संदर्भ
ब्राजील का एथेनॉल-आधारित परिवहन ईंधन की दिशा में सफल परिवर्तन भारत के लिए महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो कच्चे तेल के आयात एवं कार्बन उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को तीव्र गति से बढ़ा रहा है।
ब्राजील में एथेनॉल प्रयोग संबंधी कालक्रम
| पहलू |
ब्राजील |
| एथेनॉल नीति का प्रारंभ |
वर्ष 1931 में एथेनॉल मिश्रण कानून (E5) लागू किया गया। |
| प्रमुख नीतिगत पहल |
वैश्विक तेल संकट के बाद वर्ष 1975 में प्रोआल्कोल (Proálcool) कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। |
| वर्तमान मिश्रण |
फ्यूल ऑफ द फ्यूचर एक्ट (2024) के अंतर्गत वर्ष 2025 से E30 मिश्रण अनिवार्य किया गया है। |
| वाहन पारितंत्र |
लगभग 90% कारें फ्लेक्स-फ्यूल वाहन (FFVs) हैं। |
| उपभोक्ता का विकल्प |
वाहन चालक E27 पेट्रोल अथवा E100 एथेनॉल में से किसी एक का चयन कर सकते हैं। |
ब्राजील का एथेनॉल कार्यक्रम क्यों सफल रहा?
- चरणबद्ध एवं पूर्वानुमेय नीतिगत ढाँचा: ब्राजील ने कई दशकों में एथेनॉल मिश्रण को क्रमिक एवं सुव्यवस्थित तरीके से लागू किया तथा स्पष्ट नीतिगत लक्ष्यों का निर्धारण किया। इससे ईंधन आपूर्तिकर्ताओं, वाहन निर्माताओं एवं उपभोक्ताओं को अनुकूलन के लिए पर्याप्त समय मिला तथा दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।
- वाहन पारितंत्र की तैयारी: सरकार ने फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) को बढ़ावा दिया, जो विभिन्न एथेनॉल मिश्रणों पर संचालित हो सकते हैं। साथ ही, वाहन निर्माताओं को एथेनॉल-संगत वाहनों के विकास हेतु पर्याप्त समय एवं नीतिगत स्थिरता प्रदान की गई।
- ईंधन चयन का विकल्प: उपभोक्ताओं को मिश्रित पेट्रोल (E27) तथा शुद्ध जलयुक्त एथेनॉल (E100) के बीच चयन की सुविधा उपलब्ध है। ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ वाहनों के व्यापक उपयोग से उपभोक्ता बाजार मूल्य के अनुसार अधिक वहनीय ईंधन का चयन कर सकते हैं।
- प्रतिस्पर्द्धी मूल्य निर्धारण एवं राजकोषीय प्रोत्साहन: एथेनॉल सामान्यतः पेट्रोल की तुलना में 25–35% सस्ता होता है। सरकार की मूल्य निर्धारण नीति एवं प्रोत्साहनों ने जैव-ईंधनों को आर्थिक रूप से आकर्षक बनाया, जिससे उनका व्यापक उपयोग संभव हुआ।
- सुदृढ़ संस्थागत एवं नीतिगत समर्थन: सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता, नियामकीय स्थिरता तथा ऑटोमोबाइल, चीनी एवं ऊर्जा उद्योगों के साथ प्रभावी समन्वय ने एथेनॉल पारितंत्र के स्थायी विकास को सुनिश्चित किया। इसका परिणाम वर्ष 2024 में फ्यूल ऑफ द फ्यूचर एक्ट के रूप में दीर्घकालिक विधायी समर्थन के रूप में सामने आया।
भारत का एथेनॉल कार्यक्रम: वर्तमान स्थिति
- एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम: वर्ष 2003 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने तथा आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया।
- E10 उपलब्धि: भारत ने वर्ष 2022 में निर्धारित लक्ष्य से पाँच माह पूर्व 10% एथेनॉल मिश्रण (E10) का लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
- E20 का राष्ट्रव्यापी क्रियान्वयन: वर्ष 2025 तक 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) का राष्ट्रव्यापी विस्तार किया गया, जिससे वर्ष 2030 के मूल लक्ष्य को समय से पूर्व प्राप्त कर लिया गया।
- भावी रूपरेखा: सरकार E25 तथा E85–E100 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रणों के साथ-साथ फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर कार्य कर रही है।

भारत के एथेनॉल संक्रमण की चुनौतियाँ
- तीव्र क्रियान्वयन: E10 से E20 की ओर संक्रमण अल्प अवधि में पूरा किया गया, जिससे वाहन निर्माताओं, ईंधन विक्रेताओं एवं उपभोक्ताओं को अनुकूलन के लिए सीमित समय मिला।
- सीमित फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पारितंत्र: भारत में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) के केवल कुछ ही मॉडल उपलब्ध हैं, जबकि अधिकांश मौजूदा वाहन उच्च एथेनॉल मिश्रणों पर कुशलतापूर्वक संचालन के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
- ईंधन दक्षता में कमी: एथेनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल की तुलना में कम होने के कारण उच्च एथेनॉल मिश्रणों से माइलेज घटता है, जिससे उपभोक्ताओं के बीच चिंता उत्पन्न होती है।
- उपभोक्ता विकल्पों की सीमित उपलब्धता: अनेक क्षेत्रों में E20 के मानक पेट्रोल बनने से पुराने वाहनों के अनुकूल ईंधन चुनने की उपभोक्ताओं की स्वतंत्रता सीमित हो गई है।
- उपभोक्ता जागरूकता का अभाव: वाहन संगतता, माइलेज पर प्रभाव एवं रखरखाव संबंधी आवश्यकताओं के बारे में सीमित जन-जागरूकता के कारण वाहन स्वामियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
- अवसंरचनात्मक बाधाएँ: उच्च एथेनॉल मिश्रणों एवं फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए आवश्यक उत्पादन, भंडारण, परिवहन तथा खुदरा वितरण अवसंरचना का विकास अभी भी प्रगति पर है।

भारत के लिए एथेनॉल का महत्त्व
- ऊर्जा सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करता है तथा वैश्विक ऊर्जा मूल्य तनावों के प्रति भारत की क्षमता को मजबूत बनाता है।
- जलवायु लक्ष्यों को समर्थन: जीवन-चक्र आधारित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं तथा नेट-जीरो लक्ष्य को सुदृढ़ करती है।
- किसानों की आय में वृद्धि: गन्ना, मक्का, निम्न गुणवत्ता वाला अनाज एवं कृषि अवशेषों की अतिरिक्त माँग उत्पन्न कर ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करता है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: कृषि अपशिष्ट एवं अधिशेष जैव-द्रव्य को स्वच्छ परिवहन ईंधन में परिवर्तित करने को प्रोत्साहित करता है।
- तेल आयात व्यय में कमी: आयातित पेट्रोल के स्थान पर घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल के उपयोग से चालू खाते के संतुलन एवं विदेशी मुद्रा की बचत में सुधार होता है।
भारत के लिए ब्राजील से सीख
- चरणबद्ध संक्रमण अपनाना: एथेनॉल मिश्रण को स्पष्ट चरणबद्ध लक्ष्यों के साथ क्रमिक रूप से बढ़ाया जाए, ताकि उद्योगों एवं उपभोक्ताओं को अनुकूलन के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
- फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पारितंत्र का विस्तार: उच्च एथेनॉल मिश्रणों को राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने से पूर्व फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) के निर्माण एवं उपलब्धता का विस्तार किया जाए।
- उपभोक्ता विकल्पों का संरक्षण: संक्रमण अवधि के दौरान पेट्रोल, E20 एवं E85 जैसे विभिन्न ईंधन विकल्पों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- मूल्य प्रोत्साहन प्रदान करना: राजकोषीय प्रोत्साहनों एवं उचित मूल्य निर्धारण तंत्र के माध्यम से एथेनॉल-आधारित ईंधनों को उपभोक्ताओं के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक बनाया जाए।
- उपभोक्ता जागरूकता को सुदृढ़ करना: ईंधन संगतता, माइलेज, रखरखाव एवं पर्यावरणीय लाभों के संबंध में व्यापक एवं सतत् जन-जागरूकता अभियान संचालित किए जाएँ।
- सुदृढ़ अवसंरचना का विकास: एथेनॉल उत्पादन क्षमता, भंडारण सुविधाओं, परिवहन नेटवर्क तथा ईंधन वितरण अवसंरचना का विस्तार किया जाए।
- फीडस्टॉक का विविधीकरण: गन्ने पर निर्भरता कम करते हुए मक्का, निम्न-गुणवत्ता वाला खाद्यान्न, कृषि अवशेष तथा द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल को बढ़ावा दिया जाए।
आगे की राह
- ईंधन, वाहन एवं अवसंरचना नीतियों में समन्वय: एथेनॉल उत्पादन, वाहन प्रौद्योगिकी तथा ईंधन वितरण नेटवर्क का समन्वित एवं संतुलित विकास सुनिश्चित किया जाए।
- द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल को बढ़ावा: फसल अवशेषों एवं कृषि अपशिष्ट से एथेनॉल उत्पादन को तीव्र गति से बढ़ावा दिया जाए, ताकि खाद्य और ईंधन संबंधी चिंताओं को न्यूनतम किया जा सके।
- ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ वाहनों का विस्तार: सहायक नीतियों एवं प्रोत्साहनों के माध्यम से वाहन निर्माताओं को फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (FFVs) के उत्पादन एवं उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रोत्साहित किया जाए।
- उपभोक्ता जागरूकता में सुधार: स्पष्ट ईंधन लेबलिंग तथा व्यापक जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से उपभोक्ताओं को सूचित एवं विवेकपूर्ण विकल्प चुनने में सक्षम बनाया जाए।
- जैव-ईंधनों के सतत् विस्तार को सुनिश्चित करना: एथेनॉल उत्पादन का विस्तार खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण एवं पर्यावरणीय सततता के साथ संतुलित रखते हुए दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।