ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB): भारत के व्यावसायिक ढाँचे का सुदृढ़ीकरण

8 Jun 2026

संदर्भ

भारत में डिजिटल शासन, विनियामक सरलीकरण तथा विश्वास-आधारित प्रशासन के माध्यम से सुविधा-प्रधान व्यावसायिक पारितंत्र की ओर संक्रमण होने से ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

संबंधित तथ्य

  • वर्ष 2016 में केवल 502 स्टार्ट-अप को मान्यता प्राप्त थी, जिन्होंने 308 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए थे। इसके विपरीत, मार्च 2026 तक 2.23 लाख से अधिक स्टार्ट-अप को मान्यता प्रदान की जा चुकी है, जिन्होंने 23.3 लाख प्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न किए हैं।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) का अर्थ

  • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) से आशय उस स्तर से है, जिस तक किसी देश का विनियामक, प्रशासनिक तथा विधिक ढाँचा न्यूनतम लागत, समय तथा प्रक्रियात्मक बाधाओं के साथ व्यवसायों की स्थापना, संचालन और विस्तार को सुगम बनाता है।
  • यह इस बात का आकलन करता है कि उद्यमियों तथा उद्यमों के लिए निम्नलिखित प्रक्रियाएँ कितनी सरल हैं:-
    • व्यवसाय की स्थापना करना।
    • अनुमतियाँ एवं लाइसेंस प्राप्त करना।
    • ऋण तक पहुँच सुनिश्चित करना।
    • संपत्ति का पंजीकरण करना।
    • करों का भुगतान करना।
    • अनुबंधों का प्रवर्तन करना।
    • व्यापार संचालन करना।
    • दिवालियापन का समाधान करना।

भारत के सुधरते व्यावसायिक वातावरण के संकेतक (UPSC CSE 2016)

  • विश्व बैंक की ‘डूइंग बिजनेस रिपोर्ट’: भारत की रैंकिंग 142 (2014) से बढ़कर 63 (2019) हो गई, जो विनियामक सरलीकरण और व्यावसायिक सुविधा में महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती है।
    • सितंबर 2021 में एक आंतरिक जाँच में डेटा अनियमितताओं और नैतिक उल्लंघनों के सामने आने के बाद इसे आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया।
    • इसे पूर्णतः एक नई प्रमुख परियोजना बिजनेस रेडी (B-Ready) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है।
  • IMD विश्व प्रतिस्पर्द्धात्मकता रैंकिंग, 2025: भारत की रैंकिंग 43वें स्थान (2021) से सुधरकर 41वें स्थान (2025) हो गई, जो शासन, व्यावसायिक दक्षता तथा अवसंरचना विकास में सुधार को दर्शाती है।
  • विश्व बैंक का ‘गवटेक परिपक्वता सूचकांक’ (GovTech Maturity Index): भारत लगातार समूह A (2020, 2022, 2025) में बना रहा, जो उन्नत डिजिटल शासन तथा नवोन्मेषी सार्वजनिक सेवा वितरण प्रणाली को प्रदर्शित करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र का ई-गवर्नेंस सर्वेक्षण: भारत ने ऑनलाइन सेवा सूचकांक, दूरसंचार अवसंरचना सूचकांक तथा मानव पूँजी सूचकांक में उच्च अंक प्राप्त किए, जो मजबूत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नागरिक-केंद्रित शासन को रेखांकित करता है।

सुधार संबंधी प्रमुख पहलें

  • स्टार्ट-अप इंडिया (Startup India): जनवरी 2016 में प्रारंभ की गई यह पहल उद्यमियों को समर्थन प्रदान करने तथा एक मजबूत स्टार्ट-अप पारितंत्र विकसित करने के उद्देश्य से शुरू की गई।
    • इसका लक्ष्य भारत को रोजगार खोजने वाले देश से रोजगार सृजन करने वाले देश में परिवर्तित करना है। इसके अंतर्गत सीड फंड, फंड ऑफ फंड्स, निवेशक संपर्क पोर्टल तथा क्रेडिट गारंटी योजना जैसी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
  • उद्यम पंजीकरण का सरलीकरण: SPICe+ तथा उद्यम पंजीकरण (Udyam Registration) जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से कागजरहित, एकीकृत तथा समयबद्ध व्यवसाय स्थापना प्रक्रिया को सक्षम बनाया गया है।
  • MCA21: MCA के तीसरे संस्करण को वित्त वर्ष 2021-22 में लॉन्च किया गया, जिसमें ई-स्क्रूटिनी, ई-अधिनिर्णयन (e-adjudication) तथा ई-परामर्श जैसी उन्नत सुविधाएँ शामिल हैं। इसमें अनुपालन प्रबंधन प्रणाली तथा MCA लैब भी सम्मिलित हैं।
    • वर्ष 2021 से 2025 के बीच लगभग 3.84 करोड़ फाइलिंग की गईं, जिनमें से 3.33 करोड़ फाइलिंग ‘स्ट्रेट थ्रू प्रोसेस’ के माध्यम से स्वीकृत हुईं।

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  • उद्यम पंजीकरण पोर्टल: जुलाई 2020 में प्रारंभ किया गया यह पोर्टल सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए निःशुल्क, कागजरहित तथा स्व-घोषणा आधारित पंजीकरण प्रणाली प्रदान करता है।
    • इस पोर्टल पर पंजीकरण अक्टूबर 2020 में 10.02 हजार से बढ़कर 5 जून, 2026 तक 8.58 लाख से अधिक हो गए हैं।
  • परिवेश 2.0: प्रो-एक्टिव एंड रिस्पॉन्सिव फैसिलिटेशन बाय इंटरएक्टिव, वर्चुअस एंड एनवायरनमेंटल सिंगल विंडो हब’ (PARIVESH) का उद्देश्य पर्यावरण स्वीकृति (EC), वन स्वीकृति (FC), वन्यजीव (WL) तथा तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) स्वीकृतियों को सुव्यवस्थित करना है।
    • इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण स्वीकृति की औसत अवधि घटकर 64 दिन (2025-26) रह गई, जबकि निर्धारित समय-सीमा 105 दिन थी।
  • सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM): वर्ष 2016 में शुरू किया गया यह प्लेटफॉर्म सार्वजनिक खरीद को डिजिटाइज, पारदर्शी और समावेशी बनाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया।
    • GeM ने संचयी रूप से ₹18.4 लाख करोड़ का ‘ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू’ (GMV) प्राप्त किया है, जिसमें वित्त वर्ष 2025–26 में ₹5 लाख करोड़ GMV का आँकड़ा पार करना शामिल है।
  • डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP): वर्ष 2016 में प्रारंभ यह कार्यक्रम भूमि अभिलेख प्रबंधन के आधुनिकीकरण तथा भूमि/संपत्ति विवादों की संभावनाओं को कम करने के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।

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उपलब्धियाँ

  • उच्च निवेशक विश्वास: नीतिगत स्थिरता, विनियामक सरलीकरण तथा ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) (EoDB) में सुधार ने भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशक विश्वास को सुदृढ़ किया है।
    • भारत को वर्ष 2000–2025 के बीच 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक संचयी FDI प्रवाह प्राप्त हुआ।
    • वार्षिक FDI प्रवाह वर्ष 2013-14 के लगभग 36 अरब डॉलर से बढ़कर हाल के वर्षों में 80 अरब डॉलर से अधिक हो गया है।
    • भारत ग्रीनफील्ड निवेशों के लिए वैश्विक स्तर पर शीर्ष गंतव्यों में बना हुआ है।
  • स्टार्टअप एवं एमएसएमई का विकास: वित्त तक बेहतर पहुँच, सरलीकृत पंजीकरण प्रक्रिया तथा सहायक नीतियों ने उद्यमिता वृद्धि को गति दी है।
    • मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप की संख्या वर्ष 2016 में 502 से बढ़कर मार्च 2026 तक 2.23 लाख से अधिक हो गई।
    • स्टार्ट-अप्स ने 23.3 लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए।
    • उद्यम पोर्टल पर एमएसएमई पंजीकरण वर्ष 2020 में 10,000 से बढ़कर वर्ष 2026 तक प्रतिवर्ष 8.58 लाख से अधिक हो गए।
    • लगभग 48% स्टार्ट-अप्स में कम-से-कम एक महिला निदेशक या भागीदार है।
  • डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार: डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के व्यापक उपयोग ने दक्षता, पारदर्शिता तथा वित्तीय समावेशन को बढ़ाया है।
    • यूपीआई (UPI) लेन-देन वित्त वर्ष 2016-17 में 2 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 24,162 करोड़ से अधिक हो गए।
    • विनिमय मूल्य ₹0.07 लाख करोड़ से बढ़कर लगभग ₹314 लाख करोड़ हो गया।
    • UPI का उपयोग 540 मिलियन से अधिक व्यक्तियों तथा 100 मिलियन व्यापारियों द्वारा किया जा रहा है।
  • कर अनुपालन एवं औपचारीकरण में वृद्धि 
    • GST करदाताओं की संख्या वर्ष 2017 में लगभग 60 लाख से बढ़कर वर्ष 2026 में 1.64 करोड़ से अधिक हो गई।
    • GST नेटवर्क ने अप्रैल 2026 तक ₹107.64 लाख करोड़ से अधिक भुगतान संसाधित किए।
    • ई-वे बिल सृजन वित्त वर्ष 2018-19 में 15.74 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 188.27 करोड़ हो गया।
  • लॉजिस्टिक्स एवं बाजार संपर्क में सुधार: अवसंरचना एवं लॉजिस्टिक्स सुधारों ने लेनदेन लागत को कम किया तथा आपूर्ति शृंखला दक्षता को बढ़ाया।
    • विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक में भारत की रैंक वर्ष 2014 में 54वें स्थान से सुधरकर वर्ष 2023 में 38वें स्थान पर आ गई।
    • सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने ₹18.4 लाख करोड़ का संचयी ‘ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू’ (GMV) प्राप्त किया।
    • ONDC का विस्तार 616 से अधिक शहरों तक हो चुका है, जिसमें 7.64 लाख से अधिक विक्रेता नेटवर्क से जुड़े हैं।

चुनौतियाँ

  • अंतर-राज्यीय विनियामक भिन्नताएँ: विभिन्न राज्यों में सुधारों के असमान क्रियान्वयन के कारण अनुपालन में अनिश्चितता उत्पन्न होती है, क्योंकि व्यवसायों को भूमि स्वीकृति, श्रम विनियमों तथा स्थानीय अनुमतियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है।
  • अनुबंध प्रवर्तन संबंधी समस्याएँ: न्यायिक विलंब तथा मामलों का लंबित रहना लेन-देन संबंधी लागत को बढ़ाता है और निवेशक विश्वास को कम करता है; भारतीय न्यायालयों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिससे समयबद्ध विवाद समाधान प्रभावित होता है।
  • भूमि अधिग्रहण में बाधाएँ: जटिल अधिग्रहण प्रक्रियाएँ तथा स्वामित्व विवाद औद्योगिक एवं अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में विलंब उत्पन्न करते हैं, जिससे परियोजना लागत और क्रियान्वयन अवधि बढ़ती है।
  • अवसंरचना अंतराल: उच्च लॉजिस्टिक्स लागत तथा ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में अपर्याप्त संपर्कता प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम करती है; भारत में लॉजिस्टिक्स लागत अभी भी GDP का लगभग 13–14% है, जो कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अधिक है।
  • MSMEs की डिजिटल तत्परता: सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों में सीमित डिजिटल साक्षरता तथा प्रौद्योगिकी अपनाने की कमी के कारण GST, ई-इनवॉइसिंग, ONDC तथा अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रभावी उपयोग बाधित होता है।
  • समयबद्ध ऋण तक पहुँच: नीतिगत प्रयासों के बावजूद कई MSMEs सीमित जमानत, उच्च जोखिम धारणा तथा अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर निर्भरता के कारण वित्तीय बाधाओं का सामना करते हैं।
  • विनियामक अतिव्यापन: विशेषकर निर्माण, विनिर्माण तथा खनन क्षेत्रों में विभिन्न प्राधिकरणों से अनेक अनुमतियाँ प्राप्त करने की आवश्यकता के कारण दोहरे अनुपालन, बढ़ा हुआ अनुपालन भार तथा विलंब उत्पन्न होता है।

आगे की राह

  • सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना: राज्यों के स्तर पर विनियमों का बेहतर सामंजस्य एक अधिक एकरूप एवं पूर्वानुमेय व्यावसायिक वातावरण निर्मित कर सकता है।
  • न्यायिक सुधारों में तेजी लाना: समर्पित वाणिज्यिक न्यायालयों तथा त्वरित विवाद निपटान तंत्र के माध्यम से अनुबंध प्रवर्तन को सुदृढ़ किया जा सकता है।
  • डिजिटल शासन को गहन बनाना: एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्मों के विस्तार से अनुपालन भार तथा प्रशासनिक विलंब को और कम किया जा सकता है।
  • लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार: मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट तथा आपूर्ति शृंखला अवसंरचना में निवेश से लेन-देन लागत कम होगी तथा प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी।
  • विश्वास-आधारित विनियमन को बढ़ावा देना: लघु अपराधों का अपराधमुक्तीकरण तथा अनुपालनों के तर्कसंगतीकरण से अधिक व्यवसाय-अनुकूल पारितंत्र विकसित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) से संबंधित सुधार विनियामक नियंत्रण से सुविधा-आधारित शासन की ओर एक प्रतिमान परिवर्तन को दर्शाते हैं। डिजिटलीकरण, अनुपालन में कमी तथा संस्थागत सुधारों में निरंतर प्रयास भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी निवेश गंतव्य में परिवर्तित करने तथा विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध होंगे।

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