संदर्भ
हालिया चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि वैश्विक GDP रैंकिंग में भारत की स्थिति को अक्सर आर्थिक प्रगति के एक संकेतक के रूप में प्रयोग किया जाता है; हालाँकि, इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित संरचनात्मक वास्तविकताओं की समझ विकृत हो सकती है।
संबंधित तथ्य
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा जारी नवीनतम ‘विश्व आर्थिक परिदृश्य’ (WEO) के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था गिरावट के साथ दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है, जिसे जापान और ब्रिटेन ने पीछे छोड़ दिया है।
- इससे पहले, भारत चौथे स्थान पर था।
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के बारे में
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की घरेलू सीमा के भीतर एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष) के दौरान उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य होता है।
- यह आर्थिक प्रदर्शन का सबसे व्यापक रूप से प्रयोग किया जाने वाला संकेतक है।
- वर्ष 2025-26 के लिए वास्तविक GDP वृद्धि 7.6% रहने का अनुमान है, जो वर्ष 2024-25 में दर्ज 7.1% से अधिक है।
- GDP अनुमानों के लिए आधार वर्ष: भारत की बदलती आर्थिक संरचना को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए इसे वर्ष 2011–12 से संशोधित करके वर्ष 2022–23 कर दिया गया है।
- संशोधित GDP शृंखला ASUSE, PLFS, GST, PFMS आदि जैसे नए और बेहतर डेटा स्रोतों को शामिल करके अनुमान प्रक्रिया को और मजबूत बनाती है।
- GDP के प्रकार
- नॉमिनल जीडीपी (Nominal GDP)
- मौजूदा कीमतों पर मापा जाता है।
- इसमें महँगाई का असर शामिल होता है।
- रियल जीडीपी (Real GDP)
- स्थिर (आधार-वर्ष) कीमतों पर मापा जाता है।
- उत्पादन में हुई वास्तविक वृद्धि को दर्शाता है।
- बाजार मूल्य बनाम कारक लागत पर GDP
- बाजार मूल्य पर GDP (GDP MP): इसमें (कर–सब्सिडी) शामिल हैं।
- कारक लागत पर GDP (GDP FC): उत्पादन के कारकों द्वारा अर्जित आय।
रैंकिंग भ्रामक क्यों हो सकती है (‘मापन’ की समस्या)
नॉमिनल GDP में भारत की वैश्विक रैंकिंग इन कारकों से प्रभावित होती है:
- विनिमय दर में उतार-चढ़ाव: अमेरिकी डॉलर (USD) के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) के अवमूल्यन से डॉलर के रूप में भारत की GDP का मूल्य कम हो जाता है।
- इस प्रकार, घरेलू उत्पादन में कोई वास्तविक गिरावट न होने पर भी रैंकिंग घट सकती है।
- सांख्यिकीय संशोधन: GDP की गणना की पद्धति में परिवर्तन से ऐतिहासिक अनुमान बदल सकते हैं।
- इससे तुलनात्मकता प्रभावित होती है और बिना किसी वास्तविक संरचनात्मक बदलाव के वृद्धि विमर्श (Growth Narratives) पुनः स्थापित की जा सकती हैं।
- इसलिए, नॉमिनल GDP रैंकिंग में होने वाले बदलाव आवश्यक नहीं कि वास्तविक आर्थिक परिवर्तन को ही दर्शाते हों।
प्रमुख चिंताएँ और चुनौतियाँ जिनका समाधान किया जाना आवश्यक है:
रैंकिंग पर ध्यान केंद्रित करने से इन गहन समस्याओं से ध्यान हट गया है:
- K-आकार का वृद्धि पैटर्न (K-Shaped Growth Pattern): यह एक भिन्न आर्थिक सुधार का वर्णन करता है, जहाँ समाज के विभिन्न वर्ग विपरीत दिशाओं में आगे बढ़ते हैं।
- जनसंख्या के शीर्ष 1% हिस्से के पास अब राष्ट्रीय आय का लगभग 22.6% हिस्सा है, जबकि निम्न और मध्यम आय वर्ग स्थिर वेतन और बढ़ती लागत का अनुभव कर रहे हैं।
- रोजगारविहीन वृद्धि की घटना (Jobless Growth Phenomenon): ऐतिहासिक रूप से, उच्च जीडीपी (GDP) वृद्धि से उच्च रोजगार सृजन होता था। आज, भारत की ‘रोजगार लोचशीलता’ (GDP वृद्धि के प्रति रोजगार वृद्धि की प्रतिक्रिया) शून्य के करीब है।
- भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह युवाओं के लिए वार्षिक रूप से आवश्यक 80 लाख नौकरियों का सृजन नहीं कर पा रही है।
- अपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन: एक स्वस्थ वृद्धि मॉडल में श्रम, कृषि से विनिर्माण और फिर सेवाओं की ओर बढ़ता है।
- भारत ने विनिर्माण चरण को दरकिनार कर दिया है; दशकों से रोजगार में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 12% पर स्थिर बनी हुई है।
- फलस्वरूप, श्रमिक कृषि कार्यों के बजाय निम्न-स्तर के, अनुत्पादक सेवा कार्यों की ओर जा स्थानांतरित हो रहे हैं।
- संकट-प्रेरित स्वरोजगार: ‘उद्यमिता’ में वृद्धि को अक्सर सकारात्मक रूप से उद्धृत किया जाता है। हालाँकि, भारत में स्वरोजगार का एक बड़ा हिस्सा संकट से प्रेरित है।
- लोग छोटे पैमाने के, अनौपचारिक कार्य पसंद से नहीं, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि औपचारिक क्षेत्र में नौकरियाँ उपलब्ध नहीं हैं।
- एक क्षतिपूर्ति तंत्र के रूप में कल्याण: तथ्य यह है कि सबसे गरीब 10% आबादी अपनी क्रय शक्ति के 80% के लिए सरकारी कल्याणकारी हस्तांतरण पर निर्भर है, जो बाजार की विफलता का संकेत है।
- यह सिद्ध करता है कि अर्थव्यवस्था उचित वेतन के माध्यम से पर्याप्त ‘बाजार-आधारित’ आय प्रदान करने में विफल रही है।
- क्षेत्रीय आर्थिक विखंडन: भारत का विकास भौगोलिक रूप से विषम है। केवल पाँच दक्षिणी राज्य राष्ट्रीय जीडीपी में लगभग 30% का योगदान देते हैं।

मुख्य शब्दावली
- नॉमिनल जीडीपी (Nominal GDP): नॉमिनल जीडीपी, एक देश के अंतर्गत उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को संदर्भित करती है, जिसे अमेरिकी डॉलर (USD) में मौजूदा बाजार कीमतों पर मापा जाता है।
- मुख्य विशेषताएँ
- मूल्य प्रभाव शामिल: यह उत्पादन (मात्रा) और मूल्य (मुद्रास्फीति) दोनों के कारण होने वाले परिवर्तनों को दर्शाता है।
- वर्तमान मूल्य माप: इसमें उसी वर्ष की प्रचलित बाजार कीमतों का उपयोग किया जाता है।
- वृद्धि को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना: मुद्रास्फीति के दौरान, यह उच्च वृद्धि दिखा सकता है, भले ही वास्तविक उत्पादन में अधिक वृद्धि न हुई हो।
- K-आकार का सुधार (K-Shaped Recovery): ऐसी स्थिति जिसमें अर्थव्यवस्था असमान रूप से सँभलती है; धनी और तकनीक-सक्षम क्षेत्र विकसित (K की ऊपर की ओर जाने वाली भुजा) होते हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र और कम वेतन पाने वाले लोग गिरावट (K की नीचे की ओर जाने वाली भुजा) का सामना करना जारी रखते हैं।
- रोजगार लोचशीलता (Employment Elasticity): यह एक तकनीकी माप है कि आर्थिक वृद्धि की प्रत्येक इकाई के लिए कितनी नौकरियों का सृजन होता है। घटती लोच यह संकेत देती है कि अर्थव्यवस्था अधिक पूँजी-प्रधान हो रही है और मानव श्रम पर कम निर्भर है।
- संरचनात्मक परिवर्तन (Structural Transformation): वह प्रक्रिया जिसके द्वारा एक अर्थव्यवस्था अपने श्रम बल को कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों (जैसे- जीवन निर्वाह कृषि) से उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों (जैसे- आधुनिक विनिर्माण) की ओर स्थानांतरित करती है।
- संकटपूर्ण रोजगार (Distress Employment): ऐसा रोजगार, जो वृद्धि के बजाय अस्तित्व बचाने के लिए किया जाता है, जो आमतौर पर कम वेतन, सामाजिक सुरक्षा के अभाव और काम की खराब स्थितियों की विशेषता रखता है।
- राजकोषीय क्षतिपूर्ति (Fiscal Compensation): जब राज्य बजटीय खर्च (कल्याणकारी योजनाओं) का उपयोग इस तथ्य की भरपाई के लिए करता है कि निजी अर्थव्यवस्था श्रमिकों को जीवित रहने के लिए पर्याप्त भुगतान नहीं कर रही है।
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आगे की राह
“बड़ी अर्थव्यवस्था” से “विकसित अर्थव्यवस्था” बनने के लिए, भारत को रैंक के बजाय संरचना पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
- श्रम-प्रधान उद्योगों को पुनर्जीवित करना: सरकार को कपड़ा, चमड़ा और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए। पूँजी-प्रधान तकनीक या भारी उद्योगों के विपरीत, ये क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों के अतिरिक्त श्रम के लिए एक “स्पंज” के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- रोजगार लोचशीलता (Employment Elasticity) को लक्षित करना: सफलता का मापन केवल जीडीपी वृद्धि के प्रतिशत के बजाय इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वृद्धि के प्रत्येक प्रतिशत के साथ कितनी गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का सृजन हुआ है।
- क्षेत्रीय विभाजन को पाटना: बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे और औद्योगिक प्रोत्साहनों को पूर्वी तथा उत्तरी भारत की ओर निर्देशित किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि विकास भौगोलिक रूप से समावेशी हो।
- कल्याण से मजदूरी की ओर बढ़ना: हालाँकि कल्याण एक आवश्यक सुरक्षा जाल है, लेकिन दीर्घकालिक लक्ष्य मजदूरी-आधारित वृद्धि होनी चाहिए, जहाँ नागरिक स्थायी रूप से राज्य पर निर्भर रहने के बजाय बाजार के माध्यम से स्वयं के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त कमाई कर सकें।
निष्कर्ष
आर्थिक वृद्धि की सतही व्याख्या से आगे बढ़ने के लिए, भारत को अपना ध्यान कुल जीडीपी के आकार से हटाकर संरचनात्मक मजबूती पर केंद्रित करना चाहिए। ‘विकसित’ होने का दर्जा कुल उत्पादन में अन्य देशों से आगे निकलने पर नहीं, बल्कि रोजगार लोचशीलता में सुधार करने, आय की असमानता को कम करने और एक संतुलित क्षेत्रीय परिवर्तन सुनिश्चित करने पर निर्भर करता है।