UPSC PYQs

Prelims, Mains & Optional PYQs

UPSC Notes

Comprehensive & Short Notes

भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में गिरावट: विदेशी निवेश की बदलती प्रकृति

11 Jun 2026

संदर्भ

भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) हाल के वर्षों में तीव्र रूप से घटा है, जिससे इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या यह निवेशकों के कम विश्वास को दर्शाता है या फिर वैश्विक पूँजी प्रवाह के बदलते रुझानों को प्रतिबिंबित करता है।

संबंधित तथ्य

  • भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) वर्ष 2020–21 में 44 अरब डॉलर के उच्च स्तर से घटकर वर्ष 2024–25 में 1 अरब डॉलर से कम हो गया, जिसके बाद वर्ष 2025–26 में यह पुनः बढ़कर लगभग 7.6 अरब डॉलर हो गया।
    • शुद्ध FDI की गणना FDI अंतःप्रवाह और FDI से संबंधित बहिर्प्रवाह के बीच अंतर के रूप में की जाती है, जिसमें पूँजी प्रत्यावर्तन (Capital repatriation) को शामिल किया जाता है।
  • इसके बावजूद, सकल FDI अंतःप्रवाह वर्ष 2025–26 जैसे वर्ष में लगभग 94.6 अरब डॉलर के उच्च स्तर पर बना रहा, जो दर्शाता है कि उच्च अंतःप्रवाह और कम शुद्ध प्रवाह एक साथ मौजूद हो सकते हैं।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के बारे में

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का अर्थ है किसी देश के व्यक्ति या कंपनी द्वारा दूसरे देश में स्थित व्यावसायिक हितों में किया गया निवेश।
  • कुछ क्षेत्रों में 100% FDI की अनुमति है- IT और सॉफ्टवेयर विकास, ई-कॉमर्स, नवीकरणीय ऊर्जा, ऑटोमोबाइल क्षेत्र, खाद्य प्रसंस्करण।
  • शासन व्यवस्था
    • भारत में FDI वर्तमान में FDI नीति 2020 तथा FEMA (गैर-ऋण साधन) नियम, 2019 के अंतर्गत संचालित होता है, जो विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 के ढाँचे के तहत जारी किए गए हैं।
    • उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT), जो वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आता है, भारत में FDI नीति के निर्माण और विनियमन के लिए प्रमुख प्राधिकरण है।
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) FDI विनियमों के कार्यान्वयन और निगरानी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है तथा FEMA के प्रावधानों के अनुपालन को सुनिश्चित करता है।
  • कुछ क्षेत्रों में FDI निषिद्ध है:
    • लॉटरी एवं जुआ
    • परमाणु ऊर्जा
    • तंबाकू
    • चिट फंड
  • FDI के दो मार्ग
    • स्वचालित मार्ग: इसमें पूर्व सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। निवेश FDI नीति के नियमों के अधीन सीधे अनुमत क्षेत्रों में किया जाता है। उदाहरण: अवसंरचना, आईटी तथा अधिकांश विनिर्माण क्षेत्र
    • सरकारी अनुमोदन मार्ग: इसमें संबंधित सरकारी प्राधिकरण या मंत्रालय से पूर्व अनुमति आवश्यक होती है। उदाहरण: रक्षा, मीडिया तथा मल्टी-ब्रांड खुदरा क्षेत्र।

1 12

भारत की FDI नीति का विकास

  • प्रारंभिक उद्देश्य (1991 के आर्थिक सुधारों के बाद): वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद, भारत की FDI नीति का मुख्य उद्देश्य प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निर्यात संवर्द्धन तथा विदेशी मुद्रा भंडार के संरक्षण के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करना था।
  • नीतिगत दृष्टिकोण में परिवर्तन: समय के साथ, नीतिगत दृष्टिकोण केवल विदेशी निवेश की गुणवत्ता एवं विकासात्मक प्रभाव पर केंद्रित रहने से हटकर FDI अंतःप्रवाह की अधिक मात्रा आकर्षित करने की ओर स्थानांतरित हो गया।
    • इस प्रक्रिया में, भविष्य के बाह्य भुगतान दायित्व, निवेश की गुणवत्ता, प्रौद्योगिकी का प्रसार तथा दीर्घकालिक आर्थिक लाभ जैसे मुद्दों पर तुलनात्मक रूप से कम ध्यान दिया गया।

FDI अंतःप्रवाह की परिवर्तित संरचना

  • प्रभावी FDI अंतःप्रवाह के हालिया विश्लेषण से निम्नलिखित तथ्य सामने आते हैं:
    • वास्तविक FDI (RFDI): 41.9%
    • वित्तीय निवेशक: 40.5%
    • प्रवासी एवं SPV-आधारित निवेश: 17.6%।
  • यह दर्शाता है कि FDI का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा नए उत्पादक निवेश के बजाय वित्तीय प्रवाह द्वारा संचालित हो रहा है।

FDI निवेशकों के विभिन्न प्रकार

वास्तविक FDI (RFDI)

  • वास्तविक FDI (RFDI) का अर्थ है पारंपरिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया गया निवेश, जो मेजबान देश में उत्पादन इकाइयाँ, सेवा संचालन, ब्रांड और दीर्घकालिक व्यावसायिक गतिविधियाँ स्थापित करती हैं।
  • ऐसे निवेशक सामान्यतः निम्नलिखित में योगदान देते हैं:
    • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण उन्नत उत्पादन विधियों एवं ज्ञान के माध्यम से।
    • रोजगार सृजन प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार अवसरों के माध्यम से।
    • उत्पादकता में सुधार बेहतर प्रबंधन पद्धतियों एवं वैश्विक मूल्य शृंखला में एकीकरण के माध्यम से।
      • उदाहरण: भारत में विदेशी विनिर्माण कंपनियों द्वारा कारखानों की स्थापना।

वित्तीय निवेशक

  • वित्तीय निवेशकों में प्राइवेट इक्विटी फंड, वेंचर कैपिटल फर्म, संप्रभु संपत्ति कोष तथा ‘एसेट मैनेजमेंट’ कंपनियाँ शामिल होती हैं, जो मुख्यतः वित्तीय प्रतिफल के लिए निवेश करती हैं।
  • इनका मुख्य उद्देश्य पूँजी प्रत्यावर्तन और नियोजित निकास होता है, न कि दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता की स्थापना।
  • ऐसे निवेश पूँजी उपलब्ध करा सकते हैं और कॉरपोरेट दक्षता में सुधार कर सकते हैं, लेकिन शेयर बिक्री, प्रत्यावर्तन या रणनीतिक विनिवेश के माध्यम से बड़े पैमाने पर निकास होने पर, सकल अंतःप्रवाह जारी रहने के बावजूद शुद्ध FDI घट सकता है।

प्रवासी निवेश एवं विशेष प्रयोजन साधन (SPVs)

  • कुछ FDI प्रवाह प्रवासी निवेश, विशेष प्रयोजन साधनों (SPVs) तथा अपतटीय वित्तीय केंद्रों के माध्यम से होते हैं।
  • इन संरचनाओं में विदेशी संस्थाएँ भारतीय पूँजी से जुड़ी होती हैं और इनमें कभी-कभी ‘राउंड-ट्रिपिंग’ भी शामिल हो सकती है, जिसमें घरेलू पूँजी विदेश जाकर पुनः विदेशी निवेश के रूप में भारत लौटती है।
  • ऐसे निवेश वित्तीय प्रवाह को बढ़ाते हैं, लेकिन यह हमेशा नई विदेशी पूँजी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण या अतिरिक्त उत्पादक क्षमता का प्रतिनिधित्व नहीं करते है।

भारत के आर्थिक रूपांतरण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की भूमिका

  • पूँजी निर्माण को बढ़ावा देता है: FDI घरेलू बचत का पूरक बनकर अवसंरचना, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के विस्तार हेतु दीर्घकालिक पूँजी प्रदान करता है, जिससे सतत् आर्थिक विकास को समर्थन मिलता है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सक्षम बनाता है: विदेशी निवेशक उन्नत प्रौद्योगिकी, नवाचार, प्रबंधकीय विशेषज्ञता और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ भी लाते हैं, जिससे भारतीय उद्योगों की उत्पादकता और प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ती है।
  • विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करता है: FDI औद्योगिक विकास, उत्पादन क्षमता विस्तार और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण को बढ़ावा देता है, जिससे भारत को विनिर्माण-आधारित विकास प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
  • रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है: विदेशी निवेश नए उद्यमों, आपूर्ति शृंखलाओं और मौजूदा व्यवसायों के विस्तार के माध्यम से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित करता है।
  • निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाता है: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत को वैश्विक बाजारों से जोड़ती हैं, जिससे निर्यात बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क में भागीदारी मजबूत होती है।
  • अवसंरचना विकास में सुधार करता है: FDI परिवहन, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में योगदान देता है, जिससे बाधाएँ कम होती हैं और आर्थिक दक्षता बढ़ती है।
  • MSMEs विकास को समर्थन देता है: विदेशी कंपनियाँ घरेलू फर्मों के साथ संबंध स्थापित कर तकनीक अपनाने, गुणवत्ता सुधार और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकरण को सक्षम बनाती हैं।
  • भुगतान संतुलन को मजबूत करता है: FDI गैर-ऋण आधारित विदेशी पूँजी प्रदान करता है, जिससे बाह्य वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और बाह्य ऋण पर निर्भरता कम होती है।
  • वैश्विक एकीकरण को बढ़ाता है: FDI भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भागीदारी को बढ़ाता है और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक साझेदारियों को सुदृढ़ करता है।

भारत में FDI को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियाँ/पहलें

  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना (2020): रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों में विदेशी निवेश आकर्षित करने और घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने हेतु प्रोत्साहन प्रदान करती है।
  • राष्ट्रीय सिंगल विंडो प्रणाली (2021): निवेशकों के लिए अनुमोदनों की प्रक्रिया को तेज करने हेतु एक एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रदान करती है और व्यापार सुगमता बढ़ाती है।
  • पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (2021): लागत कम करने और निवेश आकर्षित करने हेतु एकीकृत अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित करता है।
  • FDI नीति उदारीकरण उपाय: स्वचालित मार्ग का विस्तार और क्षेत्रीय सीमाओं में शिथिलता प्रदान कर प्रमुख क्षेत्रों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करता है।
  • GIFT सिटी–IFSC विकास: भारत को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र के रूप में विकसित कर वैश्विक वित्तीय संस्थानों और सीमा-पार निवेश को आकर्षित करता है।

FDI दृष्टिकोण संबंधी वर्तमान चुनौतियाँ

  • मात्रा पर अधिक ध्यान, गुणवत्ता पर कम: FDI की मात्रा बढ़ाने पर अत्यधिक बल इस बात को उपेक्षित कर सकता है कि क्या विदेशी निवेश वास्तव में उत्पादक क्षमता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक आर्थिक मूल्य उत्पन्न कर रहा है।
  • विनिर्माण पर सीमित प्रभाव: वास्तविक FDI (RFDI) की घटती हिस्सेदारी यह चिंता बढ़ाती है कि विदेशी निवेश पर्याप्त रूप से औद्योगिक विकास, विनिर्माण विस्तार और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण में योगदान नहीं दे रहा है।
  • बढ़ते पूँजी बहिर्वाह: बड़े पैमाने पर निवेशक निकास, विनिवेश और पूँजी प्रत्यावर्तन (Capital repatriation) बाह्य भुगतान दबाव बढ़ा सकते हैं और विदेशी पूँजी के दीर्घकालिक लाभ को कम कर सकते हैं।
  • जटिल पूँजी संरचनाएँ: विशेष प्रयोजन साधन (SPVs), संस्थाएँ और वित्तीय निवेश मार्गों का बढ़ता उपयोग यह स्पष्ट करना कठिन बनाता है कि कौन-सा निवेश वास्तविक विदेशी निवेश है और कौन-सा केवल वित्तीय पूँजी प्रवाह।
  • सीमित प्रौद्योगिकी प्रसार: FDI का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर वित्तीय निवेश, प्रायः प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, नवाचार या घरेलू उत्पादक क्षमता में सुधार नहीं कर पाता।
  • बढ़ते लाभ एवं रॉयल्टी बहिर्वाह: लाभांश, रॉयल्टी और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) भुगतान में वृद्धि बाह्य क्षेत्र पर दबाव डाल सकती है और FDI से होने वाले शुद्ध लाभ को घटा सकती है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन: FDI प्रायः सेवा क्षेत्र, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वित्त जैसे क्षेत्रों में केंद्रित रहता है, जबकि विनिर्माण जैसे गहन औद्योगिक परिवर्तन वाले क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम निवेश मिलता है।
  • वैश्विक पूँजी उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशीलता: वित्तीय निवेशकों पर बढ़ती निर्भरता अर्थव्यवस्था को अचानक पूँजी निकास, बाजार अस्थिरता और वैश्विक निवेश दृष्टिकोण में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।

आगे की राह

  • गुणवत्ता आधारित FDI पर ध्यान: भारत को केवल निवेश की मात्रा बढ़ाने के बजाय गुणवत्ता-आधारित FDI को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, विनिर्माण क्षमता, नवाचार और कुशल रोजगार सृजन में योगदान दे।
  • FDI डेटा पारदर्शिता में सुधार: FDI रिपोर्टिंग में नई पूँजी निवेश, वित्तीय निवेश और स्वामित्व पुनर्गठन लेन-देन के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए, ताकि विदेशी निवेश के वास्तविक लाभों का सही आकलन हो सके।
  • घरेलू विनिर्माण तंत्र को मजबूत करना: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना, अवसंरचना विकास और कौशल उन्नयन कार्यक्रमों के माध्यम से दीर्घकालिक निवेशकों को आकर्षित किया जाना चाहिए और विनिर्माण विकास को बढ़ावा देना चाहिए।
  • बाह्य संवेदनशीलताओं का प्रबंधन: भारत को पूँजी बहिर्वाह, रॉयल्टी एवं बौद्धिक संपदा भुगतान तथा लाभ प्रत्यावर्तन पर सतत् निगरानी रखनी चाहिए ताकि बाह्य क्षेत्र की स्थिरता बनी रहे।
  • ग्रीनफील्ड’ निवेश को बढ़ावा: भारत को ग्रीनफील्ड FDI को प्रोत्साहित करना चाहिए, जो नई उत्पादन इकाइयाँ स्थापित कर औद्योगिक क्षमता विस्तार और रोजगार सृजन करता है।
  • निर्यात-उन्मुख FDI को प्रोत्साहन: ऐसी नीतियाँ अपनाई जानी चाहिए, जो निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता, भारत का वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण और विनिर्माण आधार को मजबूत करें।
  • घरेलू निवेश क्षमता को सशक्त बनाना: घरेलू कारोबारी वातावरण में सुधार कर और भारतीय उद्यमों को समर्थन देकर विदेशी पूँजी पर अत्यधिक निर्भरता कम की जानी चाहिए।
  • संतुलित नियामक ढाँचा सुनिश्चित करना: भारत को ऐसा ढाँचा बनाए रखना चाहिए, जो निवेशकों का विश्वास बनाए रखते हुए राष्ट्रीय आर्थिक हितों की रक्षा करे और सतत् विकास लक्ष्यों को समर्थन दे।

आधार अंतःप्रवाह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Inward FDI) बहिर्प्रवाह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Outward FDI)
अर्थ विदेशी कंपनियों या निवेशकों द्वारा घरेलू अर्थव्यवस्था में किया गया निवेश। घरेलू कंपनियों या निवेशकों द्वारा विदेशी देशों में किया गया निवेश।
पूँजी प्रवाह की दिशा पूँजी विदेशी अर्थव्यवस्थाओं से भारत में प्रवाहित होती है। पूँजी भारत से बाहर विदेशी बाजारों में प्रवाहित होती है।
उद्देश्य व्यवसाय स्थापित करना, कंपनियों का अधिग्रहण, संचालन का विस्तार या भारतीय बाजारों तक पहुँच। वैश्विक विस्तार, संसाधनों की प्राप्ति, तकनीक तक पहुँच और नए बाजारों में प्रवेश।
अर्थव्यवस्था पर प्रभाव विदेशी पूँजी में वृद्धि, निवेश, रोजगार और विकास को बढ़ावा। घरेलू पूँजी में कमी हो सकती है, पर भारतीय कंपनियों को वैश्विक बनाने में सहायता।
भुगतान संतुलन (BoP) वित्तीय खाते में अंतःप्रवाह के रूप में दर्ज। वित्तीय खाते में बहिर्प्रवाह के रूप में दर्ज।
उदाहरण विदेशी ऑटोमोबाइल कंपनी द्वारा भारत में विनिर्माण संयंत्र स्थापित करना। भारतीय कंपनी द्वारा किसी विदेशी कंपनी का अधिग्रहण या विदेश में सहायक कंपनी स्थापित करना।
मुख्य लाभ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, रोजगार सृजन, उत्पादकता में वृद्धि और वैश्विक मूल्य शृंखला से जुड़ाव। विदेशी बाजारों, संसाधनों और प्रौद्योगिकी तक पहुँच तथा वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता।
संभावित चिंताएँ लाभ प्रत्यावर्तन, रॉयल्टी भुगतान और विदेशी निवेश पर निर्भरता। पूँजी बहिर्गमन, संभावित पूँजी पुनर्चक्रण और विदेशी मुद्रा संसाधनों पर दबाव।
प्रमुख निवेशक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, संप्रभु संपत्ति कोष, निजी इक्विटी फंड, विदेशी संस्थागत निवेशक। भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, व्यावसायिक समूह और घरेलू निवेशक।
भारत संदर्भ में उदाहरण विदेशी कंपनियों द्वारा भारत के विनिर्माण, सेवा और अवसंरचना क्षेत्रों में निवेश। भारतीय कंपनियों द्वारा सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, यूरोप या अन्य वैश्विक बाजारों में निवेश।

निष्कर्ष

भारत के FDI परिदृश्य का मूल्यांकन केवल सकल अंतःप्रवाह या घटते शुद्ध प्रवाह के आधार पर नहीं किया जा सकता है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी निवेश प्रौद्योगिकी सृजन, विनिर्माण विकास, रोजगार सृजन और सतत् बाह्य संतुलन में योगदान दे। भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति के लिए FDI की मात्रा से FDI की गुणवत्ता की ओर परिवर्तन आवश्यक है।

भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में गिरावट: विदेशी निवेश की बदलती प्रकृति

Explore UPSC Foundation Batches

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Free Counselling for UPSC Aspirants

Connect with our experts and take the right next step.

Expert Guidance
Personalized Strategy
100% Free

Book Your Free Session

NEED ASSISTANCE?

Request a Callback

Our counsellor will connect with you and help you choose the right course and centre.

  • Expert Guidance
  • Course & Fee Information
  • Quick Callback Support

Request a Callback

Books
UPSC PYQs
UPSC Notes
Current Affairs
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.