संदर्भ
हाल ही में म्याँमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग (Min Aung Hlaing) ने भारत की आधिकारिक यात्रा की।
संबंधित तथ्य
- राजनीतिक समर्थन: भारत ने सभी हितधारकों को शामिल करते हुए म्याँमार के नेतृत्व एवं स्वामित्व वाली शांति प्रक्रिया के प्रति अपना समर्थन पुनः व्यक्त किया।
- भारत ने नोबेल पुरस्कार विजेता ‘आंग सान सू की’ के मुद्दे को भी उठाया, जो वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से म्याँमार में निरुद्ध हैं।
म्यामाँर के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के प्रमुख बिंदु
- म्यामाँर का रणनीतिक महतेत्व: प्रधानमंत्री मोदी ने नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट तथा महासागर विजन में म्यामाँर की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया।
- शैक्षिक सहयोग: भारत ने वर्ष 2026 से म्यामाँर के छात्रों के लिए मेकांग गंगा आईसीसीआर छात्रवृत्ति को प्रति वर्ष 36 से बढ़ाकर 100 करने की घोषणा की।
- सुरक्षा आश्वासन: राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने पुनः आश्वासन दिया कि म्यामाँर की भूमि का उपयोग भारत के सुरक्षा हितों के विरुद्ध नहीं होने दिया जाएगा।
‘रुपया–क्यात’ निपटान तंत्र के बारे में
- यह तंत्र वर्ष 2024 के मई माह में पहली बार परिचालित किया गया था, ताकि मुद्रा प्रवाह को सुगम बनाया जा सके। इस तंत्र के अंतर्गत लेन-देन की मात्रा में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है।
- यह अमेरिकी डॉलर जैसी तृतीय-पक्ष मुद्राओं पर निर्भरता को कम करता है, क्योंकि व्यापार का निपटान सीधे विशेष रुपया आधारित ‘वोस्ट्रो’ खाते (SRVA) के माध्यम से किया जाता है, जिनका प्रबंधन पंजाब नेशनल बैंक (PNB) द्वारा किया जाता है।
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- संप्रभुता के प्रति समर्थन: भारत ने म्यामाँर की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पुनः व्यक्त की, विशेषकर वर्तमान आंतरिक चुनौतियों के संदर्भ में।
- सीमा प्रबंधन: दोनों पक्षों ने इस बात पर बल दिया कि उनकी भूमियों का दुरुपयोग एक-दूसरे की सुरक्षा के विरुद्ध गतिविधियों के लिए न हो।
- कलादान परियोजना: नेताओं ने कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना की प्रगति की समीक्षा की तथा इसके शीघ्र पूर्ण होने की आवश्यकता पर जोर दिया।
- त्रिपक्षीय राजमार्ग: दोनों देशों ने भारत–म्यामाँर–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग को आगे बढ़ाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जिससे क्षेत्रीय संपर्क एवं समृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।

- व्यापार सुगमता: दोनों देशों ने वर्ष 2024 के मई माह से संचालित रुपया–क्यात द्विपक्षीय निपटान तंत्र के बढ़ते उपयोग का स्वागत किया।
- निवेश सहयोग: कृषि-प्रसंस्करण, पेट्रोलियम, ऊर्जा, तथा खनन को निवेश एवं आर्थिक सहयोग के प्राथमिक क्षेत्रों के रूप में पहचाना गया।
- साइबर ठगी से पीड़ित व्यक्ति: भारत एवं म्यामाँर ने साइबर ठगी संबंधी स्थलों में फँसे भारतीय नागरिकों के संरक्षण तथा वापसी हेतु सहयोग जारी रखने पर सहमति व्यक्त की।
भारत के लिए म्यामाँर का महत्त्व
- प्रमुख नीतियों का संगम: म्यामाँर भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति, एक्ट ईस्ट नीति तथा महासागर विजन के केंद्र बिंदु पर स्थित है, जिससे यह भारत की क्षेत्रीय रणनीति में एक महत्त्वपूर्ण भागीदार है।
- दक्षिण-पूर्व एशिया का द्वार: म्यामाँर आसियान के लिए भारत का स्थलीय सेतु है, जो संपर्क, व्यापार तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ गहन सहभागिता को सुगम बनाता है।
- क्षेत्रीय प्रभाव: मजबूत भारत–म्यामाँर संबंध दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, तथा व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के रणनीतिक, आर्थिक तथा भू-राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य हैं।
- रणनीतिक पड़ोसी: म्यामाँर भारत का एकमात्र दक्षिण-पूर्व एशियाई पड़ोसी है, जिसके साथ भारत स्थलीय सीमा एवं समुद्री सीमा दोनों साझा करता है, जिससे यह क्षेत्रीय सुरक्षा एवं संपर्क के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

- पूर्वोत्तर सुरक्षा: म्यामाँर में स्थिरता 1643 किमी. लंबी भारत–म्यामाँर सीमा पर विद्रोह, सीमा पार अपराध तथा अन्य सुरक्षा चुनौतियों के प्रबंधन के लिए आवश्यक है।
- संपर्क केंद्र: म्यामाँर कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना तथा भारत–म्यामाँर–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी प्रमुख परियोजनाओं का केंद्रीय बिंदु है।
- क्षेत्रीय नीति का रणनीतिक स्तंभ: म्यामाँर नेबरहुड फर्स्ट नीति, एक्ट ईस्ट नीति, तथा महासागर विजन के केंद्र पर स्थित होने के कारण भारत की क्षेत्रीय रणनीति के लिए अनिवार्य है।
- आर्थिक भागीदार: म्यामाँर व्यापार, निवेश, ऊर्जा सहयोग, खनन तथा महत्त्वपूर्ण खनिजों एवं दुर्लभ मृदा संसाधनों तक पहुँच के अवसर प्रदान करता है।
- द्विपक्षीय व्यापार: वित्तीय वर्ष 2024–2025 में भारत और म्यामाँर के बीच व्यापार 2.15 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचा, जिससे भारत म्यामाँर का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बना।
- व्यापार संतुलन: भारत प्रायः म्यामाँर के साथ व्यापार घाटा बनाए रखता है, क्योंकि कृषि उत्पादों का आयात अधिक होता है, हालाँकि भारत निर्यात बढ़ाने के प्रयास कर रहा है।
- समुद्री महत्त्व: बंगाल की खाड़ी के साथ म्यामाँर की तटरेखा भारत के समुद्री विस्तार को सुदृढ़ करती है तथा क्षेत्रीय संपर्क पहलों का समर्थन करती है।
- हिंद-प्रशांत संबंध: म्यामाँर के साथ मजबूत संबंध भारत की दक्षिण-पूर्व एशिया में सहभागिता को सुदृढ़ करते हैं तथा उसके व्यापक हिंद-प्रशांत उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हैं।
- सभ्यतागत संबंध: साझा बौद्ध विरासत तथा दीर्घकालिक सांस्कृतिक संबंध जन-से-जन संपर्क के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं।
- आसियान स्थिरता: म्यामाँर में शांति एवं स्थिरता आसियान की एकता तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की व्यापक सुरक्षा संरचना के लिए अत्यंत आवश्यक है।
चुनौतियाँ
- सीमा सुरक्षा एवं उग्रवाद: पूर्वोत्तर के कई उग्रवादी समूह ऐतिहासिक रूप से म्यामाँर के भीतर स्थित ठिकानों से संचालित होते रहे हैं, जो भारत के लिए एक प्रमुख सुरक्षा चुनौती है।
- वर्ष 2026 के जून माह की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने विशेष रूप से इस मुद्दे को उठाया, जिसके पश्चात् म्यामाँर ने आश्वासन दिया कि उसकी भूमि का उपयोग भारत के विरुद्ध नहीं होने दिया जाएगा।
- म्यामाँर में राजनीतिक अस्थिरता: म्यामाँर की सेना एवं जातीय सशस्त्र संगठनों के बीच जारी संघर्ष ने द्विपक्षीय संबंधों में अनिश्चितता उत्पन्न की है।
- संपर्क परियोजनाओं में विलंब: कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना तथा भारत–म्यामाँर–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी रणनीतिक परियोजनाएँ अभी भी विलंब का सामना कर रही हैं।
- यह विलंब मुख्यतः रखाइन प्रांत एवं जातीय सशस्त्र समूहों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सक्रिय संघर्ष के कारण है।
- पूर्वोत्तर भारत में शरणार्थी प्रवाह: म्यामाँर में हिंसा एवं अस्थिरता के कारण मिजोरम एवं अन्य सीमावर्ती राज्यों में बार-बार शरणार्थियों का आगमन हुआ है।
- वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से मिजोरम में हजारों म्यामाँर शरणार्थी निवास कर रहे हैं, जिससे मानवीय एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
- रोहिंग्या संकट एक गंभीर मानवीय एवं मानवाधिकार संकट है, जिसने भारत–म्यामाँर संबंधों पर प्रभाव डाला है। रोहिंग्या समुदाय के लोग बांग्लादेश एवं भारत जैसे पड़ोसी देशों में शरण लेने के लिए पलायन कर चुके हैं।
- सीमापार अपराध एवं साइबर ठगी: म्यामाँर स्थित साइबर ठगी स्थलों ने एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती का रूप ले लिया है।
- भारत ऐसे स्थलों में फँसे 2400 से अधिक भारतीय नागरिकों को वापस ला चुका है, जबकि अन्य को बचाने के प्रयास जारी हैं।
- चीन का रणनीतिक प्रभाव: म्यामाँर अपनी रणनीतिक स्थिति एवं प्राकृतिक संसाधनों के कारण भारत–चीन प्रतिस्पर्द्धा का एक प्रमुख क्षेत्र बना हुआ है।
- विश्लेषकों के अनुसार, भारत की म्यामाँर नीति आंशिक रूप से चीन के बढ़ते आर्थिक एवं भू-राजनीतिक प्रभाव को संतुलित करने से प्रेरित है।
- कठिन सीमा प्रबंधन: 1643 किमी. लंबी भारत–म्यामाँर सीमा दुर्गम पर्वतों, सघन वनों, तथा दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों से होकर गुजरती है।
- ये भौगोलिक परिस्थितियाँ प्रभावी निगरानी, सीमा संरक्षण तथा कानून प्रवर्तन को कठिन बनाती हैं।
- व्यापार एवं आर्थिक सहयोग पर प्रभाव: सुरक्षा चिंताओं एवं संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के कारण व्यापार विस्तार एवं निवेश अवसरों में बाधा उत्पन्न होती है।
- संपर्क परियोजनाओं में विलंब ने भारत की एक्ट ईस्ट नीति की आर्थिक संभावनाओं को सीमित किया है।
- एक्ट ईस्ट नीति के लिए चुनौती: म्यामाँर भारत का एकमात्र आसियान देश है, जिसके साथ भारत की स्थलीय सीमा लगती है तथा यह दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है।
- म्यामाँर में अस्थिरता भारत की संपर्क, व्यापार तथा हिंद-प्रशांत पहलों की सफलता को सीधे प्रभावित करती है।
आगे की राह
- लोकतंत्र एवं रणनीतिक हितों के मध्य संतुलन: भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन तथा सुरक्षा एवं संपर्क उद्देश्यों हेतु म्यामाँर की वर्तमान सरकार के साथ संवाद बनाए रखने के मध्य संतुलन स्थापित करना होगा।
- संतुलित सीमा प्रबंधन रणनीति अपनाना: भारत को मुक्त आवागमन व्यवस्था (FMR) के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सीमा अवसंरचना को सुदृढ़ करना, सीमापार आवाजाही को विनियमित करना तथा निर्धारित प्रवेश बिंदुओं के माध्यम से व्यापार को औपचारिक बनाना चाहिए।
- ऐसे उपाय सुरक्षा चिंताओं का समाधान करते हुए सीमावर्ती समुदायों के पारंपरिक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संबंधों को बनाए रख सकते हैं।

- रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से बाहरी प्रभाव का संतुलन: म्यामाँर में बढ़ते चीनी प्रभाव को संतुलित करने हेतु भारत को आर्थिक सहयोग, संपर्क पहल तथा विकास साझेदारियों को सुदृढ़ करना चाहिए।
- म्यामाँर की संप्रभुता का सम्मान करते हुए द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना भारत की विश्वसनीय क्षेत्रीय भागीदार की भूमिका को सुदृढ़ करेगा।
- पारस्परिक लाभकारी आर्थिक सहयोग को बढ़ावा: भारत को व्यापार असंतुलन को कम करने हेतु म्यामाँर के निर्यात के लिए अधिक बाजार पहुँच, व्यापार विविधीकरण तथा ऊर्जा, अवसंरचना एवं विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश का विस्तार करना चाहिए।
- यांगून के निकट प्रस्तावित 6 अरब अमेरिकी डॉलर की पेट्रोलियम रिफाइनरी परियोजना जैसी पहलें आर्थिक पारस्परिकता को गहरा कर सकती हैं।
- संपर्क एवं अवसंरचना परियोजनाओं में तेजी: कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना तथा सितवे बंदरगाह जैसी परियोजनाओं का समयबद्ध पूर्ण होना क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार वृद्धि तथा एक्ट ईस्ट नीति को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है।
- बेहतर अवसंरचना दोनों देशों के लिए आर्थिक लाभ उत्पन्न करेगी तथा पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ेगी।
- सांस्कृतिक एवं ‘जन-से-जन’ संपर्क का विस्तार: भारत को म्यामाँर के साथ साझा सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक विरासत का उपयोग करते हुए शैक्षिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा धरोहर संरक्षण को बढ़ावा देना चाहिए।
- बागान स्थित आनंद मंदिर के पुनर्स्थापन तथा क्षतिग्रस्त पगोडाओं के संरक्षण जैसी परियोजनाएँ सामाजिक संबंधों को मजबूत करेंगी।
- ट्रैक-II कूटनीति एवं क्षेत्रीय शांति पहलों को प्रोत्साहन: भारत क्वाड तथा ‘आसियान ट्रोइका’ जैसे क्षेत्रीय समूहों के नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों एवं नागरिक समाज प्रतिनिधियों के मध्य संवाद मंचों को बढ़ावा दे सकता है।
- ऐसी पहलें सहमति निर्माण, मानवीय मुद्दों के समाधान, राष्ट्रीय सुलह के समर्थन, तथा म्यामाँर में स्थायी शांति एवं स्थिरता को प्रोत्साहित कर सकती हैं।
निष्कर्ष
- भारत की म्यामाँर नीति में रणनीतिक व्यावहारिकता, आर्थिक सहभागिता, सुरक्षा सहयोग तथा लोकतांत्रिक पहुँच का समन्वय होना आवश्यक है।
- एक संतुलित एवं बहुआयामी दृष्टिकोण न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा, बल्कि व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा समृद्धि को भी प्रोत्साहित करेगा।