संदर्भ
बिरसा मुंडा की 126वीं पुण्यतिथि (9 जून) पर, झारखंड में आदिवासी समूहों ने उनकी विरासत की रक्षा करने का संकल्प लिया।

बिरसा मुंडा के बारे में
- जन्म: उनका जन्म 1875 ईसवी में मुंडारी रियासत खूँटी के उलिहातू गाँव में हुआ था और यह वह समय था जब मुंडा लोग ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और हिंदू जमींदारों द्वारा बढ़ते शोषण और विस्थापन का सामना कर रहे थे।
- वर्तमान में, खूँटी झारखंड का एक प्रशासनिक जिला है, जो अपनी अनूठी आदिवासी शासन व्यवस्था और पारंपरिक भूमि अधिकारों को संजोए रखने के लिए जाना जाता है।
- 15 नवंबर को ‘बिरसा मुंडा जयंती’ के रूप में मनाया जाता है।
- एक मुंडा नेता: बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और धार्मिक सुधारक थे, जो छोटानागपुर के मुंडा आदिवासी समुदाय से संबंधित हैं, जो क्षेत्र वर्तमान समय में झारखंड और ओडिशा में है।
- बिरसाइत संप्रदाय की स्थापना: यह जीववाद (animism) और स्वदेशी मान्यताओं का मिश्रण था, जिसने एक ही ईश्वर की पूजा पर जोर दिया।
- विरासत
- वर्ष 2000 में उनकी जयंती के अवसर पर ही झारखंड राज्य का गठन किया गया था।
- सम्मानजनक उपाधियाँ: उनके अनुयायी उन्हें “धरती आबा” (धरती के पिता) और “भगवान” कहते हैं क्योंकि वे उन्हें एक उद्धारक के रूप में देखते थे।
- दृष्टिकोण (विजन): उन्होंने आदिवासी सम्मान, स्वतंत्रता और स्वदेशी स्वशासन के लिए लड़ाई लड़ी, जिसे उन्होंने “आदिवासी दिसुम” कहा।
- राष्ट्रीय दिवस: उनके जन्मदिन को देश भर में राष्ट्रीय स्तर पर ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
- महत्त्वपूर्ण आंदोलन
- मुंडावाद (Mundaism): 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, बिरसा मुंडा ने एक नए धार्मिक आंदोलन की नींव रखी, जिसे “मुंडावाद” या “किसानवाद” या “बिरसाइत संप्रदाय” के रूप में जाना जाता है।
- उद्देश्य: पारंपरिक मुंडा रीति-रिवाजों और मान्यताओं को पुनर्जीवित करना और मुंडा लोगों को उनके उत्पीड़कों के विरुद्ध एकजुट करना।
- इन बातों पर जोर: बिरसा की शिक्षाओं ने आत्मनिर्भरता, सामाजिक न्याय और उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध के महत्त्व पर बल दिया।
- उपदेश: उन्होंने उपदेश दिया कि मुंडा लोगों को अपने पारंपरिक मूल्यों की ओर लौटना चाहिए और ब्रिटिश उपनिवेशवाद तथा मिशनरियों दोनों के प्रभाव को खारिज कर देना चाहिए।
- उलगुलान आंदोलन (UPSC CSE Prelims- 2020 & 1997)
- उलगुलान आंदोलन (1899-1900), जिसका अर्थ है “महान हलचल”, का नेतृत्व बिरसा मुंडा ने छोटानागपुर क्षेत्र में औपनिवेशिक शोषण और आदिवासी अधिकारों के हनन के विरुद्ध किया था।
- यह आंदोलन अंग्रेजों के विरुद्ध था, जिन्होंने ऐसे भूमि कानून पेश किए जिससे आदिवासियों का नियंत्रण कमजोर हुआ; दिकुओं (बाहरी लोगों) के विरुद्ध था, जिनमें जमींदार और साहूकार शामिल थे, जो कर्ज और बंधुआ मजदूरी (बेगारी) के जरिए आदिवासियों का शोषण करते थे; और मिशनरियों के विरुद्ध था, जिन्हें पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करने वाले के रूप में देखा जाता था।
- आंदोलन के कारण: इसका मुख्य कारण मुंडा जनजाति की ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ का बाधित होना था, जो कि मूल निवासियों द्वारा संयुक्त ग्राम भूमि स्वामित्व की एक पारंपरिक प्रणाली थी।
- ब्रिटिश भूमि नीतियों ने आदिवासी जमीनों को निजी संपत्ति में बदल दिया, जिससे बाहरी लोगों को उन्हें हथियाने का मौका मिला। इसके परिणामस्वरूप भूमि का अलगाव, आर्थिक शोषण और पारंपरिक सत्ता का नुकसान हुआ।
- अत्यधिक ब्याज दरों वाले कर्ज, राजस्व की माँग और जबरन मजदूरी के कारण आदिवासियों को और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ।
- प्रमुख घटनाएँ: वर्ष 1899-1900 में यह आंदोलन डोंबारी बुरु पहाड़ी पर अत्यंत उग्र हो गया, जहाँ ब्रिटिश सेना ने बिरसा के अनुयायियों की एक सभा पर गोलियाँ चलाई थीं।
- यह घटना आदिवासी प्रतिरोध के औपनिवेशिक दमन का एक बड़ा उदाहरण बनी।
- बाद में बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया और 9 जून, 1900 को राँची जेल में उनकी मृत्यु हो गई।
- कानूनी विरासत – छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908
- इस विद्रोह के फलस्वरूप छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम, 1908 लागू हुआ।
- इस अधिनियम ने गैर-आदिवासियों को आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगा दी और भूमि, जल तथा जंगलों पर पारंपरिक आदिवासी अधिकारों की रक्षा की।
- इसने खुंटकट्टी व्यवस्था को भी मान्यता दी और मूल मुंडा भूमिधारकों के लिए ‘मुंडारी खुंटकट्टीदार’ श्रेणी की शुरुआत की।
- महत्त्व: उलगुलान आंदोलन औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
- इसने आदिवासी पहचान, स्वायत्तता और पारंपरिक अधिकारों के संरक्षण की माँग को मजबूत किया।
- बिरसा मुंडा की विरासत ने बाद में एक अलग आदिवासी-बहुल राज्य के लिए चले ‘झारखंड आंदोलन’ को भी प्रभावित किया।
- आध्यात्मिक सुधार – बिरसाइत संप्रदाय
- आदिवासी संस्कृति पर मिशनरी स्कूलों के विचारों से असहमत होने के बाद बिरसा ने उन्हें छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने अपने आध्यात्मिक मार्ग का प्रचार करना शुरू किया, जिसे ‘बिरसाइत संप्रदाय’ कहा गया।
- मूल सिद्धांत: इसने आदिवासी सदस्यों से अंधविश्वासों को छोड़ने, पशु बलि बंद करने, शराब का त्याग करने और ‘सिंगबोंगा’ नामक एक सर्वोच्च निर्माता की पूजा करने का आग्रह किया।
- सामाजिक शुद्धि: उन्होंने सिखाया कि आदिवासी पहचान उनके वंश और समुदाय से आती है, न कि किसी बाहरी धर्म से।
- प्रसिद्ध नारा: “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना”, जिसका अर्थ है “हमारा राज स्थापित हो और महारानी का राज समाप्त हो।”
- मृत्यु: अंग्रेजों ने वर्ष 1895 में बिरसा को गिरफ्तार किया था और वर्ष 1900 में जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने हिंसक विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया और वे अंग्रेजों के विरुद्ध आदिवासी सक्रियता के लिए एक शहीद के रूप में चिन्हित किए गए।
आदिवासी इतिहास और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहल
| पहल |
उद्देश्य |
मुख्य विशेषताएँ |
| आदि संस्कृति परियोजना (Adi Sanskriti Project) |
जनजातीय कला रूपों का डिजिटल माध्यम से शिक्षण। |
- विभिन्न जनजातीय कला रूपों पर लगभग 100 इमर्सिव (Immersive) पाठ्यक्रम प्रदान करता है।
- इसमें भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक जनजातीय विरासत पर लगभग 5,000 क्यूरेटेड दस्तावेज शामिल हैं।
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| आदि वाणी (AI अनुवाद) (Adi Vaani – AI Translation) |
जनजातीय भाषाओं को संरक्षित और बढ़ावा देने के लिए एक AI-संचालित अनुवाद उपकरण। |
- हिंदी, अंग्रेजी और जनजातीय भाषाओं — मुंडारी, भीली, गोंडी, संथाली, गारो और कुई के बीच वास्तविक समय (Real-time) में पाठ (Text) और भाषण (Speech) अनुवाद प्रदान करता है।
- लोककथाओं, मौखिक परंपराओं और सांस्कृतिक ज्ञान को डिजिटल बनाने और संरक्षित करने में सहायता करता है।
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| जनजातीय डिजिटल दस्तावेज भंडार (Tribal Digital Document Repository) |
जनजातीय-संबंधित अनुसंधान और संसाधनों का एक डिजिटल संग्रह। |
- भारत के जनजातीय समुदायों से संबंधित दस्तावेजों के एक खोजने योग्य (Searchable) भंडार के रूप में कार्य करता है।
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| वर्णमाला और मौखिक साहित्य (Varnamala & Oral Literature) |
जनजातीय भाषायी और मौखिक विरासत का संरक्षण। |
- जनजातीय भाषाओं में स्थानीय कविताओं और कहानियों का प्रकाशन करना।
- संरक्षण के लिए मौखिक जनजातीय साहित्य, लोककथाओं और लोककथाओं का संग्रह और दस्तावेजीकरण करना।
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| आदि महोत्सव (Aadi Mahotsav) |
भारत सरकार द्वारा आयोजित जनजातीय संस्कृति का एक राष्ट्रीय उत्सव। |
- जनजातीय शिल्प, व्यंजन, वाणिज्य, संस्कृति और कला का उत्सव मनाता है।
- यह जनजातीय प्रतिभा और उद्यमिता को प्रदर्शित करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करता है।
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