृह-आधारित शिक्षा, परिवहन भत्ता तथा सुलभ अवसंरचना के माध्यम से समावेशी शिक्षा को समर्थन प्रदान करती है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020: समावेशी एवं न्यायसंगत शिक्षा, सार्वभौमिक पहुँच, बाधा-रहित विद्यालय, सहायक प्रौद्योगिकियों तथा शिक्षकों की क्षमता निर्माण पर बल देती है।

आगे की राह
- प्रारंभिक पहचान को सुदृढ़ करना: स्वास्थ्य एवं शिक्षा क्षेत्रों के बीच समन्वय स्थापित कर दिव्यांग बच्चों की सार्वभौमिक स्क्रीनिंग एवं समयबद्ध पहचान सुनिश्चित की जाए।
- डेटा की गुणवत्ता में सुधार: विद्यालयीय प्रतिवेदन प्रणाली को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त 21 दिव्यांगता श्रेणियों के अनुरूप अद्यतन किया जाए तथा नियमित दिव्यांगता सर्वेक्षण कराए जाएँ।
- समावेशी अवसंरचना का विस्तार: सभी विद्यालयों में रैंप, सुलभ कक्षाएँ, शौचालय, परिवहन तथा सहायक प्रौद्योगिकियों सहित सार्वभौमिक सुगमता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
- शिक्षकों की क्षमता में वृद्धि: अधिक विशेष शिक्षकों की नियुक्ति की जाए तथा नियमित शिक्षकों को समावेशी शिक्षण पद्धति पर सतत् प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
- निरंतरता में सुधार: माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने की दर कम करने के लिए छात्रवृत्ति, परामर्श, अभिभावक सहयोग तथा संक्रमण योजना को सुदृढ़ किया जाए।
- सामुदायिक जागरूकता को बढ़ावा: जागरूकता अभियानों के माध्यम से सामाजिक उपेक्षा एवं भेदभाव को कम किया जाए तथा शिक्षा में दिव्यांग बालिकाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
निष्कर्ष
समावेशी शिक्षा की वास्तविक प्राप्ति के लिए प्रभावी क्रियान्वयन, सुलभ अवसंरचना, प्रशिक्षित शिक्षक तथा डेटा-आधारित योजना निर्माण आवश्यक है, ताकि समानता, गरिमा एवं सामाजिक न्याय के संवैधानिक आदर्शों को साकार किया जा सके तथा यह सुनिश्चित किया जा सके कि विशेष आवश्यकता वाला कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रह जाए।