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सरकार द्वारा विदेशी पूँजी आकर्षित करने के उपायों की घोषणा

8 Jun 2026

संदर्भ

भारत को एक प्रमुख निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करने के लिए वित्त मंत्रालय ने पूँजी बाजार सुधारों को लागू किया है, जिनका उद्देश्य सरकारी प्रतिभूति (G-Sec) बाजार को सुदृढ़ करना तथा इक्विटी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को तीव्र गति प्रदान करना है।

सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम

सरकार ने इन संरचनात्मक सुधारों को तीन स्वतंत्र वित्तीय स्तंभों में विभाजित किया है:

  • व्यक्तिगत विदेशी इक्विटी प्रवाह का उदारीकरण
    • पोर्टफोलियो निवेश योजना (PIS) की शुरुआत: अब ‘भारत के बाहर निवास करने वाले व्यक्तियों’ (PROIs) को PIS ढाँचे के माध्यम से सूचीबद्ध भारतीय इक्विटी में प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति दी गई है। पूर्व में यह सुविधा केवल NRI तथा OCI तक सीमित थी।
    • इक्विटी सीमा में दोगुनी वृद्धि: किसी एक कंपनी में व्यक्तिगत विदेशी निवेशक के लिए निवेश सीमा 5% से बढ़ाकर 10% कर दी गई है।
    • समष्टिगत सीमा का विस्तार: किसी एक सूचीबद्ध कंपनी में सभी PROIs की कुल संयुक्त हिस्सेदारी 10% से बढ़ाकर 24% कर दी गई है।
    • डिजिटल प्रक्रिया का पुनः उपयोग: ऑनबोर्डिंग के लिए पूर्व-स्थापित NRI/OCI डिजिटल अवसंरचना का उपयोग किया जा रहा है, जिससे त्वरित पंजीकरण संभव होता है तथा नई सत्यापन प्रक्रियाओं में विलंब नहीं होता है।
  • सरकारी प्रतिभूति (G-Sec) ऋण बाजार ढाँचे में व्यापक सुधार
    • ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ (FAR) का विस्तार: सीमा-रहित FAR मार्ग को नए 15, 30 और 40-वर्षीय दीर्घावधि G-Sec निर्गमों तथा समान अवधि वाले सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स (SGrBs) तक विस्तारित किया गया है।
    • ‘जनरल रूट’ प्रतिबंधों की समाप्ति: सरकार ने G-Sec में निवेश करने वाले FPIs के लिए ‘जनरल रूट’ के अंतर्गत तीन प्रमुख प्रतिबंधों को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया है:
      • अल्पकालिक निवेश सीमा
      • निवेशक एकाग्रता सीमा
      • प्रतिभूति आधारित सीमा
    • निवेश श्रेणियों का एकीकरण: ‘सामान्य’ तथा ‘दीर्घकालिक’ निवेश सीमाओं के पृथक उप-खंडों को एकल पूल में एकीकृत कर दिया गया है, जिससे ‘फंड मैनेजर्स’ को पूर्ण पोर्टफोलियो प्राप्त होता है।
    • मैक्रो-सीमाओं का संरक्षण: समग्र मात्रात्मक सीमाएँ यथावत रखते हुए केंद्रीय सरकारी प्रतिभूतियों के शेष स्टॉक का 6% तथा राज्य सरकारी प्रतिभूतियों (SGSs) का 2% सीमा बनाए रखी गई है।
  • सॉवरेन ऋण पर पूर्ण आयकर छूट
    • शून्य-कर व्यवस्था: FPIs को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से प्राप्त ब्याज आय तथा पूँजीगत लाभ पर पूर्ण आयकर छूट प्रदान की गई है।
    • पूर्वप्रभावी लागूकरण: यह कर छूट 1 अप्रैल, 2026 के बाद अर्जित सभी आय पर प्रभावी होगी।
    • संस्थागत दायरा: यही कर छूट स्पष्ट रूप से बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) पर भी लागू की गई है, जिससे वैश्विक संस्थागत तरलता को आकर्षित किया जा सके।

PWOnlyIas विशेष

  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI): यह ऐसे निवेश को दर्शाता है, जिसमें निवेशक किसी अन्य देश में वित्तीय परिसंपत्तियों जैसे शेयर तथा बॉण्ड में निवेश करते हैं।
    • FPI के अंतर्गत निवेशकों को कंपनी की भौतिक परिसंपत्तियों पर प्रत्यक्ष स्वामित्व या नियंत्रण प्राप्त नहीं होता तथा यह निवेश अत्यधिक तरल एवं गतिशील होता है।
    • कानून के अनुसार, किसी एक FPI (या संबद्ध निवेशक समूह) द्वारा किसी भारतीय कंपनी में निवेश उसकी कुल चुकता पूँजी इक्विटी पूँजी के 10% से अधिक नहीं हो सकती है।
  • सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Sec): यह केंद्रीय या राज्य सरकारों द्वारा जारी व्यापार योग्य ऋण साधन हैं, जो सरकार के ऋण दायित्व को दर्शाते हैं। (UPSC CSE 2018)
    • ये अर्थव्यवस्था में जोखिम-मुक्त दर का आधार प्रदान करती हैं तथा व्यापक वित्तीय प्रणाली की यील्ड कर्व का आधार बनाती हैं।
  • ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ (FAR): यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रस्तुत एक विशेष विनियामक माध्यम है, जो गैर-निवासी निवेशकों को निर्धारित सरकारी प्रतिभूतियों में बिना किसी मात्रात्मक सीमा या निवेश सीमा के निवेश करने की अनुमति देता है।
  • सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स (SGrBs): ये सरकार द्वारा जारी ब्याज वहन करने वाली ऋण प्रतिभूतियाँ हैं, जिनसे प्राप्त धन को विधिक रूप से उन सार्वजनिक परियोजनाओं में निवेश किया जाता है, जो अर्थव्यवस्था में कार्बन तीव्रता को कम करती हैं।

उपायों का महत्व

  • दीर्घकालिक पूँजी को आकर्षित करना: FAR मार्ग को 30 एवं 40-वर्षीय दीर्घावधि बॉन्ड्स तक विस्तारित करने तथा अल्पकालिक प्रतिबंधों को समाप्त करने के माध्यम से भारत पेंशन फंड, बीमा कंपनियों तथा सॉवरेन वेल्थ फंड्स जैसे वैश्विक दीर्घकालिक निवेशकों को आकर्षित कर रहा है।
  • सुगम ‘यील्ड कर्व’ का निर्माण: अति दीर्घ अवधि में स्थिर विदेशी पूँजी प्रवाह से सरकार को सभी अवधियों के लिए स्थिर एवं पूर्वानुमेय ब्याज दर मानक विकसित करने में सहायता मिलती है, जिससे संरचनात्मक उधारी लागत कम होती है।
  • वैश्विक समानता की प्राप्ति: शून्य-कर व्यवस्था भारत की G-Sec प्रतिफल दरों को उन विकसित पश्चिमी एवं एशियाई बाजारों के समकक्ष लाती है, जहाँ विदेशी केंद्रीय निवेशकों के लिए कर-मुक्त ढाँचा उपलब्ध है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार को सुदृढ़ करना: इक्विटी तथा बॉन्ड बाजारों में स्थिर एवं निरंतर विदेशी पूँजी प्रवाह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करता है तथा वैश्विक अस्थिरता के समय मुद्रा पर दबाव को कम करने में सहायक होता है।

अपेक्षित चुनौतियाँ

  • पूँजी के तीव्र निर्गमन की संवेदनशीलता: एकाग्रता सीमा तथा अल्पकालिक निवेश प्रतिबंधों को हटाने से फंड प्रबंधकों को उच्च लचीलापन प्राप्त होता है, परंतु इससे वैश्विक वित्तीय झटकों के दौरान विदेशी पूँजी के तीव्र निर्गमन का जोखिम बढ़ जाता है।
  • हॉट मनी अस्थिरता का जोखिम:सामान्य’ तथा ‘दीर्घकालिक’ निवेश श्रेणियों के एकीकरण से वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन होने पर अल्पकालिक एवं सट्टात्मक निवेश की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
  • विनिमय दर दबाव का प्रबंधन: विदेशी पूँजी के बड़े एवं अनियंत्रित प्रवाह से भारतीय रुपया (INR) में अचानक अधिमूल्यन हो सकता है, जिससे भारतीय निर्यातकों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।

आगे की राह

  • मैक्रो-प्रूडेंशियल निगरानी को सुदृढ़ करना: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) तथा सेबी (SEBI) को रीयल-टाइम डेटा निगरानी उपकरणों का उपयोग कर एकीकृत निवेश सीमाओं के अंतर्गत पूँजी प्रवाह की गति की निगरानी करनी चाहिए, ताकि 6% की मैक्रो-सीमा का गतिशील रूप से उल्लंघन न हो।
  • कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को सुदृढ़ बनाना: G-Sec सुधारों की सफलता को आधार बनाते हुए उच्च गुणवत्ता वाले कॉरपोरेट ऋण बाजार में FPI प्रतिबंधों को क्रमिक रूप से कम किया जाना चाहिए, जिससे संतुलित पूँजी गहराई सुनिश्चित हो सके।
  • हेजिंग संबंधी ढाँचे को सुदृढ़ करना: घरेलू ब्याज दर आधारित ‘डेरिवेटिव बाजारों’ का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि बड़े विदेशी पेंशन तथा बीमा फंड भारत के भीतर ही अपने दीर्घकालिक मुद्रा जोखिमों का प्रभावी हेजिंग कर सकें।
सरकार द्वारा विदेशी पूँजी आकर्षित करने के उपायों की घोषणा

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