संदर्भ:
हाल ही में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सरकारी विद्यालयों की प्रार्थना सभाओं में गायत्री मंत्र एवं अन्य संस्कृत प्रार्थना श्लोकों के पाठ संबंधी राज्य सरकार के आदेश को बरकरार रखा और टिप्पणी की कि इनका पाठ अनुच्छेद-28(1) का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि यह केवल धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगाता है, धर्मनिरपेक्ष नैतिक शिक्षा पर नहीं।
संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-14: विधि के समक्ष समानता तथा विधियों के समान संरक्षण की गारंटी प्रदान करता है।
- अनुच्छेद-21: जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता के अधिकार का संरक्षण करता है।
- अनुच्छेद-25: लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य एवं अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने एवं प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 28: शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा का विनियमन करता है।
- अनुच्छेद-28(1): राज्य निधि से पूर्णतः पोषित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगाता है।
- अनुच्छेद-28(2): ऐसे शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा की अनुमति देता है, जो राज्य द्वारा प्रशासित हों, किंतु ऐसे न्यास या धर्मार्थ निधि के अंतर्गत स्थापित किए गए हों, जहाँ ऐसी शिक्षा अनिवार्य हो।
- अनुच्छेद-28(3): राज्य से मान्यता प्राप्त अथवा राज्य सहायता प्राप्त किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी विद्यार्थी को उसकी अथवा उसके अभिभावक की सहमति के बिना धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
- अनुच्छेद-29: नागरिकों के सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकारों का संरक्षण करता है।
- अनुच्छेद-30: धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है।
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मामले की पृष्ठभूमि
- सरकारी आदेश: छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग ने सरकारी विद्यालयों की प्रातःकालीन प्रार्थना सभाओं में गायत्री मंत्र एवं कुछ संस्कृत प्रार्थनाओं को शामिल करने का निर्देश दिया।
- उच्च न्यायालय में चुनौती: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य द्वारा वित्तपोषित विद्यालयों की प्रार्थना सभाओं में हिंदू प्रार्थनाओं को शामिल करना संविधान द्वारा निषिद्ध धार्मिक शिक्षा के समान है।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- सरकारी आदेश का स्वरूप: आदेश में ऐसा कोई अनिवार्य अथवा बलपूर्वक निर्देश नहीं था, जो विद्यार्थियों को उनकी आस्थाओं के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य करता हो।
- असमय दायर याचिका: याचिका असमय दायर की गई थी, क्योंकि मौलिक अधिकारों के किसी वास्तविक उल्लंघन अथवा प्रत्यक्ष क्षति का प्रदर्शन नहीं किया गया था।
- अनुच्छेद-28(1) की व्याख्या: अनुच्छेद-28(1) केवल धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगाता है, अर्थात् राज्य पोषित संस्थानों में किसी धर्म के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों, प्रथाओं एवं उपासना-पद्धतियों का शिक्षण।
- नैतिक शिक्षा की अनुमति: धर्म निरपेक्ष नैतिक शिक्षा संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है, क्योंकि यह उत्तरदायी नागरिकता, सामाजिक समरसता एवं लोक व्यवस्था को प्रोत्साहित करती है।
- धर्म की स्वतंत्रता: चूँकि विद्यार्थियों को उनकी आस्थाओं के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया गया था, अतः यह आदेश अंतःकरण की स्वतंत्रता एवं धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता है।
धार्मिक शिक्षा एवं नैतिक शिक्षा में अंतर
- धार्मिक शिक्षा: किसी विशिष्ट धर्म के विश्वासों, सिद्धांतों, धार्मिक ग्रंथों, अनुष्ठानों, उपासना-पद्धतियों एवं धार्मिक प्रथाओं का इस उद्देश्य से शिक्षण, ताकि उस धर्म का प्रचार-प्रसार किया जा सके।
- अनुच्छेद-28(1) के अंतर्गत राज्य निधि से पूर्णतः पोषित शैक्षणिक संस्थानों में ऐसी धार्मिक शिक्षा निषिद्ध है।
- नैतिक शिक्षा: नैतिक मूल्यों, अनुशासन, करुणा, ईमानदारी, उत्तरदायी नागरिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं संवैधानिक मूल्यों का शिक्षण, जो सार्वभौमिक हों तथा किसी विशिष्ट धर्म से संबद्ध न हों।
- इसका उद्देश्य धर्म का प्रचार न होकर चरित्र निर्माण एवं उत्तरदायी नागरिकता का विकास करना है।
- संवैधानिक स्थिति: संविधान धार्मिक शिक्षा एवं मूल्य-आधारित शिक्षा के मध्य स्पष्ट अंतर करता है। अनुच्छेद-28(1) के अंतर्गत राज्य-पोषित संस्थानों में धार्मिक शिक्षा निषिद्ध है, किंतु धर्म निरपेक्ष नैतिक शिक्षा अनुमेय है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS)
- भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS): राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) को पाठ्यक्रम में समाहित करने पर बल देती है, ताकि विद्यार्थियों को भारत की वैज्ञानिक, गणितीय, दार्शनिक, भाषायी, कलात्मक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराया जा सके तथा साक्ष्य-आधारित एवं बहुविषयक अधिगम को प्रोत्साहन मिले।
- उद्देश्य: इस नीति का उद्देश्य आधुनिक ज्ञान एवं भारत की पारंपरिक ज्ञान-परंपरा के समन्वय के माध्यम से समग्र शिक्षा प्रदान करना, संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करना, नैतिक चिंतन, आलोचनात्मक सोच एवं सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देना तथा धार्मिक मतारोपण या सांप्रदायिक शिक्षा के बिना भारत की समृद्ध विरासत का संरक्षण करना है।
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सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- डी.ए.वी. कॉलेज बनाम पंजाब राज्य वाद (1971): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद-28(1) राज्य द्वारा पूर्णतः पोषित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगाता है, जबकि धर्मों के अकादमिक अध्ययन को धर्मनिरपेक्ष संदर्भ में अनुमति देता है।
- बिजो एमैनुअल बनाम केरल राज्य (1986): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद-25 के अंतर्गत अंतःकरण की स्वतंत्रता व्यक्तियों को धार्मिक अथवा वैचारिक अभिव्यक्तियों में बलपूर्वक भाग लेने के लिए विवश किए जाने से संरक्षण प्रदान करती है। अतः विद्यार्थियों को उनकी आस्थाओं के विरुद्ध प्रार्थना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
- एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढाँचे का अंग घोषित करते हुए कहा कि राज्य को धार्मिक तटस्थता बनाए रखनी चाहिए तथा किसी विशिष्ट धर्म का पक्ष नहीं लेना चाहिए।
- ए.एस. नारायण दीक्षितुलु बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं एवं सांस्कृतिक अथवा धर्मनिरपेक्ष महत्त्व वाली गतिविधियों के मध्य भेद स्थापित करते हुए माना कि धर्म से संबंधित प्रत्येक प्रथा अनिवार्य रूप से धार्मिक स्वरूप की नहीं होती है।
- अरुणा रॉय बनाम भारत संघ (2002) (NCERT वाद): न्यायालय ने निर्णय दिया कि मूल्य-आधारित शिक्षा संवैधानिक रूप से एक वैध है, बशर्ते वह धार्मिक शिक्षा अथवा किसी विशिष्ट धर्म के प्रचार-प्रसार का माध्यम न बने। इस प्रकार न्यायालय ने नैतिक शिक्षा एवं सांप्रदायिक शिक्षण के मध्य स्पष्ट अंतर स्थापित किया।