संदर्भ
हाल ही में भारत एवं संयुक्त राज्य अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स तथा दुर्लभ मृदा तत्त्व (REEs) की आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने हेतु एक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए।
संबंधित तथ्य
- इसी के साथ, क्वाड साझेदारों ने एक संयुक्त ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ पहल की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य एकल-स्रोत प्रभुत्व (Single-source Dominance) से हटकर वैश्विक खनन एवं प्रसंस्करण क्षमताओं के विस्तार हेतु 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक की राशि जुटाना है।
समझौते के मुख्य बिंदु
यह समझौता वैश्विक प्रौद्योगिकी अवसंरचना की सुरक्षा हेतु रणनीतिक संसाधनों के लिए विश्वसनीय एवं वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग स्थापित करने पर केंद्रित है।
- द्वि-स्तरीय कूटनीति: यह साझेदारी एक द्विपक्षीय भारत–अमेरिका ढाँचे के साथ-साथ बहुपक्षीय क्वाड पहल (G4 — भारत, अमेरिका, जापान एवं ऑस्ट्रेलिया) के माध्यम से कार्य करती है।
- वित्तीय संसाधन जुटाना: G4 समूह वैश्विक स्तर पर खनन, परिशोधन एवं पुनर्चक्रण अवसंरचना को समर्थन देने हेतु सार्वजनिक एवं निजी वित्तपोषण के रूप में 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक जुटाने का लक्ष्य रखता है।
- भारत–अमेरिका फ्रेमवर्क का दायरा: भारत के विदेश मंत्री एवं अमेरिका के विदेश मंत्री द्वारा हस्ताक्षरित यह समझौता रणनीतिक खनिजों के संपूर्ण जीवन-चक्र को शामिल करता है, जिसमें अन्वेषण, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण एवं संयुक्त वाणिज्यिक निवेश सम्मिलित हैं।
- लक्षित रणनीतिक उद्योग: खनिज आपूर्ति शृंखलाएँ सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन (EVs), स्वच्छ/नवीकरणीय ऊर्जा ग्रिड तथा उन्नत रक्षा प्रणालियों जैसे संवेदनशील एवं उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों को समर्थन देने हेतु निर्धारित की गई हैं।
- भू-राजनैतिक उद्देश्य: इस समझौते का उद्देश्य अत्यधिक केंद्रीकृत विनिर्माण केंद्रों पर निर्भरता कम करना तथा निर्यात प्रतिबंधों अथवा खनिज बाजारों के राजनीतिक दुरुपयोग से जुड़े जोखिमों को कम करना है।
- संस्थागत समन्वय: यह फ्रेमवर्क पूर्व राजनयिक प्रतिबद्धताओं का विस्तार करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं, अमेरिका-नेतृत्व वाले ‘फोरम ऑन रिसोर्स जियोस्ट्रेटेजिक एंगेजमेंट’ (FORGE) तथा उच्च-प्रौद्योगिकी अवसंरचना साझेदारियों के साथ एकीकृत होता है।
- क्रिटिकल मिनरल्स एवं दुर्लभ मृदा तत्त्व क्या हैं?
- क्रिटिकल मिनरल्स: लीथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट एवं गैलियम जैसे खनिज, जो उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, किंतु उनकी आपूर्ति में व्यवधान की गंभीर संवेदनशीलता होती है।
- दुर्लभ मृदा तत्त्व (REEs): 17 धातुओं का एक विशिष्ट समूह — स्कैंडियम, यिट्रियम (Yttrium) एवं 15 लैंथेनाइड्स (Lanthanides) — जो अपने विशिष्ट चुंबकीय एवं प्रकाशीय (Luminescent) गुणों के लिए जाने जाते हैं तथा रक्षा उपकरणों एवं हरित प्रौद्योगिकियों में महत्त्वपूर्ण हैं।
- G4/क्वाड रणनीति: यह पहल साझेदार देशों में खनन, उन्नत खनिज पुनर्प्राप्ति एवं पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में उच्च पर्यावरणीय, सामाजिक एवं प्रशासनिक (ESG) मानकों पर बल देती है।
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भारत के लिए महत्त्व
- स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना: लीथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट एवं दुर्लभ मृदा तत्त्व जैसे क्रिटिकल मिनरल्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EVs), बैटरी भंडारण, सौर पैनल, पवन टरबाइन एवं नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना के लिए अनिवार्य हैं, जिससे वे भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के केंद्र में हैं।
- सेमीकंडक्टर एवं उन्नत विनिर्माण को बढ़ावा: क्रिटिकल मिनरल्स की विश्वसनीय उपलब्धता, मेक इन इंडिया एवं आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों के अंतर्गत भारत की सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, बैटरी उत्पादन एवं उच्च-प्रौद्योगिकी औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं को समर्थन दे सकती है।
- चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता में कमी: यह ढाँचा भारत को विशेष रूप से दुर्लभ मृदा तत्त्व प्रसंस्करण एवं खनिज परिशोधन में अत्यधिक केंद्रीकृत आपूर्ति शृंखलाओं से विविधीकरण को सक्षम बनाता है, जिससे निर्यात प्रतिबंधों, भू-राजनैतिक दबाव एवं आपूर्ति व्यवधानों के प्रति संवेदनशीलता कम होगी।
- संसाधन कूटनीति का विस्तार: क्रिटिकल मिनरल्स भारत की अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, अर्जेंटीना, चिली, अफ्रीकी देशों एवं रूस जैसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियों का प्रमुख आधार बनते जा रहे हैं, जिससे भारत की आर्थिक एवं भू-राजनैतिक भागीदारी सुदृढ़ होती है।
- रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: क्रिटिकल मिनरल्स तक सुरक्षित पहुँच भारत की रक्षा प्रौद्योगिकियों, स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, एयरोस्पेस, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों एवं उन्नत विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत कर सकती है, जिससे दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता सुदृढ़ होगी।
चुनौतियाँ
- सीमित घरेलू प्रसंस्करण एवं परिशोधन क्षमता: यद्यपि भारत के पास खनिज भंडार उपलब्ध हैं, फिर भी खनिज परिशोधन, पृथक्करण प्रौद्योगिकी, प्रसंस्करण अवसंरचना एवं मूल्य संवर्द्धन की पर्याप्त क्षमता का अभाव है, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में इसका एकीकरण सीमित रहता है।
- पर्यावरणीय एवं सामाजिक चिंताएँ: यदि खनन गतिविधियों का सतत् रूप से विनियमन नहीं किया जाए, तो क्रिटिकल मिनरल्स का उत्खनन पारिस्थितिकी निम्नीकरण, जल संकट, स्थानीय समुदायों के विस्थापन एवं जनजातीय अधिकारों से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
- बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा: स्वच्छ ऊर्जा एवं उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योगों के तीव्र विस्तार ने क्रिटिकल मिनरल्स हेतु वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ा दिया है, जिससे दीर्घकालिक आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
- विदेशी संसाधन अधिग्रहण में जोखिम: विदेशी खनन परिसंपत्तियों में भारतीय निवेश को राजनीतिक अस्थिरता, संसाधन आधारित राष्ट्रवाद, नियामकीय अनिश्चितता एवं लॉजिस्टिक कमजोरियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
- बाहरी आपूर्ति शृंखलाओं पर रणनीतिक निर्भरता: क्रिटिकल मिनरल्स के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता विशेषतः रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भारत को मूल्य अस्थिरता, भू-राजनैतिक तनाव एवं बाह्य बाजार व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
आगे की राह
- घरेलू अन्वेषण एवं मैपिंग को सुदृढ़ करना: भारत को क्रिटिकल मिनरल्स के भंडारों की खोज एवं उत्खनन में तेजी लाने हेतु भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, खनिज मानचित्रण, अन्वेषण प्रोत्साहन तथा पारदर्शी नीलामी तंत्र का विस्तार करना चाहिए।
- प्रसंस्करण एवं परिशोधन पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: नीतिगत फोकस केवल खनिज अधिग्रहण तक सीमित न रहकर प्रसंस्करण, परिशोधन, पृथक्करण प्रौद्योगिकी तथा ‘डाउनस्ट्रीम’ मूल्यवर्द्धित विनिर्माण क्षमताओं के विकास पर केंद्रित होना चाहिए।
- पुनर्चक्रण एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: भारत को बैटरी पुनर्चक्रण, ई-कचरा पुनर्प्राप्ति, शहरी खनन एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था ढाँचों को मजबूत करना चाहिए, ताकि आयात निर्भरता कम हो तथा संसाधन दक्षता को बढ़ावा मिले।
- सतत् एवं उत्तरदायी खनन सुनिश्चित करना: क्रिटिकल मिनरल्स रणनीतियों में रणनीतिक एवं आर्थिक प्राथमिकताओं के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा, जनजातीय अधिकार संरक्षण, भूमि अधिकार तथा सामुदायिक भागीदारी तंत्र के मध्य संतुलन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक साझेदारियों को बढ़ावा देना: भारत को विश्वसनीय साझेदार देशों के साथ प्रौद्योगिकी-साझाकरण समझौतों, विदेशी खनन साझेदारियों एवं सुदृढ़ आपूर्ति शृंखला पहलों के माध्यम से द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना चाहिए।