संदर्भ
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 भारत में रोजगार संकेतकों में सुधार को दर्शाता है, साथ ही कौशल, महिलाओं की भागीदारी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन से संबंधित निरंतर चुनौतियों को भी उजागर करता है।
PLFS 2025 के प्रमुख बिंदु
- रोजगार संकेतकों में सुधार: PLFS 2025 में श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 59%, कार्यबल भागीदारी दर (WPR) 57% और बेरोजगारी दर 3% दर्ज की गई।
- औपचारिक रोजगार में वृद्धि: नियमित वेतनभोगी रोजगार 22% से बढ़कर 24% हो गया, जो श्रम बाजार के क्रमिक औपचारीकरण और सामाजिक सुरक्षा लाभों तक बेहतर पहुँच को दर्शाता है।
- महिलाओं की भागीदारी में सुधार: महिला श्रम बल भागीदारी में वृद्धि हुई, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, जो आर्थिक समावेशन और रोजगार अवसरों तक बेहतर पहुँच को दर्शाता है।
- संरचनात्मक आर्थिक परिवर्तन: कृषि का रोजगार में हिस्सा 43% तक घट गया, जबकि विनिर्माण और सेवाओं का विस्तार हुआ, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के क्रमिक संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है।
- महिलाओं की श्रम दर में अधिक वृद्धि: महिलाओं की आय वेतनभोगी, स्व-रोजगार और आकस्मिक श्रम श्रेणियों में पुरुषों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ी, हालाँकि लैंगिक वेतन असमानताएँ अभी भी बनी हुई हैं।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) वार्षिक रिपोर्ट के बारे में
- राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) रोजगार और बेरोजगारी के विश्लेषण हेतु उच्च-आवृत्ति श्रम बाजार डेटा उत्पन्न करने के लिए PLFS का संचालन करता है।
- प्रकाशन: सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)।
- अवधि: वर्ष 2025 की रिपोर्ट जनवरी–दिसंबर 2025 को कवर करती है, जो पहले के जुलाई–जून कृषि चक्र से परिवर्तन को दर्शाती है।
- कार्यप्रणाली में परिवर्तन: संशोधित नमूना डिजाइन के साथ नमूना आकार (~2.7 लाख परिवार) बढ़ाया गया और अधिक सटीकता के लिए रोटेशनल पैनल प्रणाली अपनाई गई।
- मुख्य संकेतक
- श्रम बल भागीदारी दर (LFPR): 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन व्यक्तियों का प्रतिशत जो श्रम बल का हिस्सा हैं।
- श्रम बल में शामिल हैं:
- कार्यरत व्यक्ति (रोजगार प्राप्त)
- कार्य की तलाश में या उपलब्ध व्यक्ति (बेरोजगार)।
- यह आर्थिक गतिविधियों में जनसंख्या की सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है।
- कार्यबल जनसंख्या अनुपात (WPR): 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन व्यक्तियों का प्रतिशत जो जनसंख्या में रोजगार प्राप्त हैं।
- इसमें सभी व्यक्ति शामिल हैं, जो किसी भी आर्थिक गतिविधि में संलग्न हैं (वेतन/अवैतनिक, औपचारिक/अनौपचारिक)।
- यह जनसंख्या में वास्तविक रोजगार स्तर को दर्शाता है।
- बेरोजगारी दर (UR): 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के उन व्यक्तियों का प्रतिशत जो श्रम बल में होने के बावजूद बेरोजगार हैं।
- बेरोजगार वे व्यक्ति होते हैं, जो कार्य नहीं कर रहे हैं, लेकिन कार्य की तलाश में हैं/उपलब्ध हैं।
- यह सक्रिय श्रम बल के अंतर्गत बेरोजगारी को मापता है (न कि कुल जनसंख्या में)।
- गतिविधियों की स्थिति का मापन
- सामान्य स्थिति (PS+SS): पिछले 365 दिनों के आधार पर (मुख्य + सहायक गतिविधियाँ)।
- वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (CWS): पिछले 7 दिनों के आधार पर, जो अल्पकालिक रोजगार गतिशीलता को दर्शाता है।
- श्रम प्रवृत्तियों को प्रभावित करने वाले कारक: शिक्षा स्तर, लैंगिक भूमिकाएँ, क्षेत्रीय परिवर्तन और शहरी–ग्रामीण अंतर, रोजगार पैटर्न को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।
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भारत के श्रम बाजार से संबंधित चुनौतियाँ
- शिक्षा-रोजगार असंगति: वर्ष 2004–2023 के मध्य प्रतिवर्ष लगभग 5 मिलियन स्नातक श्रम बाजार में प्रवेश करते रहे, लेकिन केवल लगभग 2.8 मिलियन को ही रोजगार के अवसर प्राप्त हुए।
- शैक्षिक उपलब्धि में वृद्धि के अनुरूप औपचारिक क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता युक्त रोजगार सृजन नहीं हो पाया है।
- कौशल प्रशिक्षण का निम्न स्तर: 15–59 वर्ष आयु वर्ग के केवल 4% व्यक्तियों ने औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया, जबकि प्रशिक्षित श्रमिकों में बेहतर रोजगार परिणाम देखे गए हैं।
- औपचारिक रूप से प्रशिक्षित व्यक्तियों में कार्यबल भागीदारी पुरुषों के लिए 83% और महिलाओं के लिए 51% रही, जो कौशल विकास पहलों के महत्त्व को दर्शाती है।
- स्थायी लैंगिक बाधाएँ: महिलाएँ अभी भी अवैतनिक देखभाल कार्य, बाल देखभाल जिम्मेदारियाँ और घरेलू दायित्वों के कारण बाधाओं का सामना करती हैं, जो उनकी सतत् कार्यबल भागीदारी को सीमित करती हैं।
- शहरी स्व-रोजगार पुरुष महिलाओँ की तुलना में प्रति सप्ताह लगभग 17.5 घंटे अधिक कार्य करते हैं, जो अवैतनिक घरेलू श्रम के असमान बोझ को दर्शाता है।
- उच्च NEET (शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में नहीं) जनसंख्या: 15–29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 25% युवा NEET (शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में नहीं) श्रेणी में हैं, जो जनसांख्यिकीय क्षमता के अपर्याप्त उपयोग को दर्शाता है।
- कई NEET युवा बेरोजगारी आँकड़ों से बाहर रह जाते हैं क्योंकि वे सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश नहीं कर रहे होते हैं।
- अनौपचारिकता और वेतन असमानताएँ: महिलाएँ वेतनभोगी कार्य में पुरुषों की तुलना में लगभग 76%, आकस्मिक श्रम में 69% और स्व-रोजगार श्रेणियों में केवल 36% आय अर्जित करती हैं।
- अनौपचारिक रोजगार और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा के अभाव आय सुरक्षा और उत्पादकता वृद्धि को प्रभावित करते रहते हैं।
श्रम की स्थिति में सुधार हेतु पहल (UPSC CSE Pre 2018)
| सरकारी पहल |
प्रारंभ वर्ष |
नोडल मंत्रालय/विभाग |
मुख्य फोकस क्षेत्र |
| कौशल भारत मिशन |
2015 |
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) |
उद्योग-उन्मुख व्यावसायिक प्रशिक्षण, अपस्किलिंग और अप्रेंटिसशिप के माध्यम से रोजगार योग्यता में सुधार। |
| प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) |
2015 |
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) |
अल्पकालिक कौशल प्रशिक्षण, पूर्व अधिगम की मान्यता (RPL) और प्रमाणन द्वारा कार्यबल भागीदारी तथा औपचारिक रोजगार को बढ़ाना। |
| राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS) |
2016 |
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) |
उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन देकर अप्रेंटिसशिप आधारित अधिगम और रोजगार-संबद्ध प्रशिक्षण को बढ़ावा। |
| स्टैंड-अप इंडिया योजना |
2016 |
वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवा विभाग |
महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए ग्रीनफील्ड उद्यमों हेतु बैंक ऋण द्वारा उद्यमिता को बढ़ावा। |
| प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) |
2015 |
वित्त मंत्रालय, वित्तीय सेवा विभाग |
छोटे उद्यमियों, विशेषकर महिलाओं के लिए बिना संपार्श्विक के ऋण द्वारा स्वरोजगार और सूक्ष्म उद्यमों को समर्थन। |
| दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) |
2011 |
ग्रामीण विकास मंत्रालय |
महिला-नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाना, ग्रामीण आजीविका, उद्यमिता और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा। |
| आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना (ABRY) |
2020 |
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय |
नए कर्मचारियों के लिए EPFO से जुड़े सामाजिक सुरक्षा समर्थन द्वारा नियोक्ताओं को औपचारिक रोजगार सृजन हेतु प्रोत्साहन। |
| ई-श्रम पोर्टल |
2021 |
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय |
असंगठित श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार कर सामाजिक सुरक्षा कवरेज और श्रम औपचारीकरण में सुधार। |
| पीएम-दक्ष योजना |
2020 |
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय |
SC, OBC, EWS और वंचित वर्गों के लिए निःशुल्क कौशल विकास तथा पुनःकौशल कार्यक्रम। |
| महिलाओं के लिए प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम |
1986 |
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय |
कौशल प्रशिक्षण, आय सृजन सहायता और ऋण-संबद्ध गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं की रोजगार क्षमता बढ़ाना। |
| पीएम विश्वकर्मा योजना |
2023 |
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) |
पारंपरिक कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, टूलकिट प्रोत्साहन और रियायती ऋण सहायता प्रदान करना। |
आगे की राह
- उद्योग-उन्मुख कौशल विकास का विस्तार: भारत को व्यावसायिक शिक्षा, अप्रेंटिसशिप और उद्योग-संबद्ध कौशल कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना चाहिए, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और हरित प्रौद्योगिकियों जैसे उभरते क्षेत्रों के अनुरूप हों।
- महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को बढ़ावा: बाल देखभाल सुविधाएँ, लचीली कार्य व्यवस्था, सुरक्षित परिवहन और समान वेतन का समर्थन करने वाली नीतियाँ महिला श्रम बल भागीदारी में सुधार ला सकती हैं।
- श्रम-प्रधान विनिर्माण को प्रोत्साहन: वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य प्रसंस्करण और हरित विनिर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों का विस्तार बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न कर सकता है।
- सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करना: औपचारीकरण, श्रम अधिकार, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन कवरेज का विस्तार श्रमिकों के लिए रोजगार की गुणवत्ता तथा आर्थिक स्थिरता में सुधार कर सकता है।
निष्कर्ष
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश केवल तभी सतत् आर्थिक विकास में परिवर्तित हो सकता है, जब उत्पादक रोजगार सृजन, कौशल विकास और महिलाओं व युवाओं का अधिक समावेशन सुनिश्चित किया जाए।