संदर्भ
भारत के प्रधानमंत्री के निमंत्रण पर, जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नई दिल्ली की आधिकारिक यात्रा की।
- भारत और जापान अपने राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में संयुक्त रूप से “इंडिया जापान ईयर ऑफ शेयर्ड होराइजन्स” (India Japan Year of Shared Horizons) का आयोजन कर रहे हैं।
भारत-जापान शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षरित मुख्य समझौते और पहलें
- हिंद-प्रशांत सहयोग: भारत और जापान ने एक स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया। इसके अंतर्गत क्षेत्रीय सहयोग को प्रगाढ़ करने के लिए जापान के ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ (FOIP) दृष्टिकोण का भारत की ‘इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव’ (IPOI) तथा ‘महासागर‘ (MAHASAGAR) विजन के साथ रणनीतिक समन्वय स्थापित किया गया।
- 10-वर्षीय रोडमैप की रूपरेखा: इस रोडमैप का उद्देश्य आठ मुख्य स्तंभों के माध्यम से आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी सहयोग को सुदृढ़ करना है। इसके साथ ही यह भारत में जापानी निजी निवेश के 10 ट्रिलियन जापानी येन (JPY) के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग प्रदान करेगा।
- प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में सहयोग को गहरा करने के लिए भारत और जापान ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर एक संयुक्त वक्तव्य (Joint Statement) जारी किया।
- इस सहयोग का मुख्य उद्देश्य वैश्विक एआई नवाचार को गति देने तथा तकनीकी साझेदारी को मजबूत करने के लिए जापान की परिशुद्ध इंजीनियरिंग को भारत के सॉफ्टवेयर कौशल के साथ एकीकृत करना है।
- व्यापार और निवेश: दोनों देश ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते‘ (CEPA) की समीक्षा में तेजी लाने, निवेश के माहौल को बेहतर बनाने तथा लॉजिस्टिक्स, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र, स्वास्थ्य सेवा व भुगतान प्रणालियों में सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमत हुए। साथ ही 10 ट्रिलियन येन के निवेश लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मिलकर कार्य करने की प्रतिबद्धता जताई।
- रक्षा सहयोग: भारत और जापान ने नौसैनिक रेडियो एंटीना “यूनिकॉर्न” (UNICORN) प्रणाली से जुड़े अपने पहले संयुक्त रक्षा सह-विकास (Co-development) प्रोजेक्ट का शुभारंभ किया।
- इसका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को बढ़ाना, रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देना है।
- स्वास्थ्य सेवा और जीव विज्ञान: दोनों देशों ने फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरणों और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
- इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य भारत की विनिर्माण क्षमता और जापान की तकनीकी उत्कृष्टता का लाभ उठाकर वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।
- जैव-ऊर्जा और सतत् विकास: भारत और जापान ने संयुक्त रूप से ‘भारत-जापान बायोगैस पहल’ (India–Japan Bio-gas Initiative) का शुभारंभ किया।
- इस पहल के अंतर्गत, संपूर्ण भारत में 1,000 बायोगैस और जैविक उर्वरक संयंत्र स्थापित किए जाएँगे।
- इसका उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, संधारणीय कृषि का समर्थन करना, अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार करना तथा ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करना है।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों और स्टार्ट-अप सहयोग
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), स्टार्ट-अप्स, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के मध्य सहयोग को बढ़ावा देने के लिए ‘भारत-जापान एसएमई फोरम’ (India–Japan SME Forum) की शुरुआत की गई।
- इस पहल का उद्देश्य टियर-II और टियर-III विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र (मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम) को मजबूत करना, नवाचार को बढ़ावा देना और व्यापक निवेश व तकनीकी साझेदारी को सुगम बनाना है।
- बुनियादी ढाँचा और कनेक्टिविटी: दोनों देशों ने मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया, 7,000 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेल नेटवर्क की संभावनाओं को तलाशने पर सहमति व्यक्त की, तथा E10 शिन्कान्सेन (Shinkansen) प्रौद्योगिकी के माध्यम से सहयोग को आगे बढ़ाया।
- जापान संधारणीय शहरी गतिशीलता और कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए मुंबई मेट्रो लाइन-11 और बंगलूरू मेट्रो चरण-3 सहित प्रमुख शहरी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का समर्थन जारी रखेगा।
- ऊर्जा सुरक्षा: दोनों देशों ने ‘ऊर्जा सुदृढ़ता पर संयुक्त वक्तव्य’ (Joint Statement on Energy Resilience) को अपनाया, जिसके तहत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, हाइड्रोजन, अमोनिया, एलएनजी (LNG), नवीकरणीय ऊर्जा और समुद्री ऊर्जा परिवहन में सहयोग का विस्तार किया गया। इसके अतिरिक्त, जापान ने ‘अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ (IEA) में भारत की सदस्यता के लिए अपने समर्थन को पुनः रेखांकित किया।
- जनसम्पर्क एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान: भारत और जापान जापानी भाषा शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, रचनात्मक उद्योगों (एनीमे, मंगा, गेमिंग) और कुशल कार्यबल की गतिशीलता में सहयोग का विस्तार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी
- दोनों देशों ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए क्वांटम प्रौद्योगिकियों, अंतरिक्ष अन्वेषण (ल्यूपेक्स मिशन), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वैज्ञानिक अनुसंधान और शैक्षणिक आदान-प्रदान में सहयोग को गहरा करने पर सहमति व्यक्त की।
सहयोग के विशिष्ट क्षेत्र
- द्विपक्षीय व्यापार: वित्तीय वर्ष 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार $27.5 बिलियन तक पहुँच गया, जबकि अप्रैल और दिसंबर 2025 के मध्य भारत में जापानी निवेश बढ़कर $3.2 बिलियन हो गया।
- बहुपक्षीय और वैश्विक शासन
- एक स्वतंत्र, खुले, समावेशी और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय आदेश को बढ़ावा देने के लिए क्वाड (Quad), G20 (G20), संयुक्त राष्ट्र, G4 (G4) और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (East Asia Summit) में समन्वय को मजबूत करना।
- इसके साथ ही, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सुधारों के प्रति पारस्परिक समर्थन को दोहराना, जिसमें संशोधित UNSC में एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता की उम्मीदवारी शामिल है।
- भारत-जापान डिजिटल साझेदारी (IJDP): वर्ष 2018 में स्थापित भारत-जापान डिजिटल साझेदारी (IJDP) ने स्टार्ट-अप्स और डिजिटल प्रतिभाओं के आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है और अब इसका विस्तार सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सहयोग तक हो गया है।
- कौशल विकास: वर्ष 2016 में हस्ताक्षरित भारत-जापान सहयोग ज्ञापन (MoC) के अंतर्गत, जापानी कंपनियों ने भारत में ‘जापान-इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मैन्युफैक्चरिंग’ (JIM) और भारतीय इंजीनियरिंग कॉलेजों में ‘जापानी एंडोव्ड कोर्सेज’ (JEC) की स्थापना की है।
- भारत-जापान एक्ट ईस्ट फोरम: दिसंबर 2017 में स्थापित, ‘एक्ट ईस्ट फोरम’ का उद्देश्य भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और जापान के “विजन ऑफ अ फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” के तत्त्वावधान में भारत-जापान सहयोग के लिए एक साझा मंच प्रदान करना है।
भारत-जापान संबंधों में विद्यमान चुनौतियाँ
- बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का धीमा क्रियान्वयन: जापान द्वारा किए गए व्यापक निवेश के बावजूद, ‘मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल’ जैसी प्रमुख परियोजनाओं के क्रियान्वयन में भूमि अधिग्रहण की समस्याओं, विनियामक स्वीकृतियों और लागत में वृद्धि के कारण विलंब देखा गया है। इससे द्विपक्षीय बुनियादी ढाँचा सहयोग की गति प्रभावित हुई है।
- व्यापार क्षमता का पूर्ण उपयोग न होना: यद्यपि भारत और जापान के बीच ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ स्थापित है, फिर भी द्विपक्षीय व्यापार अपनी वास्तविक क्षमता की तुलना में सीमित बना हुआ है। यह दोनों देशों के मध्य ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते’ (CEPA) के कम उपयोग को दर्शाता है।
- वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत-जापान द्विपक्षीय व्यापार $22.85 बिलियन रहा, जो भारत के कुल व्यापार का मात्र 2% है। यह इस क्षेत्र में व्यापक विस्तार की संभावनाओं को इंगित करता है।
- निरंतर व्यापार असंतुलन: मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और परिवहन उपकरणों के अत्यधिक आयात के कारण जापान के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बड़ा बना हुआ है। इसके विपरीत, जापानी बाजारों में भारतीय निर्यातों को गैर-टैरिफ बाधाओं और बाजार पहुँच संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- वित्तीय वर्ष 2023-24 में जापान को भारत का निर्यात $5.15 बिलियन था, जबकि आयात $17.69 बिलियन तक पहुँच गया था।
- विनियामक और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ संबंधी चिंताएँ: भारत में अपने निवेश का विस्तार करने के लिए जापानी निवेशक लगातार नीतिगत स्थिरता, विवादों के त्वरित निवारण, सरलीकृत कराधान (टैक्सेशन) और पूर्वानुमेय विनियामक ढाँचे की माँग कर रहे हैं।
- सीमित रक्षा औद्योगिक सहयोग: यद्यपि दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध गहरे हुए हैं, लेकिन विनियामक और खरीद संबंधी बाधाओं के कारण संयुक्त रक्षा सह-विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त विनिर्माण में प्रगति अपेक्षा से धीमी रही है।
- भिन्न रणनीतिक दृष्टिकोण: हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर सहमति होने के बावजूद, भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ जापान के सुरक्षा गठबंधन के कारण कभी-कभी दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं में भिन्नता उत्पन्न हो जाती है।
- चीन से प्रतिस्पर्द्धा और क्षेत्रीय भू-राजनीति: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का बढ़ता आर्थिक प्रभाव और सैन्य आक्रामकता दोनों देशों के क्षेत्रीय रणनीतिक आकलन को जटिल बनाती है तथा भू-राजनीतिक जोखिमों को बढ़ाती है।
- श्रम, भाषा और सांस्कृतिक बाधाएँ: जापानी भाषा में दक्षता की कमी, सांस्कृतिक अंतर और कौशल प्रमाणन के कड़े नियम अभी भी दोनों देशों के मध्य श्रम गतिशीलता और जनसंपर्क की पूर्ण क्षमता को प्रतिबंधित करते हैं।
- आपूर्ति शृंखला और विनिर्माण संबंधी बाधाएँ: बुनियादी ढाँचे की कमियाँ, उच्च लॉजिस्टिक्स लागत और विनियामक जटिलताएँ, ‘लचीली आपूर्ति शृंखला पहलों’ के तहत जापानी विनिर्माण इकाइयों को बड़े पैमाने पर भारत में स्थानांतरित करने की क्षमता को सीमित करती हैं।
- जापान की जनसांख्यिकीय और आर्थिक चुनौतियाँ: जापान की वृद्ध होती जनसंख्या, श्रमिकों की कमी और तुलनात्मक रूप से धीमी आर्थिक वृद्धि, भविष्य में भारत के साथ होने वाले निवेश के पैमाने और आर्थिक जुड़ाव को सीमित या धीमा कर सकती है।
आगे की राह
- बुनियादी ढाँचा और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में तेजी लाना: भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाओं, विनियामक स्वीकृतियों में तेजी लाकर तथा समन्वित कार्यान्वयन के माध्यम से मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल, औद्योगिक कॉरिडोर और मेट्रो परियोजनाओं जैसी प्रमुख पहलों की प्रगति की गति बढ़ाने के लिए समर्पित परियोजना निगरानी तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।
- आर्थिक एकीकरण को प्रगाढ़ करना: द्विपक्षीय व्यापार का विस्तार करने और 10 ट्रिलियन जापानी येन (JPY) के निजी निवेश लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत-जापान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) की समीक्षा को अंतिम रूप देना, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना, आपूर्ति शृंखला के लचीलेपन को मजबूत करना और एक स्थिर निवेश वातावरण का निर्माण करना आवश्यक है।
- रणनीतिक और रक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना: ‘यूनिकॉर्न’ (UNICORN) नौसैनिक रेडियो एंटीना प्रणाली से आगे बढ़कर संयुक्त रक्षा सह-विकास का विस्तार करना, रक्षा औद्योगिक साझेदारी को बढ़ावा देना, संयुक्त सैन्य अभ्यासों की आवृत्ति बढ़ाना तथा समुद्री क्षेत्र जागरूकता, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग को मजबूत करना चाहिए।
- भविष्य के अनुकूल तकनीकी साझेदारी का निर्माण: भारत-जापान डिजिटल साझेदारी के अंतर्गत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर, क्वांटम प्रौद्योगिकियों, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे (DPI), अंतरिक्ष अन्वेषण और स्टार्ट-अप नवाचार में सहयोग को बढ़ावा देकर भारत-जापान एआई संयुक्त वक्तव्य को व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित किया जाना चाहिए।
- ऊर्जा सुरक्षा और हरित विकास का विस्तार: स्वच्छ ऊर्जा और भारत के नेट-जीरो लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए हरित हाइड्रोजन, अमोनिया, जैव-ऊर्जा, एलएनजी (LNG), नवीकरणीय ऊर्जा और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में सहयोग को तीव्र करना तथा ‘भारत-जापान बायोगैस पहल’ का सफल कार्यान्वयन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- मानव संसाधन और जनसंपर्क सहयोग को बढ़ावा देना: भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने और जापान की कुशल कार्यबल संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जापानी भाषा शिक्षा, तकनीकी इंटर्न प्रशिक्षण कार्यक्रम (TITP), निर्दिष्ट कुशल श्रमिक (SSW) मार्ग, जापान-इंडिया इंस्टिट्यूट्स ऑफ मैन्युफैक्चरिंग (JIMs) और शैक्षणिक आदान-प्रदान के दायरे को विस्तृत किया जाना चाहिए।
- क्षेत्रीय और वैश्विक शासन को सुदृढ़ करना: एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के संकल्प को बनाए रखने, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के व्यापक सुधारों की संयुक्त रूप से वकालत करने के लिए क्वाड (Quad), G20, G4, संयुक्त राष्ट्र और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के माध्यम से समन्वय को और गहरा करना चाहिए।
- एक व्यापक रणनीतिक रोडमैप को संस्थागत रूप देना: इस साझेदारी को ‘एशियाई शताब्दी’ (Asian Century) के आधार स्तंभ में बदलने के लिए नियमित शिखर-स्तरीय समीक्षाओं, सुदृढ़ केंद्र-राज्य समन्वय, निजी क्षेत्र की व्यापक भागीदारी तथा व्यापार, प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढाँचे, रक्षा व सतत् विकास के क्षेत्रों में मापने योग्य परिणामों (Measurable Outcomes) के माध्यम से आठ-स्तंभों वाले रोडमैप को लागू किया जाना चाहिए।