संदर्भ
हाल ही में सहकारिता मंत्रालय ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की नीति क्रियान्वयन एवं निगरानी समिति की पहली बैठक आयोजित की।
- इस समिति ने नई लॉन्च की गई राष्ट्रीय सहकारिता नीति–2025 के क्रियान्वयन हेतु एक देशव्यापी रोडमैप तैयार करने के उद्देश्य से विचार-विमर्श किया।
संबंधित तथ्य
- संपूर्ण-सरकारी क्रियान्वयन: समिति ने कई केंद्रीय मंत्रालयों (पंचायती राज, ग्रामीण विकास, कृषि), राज्य सरकारों तथा नाबार्ड (NABARD) जैसी वित्तीय संस्थाओं को साथ लेकर आधारभूत स्तर पर समन्वित क्रियान्वयन सुनिश्चित करने पर बल दिया।
- विशाल विकास लक्ष्य: समिति ने राष्ट्रीय सहकारिता क्षेत्र की सदस्यता को वर्ष 2035 तक 50 करोड़ तक बढ़ाने तथा सहकारिता क्षेत्र के आर्थिक योगदान को तीन गुना करने की रणनीतिक योजनाओं की समीक्षा की।
- आधारभूत तकनीकी उन्नयन: प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के तीव्र कंप्यूटरीकरण, ERP आधारित प्रबंधन प्रणालियों की शुरुआत तथा डेटा प्रणालियों की साइबर सुरक्षा को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया।
- नई संस्थाओं की समीक्षा: समिति ने हाल ही में गठित विशेष संस्थानों की प्रगति का आकलन किया, जिनमें प्रशिक्षण हेतु त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय तथा निर्यात, जैविक उत्पाद और बीज गुणवत्ता से संबंधित तीन राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाएँ शामिल हैं।
राष्ट्रीय सहकारिता नीति–2025 के बारे में
- यह नीति एक व्यापक राष्ट्रीय ढाँचा है, जिसका उद्देश्य भारत की सहकारी समितियों को पारदर्शी, प्रौद्योगिकी-सक्षम, पेशेवर रूप से प्रबंधित और सदस्य-केंद्रित आर्थिक संस्थाओं में बदलना है।
- प्रधानमंत्री के “सहकार से समृद्धि” के विजन से प्रेरित यह नीति ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने तथा भारत को विकसित भारत @2047 की दिशा में आगे ले जाने का एक प्रमुख साधन है।
- उद्देश्य: एक समावेशी, तकनीक-आधारित और भविष्य के लिए तैयार सहकारिता क्षेत्र का निर्माण करना, जो वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को समर्थन दे।
- राष्ट्रीय सहकारिता नीति–2025 के लक्ष्य
- विस्तार और प्रभाव बढ़ाना: सहकारी समितियों की संख्या में 30% वृद्धि करना और उनकी GDP में योगदान को तीन गुना करना, साथ ही वर्ष 2034 तक 50 करोड़ सक्रिय सदस्य जोड़ना।
- सार्वभौमिक कवरेज सुनिश्चित करना: हर पंचायत में कम-से-कम एक प्राथमिक सहकारी इकाई स्थापित करना ताकि आधारभूत स्तर तक पहुँच सुनिश्चित हो सके।
छह रणनीतिक स्तंभ

संपूर्ण नीति संरचना छह मूलभूत स्तंभों पर आधारित है:
- आधार को सुदृढ़ करना: सहकारिता क्षेत्र के मौजूदा आधार को पुनर्गठित और मजबूत करना।
- सशक्त और प्रतिस्पर्द्धी बनाना: सहकारी समितियों को आधुनिक, अत्यधिक दक्ष और प्रतिस्पर्द्धी व्यावसायिक उद्यमों में परिवर्तित करना।
- भविष्य के लिए तैयारी: उन्नत प्रौद्योगिकी के माध्यम से संचालन का आधुनिकीकरण करना ताकि भविष्य की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
- समावेशिता का विस्तार: महिलाओं, युवाओं तथा लघु एवं सीमांत किसानों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु पहुँच का विस्तार करना।
- नए और उभरते क्षेत्र: तकनीक-आधारित सेवाओं और हरित ऊर्जा जैसे आधुनिक व्यावसायिक क्षेत्रों में सहकारिता की उपस्थिति को बढ़ावा देना।
- अगली पीढ़ी का नेतृत्व: युवा पीढ़ी को सहकारी मूल्यों से जोड़ना और क्षेत्र में स्टार्ट-अप संस्कृति को विकसित करना।

राष्ट्रीय सहकारिता नीति–2025 के प्रमुख प्रावधान
- मॉडल सहकारी ग्राम: प्रत्येक तहसील में पाँच मॉडल सहकारी ग्रामों की स्थापना, जिसकी शुरुआत गांधीनगर में पायलट परियोजना (NABARD के नेतृत्व में) से होगी।
- क्षेत्रीय विस्तार: सहकारिता को पर्यटन, टैक्सी सेवाएँ (सहकार टैक्सी), बीमा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बढ़ावा देना; जिससे होने वाला लाभ प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को मिलेगा।
- रोजगार एवं युवा जुड़ाव: प्रत्येक गाँव में एक सहकारी इकाई स्थापित कर रोजगार सृजन करना तथा युवाओं की भागीदारी बढ़ाना।
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: विशेषकर PACS में कंप्यूटरीकरण और तकनीक-आधारित पारदर्शी प्रबंधन पर बल, ताकि जवाबदेही बढ़े।
- समावेशिता पर ध्यान: ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को प्राथमिकता देते हुए समान विकास सुनिश्चित करना।
- प्रशिक्षण एवं शिक्षा: सहकारी क्षेत्र के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करने हेतु त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना।
- क्रियान्वयन रूपरेखा: कुल 83 बिंदुओं की पहचान, जिनमें से 58 पर कार्य पूर्ण, तथा प्रत्येक 10 वर्ष में कानूनी अद्यतन का प्रावधान।
- वैश्विक महत्त्वाकांक्षा: भारतीय सहकारी उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक बाजार तक पहुँच हेतु राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड की स्थापना।
सहकारी समितियों के बारे में
- सहकारी समितियाँ व्यक्तियों के स्वैच्छिक संघ हैं, जो अपने सामान्य आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक साथ जुड़ते हैं।
- ये परस्पर सहायता और स्व-सहायता के सिद्धांत पर कार्य करती हैं तथा लाभ अधिकतम करने की बजाय सदस्यों के कल्याण को प्राथमिकता देती हैं।
- भारत में सहकारी समितियों की स्थिति
- वर्तमान में देश में विभिन्न क्षेत्रों जैसे आवास, डेयरी, कृषि, वित्त आदि में 8 लाख से अधिक सहकारी समितियाँ पंजीकृत हैं।
- वर्ष 2021 में भारत सरकार द्वारा सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य ‘सहकार से समृद्धि’ के विजन को साकार करना है।
- क्षेत्राधिकार: सहकारिता राज्य का विषय है।
- संविधान की सातवीं अनुसूची के राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 32 में ‘सहकारी समितियाँ’ का उल्लेख किया गया है।
सहकारी बैंक
- सहकारी बैंक ऐसे वित्तीय संस्थान होते हैं, जो अपने सदस्यों के स्वामित्व और प्रबंधन में संचालित होते हैं, जहाँ सदस्य ही उनके ग्राहक भी होते हैं।
- ये सहयोग के सिद्धांत पर कार्य करते हैं तथा वाणिज्यिक बैंकों की तरह लाभ अधिकतम करने के बजाय सामुदायिक कल्याण और सदस्य सहायता पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
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भारत में सहकारी समितियों के प्रकार
- उपभोक्ता सहकारी समितियाँ: इनका उद्देश्य अपने सदस्यों को सस्ती कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण वस्तुएँ और सेवाएँ उपलब्ध कराना होता है।
- उदाहरण: केंद्रीय भंडार (Kendriya Bhandar), अपना बाजार (Apna Bazar)।
- उत्पादक सहकारी समितियाँ: ये छोटे उत्पादकों को संसाधन, तकनीक और बाजार तक पहुँच उपलब्ध कराकर सहायता प्रदान करती हैं।
- उदाहरण: अमूल डेयरी सहकारी, कर्नाटक हैंडलूम वीवर्स सहकारी समिति।
- विपणन सहकारी समितियाँ: ये कृषि एवं अन्य उत्पादों के सामूहिक विपणन को सुगम बनाती हैं, जिससे सदस्यों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है।
- ऋण सहकारी समितियाँ: ये अपने सदस्यों, विशेषकर ग्रामीण और वंचित समुदायों को ऋण और बचत जैसी वित्तीय सेवाएँ प्रदान करती हैं।
- उदाहरण: शहरी सहकारी बैंक, ग्रामीण सहकारी बैंक।
- आवास सहकारी समितियाँ: ये अपने सदस्यों को सस्ती आवास सुविधा उपलब्ध कराने हेतु संसाधनों को एकत्र कर सामूहिक रूप से आवास परियोजनाएँ विकसित करती हैं।
- बहु-राज्य बनाम एकल-राज्य सहकारी समितियाँ
- बहु-राज्य सहकारी समितियाँ एक से अधिक राज्यों में कार्य करती हैं और बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 द्वारा शासित होती हैं, जबकि एकल-राज्य सहकारी समितियाँ केवल एक राज्य में कार्य करती हैं और संबंधित राज्य सहकारी अधिनियम के अंतर्गत आती हैं।
- IFFCO, अमूल और NCDFI बहु-राज्य सहकारी समितियाँ हैं, जबकि राज्य सहकारी बैंक और PACS राज्य स्तरीय सहकारी समितियाँ हैं।
भारत में सहकारिता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- 97वाँ संवैधानिक संशोधन: इस संशोधन द्वारा संविधान में भाग IXB (सहकारी समितियाँ) जोड़ा गया।
- सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार: अनुच्छेद-19 (1) के अंतर्गत स्वतंत्रता के अधिकार में सहकारी समितियाँ बनाने के अधिकार को शामिल किया गया।
- अनुच्छेद-43-B: यह अनुच्छेद राज्य के नीति निदेशक तत्त्व (DPSP) में जोड़ा गया, जिसमें सहकारी समितियों के संवर्द्धन का प्रावधान किया गया है।
- बहु-राज्य सहकारी समितियाँ (संशोधन) अधिनियम, 2023: MSCS अधिनियम, 2002 में संशोधन कर इसे और सुदृढ़ किया गया, जिसका उद्देश्य शासन व्यवस्था को मजबूत करना, पारदर्शिता बढ़ाना, जवाबदेही सुनिश्चित करना, चुनाव प्रक्रिया में सुधार करना तथा बहु-राज्य सहकारी समितियों में 97वें संवैधानिक संशोधन के प्रावधानों को सम्मिलित करना है।
सहकारिता को मजबूत करने हेतु अन्य सरकारी पहलें
- सहकारिता मंत्रालय: वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की गई, जिसने सहकारी क्षेत्र की आवश्यकताओं और चुनौतियों को संबोधित करने हेतु एक समर्पित मंच प्रदान किया है।
- वित्तीय सहायता: सरकार विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से सहकारी समितियों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
- उदाहरण के लिए प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के कंप्यूटरीकरण योजना के अंतर्गत सरकार ने लगभग 63,000 PACS के कंप्यूटरीकरण हेतु ₹2,516 करोड़ आवंटित किए हैं।
- विभिन्न क्षेत्रों में सहकारिता का विस्तार
- डिजिटल सेवाएँ: ग्रामीण नागरिकों को विविध ई-सेवाएँ प्रदान करने हेतु PACS को कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।
- स्वास्थ्य: ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने हेतु PM भारतीय जन औषधि केंद्र, PACS द्वारा संचालित किए जा रहे हैं।
- ऊर्जा: PM-कुसुम अभिसरण योजना के अंतर्गत PACS, किसानों में सौर ऊर्जा अपनाने को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि सतत् कृषि को प्रोत्साहन मिले।
- मत्स्य पालन: मछुआरों को सशक्त बनाने और बाजार तक बेहतर पहुँच दिलाने हेतु फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FFPOs) का गठन किया जा रहा है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय सहकारिता नीति–2025 भारत की लगभग 8.48 लाख सहकारी समितियों को आधुनिक, तकनीक-आधारित हब में परिवर्तित करने का लक्ष्य रखती है। यह 50 करोड़ सदस्य विस्तार, PACS के सुदृढ़ीकरण और विकसित भारत @2047 के लक्ष्य के माध्यम से ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाते हुए मध्यस्थ-रहित समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है।