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UNSC का ट्रिपल वीटो (1986)

23 Apr 2026

संदर्भ

23 अप्रैल, 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वर्ष 1986 के ट्रिपल वीटो’ की घटना के 40 वर्ष पूर्ण हो गए, यह एक ऐसी घटना थी, जो वीटो शक्ति और UNSC सुधारों पर होने वाली बहसों को आज भी प्रभावित करती है।

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वर्ष 1986 की घटना के बारे में

23 अप्रैल, 1986 को ‘ट्रिपल वीटो’ की एक दुर्लभ घटना घटी, जब तीन स्थायी सदस्यों ने लीबिया पर संयुक्त राज्य अमेरिका के हवाई हमलों (ऑपरेशन एल डोराडो कैन्यन) की निंदा करने वाले एक प्रस्ताव को रोक दिया।

  • प्रेरक कारक: संयुक्त राज्य अमेरिका ने पश्चिम बर्लिन (जर्मनी) के एक डिस्कोथेक पर हुए बम हमले के बाद लीबिया द्वारा प्रायोजित आतंकवाद पर आरोप लगाते हुए लीबिया पर जवाबी हमले किए।
  • मसौदा प्रस्ताव: गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) से जुड़े देशों द्वारा प्रस्तुत किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य लीबिया पर सैन्य कार्रवाई की औपचारिक रूप से निंदा करना था।
  • मतदान का परिणाम: इस प्रस्ताव को 9 स्वीकारात्मक वोट मिले, जो इस प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करते थे।
  • वीटो का प्रयोग: इस प्रस्ताव को बहुमत के समर्थन (9 स्वीकारात्मक वोट) के बावजूद, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और फ्राँस ने एक साथ अपने वीटो पॉवर (निषेधाधिकार) का प्रयोग किया।
    • यह घटना वैश्विक शासन की संरचनात्मक विषमता को उजागर करते हुए, बहुमत के निर्णय पर हावी होने वाली राजनीति का एक प्राथमिक उदाहरण बनी हुई है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के बारे में

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है, जिसे अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने, शांति स्थापना अभियानों को अधिकृत करने और प्रतिबंध लगाने का कार्य सौंपा गया है।
  • संरचना और निर्णय प्रक्रिया
    • कुल सदस्य: 15 (5 स्थायी सदस्य या P5; 10 अस्थायी सदस्य जो दो वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं)।
    • स्थायी पाँच (P5): संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्राँस, रूस और चीन।
    • निर्णय का नियम: किसी भी प्रस्ताव को अपनाने के लिए कम-से-कम 9 स्वीकारात्मक मतों की आवश्यकता होती है और किसी भी P5 सदस्य द्वारा वीटो (निषेधाधिकार) का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
  • वीटो पॉवर (निषेधाधिकार): वीटो पॉवर किसी भी P5 देश को बहुमत के समर्थन के बावजूद महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों को रोकने की अनुमति देती है। हालाँकि इसकी अक्सर आलोचना की जाती है, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इसे एक विशिष्ट रणनीतिक तर्क के साथ स्थापित किया गया था:-
    • वीटो तंत्र: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-27 के तहत, सभी महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए स्थायी सदस्यों के मतों की आवश्यकता होती है।
    • रणनीतिक विशेषाधिकार: वीटो की स्थापना यह सुनिश्चित करने के लिए की गई थी कि संयुक्त राष्ट्र ऐसी कार्रवाइयों को अधिकृत न करे, जिससे विश्व की प्रमुख परमाणु शक्तियों के बीच सीधा सैन्य टकराव हो सके।
    • महाशक्तियों की समावेशिता: यह सुनिश्चित करता है कि प्रमुख शक्तियाँ संयुक्त राष्ट्र के दायरे में ही रहें, और एकतरफा कार्रवाई के जरिए व्यवस्था को दरकिनार न करें।
    • स्थिरता तंत्र: परमाणु-संपन्न शक्तियों के बीच सीधे टकराव के जोखिम को कम करता है, जो वैश्विक स्थिरता में योगदान देता है।
    • सहमति का सिद्धांत: अंतरराष्ट्रीय निर्णय लेने की प्रक्रिया में महाशक्तियों की सहमति के सिद्धांत को साकार करता है।

वीटो (निषेधाधिकार) का कानूनी आधार

  • चार्टर का प्रावधान (अनुच्छेद-27): संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद-27 सुरक्षा परिषद (UNSC) के मतदान को नियंत्रित करता है, जिसके अनुसार महत्त्वपूर्ण निर्णयों के लिए 9 स्वीकारात्मक मतों के साथ-साथ स्थायी सदस्यों की सहमति आवश्यक है।
  • सहमति (Concurrence) की व्याख्या: सहमति’ शब्द की व्याख्या नकारात्मक वोट की अनुपस्थिति के रूप में की गई है, जिसका अर्थ है कि कोई भी P5 सदस्य वीटो के माध्यम से किसी प्रस्ताव को रोक सकता है।
  • प्रक्रियात्मक बनाम मूल मामलों में अंतर: प्रक्रियात्मक मामलों (जिन पर वीटो लागू नहीं होता है) और मूल मामलों (जिन पर वीटो लागू होता है) के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर मौजूद है; यह सुनिश्चित करता है कि विचार-विमर्श को बाधित न किया जा सके, किंतु निर्णयों को नियंत्रित किया जा सके।
  • विवाद में शामिल पक्ष संबंधी खंड: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 27(3) यह सिद्धांत स्थापित करता है कि विवाद का पक्षकार होने वाली पार्टी मतदान से अलग रहेगी’, लेकिन वास्तविकता में इसके परिणाम काफी सीमित रहे हैं।
  • वैधानिकता बनाम वैधता: वीटो कानूनी रूप से मान्य है, लेकिन नैतिक दृष्टि से यह विवादित है; यह एक ऐसी व्यवस्था को दर्शाता है, जो बहुमत के शासन के बजाय महाशक्तियों की आम सहमति को प्राथमिकता देती है।
  • अनुच्छेद-108 के माध्यम से मजबूती: अनुच्छेद-108 (संशोधन प्रक्रिया) वीटो सुधार को कठिन बना देता है, क्योंकि चार्टर के किसी भी संशोधन के लिए सभी P5 सदस्यों द्वारा पुष्टि की आवश्यकता होती है; इस प्रकार, यह प्रभावी रूप से उन्हें सुधार प्रक्रिया पर ही नियंत्रण प्रदान करता है।
  • दोहरी वीटो व्यवस्था: ‘दोहरी वीटो’ व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र चार्टर में प्रक्रियागत बनाम मूल मामलों को लेकर मौजूद अस्पष्टता का लाभ उठाती है। P5 का कोई भी सदस्य पहले किसी मामले के वर्गीकरण पर वीटो कर सकता है और उसके बाद प्रस्ताव पर भी वीटो कर सकता है, जिससे एजेंडा तथा परिणामों पर उसका पूर्ण नियंत्रण सुनिश्चित हो जाता है।

वीटो शक्ति

वीटो के पक्ष में तर्क वीटो के विरुद्ध तर्क
महाशक्तियों के बीच संघर्ष को रोकता है: यह सुनिश्चित करता है कि संयुक्त राष्ट्र ऐसे किसी भी निर्णय को मंजूरी न दे, जिससे परमाणु शक्तियों के बीच सीधा युद्ध छिड़ सकता हो। लोकतांत्रिक घाटा: कोई एक राष्ट्र (या वर्ष 1986 की तरह तीन राष्ट्रों का समूह) बहुमत की इच्छा को निरस्त कर सकता है, जिससे लोकतांत्रिक वैधता कमजोर पड़ती है।
संस्थागत यथार्थवाद: यह स्वीकार करता है कि संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी बने रहने के लिए सबसे शक्तिशाली राष्ट्रों की भागीदारी की आवश्यकता है। भू-राजनीतिक गतिरोध: मानवीय संकटों के दौरान परिषद अक्सर तब अप्रभावी हो जाती है, जब P5 का कोई सदस्य या उसका कोई सहयोगी उस संघर्ष में एक पक्ष होता है।
आम सहमति निर्माण: सैद्धांतिक रूप से, यह P5 सदस्यों को पूर्ण गतिरोध से बचने के लिए बीच का रास्ता निकालने वाले समाधानों पर बातचीत करने के लिए बाध्य करता है। पारंपरिक संरचना: P5 वर्ष 1945 के विश्व को दर्शाता है, और ‘ग्लोबल साउथ’ की शक्तियों के उदय को ध्यान में रखने में विफल रहता है।

आधुनिक अपडेट – ‘वीटो पहल’ (2022)

इन चुनौतियों से निपटने के लिए अप्रैल 2022 में वैश्विक शासन में एक महत्त्वपूर्ण सुधार किया गया:

  • प्रस्ताव: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अब यह अनिवार्य कर दिया है कि जब भी वीटो का प्रयोग किया जाएगा, संयुक्त राष्ट्र महासभा को 10 कार्य दिवसों के भीतर बैठक करनी होगी।
  • जवाबदेही: वीटो का उपयोग करने वाले P5 सदस्य को अपने निर्णय का औचित्य सिद्ध करने के लिए महासभा के समक्ष उपस्थित होना होगा, जिससे पारदर्शिता और नैतिक दबाव बढ़ता है।

भारत का दृष्टिकोण और सुधार की वकालत

एक संस्थापक सदस्य और ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रतिनिधि के रूप में, भारत वर्ष 1986 के ट्रिपल वीटो (Triple Veto) को इस प्रमाण के रूप में देखता है कि सुरक्षा परिषद संरचनात्मक रूप से असंतुलित है।

  • G4 पहल: भारत, स्थायी सदस्यता के विस्तार पर जोर देने के लिए जर्मनी, जापान और ब्राजील के साथ साझेदारी करता है।
  • L.69 समूह का नेतृत्व: G4 से परे, भारत L.69 समूह (40+ विकासशील देश) का नेतृत्व करता है, जो ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व की वकालत करता है। यह न्यायसंगत बहुपक्षवाद और लोकतांत्रिक वैश्विक शासन के प्रयास को दर्शाता है।
  • मुख्य माँगें: भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए स्थायी प्रतिनिधित्व और वीटो प्रणाली में सुधार की वकालत करता है, जिसमें सामूहिक अत्याचारों (Mass Atrocities) के मामलों में इसके उपयोग को प्रतिबंधित करना शामिल है।
  • रणनीतिक तर्क: भारत का तर्क है कि सुरक्षा परिषद को प्रासंगिक बने रहने के लिए समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए और विकासशील दुनिया को न्यायसंगत प्रतिनिधित्व प्रदान करना चाहिए।

निष्कर्ष

वर्ष 1986 का सुरक्षा परिषद का ट्रिपल वीटो, शक्ति और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के बीच स्थायी तनाव को उजागर करता है। यह एक अधिक प्रतिनिधि, जवाबदेह और प्रभावी सुरक्षा परिषद की तत्काल आवश्यकता पर बल देता है, जो युद्ध के बाद की वास्तविकताओं के बजाय 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप हो।

UNSC का ट्रिपल वीटो (1986)

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